यह भारतीय किसानों की आत्महत्या पर सत्याग्रह की चार किश्तों की श्रृंखला का पहला हिस्सा है


नगला उपटेला गांव. ज़िला- भरतपुर, राजस्थान. किसान सुरेश कुमार को फांसी के फंदे पर झूले दो महीने हो चुके हैं, लेकिन उनके परिजन आज तक उस सदमे से नहीं उभर पाए हैं. सुरेश कुमार के पड़ोसी बताते हैं कि बीते कुछ साल से उनकी फसल अच्छी नहीं हुई थी. और जो हुई उसके भी वाजिब दाम नहीं मिल पाए. इस दौरान सुरेश कुमार पर कर्ज़ बढ़ता चला गया. सुरेश कुमार के परिजनों के मुताबिक इस साल उन्हें अच्छी फसल की उम्मीद थी. लेकिन बेमौसम हुई ओलावृष्टि ने उनकी सारी उम्मीदों पर पानी फेर दिया. वे इस आघात को झेल नहीं पाए और बीती 15 मार्च को उन्होंने ख़ुदकुशी कर ली. उस हफ़्ते आत्महत्या करने वाले सुरेश कुमार भरतपुर के तीसरे किसान थे.

इससे पहले फरवरी महीने में राजस्थान के ही गंगानगर ज़िले के किसान महेंद्र वर्मा (35 वर्ष) ने भी बैंक का ऋण न चुका पाने की वजह से आत्महत्या कर ली थी. उनके ऊपर स्टेट बैंक इंडिया का साढ़े पांच लाख रुपए का कर्ज था. वर्मा के परिवार का आरोप है कि राज्य की कांग्रेस सरकार की कर्ज़माफी योजना का किसानों को कोई फायदा नहीं हुआ. पिछले साल भी गंगानगर तब सुर्खियों में आया था जब यहां के एक और किसान सोहन लाल कडेला ने ज़हर खाकर आत्महत्या कर ली थी. स्थानीय एसपी के मुताबिक उन पर करीब ढाई लाख रुपए का कर्ज़ बाकी था. आत्महत्या करने से पहले कडेला ने वीडियो बनाकर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उप-मुख्यमंत्री सचिन पायलट को अपनी मौत का जिम्मेदार बताया था. उनका भी आरोप था कि राज्य की कांग्रेस सरकार की कर्ज़माफी योजना का किसानों को कोई फायदा नहीं हुआ. लेकिन न तो धान का कटोरा कहे जाने वाले गंगानगर के लिए ये दो आत्महत्याएं अपवाद हैं और न राजस्थान के लिए.

जीवट छवि वाले राजस्थान के किसानों का जिंदगी की जंग यूं हार जाना जानकारों को चौंकाता है. प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार संदीप पुरोहित इस बारे में कहते हैं, ‘घोर विषम प्राकृतिक परिस्थितियों में खेती करने की वजह से हमारे किसान स्वभाविक रूप से बड़ी-बड़ी से परेशानियों को झेलने के आदी होते हैं. राजस्थान के गौरवमयी इतिहास से भी वे आख़िरी दम तक लड़ते रहने की प्रेरणा लेते रहे हैं. लेकिन अब हालात बदल गए हैं. प्रकृति के बाद लालफीताशाही से जूझते-जूझते किसानों की हिम्मत पस्त होने लगी है.’

लेकिन यह स्थिति सिर्फ़ राजस्थान की भी नहीं बल्कि देश भर के किसानों की कहानी है. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा जारी किए गये आंकड़ों के मुताबिक बीते करीब दो दशकों में देश भर के 3.2 लाख से ज्यादा किसानों को आत्महत्या के लिए मज़बूर होना पड़ा है. एनसीआरबी की एक हालिया रिपोर्ट बताती है कि 2018 में कृषि क्षेत्र से जुड़े 10,349 लोगों ने ख़ुदकुशी कर ली थी. वहीं 2017 में ये आंकड़ा 10,655 था. इस तरह बीते दो साल में भारत में प्रतिदिन औसतन 29 किसानों ने अपनी जान दी है.

राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) के एक सर्वे के मुताबिक देश के आधे से ज्यादा किसान कर्ज के बोझ तले दबे हैं. और एक अन्य अध्ययन के अनुसार हर तरफ से निराश हो चुके देश के 76 फीसदी किसान खेती छोड़कर कुछ और करना चाहते हैं. आर्थिक सर्वेक्षण 2018-19 के आंकड़े भी बताते हैं कि वर्ष 2016-17 की तुलना में कृषि की सकल मूल्य वृद्धि (जीवीए) में करीब 54 प्रतिशत की कमी देखी गई है.

किसानों की इस बदहाली के लिए वरिष्ठ समाजशास्त्री राजीव गुप्ता मौजूदा और पिछली सरकारों की नीयत और नीति दोनों को जिम्मेदार ठहराते हैं. वे कहते हैं, ‘90 के दशक में वैश्वीकरण के दौर के बाद किसानों को राजनैतिक एजेंडे में तो फंसाकर रखा गया, लेकिन विकास के एजेंडे से उन्हें बाहर कर दिया गया. बार-बार कृषकों के हितों की दुहाई दी गईं. उनके नाम पर कमेटियों का गठन हुआ. उन्हें सब्सिडी दी गईं. उनके कर्ज़ माफ़ किए. लेकिन किसान की आय कैसे बढ़ाई जाए, यह सुनिश्चित नहीं किया गया! बल्कि शासन-प्रशासन ने अन्नदाताओं की इकलौती निधि ‘आत्मसम्मान’ को रौंद कर उन्हें जान देने के लिए मजबूर कर दिया. ये आत्महत्याएं नहीं बल्कि संस्थागत हत्याएं हैं. इनके लिए राज्य और उसके विभिन्न निकाय जिम्मेदार हैं.’

खाद्य एवं आर्थिक नीति विशेषज्ञ देविंदर शर्मा इस बात से सहमति जताते हुए कहते हैं कि किसानों की आय बढ़ाना सरकार के आर्थिक लक्ष्यों की वरीयता में कभी शामिल ही नहीं रहा. ‘आजादी के 70 वर्ष बाद भी देश के तकरीबन आधे राज्यों में एक कृषक परिवार की औसत वार्षिक आय(आर्थिक सर्वेक्षण 2016 के मुताबिक) महज 20,000 रुपये यानी 1666.66 रुपए मासिक है. यह दिखाता है कि किसानों की स्थिति को लेकर सरकारें कितनी गंभीर हैं!’ देविंदर शर्मा देश के आर्थिक नीतिकारों के किसानों के प्रति दोहरे रवैये को कठघरे में खड़ा करते हुए कहते हैं, ‘दर्जन भर व्यवसायिक घरानों के लिए दसियों लाख करोड़ का ऋण माफ़ किया जाना हमारे यहां विकास का प्रतीक है, जबकि कृषि पर आश्रित 32 करोड़ लोगों की कर्ज़माफ़ी आर्थिक अनुशासनहीनता और राष्ट्रीय राजकोष के अपव्यय के तौर पर देखी जाती है.’

उनकी इस बात की बानगी के तौर पर पिछली मोदी सरकार में वित्त मंत्री अरुण जेटली के उस बयान को लिया जा सकता है जिसमें उन्होंने (उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के) कर्ज़दार किसानों की मदद करने से इनकार कर दिया था. इसके पीछे वित्त मंत्री की दलील थी कि चूंकि फसलों से जुड़े निर्णय राज्य के अधीन आते हैं, इसलिए जो भी राज्य काश्तकारों का ऋण माफ़ करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है, उसे अपने स्तर पर ही संसाधनों की व्यवस्था करनी होगी. विश्लेषकों का मानना है कि तब किसानों की मदद कर जेटली राजकोष पर अतिरिक्त भार नहीं डालना चाहते थे. इसके करीब एक साल बाद रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया ने आंकड़े जारी कर बताया कि अप्रैल 2014 से अप्रैल 2018 के बीच 3.16 लाख करोड़ रुपए के फंसे हुए कर्जों को माफ़ कर दिया गया था.

2018 में ही जेटली ने सरकारी बैंकों के रिकॉर्ड से नॉन परफॉर्मिंग एसेट (फंसे हुए कर्ज) से जुड़ी जानकारी हटाने का समर्थन किया था. तब उनकी इस कवायद को कर्ज़दार उद्योगपतियों की पहचान छिपाने की कोशिश से जोड़कर देखा था. उधर खबरों के मुताबिक 2004 से 2016 के बीच औद्योगिक घरानों द्वारा लिये गये करीब पचास लाख करोड़ रुपयों को भुलाए जा चुके राजस्व की श्रेणी में रखकर माफ़ किया किया जा चुका है.

साल 2016 में तत्कालीन कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री पुरुषोत्तम रुपाला ने सदन में किसानों पर 12 लाख 60 हजार करोड़ रुपए का बकाया होने की जानकारी दी थी. जबकि बिजनेस स्टैंडर्ड की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश के सबसे बड़े सिर्फ 10 कॉरपोरेट घरानों का कर्ज ही 7 लाख 31 हजार करोड़ रुपये है. इसी रिपोर्ट के अनुसार देश के शीर्ष बारह औद्योगिक एनपीए (उद्योगों में फंसा कर्ज) का मूल्य (3.45 लाख करोड़ रुपये) 2018 में 10 राज्यों द्वारा की गई किसानों की कर्जमाफी (1.8 लाख करोड़ रुपये) का लगभग दोगुना है.

एक अन्य मीडिया रिपोर्ट बताती है कि बीते साल तक देश की कुछ चुनिंदा स्टील कंपनियों पर ही तकरीबन 1.4 लाख करोड़ रुपए का कर्ज़ बाकी था जो कि पंजाब और उत्तर प्रदेश के कुल कृषि ऋण- 75 हजार करोड़ - के दोगुने से जरा ही कम था. इनमें से कुछ औद्योगिक घराने तो ऐसे हैं जिन पर अकेले ही किसी-किसी राज्य के कृषि ऋण से कहीं ज्यादा राशि बकाया थी. लेकिन इसके बावजूद उद्योगों के प्रति सरकार का झुकाव किसी से नहीं छिपा है.

बजट 2020-21 की बात करें तो किसानों और ग्रामीण भारत से जुड़े कृषि मंत्रालय, ग्रामीण विकास मंत्रालय, रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय और पशुपालन व डेयरी मंत्रालयों के लिए 340,600 करोड़ रुपए आवंटित किए गए हैं जो संपूर्ण बजट का सिर्फ़ 11 प्रतिशत है. सवाल उठाया जा सकता है कि ग्रामीण भारत में बसने वाली 70 प्रतिशत आबादी के लिए महज 11 प्रतिशत बजट का आवंटन कितना न्यायपूर्ण है? जानकारों के मुताबिक कुल बजट की ही तरह इस बजट में भी यदि 2019-20 की तुलना में नौ फ़ीसदी की बढ़ोतरी की जाती तो यह बजट 3,71,000 करोड़ रुपए होना चाहिए था.

इसी तरह 2019-20 के बजट पर नज़र डालें तो 400 करोड़ रुपये तक के टर्नओवर वाली कंपनियों पर कॉरपोरेट टैक्स को 30 फीसदी से घटाकर 25 फीसदी कर दिया गया और स्टार्टअप को पूंजी जुटाने से लेकर एंजेल टैक्स पर भी राहत दी गई. लेकिन किसानों के मामले में सरकार इतनी उदार नहीं दिखी. ग़ौरतलब है कि पिछले बजट में वर्ष कृषि मंत्रालय का बजट 138,564 करोड़ रुपए था, लेकिन इसे बाद में संशोधित कर 109,750 करोड़ रुपए कर दिया गया था.

हालांकि 2018 में केंद्र सरकार ने ‘पीएम किसान सम्मान निधि’ योजना के तहत काश्तकारों को प्रतिवर्ष छह हजार रुपए की मदद देने की घोषणा की थी. इस योजना के तहत प्रत्येक चौथे महीने की शुरुआत में यानी साल में तीन बार सरकार की तरफ़ से किसानों के बैंक खातों में दो हजार रुपए जमा करवाए जाने लगे. किसी ने इस मदद को ऊंट के मुंह में जीरे जैसा बताया तो कई ऐसे भी थे जिन्होंने किसानों को मिली इस थोड़ी-बहुत मदद को कोई मदद न मिलने से बेहतर ही समझा.

यहां यह जानना दिलचस्प है कि पिछले साल इस योजना के लिए 75 हजार करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे, जबकि इस बार के बजट में इसके लिए सिर्फ 54,370 करोड़ रूपये ही दिए गए. पीएम किसान योजना के मद में यह कटौती चौंकाने वाली थी. क्योंकि लोकसभा चुनाव से पहले इसके तहत सिर्फ छोटी जोत के किसानों को साल में तीन किश्तों में छह हजार रूपये की मदद देने की बात कही गई थी. लेकिन, लोकसभा चुनाव के बाद सरकार ने सभी किसानों को इसके दायरे में ला दिया. सहज बुद्धि कहती है कि किसानों की संख्या बढ़ने के बाद इस योजना के लिए पैसे बढ़ने चाहिए थे, लेकिन इसके इसके बजाय पैसे घटा दिये गए.

एक आरटीआई आवेदन के जवाब में कृषि विभाग द्वारा दी गई जानकारी बताती है कि पूरे देश के करीब 25 फीसद किसान ही इस साल की शुरुआत तक पीएम किसान योजना की सभी किश्तों का लाभ ले पाये थे. आंकड़े बताते हैं कि पीएम किसान की पहली किश्त के लिए देश भर में 8.80 करोड़ लाभार्थी चिन्हित किए गए जिनमें से 8.35 करोड़ को इसका लाभ मिला. दूसरी किश्त में लाभार्थियों की संख्या घटकर 7.51 करोड़ रह गई और तीसरी किश्त पाने वाले किसान 6.12 करोड़ ही रह गए. सत्यापन में सख्ती के साथ यह संख्या और घटी और चौथी किश्त पाने वालों की संख्या 3.01 करोड़ पर ही सिमट गई.

उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले की बदलापुर तहसील के रहने वाले किसान मुलायम यादव बताते हैं कि उनके खाते में अब तक पीएम किसान की सभी किश्तें यानी छह हजार रूपये आ चुके हैं. लेकिन, इस मामले में सभी लोग इतने भाग्यशाली नहीं हैं. उनके पड़ोस के गांव के बेचन अपने मोबाइल पर पीएम किसान की वेबसाइट का एक स्क्रीन शॉट दिखाते हुए सत्याग्रह को बताते हैं कि उनके पिता जी के खाते में शुरुआत में दो बार पैसा आया फिर उसके बाद बंद हो गया. बेचन के मुताबिक, लेखपाल ने इसकी वजह यह बताई है कि खाता आधार से लिंक नहीं है. बेचन का कहना है कि वे कई बार आधार कार्ड जमा कर चुके हैं, लेकिन अभी तक सत्यापन नहीं हुआ है.

बाराबंकी के समाजवादी पार्टी के एक स्थानीय नेता सरफराज़ कहते हैं, ‘लोकसभा चुनाव के समय बिना दस्तावेजों के सत्यापन के पैसे जारी कर दिए गए. उसके बाद हरियाणा और झारखंड के चुनाव तक भी ढील रखी गई. लेकिन उसके बाद खातों के सत्यापन में सख्ती की गई तो पैसे आने बंद हो गए.’

बाराबंकी की दरियाबाद तहसील में वकील राम सुमेर कहते हैं कि बहुत छोटी-छोटी गड़बड़ियों के कारण पैसा रूक जाता है. वे कहते हैं कि बहुत से किसानों के खाते में बैंक का आईएफएससी कोड गलत था, इस वजह से उनका पेमेंट नहीं हो पा रहा था. इस तरह की गलतियां कितने बड़े पैमाने पर हैं इसका अंदाजा इसी साल फरवरी में बरेली के एक स्थानीय अखबार में छपी खबर से लगाया जा सकता है. खबर में कहा गया था कि पीएम किसान के 80 हजार खातों में गड़बड़ि़यां जल्द दूर हो जाएंगी. ऐसा तब था जब उससे कुछ समय पहले ही यहां के 37 हजार खातों की गड़बड़ियां दूर की गई थीं.

हालांकि कोरोना वायरस के प्रकोप के चलते यह सख्ती अब फिर से खत्म हो गई है लेकिन यहा बात किसानों के साथ हमारे उस व्यवहार की हो रही है जो हम सामान्य समय में उनके साथ करते हैं.

कभी-कभी ऐसी योजनाओं का लाभ मिलने में विभिन्न राजनीतिक दलों की आपसी खींचतान का भी खामियाज़ा उठाना पड़ता है. इसे पश्चिम बंगाल के उदाहरण से समझा जा सकता है. जहां मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पीएम किसान सम्मान निधि को राज्य में लागू नहीं होने दिया है. इससे प्रदेश के करीब सत्तर लाख किसानों के प्रभावित होने का अनुमान है. बनर्जी की ही तरह शुरुआत में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी इस योजना के आलोचक थे. लेकिन बाद में उन्होंने इसे लेकर अपना रुख बदल लिया.

कई बार ऐसा भी होता है कि किसानों के लिए शुरु की गई योजनाएं उन्हीं को छोड़कर बाकी सभी के लिए लाभदायक साबित होती हैं. 2016 में मोदी सरकार द्वारा शुरु की गई फसल बीमा योजना (पीएमएफबीवाई) को इस फेहरिश्त में सबसे ऊपर रखा जा सकता है. इस योजना को पहले से चल रही राष्ट्रीय कृषि बीमा योजना की जगह लाया गया था. इसके तहत उन आपदाओं के दायरे में विस्तार किया गया जिनसे फसलों को नुकसान पहुंचता है. लेकिन 2017 में चर्चित संस्था सेंटर फॉर साइंस एंड एनवॉयरमेंट (सीएसई) ने पीएमएफबीवाई से जुड़ी एक रिपोर्ट जारी कर दावा किया कि इस योजना में बैंकों की सक्रियता और किसानों की संख्या तो बढ़ी है पर किसानों को फायदा मिल पाना दूर की कौड़ी रहा. इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद फसल बीमा योजना पर आरोप लगने लगे थे कि ये किसानों की बजाय बीमा कंपनियों के लिए ज़्यादा फ़ायदेमंद साबित हुई है. सत्याग्रह ने तब इस बारे में एक विस्तृत रिपोर्ट की थी.

किसानों के प्रति बैंकों का दुराग्रह भी किसी से नहीं छिपा है. 2018 में छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस द्वारा किसानों की कर्ज़ माफ़ी की घोषणा पर कई प्रमुख बैंकों के प्रतिनिधियों ने चिंता ज़ाहिर की थी. इसी तरह 2017-18 में दस राज्यों द्वारा किसानों के तकरीबन 1.8 लाख करोड़ रुपए की कर्ज़माफ़ी की घोषणा पर भी बैंकों ने कड़ी प्रतिक्रिया दी थी. लेकिन वित्त वर्ष 2018-19 की आख़िरी तिमाही तक गिने गए 10.17 लाख करोड़ रुपए के एनपीए के मुद्दे पर बैकों की तरफ़ से कोई खास टीका-टिप्पणी सुनने को नहीं मिली.

इसी तर्ज़ पर स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) की पूर्व चेयरपर्सन अरुंधती भट्टाचार्य ने 2017 में उत्तर प्रदेश के गरीब और जरूरतमंद किसानों के लिए 36,359 करोड़ रुपए की कर्ज़माफी को अनुशासनहीनता करार दिया था. अपने बयान में भट्टाचार्य का कहना था कि यदि एक बार किसी को इस तरह ऋण से माफी मिल जाएगी तो वह आगे से हर बार इसकी उम्मीद करेगा. इस तरह भविष्य में ऐसे अधिकतर लोन बिना चुकाए ही रह जाएंगे. कुछ ऐसी ही राय भट्टाचार्य ने तब भी ज़ाहिर की थी जब एसबीआई ने कृषि उपकरणों और ट्रैक्टर लोन को लेकर किसानों को राहत देते हुए वन टाइम सेटलमेंट स्कीम की शुरुआत की थी. जबकि यही अरुंधती भट्टाचार्य उससे पहले टेलीकॉम क्षेत्र पर चढ़े चार लाख करोड़ रुपए के कर्ज़ में रियायत देने की पैरवी करने की वजह से चर्चाओं में शामिल रही थीं.

ये दोहरी नीतियां नहीं तो और क्या हैं जिनके चलते विजय माल्या और नीरव मोदी जैसे बड़े बैंक डिफॉल्टरों को लगातार कर्ज़ पर कर्ज दिया जाता रहता है. लेकिन किसानों को छोटे से छोटे कर्ज़ की वसूली के लिए उनकी जमीन की नीलामी के नोटिस थमा दिए जाते हैं. इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट एनसीआरबी के आंकड़ों के हवाले से बताती है कि कर्ज़ के चलते आत्महत्या करने वाले किसानों में से अस्सी फीसदी, बैंकों और माइक्रोफायनेंस संस्थाओं के कर्ज़दार थे, न कि साहूकारों के. जाहिर सी बात है कि इनमें से ज्यादातर सरकारी बैंक ही रहे होंगे. योजना आयोग के एक पूर्व सदस्य अभिजीत सेन इस रिपोर्ट में बताते हैं कि कर्जों की वसूली के मामले में साहूकारों से ज्यादा सख्त बैंक थे क्योंकि उनके नियम ही ऐसे हैं कि वे इस मामले में कोई नर्मी नहीं दिखा सकते. इस मामले में माइक्रोफायनेंस संस्थाएं और भी ज्यादा निर्दयी थीं. वे सामाजिक स्तर पर इतना दबाव बनाती हैं कि किसानों के पास कर्ज न लौटा पाने की हालत में आत्महत्या करने के अलावा कोई और चारा नहीं रहता.

सरकार और उसकी संस्थाओं के इन्हीं दोहरे मापदंडों को आड़े हाथों लेते हुए पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहाकार अरविंद सुब्रमण्यम ने 2017 में अपने एक बयान के ज़रिए खूब सुर्ख़ियां बटोरी थीं. उन्होंने कहा था कि सरकार को कॉरपोरेट क्षेत्र के बड़े कर्जदारों का कर्ज़ माफ़ करना पड़ेगा क्योंकि ‘पूंजीवाद इसी तरह काम करता है. चूंकि लोगों से गलतियां हो जाती हैं इसलिए उन्हें एक हद तक रियायत मिलनी चाहिए... लेकिन मुझे इस बात पर आश्चर्य होता है कि यह सिद्धांत किसानों पर लागू क्यों नहीं होता. अगर धनी कॉरपोरेट्स गलती करके इतनी बड़ी रियायतें पा सकते हैं तो उन किसानों को कर्जमाफी क्यों नहीं मिल सकती जो ऐसी कोई गलती नहीं करते बल्कि उन आर्थिक नीतियों के सताये हैं जो उन्हें जान-बूझकर गरीब बनाए रखती है. क्या किसान इस पूंजीवादी व्यवस्था का हिस्सा नहीं हैं?’

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