बीते साल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान परमाणु समझौते से अलग होकर उस पर कई तरह के प्रतिबंध लगा दिए थे. डोनाल्ड ट्रंप का कहना था कि वे ईरान पर इतना दबाव बना देंगे की वह अमेरिका के सामने घुटने टेकने के लिए मजबूर हो जाएगा. इसके बाद से ट्रंप अपनी इसी नीति के तहत लगातार ईरान पर प्रतिबंध कड़े करते गए. लेकिन बीते एक महीने में ईरान ने इस मामले पर जो रुख अपनाया है, उसने अमेरिका सहित पूरी दुनिया को हैरान कर दिया है.

ईरान ने कथित रूप से मध्यपूर्व के होर्मुज जल संधि क्षेत्र में छह तेलवाहक जहाजों पर मिसाइल से हमले किए हैं. उसने इसी क्षेत्र में अमेरिका के एक अति-उन्नत निगरानी ड्रोन-विमान को मार गिराया. इसके अलावा उसने अमेरिका और यूरोप की चेतावनियों के बाद भी 2015 परमाणु समझौते यानी जॉइंट कॉम्प्रिहेंशन प्लान ऑफ एक्शन (जेसीपीओए) की सबसे बड़ी शर्त तोड़ दी और तय सीमा से ज्यादा यूरेनियम को संवर्धित किया. सयुंक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सभी सदस्यों, जर्मनी और यूरोपीय संघ के साथ हुए इस परमाणु समझौते में ईरान के लिए 3.67 फीसदी की यूरेनियम संवर्धन सीमा तय की गयी थी. लेकिन बीते सोमवार को ईरान ने यूरेनियम को 4.5 फीसदी तक संवर्धित करने की घोषणा कर दी. ईरान ने यह भी कहा है कि अगर परमाणु समझौते के अन्य सदस्य देश उसकी मदद में आगे नहीं आए तो वह इस संवर्धन के स्तर में और बढ़ोत्तरी करेगा.

होर्मुज जल संधि क्षेत्र में एक तेल वाहक जहाज पर हुए हमले के बाद का दृश्य | फोटो : एएफपी
होर्मुज जल संधि क्षेत्र में एक तेल वाहक जहाज पर हुए हमले के बाद का दृश्य | फोटो : एएफपी

ईरान के इस रुख के बाद एक बात साफ़ है कि वह हाल-फिलहाल अमेरिका के सामने झुकने वाला नहीं है और उसने अमेरिका को कड़ा जवाब देने का मन बना लिया है. ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर ईरान अमेरिकी प्रतिबंधों से खराब होती अपनी आर्थिक स्थिति के बाद भी उसके सामने झुक क्यों नहीं रहा? साथ ही उसने दुनिया के सबसे ताकवर देश के सामने उग्र या टकराव वाला रुख क्यों अपना लिया है?

ईरान और अमेरिका मामले पर नजर रखने वाले जानकार ईरान के इस रुख की कई वजहें बताते हैं. इन लोगों के मुताबिक डोनाल्ड ट्रंप इस समय ईरान के खिलाफ वास्तव में युद्ध नहीं छेड़ना चाहते. इसकी पहली वजह अमेरिकी संसद और वहां के लोगों का युद्ध के पूरी तरह खिलाफ होना है.

बीते कुछ समय से अमेरिका में जो भी सर्वेक्षण हुए हैं उनमें अधिकांश लोगों ने यही कहा है कि अब अमेरिका को खुद को किसी युद्ध में नहीं फंसाना चाहिए. लोगों का कहना है कि अगर इराक युद्ध में खर्च किया गया छह खरब डॉलर अमेरिका में लगाया जाता तो देश की तस्वीर ही बदल जाती. अमेरिका का कुल वार्षिक बजट करीब एक खरब रुपए के करीब ही रहता है.

विशेषज्ञों के मुताबिक डोनाल्ड ट्रंप अमेरिकियों की नाराजगी मोल नहीं लेना चाहेंगे क्योंकि अगले साल ही उन्हें चुनावी मैदान में उतरना है. अमेरिकी जानकारों के एक धड़े का यह भी मानना है कि ट्रंप खुद भी युद्ध नहीं करना चाहते बल्कि उनकी नीति हमेशा से अमेरिकी फौजों को युद्धग्रस्त क्षेत्रों से निकालने की रही है. सीरिया और अफगानिस्तान से सैनिक वापस बुलाना इसके ताजा उदहारण हैं.

ईरान को लेकर दुनियाभर में जैसी परिस्थितियां बनी हैं, उनमें अमेरिका को ईरान पर हमला करने के बाद अकेले पड़ जाने का डर भी है. विशेषज्ञों की मानें तो इराक और अफगानिस्तान में जब अमेरिका ने हमला किया था तब उसके पास एक बड़ी वजह थी. लेकिन ईरान के मामले में ऐसा नहीं है. ईरान के खिलाफ जो कुछ हो रहा है, वह साफ़ तौर पर डोनाल्ड ट्रंप की जिद का नतीजा लगता है. अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) और 2015 परमाणु समझौते में शामिल रहे अन्य देशों का कहना है कि अमेरिका का समझौते से हटना और ईरान पर प्रतिबंध लगाना गलत है. इनके मुताबिक यह समझौता सही था और ईरान इसकी शर्तों का पालन भी कर रहा था. कूटनीति के जानकार कहते हैं कि अब अगर ऐसे में अमेरिका ईरान पर हमला करता है तो तबाही के लिए उसे ही कोसा जाएगा और इस लड़ाई में वह अकेला पड़ सकता है.

हाल में अमेरिकी राष्ट्रपति ने दो बार ऐसे संकेत भी दिए जिनसे पता लगता है कि अमेरिका की ओर से युद्ध छिड़ने की संभावना काफी कम है. ईरान द्वारा अमेरिकी ड्रोन विमान मार गिराए जाने के बाद उन्होंने ईरान पर छोटे हमले का आदेश देकर उसे वापस ले लिया था. इसके बाद बीते महीने टाइम पत्रिका को दिए एक साक्षात्कार में डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि वे तेलवाहक टैंकरों पर हमले की घटनाओं को बहुत मामूली मानते हैं. उन्होंने साफ़ संकेत दिया कि इस तरह के हमले के चलते युद्ध नहीं छिड़ेगा.

ईरान अमेरिका के खिलाफ उसकी ही नीति अपना रहा है

अमेरिका के कैलिफोर्निया स्थित नौसैनिक स्नातकोत्तर संस्थान में ईरान मामलों के विशेषज्ञ अफशोन ओस्तोवार एक अमेरिकी न्यूज़ वेबसाइट को दिए साक्षात्कार में कहते हैं कि ईरान ये सभी बातें अच्छे से जानता है. उसे पता है कि अमेरिका उसके खिलाफ युद्ध की कोई बड़ी कार्रवाई नहीं करेगा. लेकिन ईरान को यह भी पता है कि ट्रंप लगातार उसके खिलाफ प्रतिबंधों को कड़ा करते रहेंगे. अफशोन ओस्तोवार के मुताबिक ऐसे में ईरान अमेरिका के खिलाफ उसकी ही नीति अपना रहा है. वह भी अमेरिकी राष्ट्रपति पर दबाव बनाकर उन्हें प्रतिबंधों में ढील देने और 2015 में हुए समझौते पर ही तैयार होने को मजबूर करना चाहता है.

कूटनीति के विशेषज्ञों की मानें तो कि ईरान के पास अमेरिका पर दवाब बनाने के लिए होर्मुज जल संधि क्षेत्र से बेहतर विकल्प कोई नहीं हो सकता. दरअसल, मध्यपूर्व से दुनिया भर में तेल और गैस का निर्यात इसी रास्ते से होता है. और ये दोनों उत्पाद दुनिया के अधिकांश देशों की अर्थव्यवस्था का सबसे जरूरी हिस्सा हैं. यही वजह थी कि जब छह तेल टैंकरों पर मिसाइल से हमले हुए तो इससे केवल अमेरिका ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया पर दवाब बढ़ा. यूरोपीय देश जो पिछले कुछ समय से ईरान मामले पर चुप बैठ गए थे, उन्होंने भी अमेरिका पर नए सिरे से दबाव बनाना शुरू कर दिया.

किंग्स कॉलेज लंदन में मध्यपूर्व मामलों के चर्चित विशेषज्ञ एंड्रियास क्रिग सीएनबीसी से बातचीत में कहते हैं, ‘ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली ख़ामेनेई ने अमेरिकियों को धमकी देते हुए कहा था कि हम उस जगह पर चोट पहुंचाएंगे जहां से सबसे ज्यादा दर्द होगा.’ एंड्रियास क्रिग के मुताबिक होर्मुज जल संधि क्षेत्र पूरी दुनिया के लिए ऊर्जा की जीवन रेखा सरीखा है, ऐसे में यहां हमले से ज्यादा दर्द होना स्वाभाविक है.

होर्मुज क्षेत्र में हुई इन घटनाओं ने सबसे ज्यादा अमेरिका के चहेते सऊदी अरब को चिंतित कर दिया है. दरअसल, यह क्षेत्र सऊदी अरब के तेल निर्यात का एक मात्र रास्ता है. ईरान के तेलवाहक जहाजों पर हमले के बाद उसने न केवल अमेरिका पर दबाव बनाया, बल्कि सभी देशों से इस क्षेत्र में सुरक्षा देने की भी गुहार लगाई है.

जानकारों की मानें तो भले ही ईरान के हमलों के बाद उसके और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ता दिख रहा हो. लेकिन हकीकत तो यह है कि इसके बाद से इस मुद्दे पर अमेरिका की भी हालत ‘न निगलते बने और न उगलते’ जैसी होती जा रही है. ईरान के इन कथित हमलों के बाद डोनाल्ड ट्रंप और उनके मंत्रियों द्वारा ईरान को बिना शर्त बातचीत का कई बार न्योता देना बताता है कि अब इस मामले पर अमेरिका भी कम दवाब में नहीं है.