यह भारतीय किसानों की आत्महत्या पर सत्याग्रह की चार किश्तों की श्रृंखला का आखिरी हिस्सा है


इस रिपोर्ट के पिछले तीन भागों में हमने किसानों की आत्महत्या के लिए जिम्मेदार तीन प्रमुख कारणों - दोहरी आर्थिक नीतियां, उपभोक्ताओं-उद्योगों के आगे किसानों के हितों की अनदेखी और न्यूनतम समर्थन मूल्य के नाम पर किसानों के साथ हो रहे मजाक - के बारे में जाना था. लेकिन हमारे अन्नदाताओं की असमय मौत के पीछे विदेशी बीज और उनके साथ इस्तेमाल किए जाने वाले रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों की भी भूमिका कम नहीं है.

सत्याग्रह से हुई बातचीत में किसान महापंचायत के अध्यक्ष रामपाल जाट हरित क्रांति के चलते आए बदलावों को किसानों के बढ़ते कर्ज़ के लिए बड़ा जिम्मेदार मानते हैं. वे कहते हैं कि खाद्य आपूर्ति को सुनिश्चित करने के लिए इस क्रांति का आह्वान करते समय नहीं सोचा गया कि लोगों के पेट भरने की कीमत किसानों को अपनी जान देकर चुकानी होगी. दरअसल हरित क्रांति का मुख्य आधार ज्यादा उत्पादन देने वाले विदेशी बीज थे. किसान इन बीजों को नपुंसक बीज कहते हैं. ‘देसी बीजों से से जो फसल उगाई जाती थी, अगली फसल के लिए बीज उसी से मिल जाते हैं. लेकिन रासायनिक बीजों से उगी फसल के बीजों से अगली बुवाई नहीं की जा सकती है. इस वजह से किसान को हर बार एक बड़ी रकम इन बीजों को खरीदने में खर्च करनी पड़ती है’ रामपाल जाट कहते हैं.

जानकार बताते हैं कि विदेशी बीजों को प्रोत्साहन देने के लिए भारत सरकार द्वारा बनाईं सीड डेवलपमेंट-1988 और नेशनल सीड पॉलिसी-2002 के अलावा विश्व बैंक की नीतियों की वजह से अंतरराष्ट्रीय बीज कंपनियां, जैसे कारगिल, मोन्सांटो और सिनजेंटा - भारत में बड़े स्तर पर सेंध लगाने में सफल रहीं. फिर इन्होंने रातों-रात हमारे किसानी के ढांचे को बदलकर रख दिया. इन कंपनियों के रासायनिक बीजों के लिए बड़ी मात्रा में रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक की जरूरत पड़ने लगी जिनके मंहगे दामों ने किसानों की कमर तोड़ कर रख दी.

राष्ट्रीय किसान आयोग के प्रथम अध्यक्ष और पूर्व केंद्रीय कृषि एंव जल संसाधन राज्यमंत्री सोमपाल शास्त्री बताते हैं कि इन बीजों के बाजार में आ जाने से एक बड़ा नुकसान यह हुआ कि हमारी खेती के तरीके बदल गए. पहले हम कई फसलें उगाने में यकीन रखते थे. इससे न सिर्फ़ जमीन की प्राकृतिक उर्वरता कायम रहती थी, बल्कि किसी एक फसल में कोई विशेष कीड़ा लगने या कोई अन्य बीमारी होने पर किसान के हाथ में दूसरी फसलें बची रह जाती थीं. लेकिन विदेशी बीजों के बाज़ार में आने के बाद हमारे यहां प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से एकल फसल को बढ़ावा दिया जाने लगा ताकि उन बीजों की ज्यादा से ज्यादा बिक्री हो सके.

इसके उदाहरण के लिए कपास का नाम लिया जा सकता है जिसे खरीफ की दूसरी फसलों जैसे मूंगफली, मेथी, मूंगी, बरसीम, तोरिया, ज्वार, बाजरा या अरण्डी और तिल के साथ बोया जा सकता है. लेकिन 2002 में जब मोन्सांटो ने पहली बार बीटी (बेलिस थ्यूरेनजिनेसिस) कॉटन के बीज बाजार में उपलब्ध करवाए, तब अधिकतर किसानों ने अपने खेतों में सिर्फ कपास की ही बुवाई की और उन्हें इसके गंभीर नुकसान भुगतने पड़े.

किसानों को देसी कॉटन बीज सात रुपए प्रति किलो तक उपलब्ध हो जाते थे लेकिन बीटी कॉटन के बीजों को सत्रह हजार रुपए प्रति किलो तक यह कहकर उन्हें बेचा गया कि ये पुराने बीजों के मुकाबले कई गुना ज्यादा कपास पैदा करने में सक्षम हैं. लेकिन ये बीज अपने दावों पर खरे नहीं उतरे. साथ ही जहां देसी बीज की जरूरत बारिश के पानी से ही पूरी हो जाती थी, वहीं बीटी कॉटन के लिए लगातार सिंचाई की जरुरत थी जिसकी वजह से किसानों का खर्चा और बढ़ गया.

इसके अलावा बीटी कॉटन बीजों को बाजार में उतारते वक़्त इनके कीट-रोधी होने को भी जोर-शोर से प्रचारित किया गया था. लेकिन ये दावा भी कोरा ही साबित हुआ. कृषि विश्लेषकों की मानें तो ये रासायनिक बीज अपने साथ नए तरह के हानिकारक कीट लेकर आए जिनके नियंत्रण के लिए किसानों को 10 से 15 गुना ज्यादा कीटनाशक का उपयोग करना पड़ा. लेकिन इसके बावजूद वे अपनी फसलों को नहीं बचा पाए. हिंदुस्तान टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक बीते साल सिर्फ़ महाराष्ट्र में 41 लाख किसानों की कपास फसल को कीटों ने बरबाद कर दिया.

इसी तरह बिहार में भी मक्का के देसी बीजों की जगह मोन्सांटो के हाइब्रिड बीजों से उगी पहली फसल ही बड़े स्तर पर तबाह हो गई. बताया जाता है कि इस वजह से वहां के किसानों के करीब चार सौ करोड़ रुपए डूब गए थे. इसमें सबसे ज्यादा नुकसान छोटी जोत के किसानों को हुआ था.

यदि छत्तीसगढ़ की बात करें तो साल 2000 से पहले यहां शायद ही किसी किसान की खुदक़ुशी की ख़बर आती थी. लेकिन मशहूर कृषि शास्त्री पी साईनाथ की एक रिपोर्ट के मुताबिक अगले दस सालों में वहां के चौदह हजार से ज्यादा किसानों को अपनी जान गंवानी पड़ी. दरअसल छत्तीसगढ़ को देसी चावलों की विविधता के लिए जाना जाता था. लेकिन बाद में उन देसी चावलों को हरित क्रांति वाली नई किस्मों से बदल दिया गया. इनके लिए बड़ी मात्रा में सिंचाई, कीटनाशक और उर्वरक की जरूरत पड़ी. लेकिन इसके बाद भी साल दर साल चावल की खराब होती महंगी फसलों की वजह से किसान दवाब में आते रहे और अपनी जान देने लगे.

ब्रिटिश अख़बार डेली मेल की एक रिपोर्ट में भारतीय किसानों की आत्महत्याओं को नरसंहार की संज्ञा देते हुए मोन्सांटो की जीएम (जेनेटिकली मोडिफाइड) फसलों को इनके लिए जिम्मेदार बताया गया था. ऐसी ही एक अन्य रिपोर्ट की मानें तो खाद, बीज और कीटनाशक बनाने वालीं ऐसी वैश्विक कंपनियां किसी भी देश में घुसने के लिए वहां की राजनीति, नियमन संस्थाओं और शोधकर्ताओं को जमकर उपकृत कर उनसे अपने मुताबिक नीतियां बनवाती हैं. इस रिपोर्ट के अनुसार भारत में विदेशी बीज कंपनियों की घुसपैठ की शुरुआत मार्च- 1995 में हुई जब महाराष्ट्र हाइब्रिड सीड कंपनी बिना सरकारी इजाजत के चोरी-छिपे मोन्सांटो बीटी कॉटन के 100 ग्राम बीज देश में ले आई. फिर 1998 में मोन्सांटो ने इस कंपनी के साथ मिलकर गैरकानूनी रूप से देश के चालीस हिस्सों में बीटी कॉटन बीजों का परीक्षण किया और फिर धीरे-धीरे वह देश के बाज़ार में अपने पैर जमाती चली गई.

आज भारत में विदेशी बीज बाज़ार की विकरालता मार्केट रिसर्च से जुड़ी संस्थान आईएमएआरसी की एक रिपोर्ट से समझी जा सकती है. इस रिपोर्ट के मुताबिक 2017 में भारतीय बीज बाजार का मूल्य 360 करोड़ डॉलर यानी करीब 24809 करोड़ रुपए (मौजूदा दर) से ज्यादा पहुंच गया. यदि भारत में बीज बाजार के कंपाउंड एनुअल ग्रोथ रेट (सीएजीआर) की बात करें तो 2010 से 2017 के बीच यह सत्रह प्रतिशत रही है. आईएमएआरसी ने कयास लगाए हैं कि 2023 तक भारत में बीज बाजार 14.3 फीसदी सीएजीआर के साथ आठ सौ करोड़ डॉलर (मौजूदा दर से बात करें तो 55 हजार करोड़ रुपए) से ज्यादा पहुंच जाएगा.

सरकार इस मामले में किस तरह बीज कंपनियों को सहयोग देती है और किसान मूर्ख बनते हैं, इसका अहसास नए बजट से होता है. इसमें वित्तमंत्री ने जीरो बजट यानी पारंपरागत खेती पर निर्भर होने की बात जोर-शोर से कही. अव्वल तो जीरो बजट खेती जैसे दावे अपने-आप में बड़ी बहस का विषय हैं. लेकिन उसमें न उलझते हुए यदि आंकड़ों को देखें तो पता चलता है कि सरकार ने परंपरागत कृषि विकास योजना का बजट 300 से सिर्फ 25 करोड़ बढ़ाकर 325 करोड़ रुपये किया है. वहीं, एक रिपोर्ट के मुताबिक ‘राष्ट्रीय जैविक कृषि परियोजना’ का बजट बीते साल के 8.10 करोड़ रुपए की तुलना में घटाकर सिर्फ़ दो करोड़ रुपए कर दिया गया है. लेकिन दूसरी तरफ केमिकल फर्टिलाइजर पर सब्सिडी आवंटन को पिछले वर्ष के 70090.35 करोड़ रुपये के मुकाबले 79,996 करोड़ रुपए कर दिया गया है.

शासन-प्रशासन के इस दोहरे रुख की छोटी सी बानगी बीते साल छत्तीसगढ़ में भी देखने को मिली थी. वहां ख़ुद कृषि विभाग ने उन जिलों में मुफ़्त हाइब्रिड बीज बांट दिए जिन्हें जैविक खेती के लिए चुना गया था. पूरे राज्य में बांटने के लिए विभाग ने पंद्रह करोड़ के हाइब्रिड बीज खरीदे थे.

वहीं, रासायनिक खाद के मामले में भारत दुनिया भर में दूसरा सबसे ज्यादा खपत और तीसरा सबसे ज्यादा उत्पादन वाला देश है. एक अध्ययन के अनुसार 2007 तक भारत में 57 बड़े और 64 माध्यम आकार के रासायनिक खाद के कारखाने स्थापित किए जा चुके थे. ऐसी ही एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार साल 2014-15 में भारत में 3083.6 हजार टन फर्टीलाइजर का उत्पादन किया गया. एक अनुमान के मुताबिक भारतीय खाद बाजार का 2016 में कुल मूल्य 27.1 बिलियन डॉलर (मौजूदा दर के हिसाब से 18 लाख करोड़ से ज्यादा) था.

जबकि इन उर्वरकों का उपयोग मृदा उर्वरता के लिए नुकसानदायक साबित हुआ है. इस बात का ज़िक्र आर्थिक सर्वेक्षण 2018-19 में भी किया गया है. एक बड़ी परेशानी इस बात की भी है कि हमारे अधिकतर किसानों को जानकारी ही नहीं होती है कि कौन सी फसल में किस खाद का, कितना इस्तेमाल किया जाना उचित है. केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा लोकसभा में अगस्त-2016 पेश की गई एक रिपोर्ट के मुताबिक राज्य सरकारों को कई बार यह सलाह दी जा चुकी है कि किसी उर्वरक को उन जिलों में न भेजा जाए जहां की मिट्टी में संबंधित तत्व की उपलब्धता पहले ही अधिक है. लेकिन इस रिपोर्ट की मानें तो कई राज्य सरकारें इस बात को अनसुना कर चुकी हैं.

वहीं, सस्ती होने की वजह से भी यूरिया की खपत देश में बेतहाशा बढ़ गई है जो न सिर्फ़ फसलों बल्कि सेहत के लिए भी बेहद हानिकारक है. सामान्यत: किसी उर्वरक में नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटैशियम का अनुपात 4:2:1 बेहतर माना जाता है. लेकिन कृषि विशषज्ञों के मुताबिक पंजाब जैसे राज्य में यह अनुपात बिगड़कर 40:10:1 हो गया है. इसका एक प्रमुख कारण सब्सिडी में असमानता भी है. 2015-16 में तय 77 हजार करोड़ की सब्सिडी में से 52 हजार करोड़ रुपए सिर्फ़ यूरिया के लिए बांट दिए गए जबकि फास्फेटिक और पोटाशिक फर्टिलाइजर के हिस्से सिर्फ़ 25 हजार करोड़ रुपए आए.

वहीं अगर कीटनाशक की बात करें तो फिक्की और टाटा स्ट्रैटजिक मैनेजमेंट ग्रुप द्वारा नेशनल कांफ्रेंस ऑन एग्रोकेमिकल्स में पेश की गई एक रिपोर्ट में बताया गया है कि जो भारतीय फसल संरक्षण रसायन उद्योग 2014 में 4.25 बिलियन अमरीकी डॉलर का था वह 2020 तक बढ़कर 6.3 बिलियन अमेरिकी डालर (मौजूदा दर से 43 हजार करोड़) से ज्यादा का हो जाएगा. जानकारों की मानें तो इनमें वे कीटनाशक भी शामिल हैं जिनका दुष्प्रभाव देखते हुए विश्व के कई देशों ने उन्हें प्रतिबंधित कर रखा है.

इन कीटनाशकों की घातकता को कृषि मंत्रालय की पिछले साल की एक रिपोर्ट से समझा जा सकता है. इसके मुताबिक बीते चार वर्षों में सिर्फ़ महाराष्ट्र में 272 किसानों को जहरीले कीटनाशकों के इस्तेमाल के चलते जान से हाथ धोना पड़ा था. यह रिपोर्ट 2017 के कुछ ही महीनों में महाराष्ट्र के 23 से ज्यादा किसानों की मौत के बाद लोकसभा में पेश की गई थी.

पिछले कुछ सालों में देश में ऐसी कई समाजसेवी संस्थाएं सामने आई हैं जिन्होंने बिना रासायनिक उर्वरक के इस्तेमाल के ऑर्गेनिक खेती और स्वदेसी बीजों को बढ़ावा देते हुए किसानों को जागृत करने का प्रयास किया है. लेकिन बिना सरकारी मदद के ग्रामीण इलाकों में किसानों तक अपनी बात पहुंचा पाना इन संस्थाओं के लिए एक बेहद लंबी प्रक्रिया साबित हो रहा है. विश्लेषक बताते हैं कि पूरे विश्व में ऐसा उदाहरण कहीं और नहीं मिलता जहां किसी एक ही पेशे से जुड़े इतने लोगों को यों एक किनारे धकेल दिया गया हो.

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