बीते शनिवार को कांग्रेस की वरिष्ठ नेता शीला दीक्षित का निधन हो गया. 81 साल की इस नेता ने दिल्ली के एक अस्पताल में अंतिम सांस ली. वे कुछ समय से बीमार चल रही थीं. शीला दीक्षित तीन बार दिल्ली की मुख्यमंत्री रही थीं. इस तरह से देखा जाए तो उन्होंने सबसे लंबे समय तक इस राज्य की मुखिया का पद संभाला. वे कांग्रेस के कद्दावर नेताओं में शुमार थीं. इसी जनवरी में कांग्रेस ने उन्हें दिल्ली प्रदेश कांग्रेस इकाई का अध्यक्ष बनाया था.

शीला दीक्षित के राजनीति में कदम रखने की अपनी एक अलग और दिलचस्प कहानी है. पंजाब के कपूरथला में 31 मार्च, 1938 को जन्मीं शीला की पढ़ाई-लिखाई दिल्ली में हुई. उनके पिता यहीं के थे और मां कपूरथला की. जन्म के बाद वे दिल्ली आ गईं और यहां के निजामुद्दीन इलाके में रहने लगीं. उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई यहां के प्रतिष्ठित स्कूल जीसस ऐंड मैरी काॅन्वेंट से की और इसके बाद दिल्ली विश्वविद्यालय के मिरांडा हाउस से इतिहास में स्नातकोत्तर किया.

एक पूरी तरह से गैर-राजनीतिक परिवार से आने वालीं शीला दीक्षित की शादी उस समय कांग्रेस के बड़े नेता रहे उमाशंकर दीक्षित के बेटे विनोद दीक्षित से हो गई. दोनों की मुलाकात विश्वविद्यालय में पढ़ाई करने के दिनों में हुई थी. विनोद दीक्षित भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी थे. यहीं से शीला दीक्षित के जीवन में धीरे-धीरे राजनीति ने जगह बनानी शुरू कर दी.

उमाशंकर दीक्षित को जवाहरलाल नेहरू के करीबी लोगों में शुमार किया जाता था. बाद में उन पर इंदिरा गांधी ने भी जमकर भरोसा किया. वे पहले देश के गृह मंत्री रहे और फिर बाद में कर्नाटक और पश्चिम बंगाल के राज्यपाल भी बने. जब शीला दीक्षित पढ़ाई कर रही थीं, उस वक्त वे भारत सेवक समाज द्वारा अपने इलाके में किए जाने वाले श्रमदान आदि में हिस्सा लेती थीं. शादी के बाद उन्होंने अपने ससुर के राजनीतिक कामकाज में हाथ बंटाना शुरू कर दिया. वे उमाशंकर दीक्षित के फोन अटेंड करतीं, उनके लिए नोट्स तैयार करतीं और उनकी सेहत का खयाल भी रखतीं. धीरे-धीरे कांग्रेस के बड़े नेता भी उन्हें जानने लगे.

इसी बीच 1984 में जब आम चुनाव होने थे तो उसी दौरान एक दिन राजीव गांधी ने शीला दीक्षित को यह संदेश भिजवाया कि उन्हें उत्तर प्रदेश की किसी लोकसभा सीट से चुनाव लड़ना चाहिए. शुरुआती हिचकिचाहट के बाद वे चुनाव लड़ने के लिए तैयार हो गईं. उन्हें उनके ससुर और पति ने समझाया कि यह एक बहुत बड़ा अवसर है और इसे हाथ से नहीं जाने देना चाहिए.

शीला दीक्षित की औपचारिक राजनीतिक शुरुआत के लिए सीट चुनी गई कन्नौज. यहां से वे चुनाव लड़ीं और इंदिरा गांधी की हत्या के बाद चली सहानुभूति लहर पर सवार होकर लोकसभा पहुंच गईं. बतौर सांसद अपने पहले ही कार्यकाल में वे केंद्र में मंत्री भी बनीं. वे कन्नौज सीट से 1989 का चुनाव भी लड़ीं लेकिन हार गईं. 1989 की हार के बाद शीला दीक्षित दिल्ली में ही सिमट गईं.

1991 में उमाशंकर दीक्षित नहीं रहे और राजीव गांधी की भी हत्या हो गई. अब शीला दीक्षित के लिए आगे का सियासी सफर बेहद मुश्किल था. लेकिन इस दौरान उन्होंने सोनिया गांधी से अपने रिश्ते बनाए रखे. सोनिया के कहने पर ही वे इंदिरा गांधी मेमोरियल ट्रस्ट की सचिव बनीं. फिर जब 1997 में सोनिया गांधी कांग्रेस में सक्रिय हुईं तो उनके साथ ही शीला दीक्षित की भी सक्रिय राजनीति में वापसी हुई.

1998 में पूर्वी दिल्ली से शीला दीक्षित को लोकसभा का टिकट दिया गया. इस चुनाव में वे भाजपा के लाल बिहारी तिवारी से 45,000 से अधिक वोटों से चुनाव हार गईं. लेकिन सोनिया ने उन पर अपना भरोसा बनाए रखा और उन्हें दिल्ली प्रदेश का कांग्रेस अध्यक्ष नियुक्त कर दिया. इसके बाद 1998 का दिल्ली विधानसभा चुनाव उनके नेतृत्व में लड़ा गया. उस समय दिल्ली में प्याज और आलू के दाम आसमान छू रहे थे. नतीजा यह हुआ कि हाल ही में राज्य की मुख्यमंत्री बनाई गईं सुषमा स्वराज के नेतृत्व में भाजपा चुनाव हार गई और शीला दीक्षित दिल्ली की मुख्यमंत्री बन गईं. इसके बाद वे 2003 का विधनसभा चुनाव भी जीतीं और 2008 का भी.

दिल्ली के मुख्यमंत्री के तौर पर शीला दीक्षित को उनके कराये तमाम विकास कार्यों के लिए याद किया जाता है. उन्हें दिल्ली के सार्वजनिक परिवहन को सीएनजी आधारित बनाने और यहां तमाम फ्लाइओवरों के निर्माण का श्रेय दिया जाता है. लेकिन उनके कार्यकाल में राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन में गड़बड़ी समेत कई तरह के भ्रष्टाचार के मामले भी सामने आए.

पहली बार मुख्यमंत्री बनने के बाद से शीला दीक्षित ने यह सुनिश्चित किया कि कम से कम दिल्ली प्रदेश कांग्रेस में उनके समानांतर कोई न हो. यहां जिसने भी उनके खिलाफ आवाज उठाई, उनमें से हर कोई किसी न किसी वजह से हाशिये पर चला गया. चाहे वह जगदीश टाइटलर हों या फिर सज्जन कुमार. एचकेएल भगत और रामबाबू शर्मा भी दिल्ली के बड़े कांग्रेसी नेता थे. लेकिन जब इन्होंने शीला के खिलाफ आवाज उठाने की कोशिश की तो ये भी किनारे लगा दिए गए.

शीला दीक्षित ऐसा करने में इसलिए कामयाब रहीं क्योंकि उनकी कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से काफी नजदीकी थी. 1989 में कन्नौज से चुनाव हारने के बाद जब उनकी राजनीति लगभग खत्म मान ली गई थी तब उन्होंने सोनिया गांधी से अपने संबंध बेहद प्रगाढ़ किए और फिर से सियासत में मजबूती से उठ खड़ी हुईं. राजनीतिक जानकारों की मानें तो केरल का राज्यपाल बनने और उस पद से हटने के बाद इसीलिए वे एक बार फिर से सक्रिय राजनीति में आ सकी थीं. अपनी मृत्यु तक वे कुछ उन चुनिंदा लोगों में शामिल रहीं, जो सोनिया गांधी से अक्सर मिलते-जुलते रहते थे. यही वजह थी कि दिल्ली में डूब चुकी कांग्रेस की नैया पार लगाने की जिम्मेदारी एक बार फिर उनको सौंप दी गई थी.