कर्नाटक में कांग्रेस और जनता दल सेकुलर की गठबंधन सरकार एक बार फिर से खतरे में है. कांग्रेस के 13 विधायकों ने विधानसभा से इस्तीफा दे दिया है. अभी इन विधायकों का इस्तीफा विधानसभा के स्पीकर ने स्वीकार नहीं किया है. ये सभी विधायक मुंबई के एक होटल में हैं. अगर इनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया जाता है तो कर्नाटक की एचडी कुमारस्वामी सरकार अल्पमत में आ जाएगी और भाजपा का बहुमत हो जाएगा.

इस बीच कुमारस्वामी सरकार के सभी 21 मंत्रियों ने इस्तीफा दे दिया है. कहा जा रहा है कि विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा देने वाले विधायकों को मंत्री बनाकर वापस कांग्रेसी खेमे में लाने के मकसद से मंत्रियों के इस्तीफे लिए गए हैं. कर्नाटक में चल रहे इस राजनीतिक नाटक में कांग्रेस और जेडीएस की ओर से लगातार भाजपा पर यह आरोप लगाया जा रहा है कि भाजपा कर्नाटक सरकार को अस्थिर करके अपनी सरकार बनाना चाहती है.

2018 में हुए कर्नाटक विधानसभा चुनावों के बाद कई बार यह स्थिति आई जब लगा कि भाजपा एचडी कुमारस्वामी की सरकार को अस्थिर करने की कोशिश कर रही है. लेकिन सुनी-सुनाई है कि इस बार कहानी कुछ अलग है. इस बार कर्नाटक में जो कुछ हो रहा है उसमें भाजपा से अधिक कांग्रेस का खुद का हाथ बताया जा रहा है.

कहा जा रहा है कि अगर भाजपा को कुमारस्वामी सरकार को अस्थिर करना होता तो इसके लिए पार्टी संसद का सत्र खत्म होने तक इंतजार करती. क्योंकि संसद के सत्र के दौरान अगर भाजपा कर्नाटक में कुछ गड़बड़ करती है तो उसका असर संसद की कार्यवाही पर भी पड़ना तय है. मोदी सरकार को इस सत्र में कई महत्वपूर्ण विधेयक पारित कराने हैं. इसके लिए राज्यसभा में उसे विपक्षी दलों का भी साथ चाहिए होगा. राजनीतिक जानकार मान रहे हैं कि ऐसी स्थिति में भाजपा कर्नाटक में कोई गड़बड़ करके संसद में अपनी स्थिति खराब करना नहीं चाहेगी.

कर्नाटक में जो भी सियासी घटनाक्रम चल रहा है, उसके पीछे कांग्रेस का हाथ होने की कई वजहें बताई जा रही हैं. पहली बात तो यही कही जा रही है कि अपने मुकाबले आधी सीटों वाली जेडीएस को 14 महीने तक मुख्यमंत्री पद देने के बाद अब कांग्रेस को लग रहा है कि किसी भी तरह से एचडी कुमारस्वामी पर दबाव बनाकर उनसे मुख्यमंत्री का पद ले लिया जाए. लोकसभा चुनावों को देखते हुए कांग्रेस ने कम सीटों वाली जेडीएस को मुख्यमंत्री की कुर्सी देने का निर्णय लिया था. अब उसे लगता है कि कुमारस्वामी को बनाए रखने का राजनीतिक तौर पर कोई खास लाभ नहीं है.

लोकसभा चुनावों में जेडीएस का प्रदर्शन बहुत ही बुरा रहा. पार्टी के सबसे बड़े नेता और पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा तक इस बार चुनाव हार गए और जेडीएस को सिर्फ एक ही सीट पर सफलता मिल सकी. कांग्रेस को भी एक ही सीट से संतोष करना पड़ा. जेडीएस की इस कमजोर स्थिति को देखते हुए कर्नाटक कांग्रेस के कुछ नेताओं को लग रहा है कि उस पर दबाव बनाकर मुख्यमंत्री की कुर्सी वापस लेने का यही सही वक्त है. अभी कांग्रेसी दबाव को अगर कुमारस्वामी नहीं मानते हैं और भाजपा के पाले में जाते हैं तो वहां भी उन्हें मुख्यमंत्री का पद नहीं मिलेगा. ऐसे में कांग्रेस को लगता है कि कुमारस्वामी के पास मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बावजूद कांग्रेस के साथ बने रहने के अलावा कोई दूसरा व्यवहारिक विकल्प नहीं है.

सुनी-सुनाई तो यह भी है कि कुमारस्वामी के देश से बाहर होने की स्थिति का लाभ उठाते हुए कर्नाटक में जो कुछ चल रहा है, उसकी पटकथा कांग्रेस के ही कुछ नेताओं ने तैयार की. इसमें भी पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार का नाम प्रमुखता से लिया जा रहा है. इसके पक्ष में यह तर्क दिया जा रहा है कि लगातार ये दोनों नेता कह रहे हैं कि वे इस्तीफा देने वाले कांग्रेसी विधायकों के संपर्क में हैं और वे सभी विधायक कांग्रेस के पाले में वापस आ जाएंगे. कुछ खबरों में भी दावा किया गया है कि इस्तीफा देने वाले विधायकों में अधिकांश सिद्धारमैया के करीबी हैं.

कहा तो यह भी जा रहा है कि कांग्रेस की सहमति से ही इस्तीफा देने वाले विधायकों ने मुंबई में ठहरने का निर्णय लिया. महाराष्ट्र में भाजपा की सरकार है और इस राज्य की राजधानी में विधायकों को ठहराने से लोगों के बीच यह संकेत जाएगा कि इस पूरी उठापटक के पीछे भाजपा का हाथ हो सकता है.

अब यह खबर आ रही है कि कर्नाटक विधानसभा के स्पीकर जब तक 13 कांग्रेसी विधायकों के इस्तीफे पर विचार करेंगे तब तक इन्हें सरकार में मंत्री पद का प्रस्ताव देकर मना लिया जाएगा. लेकिन अगर ऐसा हो जाता है तो भी अब इस बात की काफी संभावना है कि कर्नाटक के मुख्यमंत्री का पद कुमारस्वामी के पास नहीं रहेगा. उस हालत में कर्नाटक के नए मुख्यमंत्री के तौर पर सिद्धारमैया या डीके शिवकुमार के शपथ लेने की पूरी संभावना है.