1943 में 25 साल की उम्र में जब नेल्सन मंडेला जोहानिसबर्ग के विट्वाट्सरैंड विश्वविद्यालय में कानून की पढ़ाई कर रहे थे, तो वहां वे अकेले अश्वेत अफ्रीकी छात्र थे. नस्लवाद और रंगभेद के उस भीषण दौर में श्वेत अफ्रीकियों की घूरती निगाहों का सामना करना उनके लिए कितना मुश्किल रहा होगा इसे समझा जा सकता है. इस समय इस नौजवान के मन में बहुत कुछ चल रहा था. जोहानिसबर्ग के ऑरलैंडो स्थित उसके घर की दीवार पर कुछ तस्वीरें टंगनी शुरू हो गई थी. इन तस्वीरों से बनता कोलाज कुछ लोगों को अजीब लग सकता था. क्योंकि जहां इनमें महात्मा गांधी की तस्वीर थी, वहीं स्टालिन की तस्वीर भी थी. एक तस्वीर चर्चिल की, तो एक रूज़वेल्ट की भी थी. इन शख्सियतों के अलावा एक तस्वीर 1917 की बोल्शेविक क्रांति के दौरान सेंट पीटर्सबर्ग के विंटर पैलेस पर क्रांतिकारियों द्वारा धावा बोले जाने की भी थी.

तस्वीरों का यह चयन मंडेला के विकासशील और मिश्रित राजनीतिक व्यक्तित्व के बारे में बहुत कुछ कहता था. और यही राजनीतिक यथार्थवाद उनके बाद के क्रांतिकारी प्रयासों में भी स्पष्ट दिखा. बहुत समय तक उन्हें हिंसा से भी कोई परहेज नहीं रहा. लेकिन गांधी के विचार इतनी आसानी से उनका पीछा छोड़ने वाले नहीं थे.

1946 में दक्षिण अफ्रीका में रहने वाले भारतीयों ने वहां उनके साथ होनेवाले भेदभाव के खिलाफ एक जबरदस्त आंदोलन छेड़ दिया. इस आंदोलन के दो प्रमुख नेता इस्माईल मीर और जेएन सिंह कानून की पढ़ाई के दौरान मंडेला के साथी रहे थे. मंडेला ने देखा कि किस तरह इन दोनों ने आंदोलन की वजह से अपनी पढ़ाई बीच में छोड़ दी. इस आंदोलन में 2,000 से अधिक लोग जेल गए जिनमें गृहिणियां, पुरोहित, डॉक्टर, वकील, व्यापारी, मजदूर और छात्र सभी शामिल थे. मंडेला के दोनों भारतीय दोस्तों को तो छह महीने कठोर कारावास हुई. डॉ युसूफ मोहम्मद दादू और डॉ जीएम नायकर उस समय नटाल भारतीय कांग्रेस और इस आंदोलन के प्रमुख नेता थे, उन्हें भी छह महीने की कठोर कारावास हुई थी. अहमद कथराडा नाम के एक हाई-स्कूल के भारतीय छात्र तक ने अपनी पढ़ाई छोड़ दी. अमीना पाहड़ नाम की एक महिला जिनके यहां मंडेला अक्सर भोजन करने जाते थे और दोनों के बीच खूब बातचीत होती थी, वे भी अपना सबकुछ छोड़कर जेल गईं.

इस आंदोलन में भारतीयों का साहस, अनुशासन, अहिंसा और सत्याग्रह जैसे गांधीवादी सिद्धांतों के प्रति उनकी निष्ठा को देखकर मंडेला हैरान हुए बिना नहीं रहे थे. उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि इस आंदोलन ने 1913 में महात्मा गांधी द्वारा दक्षिण अफ्रीका में किए गए सिविल नाफरमानी की याद दिला दी थी. मंडेला ने लिखा है कि महात्मा गांधी वाला वह आंदोलन तो इतिहास का हिस्सा था, लेकिन यह आंदोलन तो उनकी अपनी आंखों के सामने हो रहा था. मंडेला ने लिखा है कि उनके साथ ही बहुत से अफ्रीकियों में जो जेल जाने का डर था वह इसी आंदोलन को देखकर दूर हुआ था. मंडेला के संगठन ‘यूथ लीग’ ने इस आंदोलन को भरपूर नैतिक समर्थन दिया था. अब उन्होंने मन में ठान लिया था कि यूथ लीग भी आगे से अपना आंदोलन भी कुछ इसी तर्ज पर करेगी. जेल जाने का डर तो दूर हो चुका था, हालांकि सबके साथ ऐसा नहीं था.

मंडेला ने इस बारे में एक दिलचस्प घटना का वर्णन किया है. 1949 में ‘यूथ लीग’ के तीन प्रमुख नेता- स्वयं मंडेला, वॉल्टर सिसुलू और ओलीवर टैम्बो अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस के अध्यक्ष डॉ अल्फ्रेड ज़ुमा के घर गए. डॉ ज़ुमा दक्षिण अफ्रीका में डॉक्टर बनने वाले पर पहले अश्वेत अफ्रीकी थे. इन तीनों युवाओं ने उनसे जाकर कहा कि अब हमें भी भारतीय अफ्रीकियों के 1946 वाले आंदोलन और उधर भारत में महात्मा गांधी द्वारा चलाए गए अहिंसक जनांदोलनों की तरह कोई आंदोलन करना चाहिए. हमें दमन के आगे झुकना नहीं चाहिए और गांधी की तरह कानून की अवमानना कर जेल जाने के लिए भी तैयार होना चाहिए. यह सुनकर डॉक्टर ज़ुमा एकदम उखड़ गए. उन्होंने मंडेला से कहा- ‘देखो भाई, मैं एक डॉक्टर हूं. मेरी इतनी बढ़िया प्रैक्टिस चल रही है. मैं भला जेल जाकर अपना धंधा क्यों चौपट करूं?’

इस पर मंडेला और उनके दोनों साथियों ने भी उन्हें अल्टीमेटम देते हुए कहा- ‘यदि आप हमारी बात नहीं मानेंगे, तो हम अगली बार आपको अफ्रीकी कांग्रेस का दोबारा अध्यक्ष बनने का समर्थन नहीं करेंगे.’ इतना सुनते ही डॉ ज़ुमा और भी आगबबूला हो गए और उन्होंने कहा - ‘मुझे ब्लैकमेल कर रहे हो? चलो निकलो यहां से.’ इतना कहते ही उन्होंने उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया और धड़ाके के साथ दरवाजा बंद कर लिया. वह अमावस की रात थी और 11 बज चुके थे. सड़क पर कहीं कोई गाड़ी मिलनी नहीं थी और घर मीलों दूर था.

मई, 1952 में अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस साउथ अफ्रीका इंडियन कांग्रेस के साथ मिलकर एक बड़ा आंदोलन करने की सोच रही थी. महात्मा गांधी के बेटे मणिलाल गांधी उस समय साउथ अफ्रीका इंडियन कांग्रेस के प्रमुख सदस्यों में से थे. मंडेला को जिम्मेदारी मिली की वे इसके लिए अभियान चलाएं, फंड जुटाएं, स्वयंसेवकों और क्षेत्रीय शाखाओं का समन्वयन करें. इस बारे में मंडेला ने अपनी आत्मकथा में लिखा है- ‘हमने इस बात पर भी चर्चा की कि क्या अभियान को अहिंसा के गांधीवादी सिद्धांतों के आधार पर चलाना चाहिए, या कि उस तरीके से जिसे महात्मा जी ‘सत्याग्रह’ का नाम देते हैं जिसमें अहिंसा के माध्यम से हृदय परिवर्तन की कोशिश की जाती है.

...इस पर कुछ लोगों ने अहिंसा का समर्थन विशुद्ध रूप से नैतिक आधार पर किया और कहा कि यह किसी अन्य सभी तरीकों से ज्यादा नैतिक था. महात्मा जी के बेटे और ‘इंडियन ओपिनियन’ नाम के समाचार पत्र के संपादक मणिलाल गांधी ने भी इस विचार का मजबूती से समर्थन किया. बहुत ही सौम्य व्यवहार वाले मणिलाल गांधी अहिंसा के मूर्तरूप नज़र आते थे, और उन्होंने जोर देकर कहा कि आंदोलन वैसा ही चले जैसा भारत में उनके पिता चला रहे हैं.

लेकिन कुछ दूसरे लोगों ने कहा कि हमें इस मुद्दे पर सिद्धांतों के बजाय रणनीति के आधार पर सोचना चाहिए, और वही तरीका अपनाना चाहिए जो समय की मांग है. यदि कोई विशेष तरीका या रणनीति हमें दुश्मन को हराने में सक्षम बनाती है तो हमें उसी का इस्तेमाल करना चाहिए. तो इस मामले में राज्य हमसे कहीं अधिक शक्तिशाली था, और हमारे द्वारा हिंसा के किसी भी प्रयास को विनाशकारी रूप से कुचल दिया जाता. इसलिए अहिंसा हमारे लिए कोई विकल्प नहीं, बल्कि एक व्यावहारिक आवश्यकता बन गई. यह मेरा विचार था, और मैंने गांधीवादी मॉडल में अहिंसा को किसी अपरिहार्य सिद्धांत के रूप में नहीं देखा, बल्कि एक रणनीति के रूप में देखा जो उस स्थिति में अपनाना बुद्धिमानी थी. यह सिद्धांत इतना भी महत्वपूर्ण नहीं था कि इसे रणनीति के तौर पर तब भी इस्तेमाल किया जाए जब वह आत्मघाती साबित हो, जैसा कि गांधी स्वयं मानते थे. मैंने तभी तक के लिए अहिंसक विरोध का आह्वान किया, जब तक यह प्रभावी साबित हो. मणिलाल गांधी की कड़ी आपत्तियों के बावजूद हम पर यही विचार हावी रहा.’

जाहिर है मंडेला कोई नैष्ठिक अहिंसावादी नहीं थे. जब यह आंदोलन शुरू हो गया तो मंडेला ने कानून की अवमानना के लिए दूसरों को तो आगे किया, लेकिन व्यावहारिक कारणों से खुद ग़िरफ़्तार होने से बचते रहे. हालांकि उसी रात जब एक बैठक के बाद आधी रात को मंडेला अपने दोस्त यूसुफ कैचलिया के साथ सड़क पर निकले तो एक दिलचस्प घटना हुई, उसका वर्णन मंडेला ने कुछ यूं किया है- ‘मैं बहुत थकान महसूस कर रहा था और किसी सिविल नाफरमानी के बारे में नहीं बल्कि मैं तो गरमा-गरम खाना और पूरी रात के नींद के बारे में सोच रहा था. लेकिन तभी एक पुलिसवाला मेरे और युसुफ की तरफ बढ़ा. यह साफ था कि हमलोग घर जा रहे थे और कोई विरोध प्रदर्शन नहीं कर रहे थे.

लेकिन पुलिसवाला चिल्लाया- ‘नहीं मंडेला, तुम बच नहीं सकते.’ उसने लाठी से पुलिस वैगन की तरफ इशारा करते हुए कहा- ‘चलो बैठो इसमें’. मुझे एकबारगी हुआ कि मैं उसे बताऊं कि भाई मैं कोई कानून तोड़ने वालों और ग़िरफ़्तारी देने वालों में से नहीं हूं, मैं तो बस रोज के आधार पर अभियान को चलाने के लिए जिम्मेदार हूं. लेकिन बेशक, ऐसा कहना हास्यास्पद ही होता. मैंने देखा कि जब उसने यूसुफ को ग़िरफ़्तार किया तो यूसुफ यह सब माजरा देखकर ठहाका मारने लगा. यह एक बहुत ही प्यारा दृश्य था कि पुलिस उसे ले जा रही थी और वह मुस्कुरा रहा था.’ यह मंडेला की भी पहली अनैच्छिक ग़िरफ़्तारी थी.

महात्मा गांधी ने सत्याग्रहों के दौरान उपवास का भी बहुत प्रयोग किया था. जुलाई 1966 में जब मंडेला और उसके साथी जेल में थे तो यह तय हुआ कि वे भी उपवास पर जाकर सत्याग्रह करेंगे. मंडेला के शब्दों में उन्हें ये उपवास वगैरह बड़ा अजीब लगता था. इसकी जगह उन्हें हड़ताल या साफ-सफाई करने से इनकार करने जैसे थोड़े आक्रामक तरीके ज्यादा पसंद थे. उन्हें लगता था कि हम भूखे रहेंगे तो जेल के अधिकारी हमें भूखा रखकर और भी मजे लेंगे. दूसरे हमारा स्वास्थ्य पहले से खराब है, भूखा रहने से हमारी जान पर बन आएगी. और फिर हम जेल के भीतर अनशन से मर भी रहे हों, तो ये खबर बाहर अखबारों तक पहुंचेगी कैसे? लेकिन आखिरकार साथियों के दबाव में मंडेला को भी अनशन के लिए तैयार होना ही पड़ा.

इसका भी दिलचस्प वर्णन मंडेला ने अपनी आत्मकथा में कुछ यूं किया है-
‘मेरे साथी मुझसे मजाक भी करते कि मैं खाना छोड़ना नहीं चाहता. भूख हड़ताल के समर्थकों ने तर्क दिया कि यह विरोध का एक पारंपरिक रूप से स्वीकृत रूप था जो महात्मा गांधी जैसे प्रमुख नेताओं ने दुनियाभर में अपनाया था. हालांकि मेरा उसूल था कि एक बार जब फैसला हो गया तो मैं भी इसका उतना ही समर्थन करता जितना कि इसका कोई भी समर्थक. बल्कि हड़तालों के दौरान अक्सर मुझे अपने उन सहयोगियों से उलझना पड़ता था जो हमारे बीच हुए समझौते का पालन नहीं करना चाहते थे. मुझे याद है कि अनशन के दौरान एक ने मुझसे आकर कहा - ‘मदीबा (दक्षिण अफ़्रीका के लोग प्यार से मंडेला को मदीबा कहते थे. स्थानीय जुबान में मदीबा का मतलब होता है – पिता ) , मुझे अपना खाना चाहिए. मेरी समझ में नहीं आता कि मैं खाना क्यों छोड़ूं. मैंने तो कई वर्षों तक इस संघर्ष में हिस्सा लिया है.’ हमारे कई कॉमरेड कभी-कभी चोरी-चुपके खाते थे. हमें यह आसानी से पता भी चल जाता था. क्योंकि जो भूख हड़ताल करेगा, उसे दूसरे दिन शौचालय की जरूरत ही नहीं पड़ेगी. फिर भी सुबह-सुबह हम किसी साथी को देखते कि वह शौचालय जा रहा है. फिर हमने अपनी आंतरिक खुफिया सेवा भी बना रखी थी, क्योंकि हमें मालूम था कि हमारे कुछ साथी इस मामले में कमजोर थे.’

अंत में बात उस दिन की जब 27 अप्रैल, 1994 को दक्षिण अफ्रीका की जनता एक रंगभेद से मुक्त देश में अपने मतदान के अधिकार का पहली बार उपयोग करने के लिए कतारबद्ध होकर खड़ी थी. वहां की रुढ़िवादी इंकाथा फ्रीडम पार्टी ने चुनाव का बहिष्कार करने का फैसला कर लिया था. लेकिन अंतिम घड़ी में वह चुनाव लड़ने को तैयार हो गई. इस स्थिति में बैलट पेपर पर सबसे ऊपर उसके चुनाव चिह्न का स्टीकर चिपकाना पड़ा. इंकाथा के प्रभाव वाले नटाल प्रांत में शांति और सुरक्षा का खतरा था. इसलिए मंडेला ने वहीं जाकर अपना वोट डालने का निर्णय लिया ताकि लोगों के भीतर सुरक्षा की भावना पैदा हो. अपना वोट उन्होंने ओहलांग स्कूल के मतदान केंद्र पर दिया. मतदान केंद्र के ठीक सामने की हरी-भरी घाटियों के पार महात्मा गांधी का फीनिक्स आश्रम था जहां गांधी ने अपना प्रिटिंग प्रेस बिठाकर नस्लीय भेदभाव के अंत का आह्वान किया था.

गांधी और मंडेला के बीच का एक संयोग यह भी तो था कि दोनों को जोहानिसबर्ग के एक ही फोर्ट जेल में बंद रखा गया. आज वह जेल दक्षिण अफ्रीका का संवैधानिक कोर्ट है और वहां गांधी और मंडेला दोनों की स्मृतियों को संग्रहालय के रूप में संजोकर रखा गया है.