निर्देशक : सुजॉय घोष

लेखक : सुजॉय घोष, सुरेश नायर

कलाकार : आरना शर्मा, मिखाइल गांधी, आर्यान्श मालवीय, पलाश कांबले, पूरब कोहली, पालोमी घोष, कंवलजीत सिंह, अभिषेक बनर्जी, जीशू सेनगुप्ता, समीर कोचर

रेटिंग : 3 / 5

(समीक्षा में कुछ छोटे-मोटे स्पॉइलर मौजूद हैं, अपनी समझ से आगे बढ़ें और पढ़ें)

‘टाइपराइटर’ शुद्ध हॉरर सिनेमा नहीं है. अगर आप इसके ट्रेलर के हिसाब से इसे हॉरर जॉनर का मानकर देखेंगे तो डर की अनुभूति बेहद कम होने की वजह से शायद निराश होंगे. पांच एपीसोड की यह सीरीज जम्प स्केयर्स - यानी कि हॉरर फिल्मों में डराने के लिए उपयोग की जाने वाली एक तकनीक - का प्रयोग बेहद कम करती है, और ज्यादातर वक्त एक सुपरनैचुरल मिस्ट्री सिनेमा की तरह अपनी मिस्ट्री की परतों को बिना किसी मेलोड्रामा के खोलने में व्यस्त रहती है. खासकर दुनियाभर की हॉरर फिल्में देखने वाले दर्शकों को इसका हॉरर एलीमेंट काफी साधारण लगेगा और डर की लगातार अनुभूति से जो चरमसुख श्रेष्ठ हॉरर सिनेमा उन्हें देता रहा है, वो यहां नहीं मिलेगा.

लेकिन, नेटफ्लिक्स की यह सीरीज मुख्यत: अपने सस्पेंस और सुपरनैचुरल मिस्ट्री को आखिर तक बनाए रखने के चलते दर्शनीय बनती है. खासकर शुरुआती तीन एपीसोड तो बेहद दिलचस्प और तेज रफ्तार हैं, और साफ समझ आता है कि सुजॉय घोष और सुरेश नायर की लेखकीय जोड़ी को यह कल्पनाशील पटकथा लिखने में खासा आनंद आया होगा. टाइपिंग स्पीड हमेशा बढ़िया रही होगी!

उनके लेखन की कमियां आखिरी दो एपीसोड में ही खुलकर नजर आती हैं. यहां कल्पना की बहुत ऊंची उड़ान के चलते पटकथा लॉजिक और समझ के पार आने-जाने लगती है और ‘सस्पेंशन ऑफ डिसबिलीफ’ नामक मानवीय गुण का उपयोग करने की आवश्यकता खासकर आखिरी एपीसोड में काफी महसूस होती है.

फिर भी, एक हल्की-फुल्की तेज स्पीड वाली कम एपीसोड की बिंज-वर्थी मिस्ट्री-थ्रिलर सीरीज के तौर पर आप इसे शर्तिया देख सकते हैं. आज कल हल्की-फुल्की कम एपीसोड की सीरीज का नया बाजार बन ही रहा है और उस बाजार की काफी सारी आवश्यकताओं को यह सिनेमा पूरा करता है. अगर ज्यादा उम्मीद के साथ कुछ देखना हो तो नेटफ्लिक्स पर ही ‘स्ट्रेंजर थिंग्स’ सीजन 3 और ‘द हॉन्टिंग ऑफ हिल हाउस’ देख लीजिएगा. क्योंकि ‘टाइपराइटर’ एक भुतहा घर में कुछ लोगों के वापस लौटने का कुछ-कुछ वैसा ही प्रिमाइस उपयोग करने के बावजूद ‘द हॉन्टिंग…’ के स्तर का हॉरर पैदा नहीं कर पाती. और बच्चों व सुपरनैचुरल को जिस अंदाज में उपयोग करती है उसमें ‘स्ट्रेंजर थिंग्स’ से ली गई प्रेरणा भी कई-कई बार नजर आती है.

सुजॉय घोष साहित्य और पुरानी व मशहूर फिल्मों को अपने सिनेमा में हमेशा ही जगह देते रहे हैं. यह नकल नहीं होती बल्कि एक तरह से जिंदगी के विभिन्न पड़ावों पर जिन चीजों से आप प्रभावित रहे हैं उनकी छाप अपने काम में शामिल करने की ‘क्रिएटिव फ्रीडम’ कहलाती है. इसलिए ‘टाइपराइटर’ में आपको कई पॉप-कल्चर रेफरेंस देखने को मिलेंगे और साथ ही कई कंटेम्पररी और पुरानी फिल्मों के नाम या तो खुद किरदारों के मुंह से सुनाई देंगे या फिर कोई इमेजरी देखकर आपको किसी पुरानी क्लासिक और महान फिल्म की याद आएगी.

जैसे सीरीज का नाम ‘टाइपराइटर’ है, और एक पुराना सुंदर-सा टाइपराइटर भूतों से जुड़ी एक बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. अगर आपने स्टेनली क्यूब्रिक की महान हॉरर फिल्म ‘द शाइनिंग’ देखी है तो आप बार-बार सोचेंगे जरूर कि क्या टाइपराइटर को यह ‘भूमिका’ देने में कल्पना की उड़ान घोष बाबू को ‘द शाइनिंग’ के टाइपराइटर के पास ले गई थी? हमारे हिसाब से, जवाब हां है!

और अगर आपने मशहूर ब्रिटिश लेखिका इनिड ब्लायटन और सत्यजीत रे का लिखा थोड़ा-बहुत भी साहित्य पढ़ा है तो सीरीज में चार बच्चों और एक प्यारे से कुत्ते का साथ मिलकर भूतों की खोज करने के ‘एडवेंचर’ पर निकलना ब्लायटन की ‘द फेमस फाइव’ की याद दिलाएगा. इन बच्चों का अपने आसपास के लोगों की जासूसी करना रे की फेलुदा डिटेक्टिव सीरीज की किताबों की. इस सीरीज के निर्देशक सुजॉय घोष सार्वजनिक रूप से रे और ब्लायटन के लेखन के मुरीद रहे हैं और ‘स्ट्रेंजर थिंग्स’ को भी छककर देखते रहे हैं! ‘टाइपराइटर’ में उन्होंने पुरानी चीजों को वैसे ही ‘होमेज’ देने की कोशिश की है जैसे ‘स्ट्रेंजर थिंग्स’ अमेरिकी पॉप-कल्चर से जुड़ी पुरानी चीजों को सफलतापूर्वक दे चुका है.

‘टाइपराइटर’ में पालोमी घोष अभिनीत पात्र जैनी बचपन की एक भयावह घटना के बाद वापस गोवा के अपने विला में लौटता है. यहां उसके सामने ही 80 के दशक में उसके दादाजी की मृत्यु हुई थी जो कि भूतों की कहानी लिखने वाले एक मशहूर राइटर थे. उनकी लिखी किताब ‘घोस्ट ऑफ सुल्तानपुर’ आज वर्तमान में भी खासी चर्चित है और कुछ बच्चों की टोली उस किताब में वर्णित कहानी और हर लिखी बात को सच मानकर भूतों की खोज में निकलती है.

सुजॉय घोष ने बहुत सधे अंदाज में यह चित्रित किया है कि किताबों में दर्ज कहानियां किस तरह मासूम बाल मन पर असर डालती हैं और एक अफसाने पर यकीन कर वे बड़ों की बातों को दरकिनार कर अपना एक भूत क्लब बनाकर उस विला के भूत को ढूंढ़ने निकलते हैं. यह तरीका इस्तेमाल कर घोष सीरीज के शुरुआती एपीसोड में दर्शकों को जमकर चकमा देने में सफल रहते हैं. आपके लिए समझना मुश्किल होता है कि बच्चे जिन बातों पर यकीन कर रहे हैं वे सच हैं भी या सिर्फ उनकी ख्याली दुनिया का हिस्सा हैं. बच्चों के समानांतर घोष कुछ और पात्र भी इंट्रोड्यूस करते चलते हैं और यह विरोधाभास लगातार पैदा होता रहता है कि ये किसी भूत का नहीं बल्कि इंसान का काम है. शुरुआती एक-दो एपीसोड में यह एप्रोच खासी प्रभावी नतीजे सामने लाती है.

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सीरीज तब बहकने लगती है जब वह कल्पना की बहुत ऊंची परवाज ले लेती है और साफ-साफ आपको पटकथा के लूपहोल्स नजर आने लगते हैं. आखिरी वक्त में काम आने वाला एक लकड़ी का स्टैच्यू आखिर क्यों खलनायक एक दूसरे आदमी से लेकर अपने पास नहीं रख लेता जबकि वह उसके लिए बेहद जरूरी था? जिस टाइपराइटर की जरूरत गणितज्ञ खलनायक को पहले एपीसोड से है उसे वह सुनसान विला से खुद क्यों नहीं चुरा पाता, जबकि बॉब बिश्वास-नुमा (विद्या बालन की फिल्म ‘कहानी’ का किरदार) उसका खतरनाक किरदार मर्डर करने तक में आगे रहता है? और फिर जिससे चोरी करने को कहा जाता है उसका भी सब-प्लॉट कुछ खास असरदार नहीं बन पाया है.

ऐसे कई सवाल सीरीज के आखिरी दो एपीसोड में लगातार उठते रहते हैं और हॉरर व सुपरनैचुरल जॉनर की हिंदी फिल्में ‘कमजोर आखिरी हिस्से’ नामक जिस कमी से अक्सर जूझती रही हैं – ‘परी’, ‘एक थी डायन’– वैसा ही कुछ ‘टाइपराइटर’ के साथ भी होता है. अगर इसके आखिरी दो एपीसोड की लिखाई बेहतरीन व नायाब होती और इन जॉनर के बॉलीवुड क्लीशे से खुद को बचाए रखती, तो यह सीरीज वन-टाइम वॉच से आगे बढ़कर बेहद कामयाब सिनेमा का रूप ले सकती थी.

इस दौरान ‘टाइपराइटर’ ज्यादातर वक्त भूत-प्रेतों से जुड़े पुराने सिनेमाई तरीकों का ही उपयोग करती है और कभी-कभार ही कल्पनाशील लेखन की वजह से कुछ नायाब चीजें हमारी नजर होती हैं. इसमें टाइपराइटर को केंद्र में रखना एक खास लेखकीय गुण बनकर उभरता है जो कि आमतौर पर इस मिजाज की फिल्मों में देखने को नहीं मिलता. सुजॉय घोष को यह बात मालूम है इसलिए वे खुद भी कई बार अपनी इस विशेषता का मजाक सीरीज में उड़ाते हैं!

अभिनय के खेला में पालोमी घोष ने डबल रोल का खेला बखूबी खेला है! इस अभिनेत्री के अभिनय से हम कम परिचित हैं (कोंकणी फिल्म Nachom-ia Kumpasar, (2015) में उन्होंने प्रमुख भूमिका निभाई थी) इसलिए किरदार की रहस्यमयी परतें तभी दिखती हैं जब सीरीज दिखाना चाहे. कास्टिंग विशेषकर खासी प्रभावी है और छवि के अनुरूप किरदारों को नहीं लिया गया है. पूरब कोहली सुंदर नायकों वाले रोल करते रहे हैं लेकिन यहां सहृदय और हीरोइक आभा से दूर रहने वाले अजीब बालों वाले पुलिसवाले की भूमिका में खासे असरदार सिद्ध होते हैं.

बंगाली फिल्मों के अभिनेता जीशू सेनगुप्ता भी छवि के विपरीत कास्ट किए गए हैं. वे रोल को निभाते तो दिलचस्प अंदाज में हैं लेकिन कई सारे शेड्स वाले ऐसे रोल हमने कई दूसरे अभिनेताओं को उनसे बेहतर परफार्म करते हुए हिंदी फिल्मों में ही पहले देख रखे हैं. अभिषेक बनर्जी जरूर फकीर के छोटे-से रोल में कहर ढा देते हैं और ‘मिर्जापुर’ का यह कम्पाउंडर भविष्य में मशहूर नाम बनने की सारी खूबियां रखता है.

सीरीज में बच्चे भी कमाल के हैं! वह तो ये सीरीज किरदारों के अंतर्मन में झांकने में ज्यादा समय नहीं खर्च करती, वर्ना ये बच्चे ‘स्ट्रेंजर थिंग्स’ के बच्चों की तरह दर्शकों के मन-मस्तिष्क में लंबे समय के लिए जगह बना लेते. उस लिहाज से यह कैरेक्टर-ड्रिवन सीरीज होने की जगह प्लॉट-ड्रिवन ज्यादा है और अपनी मुख्य मिस्ट्री को ही खोलने में किरदारों को उपयोग करती है. इस वजह से बच्चों से आप उस तरह नहीं जुड़ पाते जैसे ‘स्ट्रेंजर थिंग्स’के बच्चों से आज भी जुड़े हुए हैं.

इस एप्रोच में वैसे तो कोई खराबी नहीं - कम एपीसोड वाली सीरीज के लिए ये मुफीद भी है - लेकिन मौजूदा कहानी की मिस्ट्री इतनी भी जोरदार नहीं थी, कि 40 से लेकर 50 मिनट तक के पांच एपीसोड सिर्फ उसी को खोलने में समर्पित किए जाएं.

बच्चों में दो चोटी वाली समीरा आनंद के रोल में आरना शर्मा सबसे ज्यादा प्रभावशाली काम करती हैं. नौ-दस साल के अपने किरदार को उन्होंने बाल मन वाली मासूमियत और अनगढ़ व्यवहार के साथ-साथ वह स्पॉनटेनिटी भी दी है जो आजकल के रिएलिटी शोज के लिए टेलरमेड किए जा रहे बच्चों के युग में मिलना दुर्लभ होता जा रहा है. उनका साथ देते मिखाइल गांधी, पलाश कांबले और आर्यान्श मालवीय भी कई मौकों पर दिल जीतते हैं, लेकिन केवल आरना शर्मा के किरदार को गहराई देने का फिल्मकार का फैसला थोड़ा खटकता है.

भूत ढूंढ़ने में घोस्ट क्लब के इन बच्चों का साथ एक प्यारा-सा व्हाइट लैब्राडोर भी देता है. जिस भी फ्रेम में वह होता है वो अपने आप सुंदर बन जाता है! इस डॉग को क्लाइमेक्स में बेहतर उपयोगिता मिलती तो बेहतर होता. जानवरों को सिनेमा में केवल शो-पीस बनाकर नहीं रखना चाहिए.

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