पहले उल्टा चोर कोतवाल को डांटे वाला रुख दिखाने के बाद उत्तर प्रदेश सरकार अब रक्षात्मक मुद्रा में आ गई है. मामला लखनऊ और लखनऊ की जान गोमती नदी की सफाई का है. राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण या एनजीटी ने लखनऊ की पर्यावरणीय दुर्दशा की निगरानी के लिए राज्य सरकार की सहमति से एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया था. इस समिति ने अपनी जांच के दौरान राजधानी लखनऊ में कूड़ा प्रबंधन और गोमती की सफाई के कार्यो में भयानक लापरवाही, अनियमितताएं और भ्रष्टाचार के मामले पकड़े. समिति ने एनजीटी को जो रिपोर्ट भेजी थी उसमें कहा गया था कि राजनैतिक हस्तक्षेप और भ्रष्टाचार के बीच मुख्य सचिव और अन्य प्रमुख ब्यूरोक्रेट अपने संवैधानिक दायित्व पूरे करने में विफल रहे हैं, जबकि मुख्य सचिव ने समिति से व्यक्तिगत रूप से कचरा प्रबन्धन की निगरानी करने की बात कही थी.

इस रिपोर्ट में आगे कहा गया था, ‘गोमती के प्रदूषण का हाल तो बहुत ही बुरा है. दो तीन दशक में गोमती का प्रदूषण चिन्ताजनक से रूप बढ़ा है. इसके लिए प्रदेश सरकार जिम्मेदार है. लापरवाही और गैर जिम्मेदारी का अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि लखनऊ में आज भी 31 नाले सीधे या आंशिक रूप से सीधे गोमती नदी में गिर रहे हैं. लेकिन सरकार इस दिशा में कोई ठोस प्रयास करने के बजाय अप्रत्यक्ष रूप से ऐसे प्रयत्न कर रही है कि समिति ठीक से कार्य ही न कर पाए. इसके सदस्यों को समय से जरूरी भुगतान और कार्यालय उपयोग के लिए जरूरी संसाधन तक उपलब्ध नहीं कराए जा रहे हैं.’

समिति ने अपनी रिपोर्ट में पाया है कि लखनऊ में कूड़ा उठाने के लिए नगर निगम द्वारा नियुक्त संस्था ईको ग्रीन हर महीने 36 हजार टन में से 22 हजार टन कूड़ा ही निस्तारित कर पा रही है. यह भी कि गोमती के प्रतिबंधित 100 मीटर के दायरे में 29 जगहों पर कचरा नदी किनारे डंप किया जा रहा है और यह काम नगर निगम तथा ईकोग्रीन द्वारा किया जा रहा है. रिपोर्ट के मुताबिक लखनऊ में 19 सीवेज पंपिंग स्टेशनों से कुल सीवरेज का लगभग आधा यानी 864.35 एमएलडी ही पंप हो पा रहा है और शेष आधा सीधे नदी में जा रहा है.

लखनऊ की पर्यावरणीय दुर्दशा से नाराज होकर एनजीटी ने लखनऊ के नगर आयुक्त पर दो करोड़ का जुर्माना लगाने को सिफारिश की थी. अब नगर आयुक्त ने अपनी जांच में नगर निगम के चार वरिष्ठ अधिकारियों को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया है और जुर्माना इन्ही चार अधिकारियों से वसूल किए जाने की अनुशंसा की है. इस तरह नगर निगम के कूड़ा प्रबंधन और सिविल विभाग के मुख्य अभियंताओं और दो जोनल अधिकारियों से 50-50 लाख जुर्माना वसूले जाने की चर्चा चल पड़ी है.

लेकिन एनजीटी की समिति अपनी अंतिम रिपोर्ट तैयार कर पाती इससे पहले ही राज्य सरकार ने समिति को ही भंग करने की घोषणा कर डाली. इसके बाद उसने समिति को दी जाने वाली सुविधाएं भी वापस ले लीं. अब एनजीटी ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए राज्य सरकार को फटकार लगाई है. एनजीटी ने कहा है कि राज्य सरकार को इस समिति को भंग करने का कोई अधिकार नहीं है. उसके मुताबिक समिति को भंग करने का अधिकार एनजीटी को ही है, किसी और को नहीं.

एनजीटी ने आगे कहा कि यह समिति इसलिए बनाई गई थी क्योंकि राज्य सरकार की मशीनरी पर्यावरण को होने वाली क्षति को रोक पाने में पूरी तरह असफल रही है. उसके मुताबिक ऐसे में जब तक सरकार कोई बेहतर विकल्प नहीं दे पाती तब तक यह अनुश्रवण समिति कार्य करती रहेगी. एनजीटी ने समिति का कार्यकाल भी 31 दिसंबर तक बढ़ा दिया है.

गौरतलब है कि राज्य के मुख्य सचिव ने बीती 14 जून को एनजीटी के संज्ञान में लाए बिना ईस्टर्न यूपी रिवर माॅनिटरिंग कमेटी को भंग करने का एकतरफा आदेश जारी कर दिया था, और एक तरह से अपनी कमियों को उजागर करने वाली समिति का मुंह बन्द करने का प्रयास किया था. लेकिन अब एनजीटी के कड़े रुख के बाद राज्य सरकार पशोपेश में आ गई. यदि एनजीटी का कड़ा रुख स्वीकार करके वह समिति का अस्तित्व बहाल करती तो सरकारी मशीनरी का भ्रष्टाचार और निकम्मापन खुले आम पकड़े जाने का खतरा था. और यदि एनजीटी से टकराव मोल लेती तो पर्यावरण की अनदेखी का सीधा आरोप झेलना पड़ता. फिलहाल वह अपनी गलती मानती लग रही है. यानी योगी सरकार ने समिति को भंग करने का फैसला रद्द कर दिया है.

राज्य सरकार एक ओर तो पर्यावरण के नाम पर बड़े बड़े दावे करती रही है मगर दूसरी ओर वह पर्यावरण के संरक्षण में जरा भी जिम्मेदार नहीं दिखती. खनन का मामला इसका एक प्रमाण है. अखिलेश सरकार में खनन मंत्री गायत्री प्रसाद प्रजापति का कारनामा इस सरकार में भी दोहराया जा रहा है. एनजीटी ने पाया है कि प्रयागराज में यमुना नदी में रोजाना सिर्फ 125 ट्रक बालू खनन की अनुमति है लेकिन असलियत में वहां हर रोज 400 से 500 ट्रक बालू का खनन किया जा रहा है. ऐसा ही राज्य की हर नदी में हो रहा है.

योगी आदित्यनाथ ने मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते ही पहला दरबार गोमती नदी के किनारे लगाया था. घोषणा की गई थी कि छह महीने में गोमती का पानी आचमन के योग्य बना दिया जाएगा. लेकिन अब ढाई वर्ष बाद स्थिति यह है कि गोमती में घुलित आक्सीजन की मात्रा शून्य हो चुकी है. घातक फीकल काॅलीफार्म बैक्टीरिया तय मात्रा से 10 हजार गुना बढ़ चुके हैं . एनजीटी की समिति के सचिव और पूर्व जिला जज राजेन्द्र सिंह ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि अप स्ट्रीम व डाउनस्ट्रीम दोनों ही जगह गोमती में घुलित आक्सीजन की मात्रा शून्य है. यह हाल तब है जब गोमती को प्रदूषण मुक्त करने के लिए हाल के वर्षों में 2000 करोड़ से ज्यादा रुपये फूंके जा चुके हैं. खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ गोमती को स्वच्छ बनाने के दो-तीन अभियानों का उद्घाटन कर चुके हैं.

लखनऊ में 31 किलोमीटर की लंबाई में बहने वाली गोमती नदी की सफाई का पहला एक्शन प्लान 1992 में शुरू हुआ था. करोडों रुपये खर्च होने के बाद भी गोमती की गन्दगी में तो कोई कमी आयी नहीं, अब उत्तर प्रदेश जल निगम ने बड़ा सा मुंह खोलते हुए नेशनल मिशन फाॅर क्लीन गंगा योजना के तहत केंद्र सरकार से 2500 करोड़ का और बजट मांगा है. जल निगम का कहना है कि यदि यह बजट मिल जाएगा तो नालों और सीवर का गंदा पानी गोमती में गिरना बिलकुल बंद हो जाएगा.

यह विरोधाभास भी दिखाता है कि राज्य सरकार और गोमती को स्वच्छ रखने के लिए जिम्मेदार विभाग अपने दायित्व के प्रति कितने गंभीर हैं. एक ओर तो राज्य सरकार के तौर तरीकों पर एनजीटी की समिति भ्रष्टाचार और आपराधिक लापरवाही के आरोप लगा रही है तो दूसरी ओर सूबे का एक महकमा फिर से उतनी ही रकम की मांग कर रहा है, जितनी अब तक गोमती के नाम पर खाई- निपटाई जा चुकी है. यानी अपने घर भरते रहिए, गोमती चाहे बचे या न बचे.