सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को अयोध्या विवाद में मध्यस्थता प्रक्रिया को खत्म करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया है. शीर्ष अदालत का कहना है कि यदि उसे ऐसा लगा कि इस दिशा में कुछ खास नहीं हुआ है तो 25 जुलाई से अयोध्या मामले में रोज सुनवाई होगी. इस खबर को आज के अधिकतर अखबारों ने पहले पन्ने पर जगह दी है.

इससे पहले सुप्रीम कोर्ट में एक पक्षकार ने याचिका दायर की थी. इसमें उसका कहना था कि मध्यस्थता को लेकर किए गए प्रयासों से अयोध्या विवाद सुलझाने की दिशा में कोई खास प्रगति नहीं हुई है, लिहाजा इसे रोकर सुप्रीम कोर्ट मामले की जल्द सुनवाई करे. इससे पहले बीते मार्च में शीर्ष अदालत ने पूर्व न्यायाधीश एफएम कलीफुल्ला की अध्यक्षता में एक तीन सदस्यीय मध्यस्थता पैनल बनाया था. इस पैनल को अपनी रिपोर्ट देने के लिए 15 अगस्त तक का वक्त दिया गया है.

महाराष्ट्र : विधानसभा चुनाव से तीन महीने पहले मुख्य निर्वाचन अधिकारी का तबादला

महाराष्ट्र की देवेंद्र फड़णवीस सरकार ने विधानसभा चुनाव से तीन महीने पहले राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) अश्वनी कुमार का तबादला कर दिया है. उनकी जगह बलदेव हरपाल सिंह को इस पद पर तैनात किया गया है. द टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक अश्वनी कुमार ने लोकसभा चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ आचार संहिता के उल्लंघन के दो मामलों पर अपनी रिपोर्ट सौंपी थी. ये रिपोर्ट ओस्मानाबाद और वर्धा में नरेंद्र मोदी के भाषण को लेकर थी. इन रिपोर्टों के आधार पर चुनाव आयोग ने नरेंद्र मोदी को 2-1 के फैसले से क्लीनचीट दी था. इस क्लीन चिट को लेकर ही चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने शिकायत की थी कि इससे संबंधित फैसले में उनकी असहमतियों को दर्ज नहीं किया गया था.

प्रतिभा की टुकड़ों में बानगी से उसने मुझे हर मोर्चे पर धराशायी कर दिया : संजय मांजरेकर

हाल में रविंद जडेजा पर निशाना साधने वाले पूर्व क्रिकेटर संजय मांजरेकर ने अब उनसे माफी मांगी है. नवभारत टाइम्स की खबर के मुताबिक आईसीसी ने एक वीडियो जारी किया है. इसमें संजय मांजरेकर कमेंटेटर इयान स्मिथ और नियाल ओब्रायन से बात कर रहे हैं. इस बातचीत में वे कहते हैं, ‘प्रतिभा की टुकड़ों में बानगी से उसने मुझे हर मोर्चे पर धराशायी कर दिया. हमने इस जडेजा को पहले कभी नहीं देखा. वह आज असाधारण था.’ संजय मांजरेकर आगे कहते हैं, ‘मुझे उससे (रविंद्र) माफी मांगनी पड़ेगी. वह मुझे ढूंढ़ रहा था, लेकिन मैं वहां नहीं था. मैं लाउंज में लंच कर रहा था. मैं माफी मांगता हूं.’ इससे पहले इस पूर्व क्रिकेटर ने रविंद्र जडेजा को टुकड़ों में अच्छा क्रिकेटर बताया था.

किसी व्यक्ति को उसकी राजनीतिक विचारधारा के आधार पर प्रताड़ित नहीं किया जा सकता है : केरल हाई कोर्ट

केरल हाई कोर्ट ने अपने एक फैसले में साफ किया है कि किसी व्यक्ति को राज्य सरकार द्वारा केवल इस संदेह पर प्रताड़ित नहीं किया जा सकता है कि वह माओवादी विचारधारा से प्रभावित है. अमर उजाला में प्रकाशित खबर के मुताबिक मुख्य न्यायाधीश ऋषिकेश रॉय की पीठ ने एकल पीठ के फैसले को बरकरार रखा है. इस पीठ का कहना है, ‘किसी व्यक्ति की एक खास राजनीतिक विचारधारा के प्रति लगाव रखने की स्वतंत्रता संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत मिली व्यक्तिगत आजादी के लिए उसके मूल अधिकार का एक पहलू है.’ इससे पहले एकल पीठ ने केरल पुलिस के विशेष दल द्वारा नक्सली होने के शक में हिरासत में लिए गए श्याम बालाकृष्णन को एक लाख रुपये मुआवजा देने का निर्देश दिया था.

सरकारी जमीन पर बने सभी निजी अस्पतालों को गरीब मरीजों का मुफ्त इलाज करना होगा : डीडीए

दिल्ली में सरकारी जमीन पर बने सभी निजी अस्पतालों को गरीब मरीजों का मुफ्त इलाज करना होगा. अगर इन अस्पतालों को जमीन नीलामी में बाजार भाव से मिली हो तो भी यह शर्त लागू होती है. हिन्दुस्तान की खबर के मुताबिक दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) ने इस बात की जानकारी हाई कोर्ट को दी है. दिल्ली हाई कोर्ट के सामने डीडीए ने कहा, ‘अस्पतालों को जमीन देते समय यह शर्त रखी जाती है कि उन्हें केंद्र और दिल्ली द्वारा समय-समय पर बदले जाने वाले नियमों का पालन करना होगा. अगर वे नियम नहीं मानते हैं तो अस्पताल को आवंटित जमीन रद्द कर दी जाएगी.’ वहीं, प्राधिकरण का यह भी कहना है कि यदि गरीबों को मुफ्त इलाज नहीं देने की शिकायत होती है तो कानून के दायरे में कार्रवाई की जाएगी.

इससे पहले एक एनजीओ ने हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की थी. इसमें कहा गया है कि सरकारी जमीन पर बने 50 से अधिक निजी अस्पताल गरीबों को मुफ्त इलाज नहीं दे रहे हैं. वहीं, इन अस्पतालों का कहना है कि उनके भूमि आवंटन पत्र में ऐसी कोई शर्त नहीं है. उनका यह भी कहना था कि किसी को मुफ्त इलाज कराने की जिम्मेदारी उनकी नहीं है.

न्यायिक नियुक्ति और न्यायाधीशों के आचरण को नियंत्रित करने के लिए कोई कानून बनाने की योजना नहीं : केंद्र सरकार

केंद्र सरकार ने साफ किया है कि न्यायिक नियुक्तियों और न्यायाधीशों के आचरण को नियंत्रित करने के लिए उसकी कोई कानून बनाने की योजना नहीं है. दैनिक जागरण में छपी खबर के मुताबिक कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने एक सवाल के जवाब में इसकी जानकारी संसद को दी. कानून मंत्री ने कहा कि शीर्ष अदालत और हाई कोर्ट के न्यायाधीशों का आचरण सात मई, 1997 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा अपनाई गई न्यायिक जीवन की बहाली के नियमों द्वारा नियंत्रित है. रविशंकर प्रसाद ने इससे आगे कहा, ‘शीर्ष न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति एक सहयोगात्मक और एकीकृत प्रक्रिया है, जिसमें कार्यपालिका और न्यायपालिका दोनों शामिल हैं.’ इससे पहले कानून मंत्री ने सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों को सुनवाई के दौरान कड़वे शब्दों के इस्तेमाल करने से बचने की सलाह दी थी.