कर्नाटक में जारी राजनीतिक संकट के बीच सत्ताधारी कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन के लिए कुछ राहत की खबर है. उसके बागी विधायक और आवास मंत्री एमटीबी नागराज ने वापस सरकार के पाले में आने के संकेत दिए हैं. ये संकेत उन्होंने कांग्रेस के संकटमोचक और कर्नाटक के जल संसाधन मंत्री डीके शिवकुमार से मुलाकात के बाद दिए.

खबरों के मुताबिक उपमुख्यमंत्री जी परमेश्वर भी शनिवार को नागराज के घर पहुंचे. उन्होंने भी इस बागी विधायक से अपना इस्तीफा वापस लेने की गुजारिश की. मुलाकात के बाद नागराज ने मीडिया से बातचीत की. उन्होंने कहा कि हालात ऐसे हो गए थे कि उन्होंने इस्तीफा दे दिया लेकिन, अब डीके शिवकुमार और दूसरों ने आकर उनसे इस्तीफा वापस लेने का आग्रह किया है तो वे इस पर विचार करेंगे. नागराज ने कहा, ‘आखिर कांग्रेस और मेरा साथ कई दशक का है.’

उधर, दूसरे विधायकों को मनाने की कोशिशें भी जारी है. बताया जा रहा है कि एचडी कुमारस्वामी खुद चार कांग्रेसी विधायकों से बातचीत कर रहे हैं. मुख्यमंत्री को उम्मीद है कि ये विधायक अपना इस्तीफा वापस ले लेंगे. अब तक कुल 16 विधायकों ने सत्ताधारी गठबंधन से इस्तीफा दिया है.

तो क्या विश्वासमत साबित करने का एचडी कुमारस्वामी का दांव काम करने लगा है? जानकारों के मुताबिक ऐसा कहना अभी जल्दबाजी होगी, लेकिन यह तय है कि इससे कांग्रेस के लिए हालात के लगातार खराब होने का सिलसिला जरूर रुक गया है. जानकारों का कहना है कि मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी ने विधानसभा में बहुमत परीक्षण की इजाजत मांगी है क्योंकि इसके जरिये वे बागी विधायकों को दल-बदल कानून के पेंच में फंसाना चाहते हैं. एक बार विश्वासमत प्रस्ताव पेश हो गया तो विधानसभा की बाकी सभी गतिविधियों को किनारे रखकर पहले उस पर चर्चा और मतदान होगा. कांग्रेस और जेडी (एस) सभी विधायकों को सदन में रहने और प्रस्ताव के पक्ष में वोट देने के लिए व्हिप जारी करेंगे. इन विधायकों में वे बागी विधायक भी शामिल होंगे जिनके इस्तीफों पर स्पीकर को फैसला करना है.

पेंच यहीं फंसेगा. अगर इन विधायकों ने पार्टी व्हिप का उल्लंघन किया तो इनकी सदस्यता दल-बदल कानून के तहत खतरे में आ जाएगी. इसका कारण यह है कि बागी कांग्रेस और जेडी(एस) विधायकों की संख्या उनकी पार्टियों के कुल विधायकों की संख्या की दो-तिहाई से कम है. ऐसे में अगर ये विधायक सदन में नहीं आए या उन्होंने प्रस्ताव के विरोध में वोट किया तो उनकी सदस्यता जा सकती है. उसके बाद विधानसभा अध्यक्ष रमेश कुमार विधायकों की सदस्यता रद्द कर सकते हैं, भले ही सरकार बहुमत परीक्षण में नाकाम रहे.

जानकारों की मानें तो यह हम तो डूबेंगे सनम, तुमको भी ले डूबेंगे वाली स्थिति होगी. इन विधायकों की सदस्यता रद्द होने का मतलब यह है कि अगर सरकार भाजपा की बनी तो भी ये विधायक उसका पक्ष नहीं ले सकेंगे. नियमों के तहत अगर किसी विधायक की सदस्यता रद्द कर दी जाती तो है तो वह तब तक मंत्री नहीं बन सकता जब तक वह दोबारा चुनाव लड़कर विधायक न बन जाए. कानून में इस्तीफा देने वाले और सदस्यता खोने वाले विधायक में अंतर किया गया है. सफलतापूर्वक इस्तीफा देने वाला विधायक पाला बदलकर सरकार में मंत्री बन सकता है, जैसे हाल में गुजरात में हुआ. लेकिन सदस्यता खोने वाले विधायक को मंत्री बनने के लिए फिर से चुनाव जीतने का इंतजार करना होता है.

अब यह देखना दिलचस्प होगा कि मंत्रीपद का लालच और सदस्यता खोने का डर कर्नाटक के इन विधायकों को किस तरफ ले जाता है. अटकलें लग रही हैं कि कर्नाटक में अगले हफ्ते बहुमत परीक्षण हो सकता है. इसे देखते हुए विधायकों पर पहरे और कड़े हो गए हैं. कांग्रेस, जेडीएस और भाजपा, सभी अपने विधायकों को होटल और रिजॉर्ट में शिफ्ट कर रहे हैं.