वर्ष है 1953. रज़ा को मिली फ्रेंच छात्रवृत्ति की दो वर्ष की अवधि बीत चुकी है. वे फिर से पेरिस में हैं. उनका अनुराग कला-संस्थान इकोल द बो ज़ार में उनके साथ ही एक स्टूडियो में छात्रा से है. जानीन मोंज़िला जो आगे चलकर स्वयं एक प्रसिद्ध कलाकार हुईं. 1959 में उनका विवाह हुआ और चूंकि वे अपने माता-पिता की इकलौती संतान थीं, उनके कारण भी रज़ा फ्रांस में ही छः दशक रह गये. उनका निधन पेरिस में 2004 में हुआ. उनको लिखे गये और उनके द्वारा लिखे गये पत्र फ्रेंच में हैं. इन दिनों उनकी अंग्रेज़ी में अनुवाद युवा अंग्रेज़ी कवयित्री मेधा सिंह कर रही हैं. सब कुछ ठीक रहा तो रज़ा के अगले जन्मदिन याने फ़रवरी 2020 में यह अनुवाद पुस्तकाकार प्रकाशित हो जायेगा.

लौटें 1953 पर. प्रेम से अभिभूत रज़ा जानीन को लिखते हैं, ‘... एक अकथनीय हर्ष और मधुरता. यहां अभी, मानों कि मैं एक भट्टी में हूं. मैं अपने को इस अनुभूति के सामने कमज़ोर पाता हूं, इतनी सघन, इतना अभिभूत करनेवाली. मेरी सारी इच्छाशक्ति, सारी शक्ति लग गयी है उसे थामने, एक बड़ा अर्थ देने, उसे होने देने में. उस दुनिया में भूचाल जिसे मैंने इतने प्यार और सावधानी से गढ़ा था और जहां किसी को प्रवेश करने की अनुमति नहीं थी. अपने दृष्टिकोण से असंतुष्ट. प्रवंचना. मूल्यों में द्वन्द्व, चिंता, तकलीफ़, कामना, अविश्वास, डर. भयानक उलझन.’ अगले पत्र में रज़ा लिखते हैं, ‘किसी भी व्यक्ति में हमेशा निश्चित और अनिश्चित रहते हैं. उनके बीच निरंतर चलते संवाद और अप्रत्याशित लेन-देन से कुछ न कुछ जन्म लेता है. हम आधे निश्चित और आधे अनिश्चित रहते हैं. हम इसी ज्ञान के आधार पर इसी निश्चितता से अज्ञात पर पहुंचते हैं. जो नहीं है उससे अधिक सुंदर कुछ नहीं है.’

इसी पत्र में रज़ा रिल्के को उद्धृत करते हैं, ‘सबसे असंतुष्ट और असंतुष्ट अपने से, मैं अपना उद्धार करना चाहूंगा और रात की शांति और एकांत पर अभिमान करना. जिनको मैंने प्यार किया है उनकी आत्माएं, उनकी आत्माएं मैंने जिनका गान किया है, मुझे शक्ति दें, समर्थन दें, दुनिया के झूठ और भ्रष्टकारी भाफ़ से मुझे हटा लें,और तुम, प्रभु मेरे ईश्वर मुझ पर अनुग्रह करो कि मैं कुछ सुंदर कविताएं लिख सकूं जो मेरे नज़दीक यह साबित कर सकें कि मैं आदमियों में आखि़री नहीं हूं, कि मैं उनसे गया-गुजरा नहीं हूं जिन्हें मैं नापसंद करता हूं.’

अगले पत्र में रज़ा पाल वेलरी को उद्धृत करते हैं, ‘मैं बीस का था और मुझे विचार की शक्ति पर विश्वास था. मैं विचित्र ढंग से होने, न होने का अहसास करता था. कभी मुझे असीम शक्ति का अनुभव होता था. वे इन समस्याओं के सामने चुक जाती थीं और मेरी सकारात्मक शक्तियों की कमज़ोरी मुझे धोखा देती थी. मैं दिखने में लापरवाह और सहज था, अंत में सुदृढ़, तिरस्कार में अतिवादी, प्रशंसा में अनियंत्रित, सहज विश्वासी, कुछ मनवाने में असंभव. ...कामना जो कहती है वह हमेशा सबसे स्पष्ट रहता है.’ तीनों पत्र अप्रैल में ही कुछ-कुछ दिनों के अंतर से लिखे गये हैं.

मंडला में रज़ा

मंडला की मिट्टी में मिलकर उससे तदाकार हुए, अपने आखि़री मुक़ाम में रज़ा को तीन बरस हो रहे हैं. वे अपने जीवन के पहले आठ बरस मंडला में रहे थे और अब तीन बरस से अपनी मृत्यु के बाद एक कालजयी आधुनिक कलाकार माने जाकर मंडला में ही हैं. यह वही मंडला है जिसकी नर्मदा जी को और उसे रज़ा पेरिस और फ्रांस में साठ बरस बिताने के बाद भी कभी भूले नहीं. बीच-बीच में जब रज़ा भारत प्रवास पर आते थे तो कई बार मंडला भी आये. उन के लिए वह जीवन-तीर्थ था.

मंडला के एक वनग्राम बाबरिया में रज़ा का जन्म घोर जंगल के बीच एक घर में एक वन अधिकारी के यहां हुआ था, 1922 में. उस गांव में कुल नौ-दस घर ही थे. सैयद हैदर रज़ा की आरंभिक पढ़ाई ककैया के सरकारी स्कूल में हुई जहां भी वे पेरिस से भारत आने पर दो बार गये. वहां के पुराने रजिस्टर में उनका नाम और वल्दियत एक छात्र के रूप में दर्ज है. पढ़ाई में उनका मन ख़ास नहीं लगता था और इधर-उधर भागता रहता था उनके माता-पिता ने इसकी शिकायत उनके अध्यापक नन्दलाल झरिया से की. इस अध्यापक ने एक दिन क्लास छूटने के बाद हैदर को रोका और स्कूल के बरामदे की कच्ची दीवार पर एक बिंदु बनाकर अपना ध्यान केंद्रित करने को कहा. तब किसे पता था कि यही बिंदु दशकों बाद रज़ा को अपनी भारतीय पहचान कला में व्यक्त करने के लिए याद आयेगा और अब सारी दुनिया में उन्हें बिंदु के महान चितेरे की तरह ही पहचाना-जाना जाता है.

मंडला में अपने पिता के साथ रहते हुए रज़ा ने आठ बरस की उमर में महात्मा गांधी को देखा था. गांधी जी 1930 में भारत की यात्रा पर मंडला आये थे. रज़ा एक बनरक्षक के साथ, जिसके सरकारी मुलाजिम होने के कारण अपनी वर्दी नहीं पहनी थी, गांधी जी की सभा में गये थे. उन्हें गांधी जी ने क्या कहा यह ख़ास समझ में नहीं आया पर उन पर गांधी जी के व्यक्तित्व की बहुत गहरी छाप पड़ा जो जीवन भर बनी रही. 1948 में जब रज़ा के तीन भाई, एक बहिन आदि यहां मुसलमानों पर हो रहे हमलों से तंग आकर पाकिस्तान चले गये तो रज़ा ने ‘अपने वतन से कहीं और’ जाने से इनकार कर दिया. बहुत बाद में बड़े संकोच से एक बार उन्होंने मुझे बताया कि न जाने का एक बड़ा कारण गांधी जी थे. पाकिस्तान जाना, उनके लेखे, उस बूढ़े आदमी के साथ विश्वासघात करना होता!

मंडला के जंगल, उनमें विचरते पशु, अंधेरे में देखे गये आदिवासी नृत्य भी रज़ा की स्मृति में बने रहे और उनकी कई कलाकृतियों में उनकी छायाएं देखी जा सकती हैं. पशुओं और पूर में आयी नदियों का डर भी उन्हें याद आता था. वे कहते थे कि मेरे मन में सौन्दर्य और भय एक साथ जागे थे. नर्मदा नदी, जिसे वे हमेशा नर्मदा जी कहकर ही संबोधित करते थे, उनके मन और स्मृति में हमेशा एक पवित्र प्रवाह बनी रही. उसका सौन्दर्य, उसका अदम्य प्रवाह, बाढ़ में उसकी विकरालता आदि सभी इस नदी के प्रति उनके मन में गहरी कृतज्ञता उपजाते रहे. वे अपने को नर्मदा जी से अभिषिक्त कलाकार मानते थे.

दो-तीन बार मुझे रज़ा के साथ मंडला और कान्हा-किसली आने का सौभाग्य मिला था. हम जबलपुर तक हवाई जहाज से आते थे और वहां से टैक्सी लेकर मंडला. उनकी हर बार ड्राइवर को हिदायत होती थी कि जैसे ही मंडला जि़ले की सीमा शुरू हो वह गाड़ी कुछ मिनिटों के लिए रोक दे. रज़ा काफ़ी ऊंचे-लंबे क़द के थे. वे कार से उतरकर सिर धरती पर टेककर अपनी मातृभूमि को प्रणाम करते थे और थोड़ी सी धूल अपने माथे पर तिलक की तरह लगा लेते थे. नर्मदा जी के किनारे मंडला में नदी को इसी तरह प्रणाम करते थे. उनके लिए मंडला और नर्मदा जी हमेशा प्रणम्य रहे.

यह तीसरा वर्ष है जब जि़ला प्रशासन और अन्य नागरिक संस्थाओं के सहयोग से रज़ा फाउंडेशन मंडला में रज़ा की पुण्य तिथि 23 जुलाई के आसपास कला, लोकसंगीत, आदिवासी नृत्य और कवि के एक बड़े समारोह के रूप में ‘रज़ा स्मृति’ नाम से मनाता है. फ़ाउंडेशन का यह प्रयत्न है कि मंडला के नागरिक उस उत्सव के माध्यम से स्वयं मंडला की कला-सम्पदा को पहचाने और उस विभूति को भी जिसकी आज विश्व-उपस्थिति है. फ़ाउंडेशन की कोशिश है कि जल्दी मंडला में ऐसा कुछ बन जाये जहां गोष्ठियां, सर्जनात्मक अड्डेबाज़ी, प्रदर्शनियां आदि नियमित रूप से हो सकें.

दूसरी बार

इन दिनों संसार की सबसे पुरानी वेनिस कला-द्वैवार्षिकी चल रही है उसमें भारत का राष्ट्रीय पैवेलियन, उचित ही, ध्यान आकर्षित कर रहा है. सौ बरसों से अधिक के इस बियेनाल के इतिहास में भारतीय राष्ट्रीय पैवेलियन कुछ दूसरी बार नियोजित हुआ है. उसका श्रेय किरण नाडार संग्रहालय, उसकी संग्राहिका रूबीना करोड़े के कल्पनाशील नियोजन के लिए तथा भारत सरकार को दिया जाना चाहिये जिसने इस पहल को मान्यता और समर्थन दिये हैं. इस बार की भारतीय प्रदर्शनी महात्मा गांधी-150 पर एकाग्र है और उसमें नन्दलाल बसु के पोस्टर से लेकर हुसैन, जी इरन्ना, जितीश कलात आदि की कृतियां शामिल की गयी हैं. एक आलोचनात्मक आकलन में भारतीय पैवेलियन को बियेनाल के दस सबसे ध्यान देने योग्य पैवेलियनों में शामिल किया है जो बहुत प्रसन्नता की बात है.

मैं पहली बार वेनिस बियेनाल देखने 2009 में ललित कला अकादेमी के अध्यक्ष के रूप में गया था और मैंने वहां छोटे-छोटे अनेक देशों के स्थायी पैवेलियन देखकर यह निश्चय किया कि अगले बियेनाल में जैसे भी हो भारत का राष्ट्रीय पैवेलियन होना चाहिये. लौटकर मैंने प्रस्ताव बनाया, भारत सरकार से वित्तीय सहायता मांगी और रणजीत होस्कोटे को संग्राहक बनाया. उन्होंने ज़रीना हाशमी, प्रणीत सोई, जी जी स्कारिया और डिज़ायर मशीन इलेक्टिव कलाकार चुने और उन्हें पैवेलियन में दिखाया गया. उस प्रदर्शनी को भी लोगों ने सराहा था. बियेनाल फ़ाउंडेशन ने भारत को बीस वर्षों के लिए लीज पर एक जगह देने की पेशकश की थी, पन्द्रह करोड़ रुपये के शुल्क पर. इस पर मंत्रालय की सहमति भी हुई मौखिक रूप से, पर मेरे अकादेमी के अध्यक्ष पद को छोड़ने तक कुछ ठोस नहीं हो पाया. उलटा हुआ यह कि अगले तीन बियेनालों में भारत का राष्ट्रीय पैवेलियन नियोजित ही नहीं हुआ. अगर तब फ़ाउंडेशन से क़रार हो जाता और आवश्यक राशि दे दी जाती तो न तो हमने तीन बियेनाल मिस किये होते और न हमें इतना शुल्क देना पड़ता. 2011 में यह शुल्क पचास लाख रुपये था और इस बार शायद ढाई करोड़ रुपये है.

यह भी ग़ौरतलब है कि इस बार के नियोजन में ललित कला अकादेमी की कोई भूमिका नहीं है- आधुनिक कला संग्रहालय का ज़िक्र है. इस बार का नियोजन अधिक सुघर और प्रभावशाली है जैसा कि रिपोर्टों से पता चलता है. पहली बार अकादेमी के तत्कालीन सचिव और उनके बाबू-सहयोगियों ने आखि़री दम तक अड़ंगे लगाये थे और एक तरह से नियोजन उनके बावजूद सम्भव हो पाया था. इस बार अकादेमी का इस महत्वपूर्ण नियोजन से बाहर रखा जाना दुर्भाग्यपूर्ण है. अकादेमी ललित कलाओं का सर्वोच्च राष्ट्रीय संस्थान है और अब कला के अन्तरराष्ट्रीय जगत् में स्वयं भारत सरकार ने उसको बाहर कर दिया है. बियेनाल में उसके इतिहास में पहला राष्ट्रीय पैवेलियन अकादेमी की पहल पर और उसी के द्वारा नियोजित हुआ था.