यह भारतीय किसानों की आत्महत्या पर सत्याग्रह की चार किश्तों की श्रृंखला का तीसरा हिस्सा है


इस रिपोर्ट के पिछले दो भागों में हमने किसानों की आत्महत्या के लिए जिम्मेदार दो प्रमुख कारणों - दोहरी आर्थिक नीतियां और उपभोक्ता व उद्योगों के आगे किसानों के हितों की अनदेखी - के बारे में जाना था. लेकिन राष्ट्रीय किसान आयोग के प्रथम अध्यक्ष और पूर्व केंद्रीय कृषि एंव जल संसाधन राज्यमंत्री सोमपाल शास्त्री का कहना है कि खेती की बढ़ती लागत और कृषि उत्पादों के बदले मिलती बेहद कम कीमतें भी किसानों को मौत के मुंह में धकलेने में बड़ी भूमिका निभाता है.

विश्लेषकों की मानें तो भारत में 90 फीसदी से ज्यादा किसानों को उनके उत्पादों के लिए सरकार द्वारा तय न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) का लाभ नहीं मिल पाता है. आर्थिक सर्वेक्षण 2018-19 में सरकार ने भी यह बात स्वीकार की है कि खाद्यानों के करीब एक तिहाई भाग की ही खरीद एमएसपी पर हो पाती है. आर्थिक सहयोग विकास संगठन और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ओईसीडी-आईसीएआईआर) की एक रिपोर्ट के हवाले से खेती-किसानी से जुड़ी एक प्रमुख वेबसाइट गांव कनेक्शन का कहना है कि वर्ष 2000 से 2017 के बीच उत्पाद का सही मूल्य न मिलने की वजह से देश के किसानों को करीब 45 लाख करोड़ रुपए का नुकसान हुआ था. वर्ष 2015 में भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के पुनर्गठन का सुझाव देने के लिए बनी शांता कुमार समिति ने भी अपनी रिपोर्ट में बताया था कि 2012-13 में सिर्फ़ छह फीसदी किसान ही ऐसे थे जो न्यनूतम समर्थन मूल्य पर गेहूं और धान बेच पाए थे. यानी तब देश के 94 फीसदी किसान एमएसपी के फायदे से दूर रहे थे.

राजनीतिक दल स्वराज अभियान के संयोजक और समाजशास्त्री योगेंद्र यादव ने न्यूनतम समर्थन मूल्य की जमीनी हक़ीकत सामने लाने के लिए पिछले साल राष्ट्रीय स्तर पर ‘एमएसपी सत्याग्रह’ की शुरुआत की थी. तब अपने एक साक्षात्कार में यादव ने एमएसपी को किसानों के लिए एक मजाक बताया था. यादव का कहना था कि पूरे देश में एक भी थोक का बाज़ार ऐसा नहीं है जहां सरकार द्वारा तय मूल्य पर कृषि उत्पादों को खरीदा-बेचा जाता हो. 2014 के लोकसभा चुनावों के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषणों में किसानों को यकीन दिलाया था कि केंद्र में भाजपा की सरकार बनते ही राष्ट्रीय किसान आयोग या स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू कर दिया जाएगा. 2018 के बजट में तत्कालीन वित्त मंत्री अरूण जेटली ने खरीफ की फसलों के लिए एसएसपी लागत मूल्य का डेढ़ गुना तक करने की घोषणा की भी कर दी. लेकिन योगेंद्र यादव के साथ-साथ कई कृषि विशेषज्ञों ने भी इसे सिर्फ़ राजनीतिक स्टंट बताया था.

कृषि विशेषज्ञों के इन आरोपों के तार स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों से जुड़ते हैं. खाद्य आपूर्ति को भरोसेमंद और किसानों की आर्थिक हालत बेहतर बनाने जैसे दो प्रमुख उद्देश्यों के साथ बने इस आयोग का गठन साल 2004 में यूपीए सरकार के समय हुआ था. इसने 2006 में अपनी रिपोर्ट दी जिसमें किसानों को उनकी लागत मूल्य का 50 प्रतिशत मुनाफा देने की पुरजोर सिफारिश की गई थी.

लेकिन इसमें एक तकनीकी पेंच था. दरअसल निर्धारित फसलों के लिए एमएसपी का आकलन करने वाला कृषि लागत और मूल्य आयोग (सीएसीपी) इस किसी फसल की लागत की गणना तीन तरह से करता है. इन्हें ए2, ए2+एफएल और सी2 कहा जाता है. ‘ए2’ में फसल उत्पादन के लिए किसानों द्वारा किए गए सभी तरह के नकद खर्च, जैसे बीज, खाद, रसायन, ईंधन और सिंचाई आदि की लागत, शामिल होते हैं. ‘ए2+एफएल’ में नकद खर्च के साथ किसान परिवार का अनुमानित मेहनताना भी जोड़ा जाता है. उधर, ‘सी2’ में व्यवसायिक मॉडल को अपनाया जाता है. इसमें कुल नकद खर्च और किसान के पारिवारिक पारिश्रमिक के अलावा खेत की जमीन का किराया और कुल कृषि पूंजी पर लगने वाले ब्याज को भी लागत में शामिल किया जाता है.

ए2+एफएल और सी2 लागत मूल्यों के बीच के अंतर को गेहूं के उदहारण से समझते हैं. 2017-18 में गेंहू के लिए ए2+एफएल पर आधारित (अनुमानित) लागत 817 रुपए/क्विंटल थी वहीं इसका सी2 आधारित लागत मूल्य 1,256 रुपए/क्विंटल था. यानी ए2+एफएल, सी2 से करीब 53 प्रतिशत ज्यादा था. कृषि विशेषज्ञ बताते हैं कि किसानों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने के लिए स्वामीनाथन आयोग ने अपनी रिपोर्ट में सी2 को लागत मूल्य के तौर पर स्वीकार करने की बात कही थी. जबकि यूपीए की ही तरह एनडीए सरकार भी ए2+एफएल को फसलों का लागत मूल्य मानती है.

सत्याग्रह से हुई बातचीत में किसान महापंचायत के अध्यक्ष रामपाल जाट कहते हैं, ‘पिछले लोकसभा चुनावों से पहले मोदी जी ने अपने घोषणा पत्र में किसानों को उनकी लागत का 50 फीसदी लाभ देने की बात जोर-शोर से कही तो हमें भी लगा कि भाजपा सरकार में सी2 को लागत मूल्य मानकर एमएसपी तय हुआ करेगी. लेकिन मोदी सरकार ने किसानों को नई पुड़िया में पुरानी गोली देने का काम ही किया.

लागत मूल्य तय होने की प्रक्रिया पर सवालिया निशान लगाते हुए वे आगे कहते हैं, ‘यदि सरकारें ईमानदारी से ए2+एफएल के आकलन पर ही ध्यान देती तो भी किसानों को कुछ राहत मिल सकती है. लेकिन यहां भी उन्हें किसानों के हितों से कोई सरोकार नहीं है. पारिश्रमिक तय करते समय किसान परिवार के कई सदस्यों को अकुशल श्रमिक माना जाता है. लिहाजा कई बार उनके दैनिक मेहनताने के लिए (औसतन) 15 से 20 रुपए ही फसल लागत में जोड़े जाते हैं.’

महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (उदयपुर) के पूर्व निदेशक सुखदेव सिंह बुरडक भी इससे सहमति जताते हैं. वे कहते हैं, ‘ए2+एफएल के तहत पारिश्रमिक की गणना में सिर्फ वही समय जोड़ा जाता है जब तक किसान खेत में मौजूद रहता है. जबकि कर्ज के लिए किसान को हफ़्तों बैंक या साहूकार के पास जाना पड़ता है, बीज खरीदने के लिए कई-कई दिन मंडियों के चक्कर लगाने पड़ते हैं, जुताई और बुवाई से पहले घंटों तैयारी करनी पड़ती है या फिर ट्रैक्टर और अन्य जरूरी साधनों के लिए किसी बड़े किसान के यहां कई दफ़ा मिन्नतें करनी पड़ती हैं. लेकिन यह सारा समय किसान की दिहाड़ी में शामिल नहीं माना जाता.’

बुरडक आगे कहते हैं, ‘पारिवारिक पारिश्रमिक के नाम पर भी किसान को ठगा ही जाता है. मान लें किसी खेत में तीन घंटे ट्रैक्टर से जुताई हुई. तब अकेले मुखिया किसान का ही तीन घंटे का मेहनताना लागत मूल्य में जुड़ता है. जबकि ट्रैक्टर के साथ किसान की पत्नी, बच्चों या घर के अन्य सदस्यों को जुताई के समय खेत में दसियों तरह के अलग-अलग काम करने पड़ते हैं. लेकिन फसल की लागत तय करते समय उनकी मेहनत को भुला दिया जाता है.’

नाम न छापने की शर्त पर सीएसीपी के एक कर्मचारी बताते हैं कि किसी खेत की बुवाई या जुताई में लगे समय को अधिकारी (अनुकूल परिस्थियों में लगे समय के हिसाब से) अपने अंदाजे से तय करते हैं. ऐसे में यदि किसी कारणवश किसान को कृषि कार्यों में ज्यादा समय लगता है (जो कि अमूमन होती ही है) तो अतिरिक्त समय का मेहनताना फसल लागत में नहीं जुड़ता.

पारिश्रमिक के बाद फसलों का कुल लागत मूल्य तय होते समय भी अधिकतर किसानों के साथ न्याय नहीं हो पाता. लंबे समय से कृषि क्षेत्र से जुड़े राजस्थान के पत्रकार पीयूष शर्मा बताते हैं, ‘कृषि विश्वविद्यालयों में बैठे अर्थशास्त्री (कृषि आंकड़ों के संकलन की बेहद धीमी प्रक्रिया होने की वजह से) पुराने फॉर्मूलों और दरों के आधार पर ही वर्तमान उपज की डेढ़ गुनी कीमत तय करते हैं इसलिए उनकी सटीकता हमेशा संदिग्ध रहती है. उदाहरण के तौर पर 2019 में उपयोग में लाए गये कृषि संसाधनों, जैसे बीज, मजदूरी, ट्रैक्टर और वॉटर पंप में इस्तेमाल हुए डीज़ल आदि, की लागत 2016 की दरों के हिसाब से तय होती है.’

‘उस पर वैज्ञानिक अनुमानों और व्यावहारिक तरीके से खेती की लागत में जमीन-आसमान का अंतर होता है. यदि सरकार किसानों को लागत से डेढ़ गुना लाभकारी मूल्य देने की मंशा रखती है तो उसे ये फॉर्मूले बदलने के साथ-साथ लागत के ताजा आंकड़े जुटाने पर भी काम करना होगा’ शर्मा आगे कहते हैं, ‘सिंचित और असिंचित क्षेत्र में पैदा हुई फसल की उत्पादन लागत अलग-अलग होती है. ऐसे ही सतही और भू-जल से सिंचित फसलों की लागत भी अलग-अलग होती है. ऐसे में सभी किसानों को लाभकारी मूल्य मिलने की बात सही नहीं है.’

अखिल भारतीय किसान सभा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष अमराराम चौधरी सत्याग्रह से बातचीत में कहते हैं, ‘जब सरकारें फसल खरीदेंगी ही नहीं तो लागत मूल्य चाहे जो हो क्या फर्क पड़ता है.’ चौधरी का मानना है कि स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को जमीन पर उतारने के लिए मनरेगा बिल की तरह देश में बाकायदा कानून बनना चाहिए ताकि सरकारें किसानों की सुध लेने को मजबूर हो सकें.

उधर, सी2 को फसलों का लागत मूल्य घोषित न करने के पक्ष में अर्थशास्त्रियों का तर्क यह है कि ऐसा करते ही खाने-पीने की चीजों की कीमतें आसमान छूने लगेंगी और उपभोक्ताओं पर भारी बोझ आ पड़ेगा. लेकिन अमराराम इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते. बाजार में बीज से लेकर खाद तक पर विदेशी कंपनियों का एकाधिकार बताते हुए वे तंज भरे लहजे में कहते हैं, ‘जिस आलू की कीमतें आठ रुपए प्रति किलो करवाने की मांग करते किसानों (मंदसौर) को गोलियों से भून दिया जाता है, बाहरी कंपनियों का ठप्पा लगते ही वही आलू (चिप्स) 800 रुपए किलो तक बिकता है. इस तरह आर्थिक वजन से न तो किसान बच पाता है और न ही उपभोक्ता. इसलिए कुतर्क की बजाय सरकारों को अपनी नीतियों में बदलाव करना चाहिए ताकि समर्थन मूल्यों के नाम पर किसानों के साथ हो रहे इस मजाक को रोका जा सके.’

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