यह भारतीय किसानों की आत्महत्या पर सत्याग्रह की चार किश्तों की श्रृंखला का दूसरा हिस्सा है


इस रिपोर्ट के पिछले भाग में बताया गया था कि किसानों की आत्महत्या के लिए सरकार की दोहरी आर्थिक नीतियां बड़ी भूमिका निभाती हैं. लेकिन अगर यह पूछा जाए कि आखिर किसका हवाला देकर किसानों को बदतर हाल में रखा जाता है, तो इसका जवाब है - आपका और हमारा. खाद्य एवं आर्थिक नीति विशेषज्ञ देविंदर शर्मा बताते हैं कि कृषि लागत और मूल्य आयोग भी इस बात को भली-भांति जानता है कि किसानों को उनका पूरा हक़ नहीं मिल रहा. लेकिन उसकी भूमिका किसानों को दी जाने वाली और उपभोक्ताओं द्वारा दी जाने वाली कीमत के बीच संतुलन बनाना है. ऐसे में बाजार में मंहगाई बढ़ने की बात कहकर किसानों को उनकी फसल का उचित मूल्य मिलने से वंचित रखा जाता है.

शर्मा आगे जोड़ते हैं, ‘1991 में आर्थिक सुधारों की शुरुआत के बाद से ही सभी सरकारें खेती और उससे जुड़े लोगों को दरकिनार करती आई हैं. न सिर्फ़ भारत बल्कि दुनिया भर में उद्योग को बढ़ाने के लिए कृषि क्षेत्र से बलिदान लिया गया है. इसके लिए आर्थिक सुधारों का हवाला दिया जाता है जोकि उद्योगों से ही जुड़े होते हैं. कृषि की भूमिका उद्योगों के लिए भूमि, सस्ता व कच्चा माल और सस्ता श्रम उपलब्ध कराने तक ही सिमटकर रह गई है.

राष्ट्रीय किसान आयोग के प्रथम अध्यक्ष और केंद्रीय कृषि एंव जल संसाधन राज्य मंत्री रह चुके सोमपाल शास्त्री हमें बताते हैं, ‘इस पूरी प्रक्रिया में किसानों पर यह कहकर मनोविज्ञानिक दवाब बनाया जाता है कि उनकी खुदगर्ज़ी के चलते बाजार में लोगों को महंगा अन्न खरीदना पड़ रहा है. लिहाज़ा हमारे मज़लूम किसान प्राकृतिक आपदाओं से जैसे-तैसे बची फसलों के बदले मिलने वाली ना-कुछ कीमत को ही अपनी नियति मानकर स्वीकार कर लेते हैं.’

शायद यही कारण है कि पिछले कई सालों से हमारी औसत कृषि आय अवरुद्ध पड़ी है. नीति आयोग द्वारा हाल के वर्षों में जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक 2010-11 से 2015-16 के बीच प्रत्येक किसान की कुल आय में मंहगाई दर के सापेक्ष प्रति वर्ष महज 0.44 फीसदी यानी न के बराबर ही बढ़ोतरी हुई. वहीं खेतिहर मजदूरों के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के मुताबिक इस दौरान किसानों को उनके उत्पादों के लिए मिलने वाली कीमतों में 6.88 फीसदी का इज़ाफा तो हुआ, लेकिन साथ ही किसानों द्वारा इसके लिए उपयोग में लाए जाने वाले संसाधनों के दाम 10.52 फीसदी बढ़ गए. करीब एक एकड़ कृषि भूमि में अनाज और दाल उगाने वाले भरतपुर (राजस्थान) के किसान गोविंद हमें बताते हैं कि उर्वरक, कीटनाशक, मजदूर और ट्रांसपोर्ट आदि मिलाकर जिस फसल के लिए वे लगभग पचास हजार रुपए खर्च करते हैं, उसके लिए कई बार उन्हें महज तीस से पैंतीस हजार रुपए ही बाज़ार से मिल पाते हैं.

खाद्य एवं आर्थिक नीति विशेषज्ञ देविंदर शर्मा इस बारे में विस्तार से बात करते हुए अपने कुछ साल पुराने एक अध्ययन का उल्लेख करते हैं. वे कहते हैं कि 1970 में गेहूं के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) 76 रुपये प्रति क्विंटल था जबकि उस समय स्कूल के शिक्षकों का वेतन 90 रुपये प्रति माह था. अगले 45 वर्षों में स्कूल के शिक्षकों के वेतन में सौकड़ों गुना की बढ़ोतरी देखने को मिली. अन्य सरकारी कर्मचारियों के वेतन में भी वृद्धि का आंकड़ा कमोबेश इतना ही था. लेकिन इस अवधि में गेहूं के लिए एमएसपी को बढ़ाकर महज़ 1,450 रुपये प्रति क्विंटल ही किया गया, जो कि पहले से सिर्फ़ 19 गुना ज़्यादा था. ‘यह साबित करता है कि किस तरह कृषि उत्पादों की क़ीमतों को समाज के अन्य वर्गों की आय की तुलना में साल-दर-साल बढ़ने से रोका गया है. यदि इन क़ीमतों को भी उसी अनुपात में बढ़ने दिया जाता तो हमारे किसानों को उस तरह के संकट का सामना नहीं करना पड़ता, जिनसे उसे आज हर रोज़ जूझना पड़ता है.’ शर्मा आगे जोड़ते हैं.

विडंबना यह है कि जब खाली जेब लिए किसान आंसू बहा रहा होता है, आम उपभोक्ता खुशियां मनाते हैं. दिसंबर 2018 में थोक महंगाई दर आठ महीने के सबसे निचले स्तर पर जाकर 3.80 प्रतिशत और खुदरा महंगाई दर अठारह महीनों के सबसे निचले स्तर पर जाकर 2.19 फीसद हो गई थीं. इस दौरान खाने-पीने की वस्तुओं की कीमतों से लेकर लोन की दरें तो घट गईं लेकिन इसने कई किसानों को बर्बाद भी कर दिया.

अक्सर देखने को मिलता है कि जब मंहगाई और खुदरा मंहगाई की दर बहुत निचले स्तर पर चली जाती है तब खाने-पीने की वस्तुओं की कीमतों भी घट जाती हैं. लेकिन इससे भी बड़ी परेशानी की बात ये है कि कई बार इन दोनों में कोई तार्किक संबंध नहीं होता है. बीते साल जनवरी की बात करें तो केंद्रीय सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक उस समय महंगाई दर काफी कम होने के बाद भी 2.05 प्रतिशत थी. लेकिन खाने-पीने से जुड़ी वस्तुओं के लिए यह दर -1.29 फीसदी ही थी. यानी कि इन चीजों के दाम बढ़ने के बजाय घट रहे थे.

लेकिन ऐसा नहीं है कि सिर्फ उपभोक्ताओं के लिए ही काश्तकारों का पेट काटा जाता है. बल्कि उद्योगों के हिस्से की कुर्बानी भी किसान को ही देनी पड़ती है. गन्ना किसान और चीनी मिलों को भी इस बात के उदाहरण के तौर पर लिया जा सकता है. पिछले कई सालों में उत्तर प्रदेश में चीनी मिलों द्वारा बकाया पैसा न चुकाए जाने से निराश होकर कई किसानों ने खुदक़ुशी कर ली. सिर्फ़ 2019-20 की बात करें तो गन्ने की फसली सीजन की बकाया राशि 12,000 करोड़ रुपये है. जबकि गन्ना नियंत्रण आदेश - 1966 के मुताबिक चीनी मिलों को या तो 14 दिनों के भीतर किसानों का भुगतान करना होगा या फ़िर बकाया राशि पर 15 प्रतिशत वार्षिक ब्याज वहन करना पड़ेगा. लेकिन आंकड़े बताते हैं कि इन दोनों में से किसी भी प्रावधान को ज़मीन पर अमल में नहीं लाया जाता है.

गन्ने का बकाया चुकाने के लिए उत्तरप्रदेश सरकार ने इस बार जो उपाय निकाला है वह किसानों को और ज़्यादा परेशान करने वाला है. योगी सरकार ने किसानों से कहा है कि वे मिलों से बकाया राशि का तगादा करने के बजाय उनसे प्रति माह सौ किलोग्राम चीनी ले लें. वस्तुओं के विनिमय आधारित इस व्यापार व्यवस्था को बार्टर सिस्टम कहते हैं. ऊपर से इस नए आदेश में यह भी कहा गया है कि किसानों को मिलों से चीनी अपने साधन से उठानी होगी और जीएसटी का भी वहन करना होगा. इस आदेश के तहत किसानों को कोई ट्रांसपोर्ट सब्सिडी भी नहीं दी जाएगी.

सरकार के इस फैसले ने गन्ना किसानों को सकते में डाल दिया है. मेरठ ज़िले की मवाना तहसील के पहाड़पुर गांव के वीरेंद्र भी इन किसानों में से एक हैं. नाराज़गी और चिंता के मिले-जुले स्वर में वे कहते हैं कि ‘चीनी मिल पर हमारे छह महीने से दो लाख रुपए बकाया हैं. हमें हमारा पैसा चाहिए, चीनी नहीं. इस लॉकडाउन में हम चीनी बेचने कहां जाएंगे और कौन हम से ख़रीदेगा? फ़िर हर महीने तीन-तीन हजार रुपए की चीनी बेचकर कब तक दो लाख रुपए की वसूली हो पाएगी?’ वे आगे कहते हैं, ‘कुछ दिनों में नई फसल बोनी है. सोच रहे हैं कि खेत के एक हिस्से पर धान बो दें. लेकिन उसके लिए भी खाद, दवा और बीज ख़रीदने के लिए लिए पैसों की जरूरत है. लेकिन पैसे नहीं मिलने से हम पिछला उधार ही नहीं चुका पाए हैं. इस बार फ़िर से ब्याज पर पैसे लेने पडे़ंगे.’

किसानों के प्रति सरकार के दुराग्रह पर एक कृषि विशेषज्ञ तंज कसते हुए कहते हैं, ‘उद्योगों के प्रति सरकारों का झुकाव इस बात से समझा जा सकता है कि करीब छह साल पहले किसानों के भुगतान से जुड़े एक मामले में जब चीनी मिलें सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी तब भारत सरकार के सॉलिसिटर जनरल किसानों के विरोध में खड़े थे. हालांकि अदालत ने किसानों के पक्ष में फैसला सुनाया. लेकिन इस घटना ने सरकार की मंशा को साफ कर दिया था.’

कपास के किसान भी इनसे अलग नहीं हैं. आंकड़े बताते हैं कि देश में आत्महत्या करने वाले किसानों में से 70 प्रतिशत कपास की खेती से ही जुड़े होते हैं. विश्लेषकों के मुताबिक वस्त्र उद्योग को प्रोत्साहित करने की कीमत किसानों को चुकानी पड़ती है. उस पर विकसित देशों द्वारा अपने किसानों को दी जाने वाली सब्सिडी और हमारे देश की आयात नीतियां भी किसानों के लिए कोढ़ में खाज का काम करती हैं. इस बात के पक्ष में देविंदर शर्मा ‘फार्म सब्सिडीज़ दैट किल’ शीर्षक से लिखे गए एक पत्र का ज़िक्र करते हैं. इस ख़त में चार अफ्रीकी देशों के प्रमुखों ने साफ़ तौर पर कहा था कि अमेरिका द्वारा दी जा रही सब्सिडी उनके देशों के कपास किसानों का जीना दूभर कर रही है.

दरअसल 2005 में अमेरिका ने केवल 20,000 किसानों को 3.9 बिलियन डॉलर मूल्य की फसल की पैदावार के लिए 4.7 बिलियन डॉलर की सब्सिडी दी थी. शर्मा के मुताबिक अमेरिकी सरकार ने ऐसा अपने वस्त्र उद्योग को व्यवहार्य बनाये रखने के लिए किया था. उनके शब्दों में, ‘इतनी ज्यादा सब्सिडी कपास की वैश्विक कीमतों में काफी गिरावट लाती हैं. इससे दुनिया भर में कपड़ों की कीमत भी कम हो जाती है. इस वजह से भारत और चीन जैसे देश बड़ी मात्रा में कपड़ों का आयात करते हैं. और हमारे काश्तकारों को अपनी फसल औने-पौने दामों में बेचनी पड़ती है. ये किसान एक सोची-समझी नीति के शिकार हैं. इन्हें फसल की उचित कीमत इसलिए भी नहीं मिलती ताकि हमारा वस्त्र उद्योग फल-फूल सके.’

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