देश के अलग-अलग राज्यों में पुलिसकर्मियों के करीब 5.28 पद खाली हैं. यह जानकारी गृह मंत्रालय द्वारा जारी एक रिपोर्ट में सामने आई है. इस मामले में देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश की स्थिति सबसे बुरी है. यहां पुलिसकर्मियों के 1.29 लाख पद खाली हैं. इसके बाद बिहार का नंबर आता है जहां यह संख्या करीब 50 हजार है. उससे थोड़ा ही पीछे पश्चिम बंगाल है जहां पुलिस विभाग में 49 हजार रिक्तियां हैं.

गृह मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि देश के सभी राज्यों में पुलिस बलों के कुल स्वीकृत पदों की संख्या 23 लाख 79 हजार 728 है. इनमें से 18 लाख 51 हज़ार 332 पद एक जनवरी 2018 तक भर लिए गए थे. मंत्रालय के एक अधिकारी के मुताबिक फिलहाल सभी राज्यों में कुल पांच लाख 28 हज़ार 396 पद खाली पड़े हैं.

अंतरराष्ट्रीय मानक कहते हैं कि प्रति एक लाख लोगों पर 222 पुलिसकर्मी होने चाहिए. भारत में कुल पदों को देखें तो यह आंकड़ा 182 पुलिसकर्मी प्रति लाख बनता है. लेकिन स्थिति इससे भी खराब है क्योंकि बड़ी संख्या में पद खाली हैं. जमीनी हालत देखें तो भारत में एक लाख लोगों की सुरक्षा के लिए महज 139 पुलिसकर्मी हैं. समय के साथ आतंकवाद से लेकर मनी लॉन्डरिंग और साइबर क्राइम जैसे तमाम अपराधों का दायरा बढ़ा है. संख्या बल की कमी के साथ इन तथ्यों को मिला दें तो इसका सीधा असर पुलिस के कामकाज पर पड़ रहा है.

इसे इस तरह से भी समझा जा सकता है कि 2005-2015 के बीच प्रति एक लाख जनसंख्या पर अपराध दर में 28 फीसदी की वृद्धि हुई है. लेकिन अपराध साबित होने की दर कम है. 2015 में भारतीय दंड संहिता, 1860 के तहत पंजीकृत 47 फीसदी मामलों में ही अपराध साबित हुए थे. विधि आयोग का मानना है कि इसके पीछे एक मुख्य कारण अच्छी तरह से जांच न होना है और कई मानते हैं कि इसका कारण संख्या बल सहित तमाम मोर्चों पर पुलिस का पिछड़ना है.