निर्देशक : विकास बहल

लेखक : संजीव दत्ता

कलाकार : ऋतिक रोशन, मृणाल ठाकुर, आदित्य श्रीवास्तव, पंकज त्रिपाठी, वीरेंद्र सक्सेना, नंदिश सिंह, अमित साध, विजय वर्मा

रेटिंग : 3/ 5

इसमें कोई शक नहीं कि भूरे रंग में ऋतिक रोशन को रंगना-पोतना ‘सुपर 30’ की एक बहुत बड़ी गलती रही है. असल जीवन में खुद गणितज्ञ आनंद कुमार की चमड़ी का ‘कलर टोन’ वैसा नहीं है जैसा कि ऋतिक का फिल्म में नजर आता है.

कद-काठी के अलावा ऋतिक का बिहारी लहजा भी आनंद कुमार की बिना नुक्ते की खास लहजे वाली हिंदी से बिलकुल नहीं मिलता. आनंद कुमार बनकर वे जिस बनावटी बिहारी लहजे का उपयोग करते हैं वह पूरा का पूरा फिल्मी है और कमर्शियल सिनेमा की उस थॉट प्रोसेस से जन्मा है जिसमें अमिताभ बच्चन और उन जैसे लार्जर देन लाइफ छवि रखने वाले सुपरस्टारों को इस तरह का बिहारी लहजा सिर्फ ज्यादा सिनेमेटिक व प्रभावशाली नजर आने के लिए दिया जाता है. रियलिज्म को पूरी तरह ताक पर रखकर.

आनंद कुमार के इंटरव्यूज देखकर आसानी से समझा भी जा सकता है कि अगर उनकी कहानी को बड़े स्केल की कमर्शियल फिल्म बनाने की विवशता नहीं होती, तो उस यथार्थवादी फिल्म में पंकज त्रिपाठी ही उन्हें नख से लेकर शिख तक आत्मसात करने की हैसियत रखने वाले इकलौते कलाकार होते. बॉडी लेंग्वेज के अलावा आनंद कुमार के बात करने का मुख्तलिफ तरीका भी पंकज त्रिपाठी ही बखूबी पकड़ते.

लेकिन जनाब, इन वृहद कमियों और नुक्ताचीनियों के बावजूद ऋतिक रोशन की मेहनत और काबिलियत की दाद देनी पड़ेगी! ‘सुपर 30’ में लंबे अरसे बाद वह ऋतिक रोशन नजर आया है जो कम्फर्ट जोन के बाहर वाले किरदार को आत्मसात करने के लिए हर संभव प्रयास करता है और अपने समर्पित अभिनय के आकर्षण के दम पर फिल्म को उसकी कई सारी कमियों से ऊपर उठा देता है. कुछ इंच ही सही, लेकिन लचर पटकथा और अतिनाटकीयता में डूबते-उतराते एक खालिस स्तुतिगान में ऐसा कर पाना यकीन मानिए काबिले-तारीफ बात है.

भावनाओं को व्यक्त करने का ऋतिक का अंदाज किरदार की जिंदगी के हर पड़ाव के साथ बदलता चलता है और यह महीन अंतर बेहद असरदार सिद्ध होता है. युवा अवस्था के आनंद कुमार के रोल में वे भले ही युवा नहीं लगते लेकिन अपने आत्मीय अभिनय के चलते – और थोड़ा ‘कोई मिल गया’ के रोहित को मिलाने के चलते! – खासे असरदार सिद्ध होते हैं. मुफलिसी की कठोर जिंदगी के बाद रईस बच्चों को कोचिंग पढ़ाने के दौरान आया उनके व्यक्तित्व का बदलाव अद्भुत अंदाज में स्क्रीन पर दिखता है.

एक गाने के दौरान यह बदलाव दिखाया जाता है और बॉडी लेंग्वेज से लेकर चेहरे तक पर नजर आने वाला गुरूर उन्होंने बेहद उम्दा अंदाज में अभिनीत किया है. अगर आप इस एक्टर के पुराने काम के मुरीद नहीं भी रहे हैं तब भी इस फिल्म में उनके अभिनय समर्पण को देखकर खासे प्रभावित होने वाले हैं.

गरीब बच्चों को पढ़ाने की लंबी कहानी कहने के दौरान किरदार की परिपक्वता अनुसार उनके अभिनय में भी बड़ा फर्क देखने को मिलता है. ‘मीटू’ आरोपित निर्देशक विकास बहल द्वारा मेलोड्रामा को ज्यादा तवज्जो दिए जाने के चलते कुछ जगह उनका किरदार बेवजह लाउड जरूर होता है लेकिन मन खट्टा करने वाला कोई सीन हो यह हमें समीक्षा लिखते वक्त तो याद नहीं आ रहा. फिल्म के अंतिम सीन में किया गया उनका अभिनय आपका दिल छू लेगा और अगर आप भूरे रंग-रोगन और फिल्मी बिहारी लहजे वाले ऋतिक को देखकर चिढ़े नहीं, तो फिल्म को उनके होने से कई-कई जगह रोशन होते हुए देख पाने का सुख शर्तिया उठा पाएंगे.

लंबे अरसे बाद किसी अभिनेता के लिए समीक्षा में इतने सारे शब्द खर्च किए हैं! अब फिल्म की बात कर लेते हैं. ‘सुपर 30’ की सबसे बड़ी कमी है कि वह भले ही कहती है कि मैं आनंद कुमार के जीवन से ‘प्रेरित’ भर हूं, लेकिन असल में वह ‘बायोपिक’ है और उनके जीवन की हर मुख्य घटना को महिमामंडित करते हुए ही पेश करती है. अगर आपने गणितज्ञ आनंद कुमार का सिर्फ विकीपीडिया पेज भर पढ़ा है तब भी आप समझ जाएंगे कि यहां उनके जीवन की हर घटना को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया गया है और उन पर लगते रहे आरोपों से सिरे से कन्नी काटी गई है.

इसलिए कहा भी जाता है कि अगर सच्ची बायोपिक बनानी है तो अपने सब्जेक्ट से दूरी बनाकर चलो. तभी आप एक ईमानदार बायोपिक बना पाओगे. लेकिन ‘सुपर 30’ फील गुड फिल्म बनाने के चक्कर में आनंद कुमार का महिमामंडन करने और स्तुतिगान गाने वाली एप्रोच के साथ ही अपनी कहानी कहती है.

इसी एप्रोच के चलते फिल्म में अतिनाटकीयता का ढेर भी लगता है और पटकथा लचर होती जाती है. ढाई घंटे की फिल्म तीन घंटे लंबी मालूम होती है जबकि यह कहानी आसानी से दो घंटे के आसपास की अवधि में समेटी जा सकती थी. लाउड बैकग्राउंड स्कोर का सहारा लेकर कूट-कूटकर मेलोड्रामा कई दृश्यों में भरा जाता है और विकास बहल का ‘क्वीन’ वाला कुशल शिल्प यहां नजर नहीं आता.

चाहे मरते हुए बाप को अस्पताल ले जाने वाला सीन हो, तूफान के बीच बच्चों को मोटिवेट करने वाला सीन, चलती हुई कार में से अपनी साइकिल देखने वाला सीन, या फिर देश-भर से गरीब बच्चों का बिहार पहुंचने के मुख्तलिफ तरीके दिखाने वाले सीन, भावनाएं इतनी ‘ऑन योर फेस’ फेंकी जाती हैं कि कई सारे दृश्यों में उपयोग की गई इस सस्ती फिल्म मेकिंग पर अचरज होता है.

कई दृश्य काफी प्रभावशाली भी बन पड़े हैं. एक तो इस फिल्म में बेहद लंबे-लंबे सीक्वेंस की भरमार है. लेखक संजीव दत्ता ने गैरपारंपरिक तरीका चुनकर बेहद लंबे-लंबे सीक्वेंस लिखे हैं जैसे कि अक्सर हिंदी फिल्मों में नजर नहीं आते. लेकिन दिलचस्प बात है कि ऐसे कई दृश्य प्रभावशाली बन पड़े हैं.

कम में बहुत ज्यादा करने में सिद्धहस्थ पंकज त्रिपाठी का जनता दरबार में आनंद कुमार को धोखा देना, ऋतिक का कोचिंग व्यवसाय में ऊंचाईयों पर पहुंचने पर घमंडी हो जाना और घड़ी-चेन-बाइक खरीदकर इठलाना, शराब के नशे में घर लौटते वक्त लैंपपोस्ट की रोशनी में पढ़ते बच्चे को देखकर उनके जीवन का करवट लेना, बेहद प्रभावी अभिनय करने वाले आदित्य श्रीवास्तव के पात्र लल्लन से ‘सुपर 30’ की क्लास में भिड़ंत होना जैसे कई सारे दृश्य हैं जो बेहद लंबे हैं लेकिन अवधि के मामले में रिस्की होने के बावजूद असरदार हैं. फिर, सबसे असरदार ‘बसंती नो डांस’ नामक गाना है जो शुरू होता है तो अटपटा लगता है लेकिन जल्द ही अपने दर्शन और ऊर्जावान फिल्मांकन से आपको हतप्रभ करता है.

ऐसे ही असरदार दृश्यों की वजह से आनंद कुमार की यह बायोपिक प्रेरक बनती है. कुछ ग्राम ही सही. इसकी लंबाई और अतिनाटकीयता के चलते इसका असर जरूर कम होता है लेकिन सम्पूर्णता में यह उस स्तर की प्रेरक बनी रहती है जितनी कि आनंद कुमार की जिंदगी और उनका उद्देश्य रहा है. आज शिक्षा एक व्यवसाय है और सरकारी व निजी स्कूल के बीच की डिबेट में हम भूल जाते हैं कि शिक्षा का सत्यानाश करने में सबसे बड़ा योगदान इस देश के महंगे कोचिंग संस्थानों का रहा है. ऐसे दौर में एक ऐसे इंसान की कहानी कमर्शियल सिनेमा के माध्यम से कहना जो कि मुफ्त में गरीब, दलित, महादलित बच्चों को प्रिवलेज्ड बच्चों के समकक्ष पहुंचाने की मुहिम में लगा हुआ है, वाकई प्रशंसनीय कदम है.

हालांकि, ‘सुपर 30’ में यह कमी तो है ही कि वह आनंद कुमार से जुड़े विवादों को छूती तक नहीं. आनंद कुमार सुपर 30 चलाने के साथ-साथ ‘रामानुजम स्कूल ऑफ मैथमैटिक्स’ नामक कोचिंग संस्थान भी चलाते हैं जो कि फ्री नहीं है और हजारों छात्रों की संख्या वाला उनका यह संस्थान एक फलता-फूलता कारोबार है. लेकिन फिल्म इसकी कोई चर्चा नहीं करती. उनके विरोधियों में अभयानंद का नाम खासतौर पर लिया जाता है जो कि बिहार पुलिस में डीजीपी थे लेकिन उनका भी फिल्म जिक्र नहीं करती. ऐसा लगता जरूर है कि उन्हें एक-दो दूसरे नाम वाले काल्पनिक पात्रों के माध्यम से खल चरित्र दिखाया गया है.

फिर फिल्म में सुपर 30 में पढ़ाने वाला एकमात्र टीचर आनंद कुमार को दिखाया गया है. जबकि वास्तविकता में वे सिर्फ गणित पढ़ाते थे/हैं और आईआईटी की परीक्षा में शामिल कैमिस्ट्री व फिजिक्स जैसे विषय दूसरे टीचर पढ़ाते थे/हैं. लेकिन फिल्म के क्लाइमेक्स में छात्र अपने गुरु आनंद कुमार की जिन शिक्षाओं का उपयोग कर खल चरित्रों को नाकों चने चबवा देते हैं उनमें भौतिकी के भी नियम मौजूद रहते हैं जो कि फिल्म में उन्हें आनंद कुमार सर ही पढ़ाते हुए दिखाए गए हैं! यह महिमामंडन अखरने वाली बात है.