यह भारतीय किसानों की आत्महत्या पर सत्याग्रह की चार किश्तों की श्रृंखला का पहला हिस्सा है


श्रीविजय नगर, जिला- श्रीगंगानगर, राजस्थान. 32 वर्षीय किसान दिलीप कुमार की मौत के बाद उनके घर में मातम पसरा है. कुमार ने 14 जुलाई को एक नहर में कूदकर आत्महत्या कर ली थी. स्थानीय लोगों के मुताबिक वे कई महीनों से बैंक के कर्ज़ को लेकर परेशान थे. कुमार के पड़ोसियों का कहना है कि पिछले दो साल से उनकी फसल अच्छी नहीं हुई थी और जो हुई उसके भी उन्हें वाजिब दाम नहीं मिले.

इससे पहले गंगानगर एक और किसान सोहन लाल कडेला की मौत के बाद चर्चाओं में आया था. कडेला ने ज़हर खाकर आत्महत्या कर ली थी. स्थानीय एसपी के मुताबिक उन पर करीब ढाई लाख रुपए का कर्ज़ बाकी था. आत्महत्या करने से पहले कडेला ने वीडियो बनाकर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उप-मुख्यमंत्री सचिन पायलट को अपनी मौत का जिम्मेदार बताया था. उनका आरोप था कि राज्य की कांग्रेस सरकार की कर्ज़माफी योजना का किसानों को कोई फायदा नहीं हुआ.

दिलीप और सोहन के अलावा हाल ही में इसी जिले से एक और किसान के ख़ुदकुशी करने की ख़बर सामने आई थी. इन आत्महत्याओं के बाद राजस्थान में धान का कटोरा कहे जाने वाले श्रीगंगानगर के उन सभी परिवारों में किसी अनहोनी का डर साफ महसूस किया जा सकता है जिनके मुखियाओं ने बैंक या आढ़तियों से कर्ज ले रखा है.

जीवट छवि वाले राजस्थान के किसानों का जिंदगी की जंग यूं हार जाना जानकारों को चौंकाता है. प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार संदीप पुरोहित इस बारे में कहते हैं, ‘घोर विषम प्राकृतिक परिस्थितियों में खेती करने की वजह से हमारे किसान स्वभाविक रूप से बड़ी-बड़ी से परेशानियों को झेलने के आदी होते हैं. राजस्थान के गौरवमयी इतिहास से भी वे आख़िरी दम तक लड़ते रहने की प्रेरणा लेते रहे हैं. लेकिन अब हालात बदल गए हैं. प्रकृति के बाद लालफीताशाही से जूझते-जूझते किसानों की हिम्मत पस्त होने लगी है.’

लेकिन यह स्थिति सिर्फ़ राजस्थान की ही नहीं बल्कि देश भर के किसानों की कहानी है. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) द्वारा जारी किए गये आंकड़ों के मुताबिक बीते करीब दो दशकों में देश भर के 3.2 लाख से ज्यादा किसानों को आत्महत्या के लिए मज़बूर होना पड़ा है. कुछ वर्ष पुरानी एनसीआरबी की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत में प्रतिदिन 45 किसान अपनी जान दे देते हैं. राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) के एक सर्वे के मुताबिक देश के आधे से ज्यादा किसान कर्ज के बोझ तले दबे हैं. और एक अन्य अध्ययन के अनुसार हर तरफ से निराश हो चुके देश के 76 फीसदी किसान खेती छोड़कर कुछ और करना चाहते हैं. आर्थिक सर्वेक्षण 2018-19 के आंकड़े भी बताते हैं कि वर्ष 2016-17 की तुलना में कृषि की सकल मूल्य वृद्धि (जीवीए) में करीब 54 प्रतिशत की कमी देखी गई है.

किसानों की इस बदहाली के लिए वरिष्ठ समाजशास्त्री राजीव गुप्ता मौजूदा और पिछली सरकारों की नीयत और नीति दोनों को जिम्मेदार ठहराते हैं. वे कहते हैं, ‘90 के दशक में वैश्वीकरण के दौर के बाद किसानों को राजनैतिक एजेंडे में तो फंसाकर रखा गया, लेकिन विकास के एजेंडे से उन्हें बाहर कर दिया गया. बार-बार कृषकों के हितों की दुहाई दी गईं. उनके नाम पर कमेटियों का गठन हुआ. उन्हें सब्सिडी दी गईं. उनके कर्ज़ माफ़ किए. लेकिन किसान की आय कैसे बढ़ाई जाए, यह सुनिश्चित नहीं किया गया! बल्कि शासन-प्रशासन ने अन्नदाताओं की इकलौती निधि ‘आत्मसम्मान’ को रौंद कर उन्हें जान देने के लिए मजबूर कर दिया. ये आत्महत्याएं नहीं बल्कि संस्थागत हत्याएं हैं. इनके लिए राज्य और उसके विभिन्न निकाय जिम्मेदार हैं.’

खाद्य एवं आर्थिक नीति विशेषज्ञ देविंदर शर्मा इस बात से सहमति जताते हुए कहते हैं कि किसानों की आय बढ़ाना सरकार के आर्थिक लक्ष्यों की वरीयता में कभी शामिल ही नहीं रहा. ‘आजादी के 70 वर्ष बाद भी देश के तकरीबन आधे राज्यों में एक कृषक परिवार की औसत वार्षिक आय(आर्थिक सर्वेक्षण 2016 के मुताबिक) महज 20,000 रुपये यानी 1666.66 रुपए मासिक है. यह दिखाता है कि किसानों की स्थिति को लेकर सरकारें कितनी गंभीर हैं!’ देविंदर शर्मा देश के आर्थिक नीतिकारों के किसानों के प्रति दोहरे रवैये को कठघरे में खड़ा करते हुए कहते हैं, ‘दर्जन भर व्यवसायिक घरानों के लिए दसियों लाख करोड़ का ऋण माफ़ किया जाना हमारे यहां विकास का प्रतीक है, जबकि कृषि पर आश्रित 32 करोड़ लोगों की कर्ज़माफ़ी आर्थिक अनुशासनहीनता और राष्ट्रीय राजकोष के अपव्यय के तौर पर देखी जाती है.’

उनकी इस बात की बानगी के तौर पर पिछली मोदी सरकार में वित्त मंत्री अरुण जेटली के उस बयान को लिया जा सकता है जिसमें उन्होंने (उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र के) कर्ज़दार किसानों की मदद करने से इनकार कर दिया था. इसके पीछे वित्त मंत्री की दलील थी कि चूंकि फसलों से जुड़े निर्णय राज्य के अधीन आते हैं, इसलिए जो भी राज्य काश्तकारों का ऋण माफ़ करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहता है, उसे अपने स्तर पर ही संसाधनों की व्यवस्था करनी होगी. विश्लेषकों का मानना है कि तब किसानों की मदद कर जेटली राजकोष पर अतिरिक्त भार नहीं डालना चाहते थे. इसके करीब एक साल बाद रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया ने आंकड़े जारी कर बताया कि अप्रैल 2014 से अप्रैल 2018 के बीच 3.16 लाख करोड़ रुपए के फंसे हुए कर्जों को माफ़ कर दिया गया था.

बीते साल जेटली ने सरकारी बैंकों के रिकॉर्ड से नॉन परफॉर्मिंग एसेट (फंसे हुए कर्ज) से जुड़ी जानकारी हटाने का समर्थन किया था. तब उनकी इस कवायद को कर्ज़दार उद्योगपतियों की पहचान छिपाने की कोशिश से जोड़कर देखा था. उधर खेती-किसानी से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाने वाली वेबसाइट गांव कनेक्शन के मुताबिक 2004 से 2016 के बीच औद्योगिक घरानों द्वारा लिये गये करीब पचास लाख करोड़ रुपयों को भुलाए जा चुके राजस्व की श्रेणी में रखकर माफ़ किया किया जा चुका है.

साल 2016 में तत्कालीन कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री पुरुषोत्तम रुपाला ने सदन में किसानों पर 12 लाख 60 हजार करोड़ रुपए का बकाया होने की जानकारी दी थी. जबकि बिजनेस स्टैंडर्ड की एक रिपोर्ट के मुताबिक देश के सबसे बड़े सिर्फ 10 कॉरपोरेट घरानों का कर्ज ही 7 लाख 31 हजार करोड़ रुपये है. इसी रिपोर्ट के अनुसार देश के शीर्ष बारह औद्योगिक एनपीए (उद्योगों में फंसा कर्ज) का मूल्य (3.45 लाख करोड़ रुपये) 2018 में 10 राज्यों द्वारा की गई किसानों की कर्जमाफी (1.8 लाख करोड़ रुपये) का लगभग दोगुना है.

एक अन्य मीडिया रिपोर्ट बताती है कि बीते दिनों देश की कुछ चुनिंदा स्टील कंपनियों पर ही तकरीबन 1.4 लाख करोड़ रुपए का कर्ज़ बाकी था जो कि पंजाब और उत्तर प्रदेश के कुल कृषि ऋण- 75 हजार करोड़ - के दोगुने से जरा ही कम था. इनमें से कुछ औद्योगिक घराने तो ऐसे हैं जिन पर अकेले ही किसी-किसी राज्य के कृषि ऋण से कहीं ज्यादा राशि बकाया थी. लेकिन इसके बावजूद उद्योगों के प्रति सरकार का झुकाव किसी से नहीं छिपा है. बजट-2019 की बात करें तो इस बार 400 करोड़ रुपये तक के टर्नओवर वाली कंपनियों पर कॉरपोरेट टैक्स को 30 फीसदी से घटाकर 25 फीसदी कर दिया गया है. वहीं स्टार्टअप को पूंजी जुटाने से लेकर एंजेल टैक्स पर भी राहत दी गई है. लेकिन किसानों के मामले में सरकार इतनी उदार नहीं दिखती.

श्रमयोगी मानधन योजना के तहत किसान परिवारों को प्रतिमाह 500 रूपए देने की घोषणा के अलावा इस बार भी बजट में किसानों की प्रमुख ज़रूरतों, जैसे, न्यूनतम समर्थन मूल्य, कृषि बाज़ार और अधूरी पड़ी सिंचाई परियोजनायों को शुरु करने जैसे मुद्दों के नाम पर सिर्फ़ खानापूर्ती की गई. इसी तरह कृषि पर प्रति वर्ष पांच लाख करोड़ रुपए खर्च करने से जुड़े भारतीय जनता पार्टी के चुनावी वायदे पर भी सरकार की तरफ से कोई स्पष्ट बात नहीं कही गई. कृषि विशेषज्ञ संभावना जताते हैं कि अतिरिक्त धन खर्च करने के बजाय अब तक कृषि के नाम पर जो राशि खर्च की जा रही थी उसी में थोड़ी-बहुत बढ़ोतरी कर इस लक्ष्य को हासिल किया जाएगा. वे यह भी कहते हैं कि अक्सर सरकारें ग्रामीण इलाकों में बिजली, सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में किए जाने वाले खर्च को भी बड़ी चतुराई से किसानों पर हुए खर्च के तौर पर गिना देती हैं. हो सकता है कि इस बार भी ऐसा ही हो!

किसानों के प्रति बैंकों का दुराग्रह भी किसी से नहीं छिपा है. बीते साल छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस द्वारा किसानों की कर्ज़ माफ़ी की घोषणा पर कई प्रमुख बैंकों के प्रतिनिधियों ने चिंता ज़ाहिर की थी. 2017-18 में दस राज्यों द्वारा किसानों के तकरीबन 1.8 लाख करोड़ रुपए की कर्ज़माफ़ी की घोषणा पर भी बैंकों ने कड़ी प्रतिक्रिया दी थी. लेकिन पिछले वित्त वर्ष की आख़िरी तिमाही तक गिने गए 10.17 लाख करोड़ रुपए के एनपीए के मुद्दे पर बैकों की तरफ़ से कोई खास टीका-टिप्पणी सुनने को नहीं मिली.

इसी तर्ज़ पर स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) की पूर्व चेयरपर्सन अरुंधती भट्टाचार्य ने 2017 में उत्तर प्रदेश के गरीब और जरूरतमंद किसानों के लिए 36,359 करोड़ रुपए की कर्ज़माफी को अनुशासनहीनता करार दिया था. अपने बयान में भट्टाचार्य का कहना था कि यदि एक बार किसी को इस तरह ऋण से माफी मिल जाएगी तो वह आगे से हर बार इसकी उम्मीद करेगा. इस तरह भविष्य में ऐसे अधिकतर लोन बिना चुकाए ही रह जाएंगे. कुछ ऐसी ही राय भट्टाचार्य ने तब भी ज़ाहिर की थी जब एसबीआई ने कृषि उपकरणों और ट्रैक्टर लोन को लेकर किसानों को राहत देते हुए वन टाइम सेटलमेंट स्कीम की शुरुआत की थी. जबकि यही अरुंधती भट्टाचार्य उससे पहले टेलीकॉम क्षेत्र पर चढ़े चार लाख करोड़ रुपए के कर्ज़ में रियायत देने की पैरवी करने की वजह से चर्चाओं में शामिल रही थीं.

ये दोहरी नीतियां नहीं तो और क्या हैं जिनके चलते विजय माल्या और नीरव मोदी जैसे बड़े बैंक डिफॉल्टरों को लगातार कर्ज़ पर कर्ज दिया जाता रहता है. लेकिन किसानों को छोटे से छोटे कर्ज़ की वसूली के लिए उनकी जमीन की नीलामी के नोटिस थमा दिए जाते हैं. इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट एनसीआरबी के आंकड़ों के हवाले से बताती है कि कर्ज़ के चलते आत्महत्या करने वाले किसानों में से अस्सी फीसदी, बैंकों और माइक्रोफायनेंस संस्थाओं के कर्ज़दार थे, न कि साहूकारों के. जाहिर सी बात है कि इनमें से ज्यादातर सरकारी बैंक ही रहे होंगे. योजना आयोग के एक पूर्व सदस्य अभिजीत सेन इस रिपोर्ट में बताते हैं कि कर्जों की वसूली के मामले में साहूकारों से ज्यादा सख्त बैंक थे क्योंकि उनके नियम ही ऐसे हैं कि वे इस मामले में कोई नर्मी नहीं दिखा सकते. इस मामले में माइक्रोफायनेंस संस्थाएं और भी ज्यादा निर्दयी थीं. वे सामाजिक स्तर पर इतना दबाव बनाती हैं कि किसानों के पास कर्ज न लौटा पाने की हालत में आत्महत्या करने के अलावा कोई और चारा नहीं रहता.

सरकार और उसकी संस्थाओं के इन्हीं दोहरे मापदंडों को आड़े हाथों लेते हुए पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहाकार अरविंद सुब्रमण्यम ने 2017 में अपने एक बयान के ज़रिए खूब सुर्ख़ियां बटोरी थीं. उन्होंने कहा था कि सरकार को कॉरपोरेट क्षेत्र के बड़े कर्जदारों का कर्ज़ माफ़ करना पड़ेगा क्योंकि ‘पूंजीवाद इसी तरह काम करता है. चूंकि लोगों से गलतियां हो जाती हैं इसलिए उन्हें एक हद तक रियायत मिलनी चाहिए... लेकिन मुझे इस बात पर आश्चर्य होता है कि यह सिद्धांत किसानों पर लागू क्यों नहीं होता. अगर धनी कॉरपोरेट्स गलती करके इतनी बड़ी रियायतें पा सकते हैं तो उन किसानों को कर्जमाफी क्यों नहीं मिल सकती जो ऐसी कोई गलती नहीं करते बल्कि उन आर्थिक नीतियों के सताये हैं जो उन्हें जान-बूझकर गरीब बनाए रखती है. क्या किसान इस पूंजीवादी व्यवस्था का हिस्सा नहीं हैं?’

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