‘पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था’ की बात मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में राष्ट्रपति के अभिभाषण से शुरु हुई. फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2024 तक भारत की अर्थव्यवस्था को पांच ट्रिलियन डॉलर (पचास खरब डॉलर) तक पहुंचाने का संकल्प दोहराया. इसके बाद वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के बजट भाषण में भी इसका कई बार उल्लेख हुआ और यह बात पूरे परिदृश्य पर छा गई. बजट पर प्रतिक्रिया देते हुए भाजपा के सांसदों और मंत्रियों ने भी पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था की बात को दोहराया और बजट के बाद तमाम आर्थिक सुर्खियां और विश्लेषण इसी को समर्पित रहे. विपक्ष ने जब इसे लेकर सरकार की आलोचना करनी चाही तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि जो लोग सोचते हैं कि 2024 तक भारत पांच ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की अर्थव्यवस्था नहीं बन पाएगा, वे पेशेवर निराशावादी हैं.

किसी भी तरह की बहस को अपने अनुकूल बनाने में मौजूदा भाजपा और उसकी सरकार को महारत हासिल है. प्रधनमंत्री नरेंद्र मोदी की पिछली सरकार के दौरान भी देखा जा चुका है कि कैसे जीएसटी जैसे कर सुधार के लागू होने को सरकार ने एक राजनीतिक इवेंट का रूप दिया और इसे दूसरी आजादी कहा. ऐसे में पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के नारे का भाजपा राजनीतिक इस्तेमाल करे तो इसमें कोई हैरत की बात कैसी! लेकिन, सवाल उठता है कि मीडिया की सुर्खियों से लेकर नेताओं के बयानों तक में आ गई इस बात का मतलब क्या है? क्या भारत 2024 तक इस लक्ष्य को पा सकता है? और पांच ट्रिलियन की अर्थव्यवस्था हो जाने के बाद देश और देशवासियों की आर्थिक सेहत में कितना सुधार होगा.

अगले पांच सालों में भारत को पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाया जा सकता है या नहीं, इस पर आर्थिक जानकारों में दो मत हैं. इनका एक खेमा मानता है कि यह सामान्य बात है, हर छह-सात सालों में अर्थव्यवस्था का आकार दोगुना हो जाता है. इनके मुताबिक, अगर सामान्य गणित का सहारा लिया जाये तो समझा जा सकता है कि 2024-25 तक भारतीय अर्थव्यवस्था बिना खास कोशिश के भी पांच ट्रिलियन डॉलर से कुछ ही कम होगी.

पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम भी इसी मत के समर्थक हैं. वे इस मुद्दे पर कहते हैं कि ‘2024 तक पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था हो जाना कोई चंद्रयान लांच करने जैसी बात नहीं है. 1991 में भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार 325 अरब डॉलर था जो 2003-04 तक 618 अरब डॉलर का हो गया. अगले चार साल में यह फिर दोगुना होकर 1.22 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया. जबकि 2017 में अर्थव्यवस्था फिर दोगुनी होकर 2.48 ट्रिलियन डॉलर हो गई. ऐसे में अर्थव्यवस्था अगर अपनी सामान्य रफ्तार से भी चलेगी तो अगले पांच सालों में दोगुनी हो जाएगी. इसके लिए किसी प्रधानमंत्री या वित्त मंत्री की जरूरत नहीं है.’

अगर चिंदबरम के तर्कों का सहारा लिया जाए तो 2024 तक पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य बहुत मुश्किल नहीं दिखता है. 2014 में मोदी सरकार के आने के समय भी भारत की अर्थव्यवस्था का कुल आकार 1.85 ट्रिलियन डॉलर था जो नोटबंदी और जीएसटी जेसे आर्थिक झटकों के बाद भी 2019 में 2.7 ट्रिलियन डॉलर हो चुका है. अगर वृद्धि की इस रफ्तार को भी देखें तो भी पांच ट्रिलियन डॉलर का लक्ष्य पहुंच से बहुत दूर नहीं दिखता है. जानकारों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) का भी आकलन है कि भारत 2024-25 के वित्तीय वर्ष तक 4.7 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बन जाएगा. कुछ अर्थशास्त्री तो यहां तक मानते हैं कि पांच ट्रिलियन का लक्ष्य सामान्य है, मोदी सरकार को और बड़ा लक्ष्य रखना चाहिए.

लेकिन, बहुत से दूसरे आर्थिक जानकार 2024 तक पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बन जाने के भारत के लक्ष्य को काफी कठिन मानते हैं. वे छह से आठ सालों में अर्थव्यवस्था के दोगुने हो जाने के सामान्य गणित के तर्क को उतने ही सामान्य तरीके से खारिज कर देते हैं. इनका मानना है कि दो से चार हो जाना आसान होता है, चार से आठ होना थोड़ा मुश्किल होता है और आठ से सोलह हो जाना काफी ज्यादा मुश्किल. ऐसे में यह कहना कि हर छह-सात साल में भारतीय अर्थव्यवस्था दोगुनी हो जाएगी ठीक नहीं है.

इसके अलावा इस लक्ष्य के मुश्किल दिखने की वजह मौजूदा आर्थिक हालात भी हैं. जीडीपी बढ़ने की दर मौजूदा समय में छह से भी नीचे है. बीते कुछ समय में भारत में खपत तेजी से गिरी है और अर्थव्यवस्था को बड़ा करने में उसका बड़ा हाथ है. इसके अलावा भारत में निवेश और बचत भी गिरावट पर हैं. ऐसे में पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य प्राप्त कर पाना आसान नहीं है.

जानकारों का मानना है कि अर्थव्यवस्था 2024 तक पांच ट्रिलियन डॉलर हो जाए यह तभी हो सकता है जब आने वाले सालों में भारतीय जीडीपी की वास्तविक वृद्धि (जीडीपी बढ़ने की सामान्य दर से महंगाई दर घटाने के बाद) आठ फीसदी के करीब रहे. अगर बजट के आकलन की ही बात करें तो 2019-20 में आर्थिक वृद्धि की वास्तविक दर सात फीसद रहने का अनुमान लगाया गया है. 2020-21 में यह वृद्धि 7.3 फीसद और 2021-22 में 7.5 फीसद रह सकती है. यानी कि सरकार का खुद का आकलन है कि अगले तीन सालों में जीडीपी की वास्तविक वृद्धि दर सात से 7.5 फीसद के बीच ही रहेगी. इसका मतलब है कि मौजूदा आर्थिक हालातों को देखते हुए पचास खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था का लक्ष्य पाना आसान नहीं बेहद मुश्किल है.

यह लक्ष्य इसलिए भी आसान नहीं है क्योंकि मौजूदा समय में दुनिया भर के देशों में आर्थिक वृद्धि की रफ्तार गिर रही है. इसके अलावा दुनिया के सामरिक हालात लगातार अस्थिर बने हुए हैं, ऐसे में कच्चे तेल की कीमतें कब क्या रूख अख्तियार कर लें कुछ कहा नहीं जा सकता है.

सरकार को भी एहसास है कि एक राजनीतिक लक्ष्य के तौर पर स्थापित कर दिए गए इस आर्थिक लक्ष्य को पाना इतना आसान नहीं है. इसीलिए देश के आम बजट में यह घोषणा की गई है कि अगले पांच सालों में बुनियादी क्षेत्रों में 100 लाख करोड़ रूपये का निवेश किया जाएगा. सरकार जानती है कि अर्थव्यवस्था के विस्तार के लिए निवेश सबसे जरूरी तत्व है और इसीलिए इसकी पहल खुद सरकार कर रही है. विदेशी निवेश के नियम और कारोबारी सुगमता पर भी जोर दिया जा रहा है. लेकिन, इन सबके साथ पांच ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था के लक्ष्य के लिए जरूरी है कि आगे कई तरह की परिस्थितयां अनुकूल ही रहें.

यह तो अर्थव्यवस्था के पांच ट्रिलियन डॉलर होने या इस लक्ष्य को पाने में कितनी मुश्किल है, इससे जुड़ी बातें हैं. लेकिन, अर्थव्यवस्था के पांच ट्रिलियन डॉलर हो जाने से लोगों की आर्थिक सेहत पर क्या फर्क पड़ेगा? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का इस बारे में मानना है कि केक जितना बड़ा होगा लोगों को भी उसका उतना बड़ा हिस्सा मिलेगा. यह बात ठीक भी लगती है. लेकिन, अगर उदारीकरण के बाद से ही देखें तो अर्थव्यवस्था में बढ़त का फायदा सभी तक सही तरह से पहुंचा हो, ऐसा नहीं हो सका है. अर्थव्यवस्था के बड़ी होने से ज्यादा बड़ी समस्या भारत में उसके सही वितरण की बनती जा रही है. ऐसे में सरकार को अर्थव्यवस्था के केक का आकार बड़ा करने के साथ यह सुनिश्चित करना एक बड़ी चुनौती है कि सभी को उसका एक न्यूनतम हिस्सा तो जरूर मिले.