उत्तर प्रदेश में 17 पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जातियों में शामिल करने के योगी सरकार के फैसले ने उल्टे उसकी खूब किरकिरी करा दी है. पूरी तरह नियम कानूनों को समझे बिना जल्दबाजी में किए गए इस अति उत्साही फैसले पर बसपा और समाजवादी पार्टी त्योरियां चढ़ातीं, इससे पहले ही केंद्र ही ही भाजपा सरकार ने उसे असहज करने की वजह दे दी. केंद्रीय सामाजिक न्याय मंत्री थाबर चन्द गहलोत ने लोकसभा में उसके इस फैसले को यह कह कर ठुकरा दिया कि राज्य सरकार का यह फैसला संविधान के अनुरूप नहीं है. हालांकि एक दिन बाद राज्यसभा में उन्होंने यह कहकर राज्य सरकार को थोड़ी राहत दी कि उन्होंने फैसले को गलत नहीं ठहराया था बल्कि फैसले के लिए अपनाई गई प्रक्रिया से असहमति जताई थी.

लेकिन राज्य सरकार के फैसले पर दूसरी असहमति इलाहाबाद हाईकोर्ट से आ गई. इलाहाबाद हाईकोर्ट की इलाहाबाद बेंच ने प्रदेश के जिला प्रशासन द्वारा 17 पिछड़ी जातियों के लिए अनुसूचित जाति के प्रमाण पत्र जारी करने पर रोक लगा दी. इस मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय में पहले से ही एक मुकदमा चल रहा था और अब राज्य सरकार को भी यह स्वीकार करना पड़ गया है कि इस प्रकरण में अब वह कोई भी फैसला हाईकोर्ट के अंतिम निर्णय के बाद ही करेगी.

इससे पहले बरती जल्दबाजी के पीछे बड़ा कारण यह माना जा रहा है कि योगी सरकार इसके जरिए राज्य के 12 विधानसभा उप चुनावों को साधना चाहती थी. सूबे की आबादी में इन 17 पिछड़ी जातियों की तादाद लगभग एक करोड़ है. इन जातियों मे सबसे अधिक 10.25 फीसदी हिस्सेदारी निषाद जाति की है. राजभर 1.32 फीसदी हैं और कुम्हारों की 1.84 फीसदी हिस्सेदारी है. इन जातियों के समकक्ष कुछ जातियां पहले से ही अनुसूचित जातियों में शामिल हैं इसलिए इन जातियों की ओर से काफी पहले से खुद को अनुसूचित जातियों में शामिल किए जाने की मांग की जाती रही है.

राजनीतिक दलों ने पहले भी अलग अलग दौर में इन जातियों को अनुसूचित जातियों में शामिल करने के प्रयास किए हैं. 2005 में मुलायम सिंह यादव, 2007 में मायावती और 2012 व 2016 में अखिलेश यादव ने अपने-अपने तरीकों से इसका प्रयास किया था. मुलायम सिंह के प्रस्ताव पर हाईकोर्ट ने रोक लगा दी थी. मायावती ने केंद्र सरकार को पत्र लिखकर इसकी कोशिश की थी जो सफल नहीं हुई. उधर, अखिलेश यादव ने कैबिनेट प्रस्ताव के जरिए इसका प्रयास किया था जिस पर बीआर अंबेडकर ग्रंथालय एवं जनकल्याण परिषद नाम की एक संस्था इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दायर करके स्थगन आदेश प्राप्त कर लिया था. इस याचिका पर अब अंतिम निर्णय आना है.

लेकिन कानूनी अड़चनों के अलावा भी इस मामले में असहमति के कई सुर हैं. उत्तर प्रदेश और केंद्र में भाजपा के सहयोगी अपना दल का कहना है कि जातियों की सामाजिक-आर्थिक गणना किए बिना आरक्षण में बंटवारे का कोई प्रयास नहीं किया जाना चाहिए. कुछ समय पहले तक उत्तर प्रदेश सरकार की सहयोगी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के ओम प्रकाश राजभर भी जातियों के बंटवारे से ज्यादा पिछड़े वर्ग की जातियों को तीन श्रेणियों में बांटने की पैरवी करते रहे थे. एक समय में भाजपा भी इस प्रस्ताव के पक्ष में दिखती थी लेकिन बाद में इससे होने वाले राजनीतिक नुकसान को समझते हुए पार्टी मुखिया अमित शाह ने लोकसभा चुनावों से पहले इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया. सुभासपा और भाजपा के रिश्ते टूटने को एक बड़ी वजह यह भी थी.

केन्द्र सरकार में सहयोगी रिपब्लिकेशन पार्टी ऑफ इंडिया के रामदास अठावले, जो केंद्र सरकार में सामाजिक न्याय व अधिकारिता राज्य मंत्री भी हैं, इस मामले में जातियों के बंटवारे के साथ साथ आरक्षण में भी बंटवारे की वकालत कर रहे हैं. उनका कहना है कि राज्य सरकार ओबीसी आरक्षण में पांच फीसदी की कमी करके उसे अनुसूचित जति के कोटे में जोड़ने के बाद ही 17 पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जातियों में शामिल करने का कदम उठाए. खुद भाजपा के लिए भी इस प्रस्ताव को लागू करने की राह में कई राजनीतिक जोखिम हैं. राज्य में कोरी, पासी, खटिक, वाल्मीकि और धानुक आदि दलित जातियां भाजपा समर्थक मानी जाती हैं. इन जातियों के हिस्से के आरक्षण में अगर 17 और जातियों को शामिल किया जाएगा तो इससे उनको मिलने वाले आरक्षण में कमी आ जाएगी. यह भाजपा समर्थक मानी जाने वाली दलित जातियों के मोहभंग की वजह भी बन सकती है. इसी कारण पार्टी ने अब अपने प्रस्ताव पर ठंडा रुख अपनाने का फैसला कर लिया है.

योगी आदित्यनाथ सरकार ने 17 पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जातियों में शामिल करने का फैसला इलाहाबाद हाईकोर्ट के 29 मार्च 2017 निर्देश के आधार पर किया था. इस निर्देश में हाईकोर्ट ने इन 17 जातियों को अनुसूचित जाति के प्रमाण पत्र जारी करने पर लगी रोक यह कहते हुए हटा दी थी कि इन प्रमाण पत्रों की वैधता हाईकोर्ट के अंतिम फैसले से ही तय होगी. लेकिन अब चारों ओर से हो रही आलोचनाओं और आपत्तियों के कारण राज्य सरकार बैकफुट पर आ गई है. अब यह तय किया गया है कि हाईकोर्ट का फैसला अगर अनुकूल आता है तभी 17 पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने का प्रस्ताव विधिवत तरीके से केंद्र सरकार को भेजा जाएगा.

वैसे भी इस बार राज्य सरकार ने इस फैसले के लिए जो तरीका अपनाया था उसमें अनेक खामियां थीं. सरकार को इन पिछड़ी जातियों को अनुसूचित जाति में शामिल करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 341 (1) के अनुसार प्रस्ताव तैयार करके उसे राज्य कैबिनेट की मंजूरी के बाद केंद्रीय सामाजिक न्याय मंत्रालय को भेजना चाहिए था. मंत्रालय इसे रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया और केंद्रीय अनुसूचित जाति आयोग के पास सहमति के लिए भेजता. दोनों की सहमति के बाद केंद्र सरकार को इस बाबत विधेयक संसद में लाना होता. दोनों सदनों से पारित हो जाने के बाद राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद 17 पिछड़ी जातियां अनुसूचित जाति में स्थाई रूप से शामिल हो जातीं. लेकिन ज्यादा वाहवाही के चक्कर में योगी आदित्यनाथ सरकार ने शार्टकट अपनाया जो अब भारी पड़ रहा है.

हालांकि राज्य सरकार के पास एक और शार्टकट तरीका भी था जो अधिकारियों की लापरवाही के कारण अमल में नहीं लाया जा सका. दरसल इन 17 पिछड़ी जातियों से संबंधित कुछ जातियां पहले से ही अनुसूचित जातियों में शामिल रही हैं. राज्य सरकार को इन 17 जातियों को पहले से शामिल जातियों का पर्यायवाची बताते हुए राज्यपाल को प्रस्ताव भेजना चाहिए था कि इन जातियों को पिछड़े वर्ग से हटा दिया जाए. ऐसी स्थिति में विवाद भी नहीं होता और हाईकोर्ट के फैसले के अनुरूप राज्य सरकार अनुसूचित जाति के प्रमाण पत्र भी जारी कर पाती.

बहरहाल राज्य सरकार के जल्दबाजी में लिए गए एक अधकचरे निर्णय ने उत्तर प्रदेश में नए जातीय असंतोष को फैलने का मौका दे दिया है, अगर यह असंतोष भड़क गया तो इसका सीधा असर विधानसभा उपचुनावों में देखने को मिल सकता है. यह भाजपा के विजय रथ के चक्कों के आगे बड़ी बाधाएं भी खड़ी कर सकता है.