हम सभी जानते हैं कि कबीर कई अर्थों में एक आग-लगाऊ घर‌-फूंकू कवि थे जो एक तरह से दुनिया को उलटबांसी मानते थे. जिन्होंने कविता लिखी नहीं, बानी कही और जिनके जन्म, मृत्यु, जीवन, कविता आदि सभी के बारे में तथ्य कम मालूम, किंवदन्तियां अधिक प्रचलित हैं. अंग्रेज़ी उपन्यासकार किरण नागरकर ने हमारे समय के लिए एक औपन्यासिक कबीर गढ़ा है ‘दि आर्सनिस्ट’ (प्रकाशक जगरनाट) के रूप में. सच की तलाश में कबीर कई धार्मिक सांस्कृतिक आदि रूढ़ियों को आग लगाकर भस्म कर देना चाहते थे. इस उपन्यास में कबीर को जुलाहागिरी के साथ-साथ राजकाज में सलाह देने के रूप में सम्बद्ध किया गया है. सारा उपन्यास एक कि़स्म की दास्तान की तरह लिखा गया है.

उपन्यास में दरबार सलाह, षड्यन्त्र आदि की जगह है, कबीर का कपड़े बुनने का कारखाना ज्ञान की खोज, संवाद और विवाद, प्रश्नांकन की जगह. दोनों को एक साथ साधने का हुनर इस मध्यकालीन भक्तकवि और संत के पास है. पर दोनों ही जगहों पर जो मुद्दे सामने आते हैं वे मुसलमानों के नरसंहार, गोरक्षा के लिए की गयी मारपीट, गोमांस, मुसलमानों में घटता रोज़गार आदि हैं. यह जल्दी ही साफ़ हो जाता है कि यह उपन्यास इतिहास-कथा नहीं हमारे समय की हिंसा-हत्या-घृणा-भेदभाव की गाथा है. कबीर के बहाने स्त्रियों की स्वतंत्रता, जात-पांत, आस्था आदि के मुद्दे भी उठते हैं जो समकालीनता का अन्तर्पट और स्पष्ट कर देते हैं.

अपने कारखाने में अपने युवा हिंदू-मुसलमान सहयोगियों से बात करते हुए कबीर कहते हैं, ‘यह थोड़ा अजब है कि शैतान तो हमेशा मिल जाता है पर ईश्वर हमेशा थोड़ा व्यस्त रहता है.’ आगे कबीर कहते हैं, ‘अगर आजकल की नयी अकादेमिक पदावली का उपयोग किया जाये तो ईश्वर ब्रह्माण्ड का एकीकृत सिद्धान्त है. अच्छा-बुरा, युद्धप्रेमी और शान्तिप्रिय, हिंदू, मुसलमान, क्रिस्तान, बौद्ध, भौतिकतावादी और धर्मोपदेशक, नास्तिक और आस्तिक, सभी उसमें समाये हैं. वह काफ़ी विशाल और काफ़ी विवेकशील है जो सभी अंतर्विरोधों को समाहित कर लेता है.’

एक और दिन जुलाहा-कवि कहता है, ‘यह कोई छुपी हुई बात नहीं है कि संसार अपूर्ण है. हम जो नहीं जानते हैं या शायद जानना नहीं चाहते वह यह है कि क्या ईश्वर अपूर्ण है. फिर एक और परेशान करनेवाला सवाल यह है कि ईश्वर ने मनुष्य को रचा या कि इसका उलटा हुआ है.’ कबीर यह भी कहते हैं कि कई देवता अपनी मियाद पूरी हो जाने की तारीख़ के साथ आते हैं. आज हिन्दुओं के वरुण, अग्नि, इन्द्र आदि को कौन पूजता है? या जि़यस, अफ्रोडाइट या अपोलो को जिन्हें सिकन्दर और उसकी प्रजा पूजती थी? त्रिमूर्ति के ब्रह्मा भी भुला दिये गये हैं.’

जब शासक हज़ारों मुसलमानों के मारे जाने को निस्सहाय देखता रहता है तो कबीर की टिप्पणी है, ‘एक हत्या और हत्यारे को जेल जाना पड़ता है और क़ानून उसे फांसी पर लटका देता है. दस हत्याएं, यही सज़ा क्योंकि हत्यारे के पास गंवाने के लिए एक ज़िंदगी होती है. पर एक हज़ार या दो हज़ार की या दस लाख की या उससे भी अधिक की हत्या कर दो तो तुम क़ानून के ऊपर होगे. और इससे पहले कि तुम्हें पता चले, विस्मृति फैल जायेगी और ऐसा सर्वहत्यारा जयजयकार पाते हुए जनता का मसीहा हो जायेगा.’ कबीर अपना प्रश्नांकन जारी रखते हुए कहते हैं, ‘अगर वह सब कुछ को देखता है तो वह धर्म के नाम पर किये बलात्कार, अत्याचार, बच्चों की हत्या के प्रति अन्धा क्यों है?’ वे यह पूछने से भी नहीं चूकते कि ‘वह सभी धर्मों को खारिज क्यों नहीं कर देता जो कि सबसे अधिक हत्याओं और नरसंहार के लिए ज़िम्मेदार हैं? .... अगर वह सर्वशक्तिमान है तो क्या वजह है कि अब तक जाति-प्रथा या नस्ली पूर्वग्रह समाप्त नहीं हुए हैं.’

उपन्यास के अंत में कबीर का स्वर्गप्रवेश होता है और उनका सामना स्वयं ईश्वर से होता है. उन्हें अमृत का प्याला दिया जाये इससे पहले वे ईश्वर से कहते हैं. ‘हे सर्वशक्तिमान मुझे बताओ कि तुम सभी प्राणियों को स्वर्ग के राज्य में आने दोगे, मुझे बताओ कि कीड़े और घुन, शिकार किये जाने वाले पक्षी और समुद्र की शार्क मछलियां, सिंह और सर्प, लताएं और पौधे, अमर बेल और विशाल वृक्ष, धोखेबाज़ और दम्भी, वे सभी जो सीधी राह चले और जिन्होंने संकरे रास्ते चुने, बाक़ी जो लालच में फंसे जिन्होंने सेब खाया. बताओ कि कोई भी, कोई भी स्वर्ग से बाहर नहीं रहने दिया जायेगा.’ ईश्वर कबीर को हमेशा के लिए मनुष्य और धरती के पास भेज देता है. उपन्यास के अन्त में कबीर कहते हैं. ‘सिर्फ़ एक ईश्वर है. उसका नाम है जीवन. वही पूजा के योग्य है. बाक़ी सब अप्रासंगिक है.’

मित्र-पत्र

इन दिनों लोग पत्र नहीं लिखते, मैसेज करते हैं. संक्षेप में सार की बात लिखते हैं. भाषा की अनेक छटाएं जो पहले पत्रों में प्रगट होती थीं, आत्मीयता और परस्पर ऊष्मा के कारण, अब उनकी जगह घट गयी है. ऐसे में दो बड़े कलाकार-मित्रों के पत्राचार का हिन्दी अनुवाद में प्रकाशन अनदेखा-अनपढ़ा भी जा सकता है. रज़ा और कृष्ण खन्ना बड़े कलाकार ही नहीं अच्छे संवादी मित्र भी रहे हैं. उनके पत्राचार का अधिकांश ‘मेरे प्रिय’ नाम पुस्तक में संग्रहीत हैं जिसे रज़ा पुस्तकमाला के अन्तर्गत राजकमल ने प्रकाशित किया है, प्रभात रंजन के अनुवाद में.

18 अगस्त 1962 को कृष्णा खन्ना ने रज़ा को लिखा, ‘... जवा के बोराबुदूर में मुझे अजीब अनुभव हुआ. मैंने सुन रखा था कि वहां बहुत भव्य स्मारक हैं, लेकिन जब मैंने उनको देखा तो हैरान रह गया. उसकी विशालता और निरन्तरता ने मुझे बहुत प्रभावित किया. वह जो इमारत है वह एक सौ अस्सी साल के दौरान बनायी गयी थी,जिसका मतलब यह हुआ कि वास्तुकारों एवं शिल्पकारों की अनेक पीढ़ियों ने काम किया. सवाल यह उठता है कि शैली और गुणवत्ता की निरन्तरता को उन्होंने किस तरह बनाये रखा. इसका जवाब, जो कम से कम मेरे दिमाग़ में आता है, वह यह है कि समुदाय के अन्दर किसी और तरह की शैली का प्रश्न ही नहीं था और शिल्पकार एक ख़ास शैली में काम करते हुए बिलकुल सन्तुष्ट थे. इसी कारण से ऐसी विशाल उपलब्धि हासिल की जा सकी. वैसे हमारे समय का जो स्वभाव है और उससे जिस तरह से वैयक्तिक शैलियों के ऊपर ज़ोर दिया जाता है, इसके कारण हमारे लिए यह सम्भव नहीं है कि इस तरह के स्मारक बना सकें. मैं इस बात का उपहास नहीं उड़ा रहा, बल्कि बस उसकी पहचान कर रहा हूं और इस पहचान के कारण यह समझ बनती है कि निजी शैलियों के ऊपर ज़ोर अनेक तरह की कलाओं के द्वार खोलता केवल एक कला के नहीं. इसलिए यह कोई तार्किक बात नहीं है कि एक ही मानक के आधार पर सभी कुछ की तुलना की जा सके. असल में, आधुनिक हालात में यह हास्यास्पद बात है कि ऐसे सिद्धान्तों की खोज की जाये जिसके आधार पर सभी चीज़ों की वैधता को देखा जा सके.’

10 जुलाई 1963 को रज़ा ने लिखा, ‘ईमानदारी से कहूं तो दिल्ली की राजनीति से मैं दुखी हो गया हूं (कला की दुनिया में). इस बनिया मानसिकता की निंदा की जानी चाहिये. किसी को भी हर वक़्त आर्थिक उद्देश्य से या अपने ही हित में काम नहीं करना चाहिये या सोचना चाहिये. इंसान की एकमात्र तीव्रता होती है. वह पूर्ण होता है या होता भी है तो.’

16 सितंबर 1964 को रज़ा ने लिखा, ‘... यह देखकर दुख होता है कि लोग अमूर्त कला के ऊपर संदेह करने लगे हैं क्योंकि गैलरियां और संग्राहक पीछे हट रहे हैं. अच्छा है, इस गिरावट को देखना मजे़दार होगा क्योंकि इससे बहुत सारे लोगों के संकल्प या संकल्प की कमी का पता चल जायेगा.’

मातृभाषा की जगह

भारत में पिछले कई दशकों की राजनीति और आर्थिकी ने मिलकर समाज में मातृभाषाओं की जगह और उनके प्रति लगाव को घटाने, कम करने की लगभग सुनियोजित कोशिश की है. वर्चस्वशाली मीडिया ने भी इस में बड़ी कारगर सक्रिय भूमिका निभायी है. पढ़ा-लिखा, चिकना-चुपड़ा समृद्धि की आकांक्षा में सब कुछ से अपने को दूर ले जाता मध्यवर्ग इस समय अंग्रेज़ी के सुनहरे सपने देखने में अपनी आंखें लगभग बंद कर चुका है. संसार भर के शिक्षाशास्त्री और ज्ञान आदि के विशेषज्ञ इस बात पर सहमत रहे हैं कि किसी भी बच्चे की आरंभिक शिक्षा मातृभाषा में ही होना चाहिये. तभी उसमें ज्ञान-रचना, नैतिक और सांस्कृतिक बोध आदि की क्षमता ठीक से विकसित हो पायेगी. हमें इस ज्ञानसम्मत विवेक पर भरोसा नहीं है. दिल्ली जैसे महानगरों में छोटे-छोटे बच्चे अपनी मातृभाषा में नहीं अंग्रेज़ी में रेढ़-रेढ़कर बोलते हैं और इसमें उनके माता-पिता बड़ी शान महसूस करते हैं. केन्द्र और राज्य सरकारें अपना असली राजकाज अंग्रेज़ी में ही चलाते हैं. भारत के बुद्धि और कलावैभव का एक महत्वपूर्ण कारण उसकी भाषिक बहुलता रही है. उसकी लगातार अवमानना अर्थतंत्र और प्रशासन की स्थायी भाव बन गया है.

नयी राष्ट्रीय शिक्षा नीति का मसौदा मैंने ध्यान से नहीं पढ़ा है. लेकिन उसमें दो बातें महत्वपूर्ण हैं. एक अंग्रेज़ी के वर्चस्व को कम करने की कोशिश और दूसरी आरंभिक शिक्षा मातृभाषा में देने का संकल्प. दोनों का विरोध होना स्वाभाविक है. पर समझदार वर्ग को इन दोनों का खुलकर व्यापक समर्थन करना चाहिये. हो सकता है इस मसौदे में कई पश्चगामी और भारतीय संस्कृति और परम्पराओं की बहुलता के विरुद्ध भी कुछ हो तो उसका ज़ोरदार विरोध भी उतनी ही शिद्दत से किया जाना चाहिये.

अंग्रेज़ी एक महान् भाषा है पर वैसे ही तमिल, असमिया, मलयालयम, मराठी, उर्दू आदि अनेक भारतीय भाषाएं भी महान भाषाएं हैं. उनकी विगत उपलब्धियां महान हैं और सम्भावनाएं भी. इन पर अभिमान करनेवाला समाज चाहिये, इन्हें आगे बढ़ानेवाला समाज चाहिये जो ज़ाहिर है न तो नकलची, उठाईगीर होगा, न ही सारे ज्ञान को पश्चिम से आयात पर आत्मसन्तुष्ट रहनेवाला समाज. हमारी नियति ज्ञान से हटकर सिर्फ़ तंत्र तक सीमित करने की विराट और सर्वथा भारतीय चेष्टा हमें लगातार विश्व स्तर पर सिर्फ़ तकनीकी मजदूरों का देश बनाने की ओर ले जा रही है. जो दो क़दम प्रस्तावित हैं अगर उन पर अमल होता है और भारतीय ज्ञानपरंपरा का अपनी बौद्धिक विविधता में पुनर्वास होता है तो हम फिर एक ज्ञान-समाज बन सकते हैं जो हम मध्यकाल, प्राचीन काल में विश्वस्तर के थे और गांधी-रवीन्द्रनाथ-नेहरू-अम्बेडकर-लोहिया आदि के रूप में स्वतंत्रता-संग्राम और लोकतंत्र की स्थापना और उसे सशक्त बनाने के दिनों में भी. अब हम भेड़चाल के लोग हैं. इसे थमना चाहिये. विश्वगुरु हम कभी नहीं थे. पर विश्वस्तर पर हमारे ज्ञान की प्रतिष्ठा थी जो अब नहीं है. मातृभाषाओं के शिक्षा में पुनर्वास से हम फिर ज्ञानोत्पादन की दिशा में बढ़ सकते हैं.