इंग्लैंड में क्रिकेट विश्व कप 2019 के शुरू होने से कुछ रोज पहले इंग्लिश क्रिकेट बोर्ड के मुखिया टॉम हैरिसन का एक बयान काफी सुर्ख़ियों में रहा था. उन्होंने कहा था, ‘इंग्लिश क्रिकेट जिन समस्याओं से जूझ रहा है वे यूं ही खत्म नहीं होतीं, किसी भी खेल में विश्व कप जैसा टूर्नामेंट हर पीढ़ी को एक बार ऐसी समस्याओं के हल की शुरुआत करने का मौका देता है. इस विश्व कप में इंग्लैंड की जीत ही इन समस्याओं से हमें निजात दिला सकती है...इससे वर्तमान पीढ़ी को वह ऊर्जा और प्रोत्साहन मिलेगा जो इंग्लैंड में इस खेल के भविष्य को सुरक्षित रख सकेगा.’

टॉम हैरिसन के इस बयान की कई लोगों ने यह कहते हुए निंदा की कि ऐसा कहकर वे इंग्लिश टीम पर विश्व कप को लेकर दबाव बना रहे हैं, जो सही नहीं है. लेकिन एक बड़ा तबका ऐसा भी था जिसने हैरिसन का समर्थन यह कहते हुए किया कि क्रिकेट को जन्म देने वाले देश में इस खेल की लोकप्रियता जिस तरह घट रही है, उससे निपटने के लिए इसी तरह प्रतिक्रिया देने का समय है.

पिछले दिनों इंग्लैंड में क्रिकेट की घटती लोकप्रियता से चिंतित ‘इंग्लैंड एंड वेल्श क्रिकेट बोर्ड’ ने वहां एक सर्वेक्षण कराया जिसके नतीजे काफी हैरानी भरे थे. सर्वेक्षण के मुताबिक देश के प्राथमिक स्कूलों के केवल 7 फीसदी बच्चे ही क्रिकेट खेलते हैं और यह संख्या भी इसलिए बनी हुई है क्योंकि प्राथमिक स्कूलों ने खेल को बढ़ावा देने वाली कुछ चैरिटी संस्थाओं के साथ अनुबंध किया हुआ है. इस अनुबंध के तहत हर खेल को तरजीह देना अनिवार्य है. माध्यमिक विद्यालय स्तर पर क्रिकेट खेलने वालों की संख्या और भी कम पायी गई. इसके अलावा सर्वेक्षण में यह भी सामने आया कि एक पखवाड़े में एक बार क्रिकेट खेलने वाले नौजवानों की संख्या में बीते तीन सालों में 20 फीसदी की गिरावट आयी है.

सर्वेक्षणों में इंग्लैंड में क्रिकेट की घटती लोकप्रियता के पीछे की वजह भी सामने आयी है. बीते 44 सालों में इस टीम के विश्व कप न जीतने से यहां लोग खासे निराश हैं. बीते छह विश्व कप टूर्नामेंट्स में इंग्लैंड के सेमीफाइनल में भी न पहुंच पाने के चलते अधिकांश लोगों ने क्रिकेट से मुंह मोड़ लिया.

ब्रिटिश मीडिया के मुताबिक इन्हीं सब वजहों के चलते इंग्लिश क्रिकेट बोर्ड, वहां के पूर्व और वर्तमान खिलाड़ियों के लिए इस विश्व कप में जीत के मायने विश्व चैंपियन का ताज हासिल करने से कहीं ज्यादा हो गए हैं. रविवार को लॉर्ड्स क्रिकेट मैदान पर खेले जाने वाले फाइनल मुकाबले की पूर्व संध्या पर कप्तान इयोन मॉर्गन का भी कहना था, ‘हमने अभी तक विश्व कप ट्रॉफी उठाने के बारे में नहीं सोचा है, हम केवल अपने खेल पर फोकस कर रहे हैं क्योंकि यह जीत बच्चों और हमारी पीढ़ी की स्मृति को पूरी तरह बदलने वाली है.’

हालांकि, सेमीफाइनल में इंग्लैंड के अपने चिरप्रतिद्वंदी ऑस्ट्रेलिया को धूल चटाने के बाद से वहां के लोगों में अपनी टीम को लेकर जबरदस्त उत्साह है. क्रिकेट प्रेमियों को भरोसा है कि इस बार इंग्लैंड विश्व कप जीत लेगा. इस उत्साह की एक वजह और भी है कि इंग्लैंड ने अपने किसी भी लोकप्रिय खेल में दशकों से कोई बड़ा टूर्नामेंट नहीं जीता है. क्रिकेट में जहां उसकी झोली खाली है, वहीं उसने अपने यहां सबसे लोकप्रिय खेल फुटबॉल में 1966 के बाद से विश्व कप नहीं जीता है. बीते चार-पांच दशकों में इंग्लिश फुटबॉल में गैरी लिनेकेर से लेकर डेविड बेकहम और हैरी केन जैसे कई दिग्गज खिलाड़ी आए, लेकिन ये इंग्लैंड को दोबारा विश्व चैंपियन नहीं बना सके. हाल में हुए महिला फुटबॉल विश्व कप में इंग्लैंड को अपनी टीम से काफी उम्मीदें थीं, लेकिन वह भी सेमीफाइनल में हार गई. ऐसे में इंग्लैंड के लोगों का 27 साल बाद फाइनल में पहुंची अपनी क्रिकेट टीम से उम्मीदें रखना स्वाभाविक है.

ब्रिटेन का चर्चित अखबार ‘द गार्डियन’ अपनी एक टिप्पणी में लिखता है, ‘पहली बार इंग्लैंड की क्रिकेट टीम ने अपने जबर्दस्त आक्रामक खेल से क्रिकेट प्रेमियों का दिल जीत लिया है...पहली बार देश में फुटबॉल हाशिये पर है और क्रिकेट की चर्चा आम है, क्योंकि लोगों में विश्वास है कि जूनून से भरी उनकी अपनी क्रिकेट टीम अब विश्व फतह कर लेगी.’

इंग्लैंड इससे पहले तीन बार विश्व कप के फाइनल में पहुंच चुका है. सबसे पहले वह 1979 में फाइनल में पहुंचा था, जहां वेस्टइंडीज ने उसे शिकस्त दी थी. 1987 विश्व कप में ईडन गार्डन पर हुए फाइनल में एलेन बार्डर की अगुवाई वाली आस्ट्रेलियाई टीम ने उसे हराया था. इसके बाद 1992 विश्व कप के फाइनल में इमरान खान की ‘अंडर डॉग’ मानी जा रही पाकिस्तानी टीम ने इंग्लैंड को शिकस्त दी थी.

करीब तीन दशक के एक लंबे अंतराल के बाद आज एक बार फिर इंग्लैंड की टीम फाइनल में है. जबरदस्त फॉर्म में चल रहे इंग्लिश खिलाड़ी जानी बेयरस्टा, जैसन राय, जो रूट, जोस बटलर और बेन स्टोक्स यह सुनिश्चित करना चाहेंगे कि 1979, 1987 और 1992 के बाद अब वे खिताब से नहीं चूकने पाएं.

बीते गुरूवार को इंग्लैंड ने जब सेमीफाइनल में ऑस्ट्रेलिया को हराया तो उसके अगले दिन ऑस्ट्रेलिया के पूर्व कप्तान एलेन बार्डर ने अपनी एक टिप्पणी में लिखा, ‘मुझे डर था कि कहीं इंग्लैंड इस मुकाबले में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर ऑस्ट्रेलिया को हरा न दे और उसने वही किया.’ लेकिन एलेन बार्डर की इस बात से अधिकांश जानकार सहमत नहीं हैं. इन लोगों का कहना है कि इस विश्व कप में इंग्लैंड ने अब तक अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया ही नहीं है.

बीते कुछ सालों में इंग्लैंड ने जिस तरह का क्रिकेट खेला है उससे भी बार्डर की बात में दम नजर नहीं आता. इंग्लैंड ने 2016 में पाकिस्तान के खिलाफ 444 का स्कोर खड़ा किया, इसके बाद उसने 2018 में अपने इस रिकॉर्ड को तोड़ते हुए ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ 481 रन बनाए, फिर इसी साल उसने फिर वेस्टइंडीज के खिलाफ 418 का स्कोर खड़ा किया. जाहिर है कि विश्व कप में इंग्लैंड का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन अभी बाकी है.

हालांकि, न्यूजीलैंड की टीम को भी अब कम नहीं आंका जा सकता. सेमीफाइनल में भारत जैसी दमदार टीम को हराने के बाद उसके हौसले भी बुलंद होंगे. यह भी ध्यान देने वाली बात है कि उसके पास केन विलियमसन के रूप में ‘कूल’ कप्तान है, जो न्यूजीलैंड की उस टीम का नेतृत्व कर रहा है जिसके छह खिलाड़ी विश्व कप फाइनल खेल चुके हैं. और फिर यह भी नहीं भूल सकते कि इंग्लैंड दो हफ्ते पहले इसी विश्व कप में पाकिस्तान और श्रीलंका जैसी टीमों के सामने धराशायी हो चुका है.

शनिवार को ब्रिटिश मीडिया ने जब बार-बार कीवी कप्तान केन विलियमसन से फाइनल में उनके ‘अंडरडॉग’ होने को लेकर सवाल किए. तो उन्होंने हल्की मुस्कुराहट के साथ कहा, ‘मुझे भी लगता है कि इंग्लैंड विश्व कप का प्रबल दावेदार होने का हकदार है. लेकिन हम कोई भी ‘डॉग’ हों, हमने भी पिछले वर्षों में यह देखा हे कि मैदान में कोई किसी को भी हरा सकता है, भले ही ‘डॉग’ की प्रजाति कुछ भी हो.’