तकरीबन हमेशा ऐसा होता है. ऑस्कर्स घोषित होने के बाद विदेशी भाषा की सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार जीतने वाली विदेशी फिल्म ही दुनियाभर के सिनेप्रेमियों की नजर में चढ़ पाती है. ऐसा बहुत कम देखने में आया है कि अंतिम पांच में नामित बाकी की फिल्में भी दुनियाभर के सुधी दर्शकों के बीच उतनी ही चर्चित हो जाएं और ऑस्कर्स की खुमारी उतरने के बाद भी याद आती रहें.

फरवरी, 2019 में घोषित हुए 91वें ऑस्कर्स के बाद ऐसा हुआ. इस श्रेणी में नामित अंतिम पांच फिल्मों में से मैक्सिकन फिल्म ‘रोमा’ ने ऑस्कर पुरस्कार जीता और जीतने से पहले तथा बाद में दुनियाभर के दर्शकों का प्यार पाया. लेकिन इसके साथ ही बाकी की चार फिल्में भी विश्व-सिनेमा पसंद करने वाले दर्शकों के बीच धीरे-धीरे पहुंचने लगीं. आज आलम यह है कि उनमें से कुछ फिल्मों को तो अपार सेलिब्रेट की जा चुकी ‘रोमा’ से बेहतर बताने वाले दर्शकों की फेहरिस्त तक काफी लंबी हो चुकी है! इन फिल्मों की सफलता बता रही है कि अलग-अलग भाषाओं की ये फिल्में अगर आसानी से अमेरिका के बाहर भी उपलब्ध होने लगीं तो हमारे देशों में वे हॉलीवुड के लोकप्रिय सिनेमा तक को टक्कर दे सकती हैं.

‘रोमा’ की तरह ही श्वेत-श्याम रंगों से सजी पोलैंड की आधिकारिक एंट्री ‘कोल्ड वॉर’ भी ऑस्कर्स की खुमारी के दौरान और बाद में खासी पसंद की जा चुकी है. नाजी अत्याचारों के साक्षी एक पेंटर की कहानी कहने वाली जर्मन फिल्म ‘नेवर लुक अवे’ भले ही बाकी फिल्मों जितनी सेलिब्रेट नहीं हुई है लेकिन जिसने भी इसे देखा इसकी तारीफ में कसीदे ही पढ़े. मुराकामी की लघु कहानी पर आधारित दक्षिण कोरियाई ‘बर्निंग’ अंतिम पांच में जगह तो नहीं बना पाई लेकिन यह धीमी गति का वह उत्कृष्ट सिनेमा है जिसको न देखना कुफ्र करने से कम नहीं.

वहीं, यथार्थ के कठोर धरातल को 12 साल के बालक के माध्यम से प्रस्तुत करने वाली लेबनानी फिल्म ‘कपरनम’ (Capernaum) तो इस कदर हार्ड-हिटिंग है कि कई-कई दर्शक इसे ‘रोमा’ और ‘कोल्ड वॉर’ से बेहतर फिल्म बताते हैं. बहुत से दर्शकों का मानना है कि इसी फिल्म को विदेशी भाषा की सर्वश्रेष्ठ फिल्म का ऑस्कर जीतना चाहिए था.

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पांचवीं फिल्म का नाम है ‘शॉपलिफ्टर्स’. यह 2019 में घोषित हुए ऑस्कर्स में ‘एकेडमी अवॉर्ड फॉर बेस्ट फॉरेन लेंग्वेज फिल्म’ श्रेणी में नामित होने के अलावा अमेरिका के एक और प्रतिष्ठित अवॉर्ड गोल्डन ग्लोब में भी इसी श्रेणी के लिए 2018 में नामित हो चुकी है. 2018 के कान फिल्म महोत्सव का सबसे बड़ा पुरस्कार पाम डोर भी इसी फिल्म के खाते में आया है.

किस्मत से 2018 में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रिलीज हुई यह उत्कृष्ट जापानी फिल्म इन दिनों भारत आई हुई है. आप इसे पीवीआर के कुछ चुनिंदा थियेटरों में देखने का सुख उठा सकते हैं. ‘शॉपलिफ्टर्स’ की सबसे खास बात है कि न सिर्फ भावनात्मक रूप से बल्कि परिवार और रिश्तों की व्याख्या करते वक्त भी यह फिल्म घोर हिंदुस्तानी मालूम होती है. इसे देखते वक्त आप सोचेंगे जरूर कि काश, ठीक यही क्रांतिकारी फिल्म किसी ‘सलाम बॉम्बे’ वाली मीरा नायर के निर्देशन में हमारे यहां बन पाती तो क्या ही फख्र की बात होती!

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‘शॉपलिफ्टर्स’ के निर्देशक हिरोकाजू कोरिएडा जापानी सिनेमा में जाना-पहचाना सेलिब्रेटिड नाम है और वहां के कंटेम्परेरी सिनेमा में बहुत ऊंचा दर्जा रखते हैं. उनकी ज्यादातर फिल्मों में ‘परिवार’ एक सतत थीम बनकर मौजूद रहता है और ‘नोबडी नोज़’ (2004), ‘स्टिल वॉकिंग’ (2008), ‘आई विश’ (2011) और ‘लाइक फादर, लाइक सन’ (2013) जैसी चर्चित व उम्दा फैमिली ड्रामा फिल्में उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति दिला चुकी हैं. ‘शॉपलिफ्टर्स’ के बाद यह ख्याति चहुंओर फैल चुकी है और इस फिल्म को इस जापानी फिल्मकार के करियर का ‘मास्टरपीस’ कहा जा रहा है.

टोक्यो के बाहरी छोर पर एक आदमी अपनी बीवी, एक बच्चे, बीवी की छोटी बहन और दादी के साथ बेहद छोटे और तंग घर में रहता है. घर के चारों ओर अट्टालिकाएं तनी हैं और यह गरीब परिवार मेहनत-मजदूरी करने के अलावा दुकानों से राशन व दूसरे कीमती सामान चोरीकर पेट भरता है. इसी से फिल्म का शीर्षक भी आया है और फिल्म शुरू भी एक सुपरमार्केट में बाप-बेटे के चोरी करने की प्रक्रिया दिखाने वाले सीन से होती है.

जल्द ही इनके घर घरेलू हिंसा की शिकार एक छोटी बच्ची आ जाती है, और आप उस दुनिया में दाखिल होते हैं जिसके अंदर क्या घटने वाला है आप लाख चतुर होने के बावजूद पहले से अंदाजा नहीं लगा पाते. जब तक कि फिल्म नहीं बताती तब तक आपको पता नहीं चल पाता कि यह मार्मिक जापानी कहानी केवल चोरी करके खाना खाने वाले परिवार की नहीं है, बल्कि परिवार नामक परंपरागत और कई बार दमघोंटू संस्था की बुनियाद पर चोट करके एक नया फलसफा हमारी नजर करने के बारे में ज्यादा है.

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तमाम संघर्षों और दुख के बावजूद इस विचित्र फैमिली में हरदम खुशी और स्नेह तारी रहता है. जब आप ताज्जुब कर-करके थक जाते हैं कि आखिर ऐसा क्यों हैं, तब जाकर फिल्म अपने असली रहस्य और केंद्रीय विचार की परतें खोलना शुरू करती है. फिल्म का आखिरी हिस्सा इस कदर प्रभावी है कि आप कई दिनों तक उसके भावनात्मक आवेग से बाहर नहीं आ पाएंगे. कुल जमा छह किरदारों की इस कहानी का हर किरदार कई-कई दिनों तक आपके जेहन में बसा रहेगा और बाकी किरदारों से साझा की गई उस किरदार की जिंदगी अनमोल मार्मिक दृश्य आपकी याददाश्त में दर्ज करती चलेगी.

सबसे दिलचस्प बात है – जो कि विश्व-सिनेमा के संदर्भ में दुर्लभ भी मालूम होती है – कि इस फिल्म के इन किरदारों की जिंदगी और उनकी भावनाएं अजनबी पृष्ठभूमि में पनपने के बावजूद नितांत देसी महसूस होती हैं. फिल्म है जापानी, फिर भी दिल है हिंदुस्तानी!

आसान फिल्ममेकिंग और सीधी-सरल सिनेमेटोग्राफी कैसे महान कहानियां कहने के भी काबिल होती हैं, यह भी आपको ‘शॉपलिफ्टर्स’ देखकर समझ आएगा. अद्भुत कहानियों को अक्सर फिल्ममेकिंग की यही सरलता महान बनाती रही है. सिनेमाई तकनीकों को कहानियों पर हावी नहीं करने का निर्णय कई बार ताजी हवा के झोंके वाला सुखद अहसास देता है.

किरदार भी ‘शॉपलिफ्टर्स’ के पास एक से बढ़कर एक हैं. टूटे हुए, सही-गलत के बीच जूझते हुए, मुस्कुराते हुए, दुनिया ने जो नहीं दिया उसे एक-दूसरे से पाते हुए. इन अलहदे किरदारों के होने से ही फिल्म अपनी ज्यादातर यात्रा में एक कैरेक्टर-ड्रिवन फिल्म बन पाती है और तीसरे एक्ट, यानी कि आखिरी हिस्से में जाकर ही आपको कहानी इन किरदारों के बीच से उठकर उनके आसपास की सयानी दुनिया के बीच विचरण करती हुई मिलती है. ज्यादातर वक्त फिल्म में छह किरदारों के आपसी रिश्तों को बुना और उधेड़ा गया है और उनकी आपसी बातचीत और गरीबी में भी स्नेह व खुशी ढूंढ़ पाना इस फिल्म को दुर्लभ बनाता है.

कई मायनों में ये फिल्म ‘रोमा’ में दिखाई गई मैक्सिकन हाउस मेड और अमीर परिवार के बीच पनपे आत्मीय रिश्ते से भी बेहतर कहानी अपने ‘चोर’ किरदारों के माध्यम से बयां करती है. अगर आपने ‘रोमा’ देखी है तो ‘शॉपलिफ्टर्स’ देखने के बाद हमारी बात का मर्म बेहतर समझ सकेंगे.

एक किरदार दादी का है, जो मातृसत्तात्मक ढांचे में मुखिया का रोल निभाकर बाकी सभी किरदारों का ख्याल रखती है. इसे लिखा इतना खूब गया है कि आपको हिंदी फिल्मों के किसी मुख्य किरदार की तरह इसमें तमाम शेड्स मिलते हैं और यह किरदार अपनी करनी से लगातार चौंकाता चलता है. 2018 में स्वर्गवासी हुईं जापानी अभिनेत्री किरिन किकी ने इस किरदार को निभाया है और एकदम यादगार बना दिया है. यह रोल उनका आखिरी परफॉर्मेंस भी था.

पति-पत्नी के रोल में लिली फ्रेंकी और सकुरा एंडो ने कमाल का काम किया है. पति ओसामू जहां हंसमुख है, थोड़ा भोला है, हर परिस्थिति में हंसता-मुस्कुराता रहता है वहीं पत्नी नोबियू पहले-पहल काम के बोझ तले दबी हुई एक कठोर महिला जान पड़ती है. धीरे-धीरे समझ आता है कि वो भी पति जितनी ही कोमल हृदय है और सभी में सबसे ज्यादा हिम्मती भी. बच्ची यूरी के साथ के उसके कुछ सीन अथाह मार्मिक हैं और इस अभिनेत्री का आखिरी हिस्से में काम देखने लायक है. खासकर एक दो-ढाई मिनट लंबा पूछताछ करने वाला सीन देखकर तो आप इनकी अभिनय प्रतिभा के कायल ही हो जाएंगे. फिल्म का सबसे झन्नाटेदार संवाद भी वे ही बोलती हैं जिसका पता आपको फिल्म देखते वक्त आसानी से चल जाएगा. इस संवाद के बेहद गहरे अर्थ फिल्म छिपाए बैठी है.

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यूरी और शोटा नाम के दो बेहद प्यारे बच्चे भी हैं, जो जहांभर की हिम्मत अपने कंधों पर लेकर चलते हुए मिलते हैं. इन्हीं के होने से फिल्म को अलहदा से कॉन्फ्लिक्ट्स मिलते हैं और इन्हीं के चलते फिल्म वह विचार हमारे बीच रख पाती है जो इस फिल्म को दुर्लभ बना जाता है. बस में सवार शोटा द्वारा पलटकर एक किरदार को देखना और कुछ बुदबुदाना एक ऐसा अद्भुत सीन है जिसे देखकर अगर आप फफककर रो नहीं पड़े, तो मान लीजिएगा कि आपसे कठोर इंसान कोई नहीं! और रो दिए तो मान लीजिएगा कि फिल्म जो कहना चाहती थी उसे आंसुओं से गाल भिगोने वाली क्रिया के माध्यम से उसने हासिल कर लिया है.

जहां भी जैसे भी मिले ‘शॉपलिफ्टर्स’ जरूर देखिएगा. विश्व-सिनेमा में ऐसी उत्कृष्ट और मेडिटेटिव फैमिली ड्रामा फिल्में आजकल कम ही बन रही हैं.

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