दिल्ली में होने वाले विधानसभा चुनावों में तकरीबन छह महीने का ही वक्त बचा है. प्रदेश की सत्ता पर काबिज आम आदमी पार्टी (आप) जनवरी, 2020 में होने वाले विधानसभा चुनावों की तैयारी में जुट गई है. केंद्र की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) भी तकरीबन दो दशक बाद दिल्ली प्रदेश की सत्ता में वापसी के लिए तैयारियों में जुट गई है. लेकिन तैयारियों के स्तर पर कांग्रेस में कोई खास सुगबुगाहट नहीं दिख रही है.

इसके उलट आम आदमी पार्टी ने अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली अपनी दिल्ली सरकार की उपलब्धियों को अलग-अलग ढंग से लोगों के बीच पहुंचाना शुरू कर दिया है. आप की ओर से लोगों को यह बताया जा रहा है कि केजरीवाल सरकार ने शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में क्या-क्या काम किए हैं. साथ ही यह भी बताया जा रहा है कि कैसे केजरीवाल सरकार ने बिजली और पानी के बिल पर होने वाले खर्चों को कम किया है. पार्टी नई सड़कों के निर्माण से लेकर नए बने फ्लाइओवरों की संख्या भी गिना रही है. इसके अलावा आम आदमी पार्टी ने चुनावों को ध्यान में रखते हुए लोगों को लुभाने के लिए नई घोषणाएं भी की हैं. इसका सबसे बड़ा उदाहरण दिल्ली मेट्रो और दिल्ली परिवहन निगम की बसों में महिलाओं के लिए मुफ्त यात्रा का प्रस्ताव है.

इसी तरह से भाजपा भी अपनी कोशिशों में लगी है. पार्टी की ओर से ऐसे मसले लगातार उठाए जा रहे हैं जिनके आधार पर ध्रुवीकरण हो. साथ ही दिल्ली प्रदेश भाजपा के लोग ​पूरी दिल्ली में सदस्यता अभियान चलाकर लोगों को पार्टी की सदस्यता दिलाने के काम भी लगे हैं. वे दिल्ली के लोगों को समझा रहे हैं कि केंद्र में भाजपा की सरकार है और ऐसे में प्रदेश में भी भाजपा की सरकार बन जाती है तो दिल्ली का विकास तेज गति से होगा.

लेकिन आप और भाजपा के मुकाबले कांग्रेस की तैयारियों को देखें तो पता चलता है कि वह अभी कुछ खास नहीं कर रही है. 1998 से लेकर 2013 तक शीला दीक्षित के नेतृत्व में दिल्ली में लगातार 15 साल तक सरकार चलाने वाली कांग्रेस में विधानसभा चुनावों को लेकर कोई खास हलचल नहीं दिख रही. न पार्टी ठीक से केजरीवाल सरकार की नाकामियों से लोगों को वाकिफ करा पा रही है और न ही भाजपा के एजेंडे से अलग अपना कोई वैकल्पिक एजेंडा दिल्ली के लोगों के सामने पेश कर पा रही है.

विधानसभा चुनावों की तैयारी के नाम पर कांग्रेस की ओर से इक्का-दुक्का कदम दिखते हैं. ये कदम भी विवादास्पद हैं. उदाहरण के तौर पर दिल्ली प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहीं शीला दीक्षित ने हाल में पूरी दिल्ली में ब्लॉक और जिला स्तर पर जो पार्टी पर्यवेक्षक थे, उन्हें हटाकर नए लोगों की नियुक्ति की घोषणा की. उनके इस निर्णय पर पार्टी में विवाद छिड़ गया. प्रदेश कांग्रेस के ही कुछ प्रमुख नेता दिल्ली प्रदेश कांग्रेस प्रभारी पीसी चाको के पास यह शिकायत लेकर पहुंचे. इस शिकायत पर कार्रवाई करते हुए पीसी चाको ने शीला दीक्षित को यह निर्देश दिया कि वे अपने निर्णय को वापस लें. चाको का कहना है कि ये नियुक्तियां नियम के हिसाब से नहीं हुई हैं. अब शीला दीक्षित का निधन हो चुका है और यह बात यहीं खत्म हो गई है.

इस विवाद के बात यह भी पता चला था कि शीला दीक्षित के साथ जिन तीन कार्यकारी अध्यक्षों की नियुक्ति हुई उन्हें प्रदेश अध्यक्ष ने काम ही आवंटित नहीं किया. चाको के पत्र के बाद इन तीनों को काम सौंपे गए. इन तीनों को विधानसभा चुनावों को देखते हुए अलग-अलग काम सौंपे गए हैं. लेकिन जिला और ब्लॉक स्तर पर नियुक्तियों को निरस्त करने के मामले में अभी स्पष्टता नहीं आई है.

प्रदेश कांग्रेस के एक नेता पार्टी के अंदर चल रहे इस खींचतान के बारे में कहते हैं, ‘विधानसभा चुनावों को लेकर तैयारियां नहीं शुरू हो पाने की सबसे बड़ी वजह पार्टी की आंतरिक कलह है. जिन लोगों को चुनाव लड़ना है, उन्हें पता ही नहीं है कि पार्टी की लाइन क्या होगी और संगठन में निर्णय कौन लेगा. इस वजह से न तो पार्टी के स्तर पर तैयारियां शुरू हो पा रही हैं और न ही संभावित उम्मीदवारों के स्तर पर. जबकि दिल्ली में आज हालत यह है कि कांग्रेस तीसरे नंबर की पार्टी है और अगर हमें विधानसभा चुनावों में एक नंबर पर आकर फिर से सरकार बनानी है तो अभी से पूरी ताकत से काम करना होगा.’

तैयारियों में देरी की दूसरी वजहों के बारे में वे कहते हैं, ‘कुछ दिक्कत तो इसलिए भी है कि राष्ट्रीय स्तर पर भी कांग्रेस में नेतृत्व को लेकर भ्रम की स्थिति बनी हुई है. राहुल गांधी अध्यक्ष पद से हट रहे हैं लेकिन उनकी जगह कौन लेगा , यह पता नहीं है. इस वजह से प्रदेश के नेताओं को पता ही नहीं चल पा रहा है कि नए अध्यक्ष की दिल्ली के बारे में क्या रणनीति होगी और कौन सी टीम दिल्ली के चुनावों में पार्टी का नेतृत्व करेगी.’

वे आगे कहते हैं, ‘भले ही लोकसभा चुनावों में कांग्रेस और आप का गठबंधन नहीं हुआ हो, लेकिन अब भी कुछ लोग पार्टी में हैं जो इस बात के पक्षधर हैं कि भाजपा को दिल्ली प्रदेश की सत्ता से बाहर रखने के लिए आप और कांग्रेस को एक होकर चुनाव लड़ना चाहिए. नए राष्ट्रीय अध्यक्ष इस बारे में क्या निर्णय लेंगे, यह भी पता नहीं है. इस वजह से जो कांग्रेस के संभावित उम्मीदवार हो सकते हैं, वे अपने क्षेत्र में तैयारियों में पूरे मन से नहीं जुटे हैं. उन्हें लगता है कि अगर गठबंधन हो गया तो पता नहीं उनकी सीट कांग्रेस के पास रहे या न रहे.’

कुल मिलाकर दिल्ली प्रदेश कांग्रेस नेताओं से बातचीत करने पर पता चलता है कि पार्टी में अभी कई स्तर पर भ्रम की स्थिति बनी है. इस स्थिति और प्रदेश स्तर पर पार्टी की आंतरिक कलह की वजह से दिल्ली विधानसभा चुनावों को लेकर कांग्रेस की तैयारियां अब तक शुरू भी नहीं हो पाई हैं.