प्रतिमा रिज़वान की उम्र करीब 32 साल है. जैसा कि उनके नाम से पता चलता है, वे एक हिंदू हैं और उनकी शादी एक मुसलमान से हुई है. प्रतिमा बताती हैं कि उनके पति नबील रिज़वान से यह उनकी दूसरी शादी है. उनकी पहली शादी 19 साल की उम्र में हो गई थी और बच्चा न होने के कारण पहला पति उन्हें बहुत मारता-पीटता था. लगातार शोषण से तंग आकर, कोई और रास्ता न देख उन्होंने पड़ोस में रहने वाले रिज़वान के साथ भागकर शादी कर ली. प्रतिमा बताती हैं कि दूसरी शादी के बाद भी हालात बहुत बदले नहीं हैं. इस बार बच्चे की जगह मुद्दा उनका धर्म हो चुका था, जिसके कारण उनके ससुराल वालों ने उन्हें अब तक स्वीकार नहीं किया है. हालांकि उनके सीधे-सादे पति अपने परिवार वालों की बात तो सुनते हैं लेकिन पत्नी का साथ भी देते हैं. यही वजह है कि दोनों परिवार से अलग रहते हैं और खर्चा चलाने के लिए मिलकर कमाते हैं.

प्रतिमा एक ब्यूटीशियन हैं और एप के जरिए होम सर्विस देने वाली एक फर्म के साथ काम करती हैं. इतनी मुश्किलों के बाद किसी तरह अपने पैरों पर खड़ी रह पा रहीं प्रतिमा के आत्मविश्वास की पिछले दिनों धज्जियां उड़ गईं. वे नोएडा की एक पॉश सोसायटी में सर्विस देने गईं थीं और एक छोटी सी बात पर उनकी क्लाइंट से थोड़ी झिकझिक हो गई. क्लाइंट किसी भी हाल में अपनी गलती मानने के लिए तैयार नहीं थीं और ब्रम्हास्त्र के रूप में उन्होंने उन्हीं शब्दों का इस्तेमाल किया जो महिलाओं को आसानी से अपमानित करने के लिए किया जा सकता है. क्लाइंट का कहना था कि ‘तुम लोग तो धंधा करने वाली होती हो, गंदा काम करती हो!’ इस सारी बहसबाजी के बाद किसी तरह प्रतिमा को उनके काम का भुगतान मिल सका, अपमान तो वे काफी मात्रा में सह ही चुकीं थीं. अच्छा यह रहा कि इसके बाद प्रतिमा की कंपनी ने इस मामले को न सिर्फ उस क्लाइंट के सामने रखा बल्कि उसे ब्लैकलिस्ट भी कर दिया गया.

दिल्ली, मुंबई, पुणे, बंगलौर जैसे तमाम बड़े शहरों में अर्बन क्लैप, यस मैडम, क्विकर-ईजी, हेल्पगुरू.कॉम, ओला-ऊबर जैसे ऐप्स और वेबसाइटें तमाम तरह की सेवाएं घर बैठे मुहैया करवाती हैं. इन कंपनियों ने ब्यूटीशियन, ड्राइवर, प्लंबर, इलेक्ट्रीशियन सरीखे काम करने वालों को आसानी से काम मिलने की सहूलियत देकर उनकी ज़िंदगी बदली है. हालांकि इनके जरिए होने वाली कमाई का पंद्रह से पच्चीस फीसदी हिस्सा बतौर कमीशन कंपनियों को जाता है लेकिन फिर भी इससे लोगों को एक नियमित आय का भरोसा बना रहता है. लेकिन सबकुछ इतना आसान भी नहीं है. घरों में जाकर सेवा देने वालों को कभी-कभार अजीबो-गरीब और डरावने अनुभव भी होते ही रहते हैं. प्लंबर-इलेक्ट्रीशियन का काम हमेशा पुरुष करते रहे हैं और घरों में जाते रहे हैं इसलिए उनके तरीकों या अनुभव में कोई खास अंतर नहीं आया है. लेकिन प्रतिमा जैसी महिलाएं जो कई तरह की दीवारें तोड़कर घर से बाहर निकली हैं और ब्यूटीशियन या मसाज थैरेपिस्ट का काम करती हैं उनके लिए कई बार तमाम तरह की मुश्किलें क्लाइंट के घर के भीतर इंतजार कर रही होती हैं.

गुड़गांव में ब्यूटीशियन का काम करने वाली ज्योति अपना एक अनुभव बताते हुए कहती हैं, ‘हमें साफ निर्देश दिए जाते हैं कि बुकिंग आने पर अगर किसी लड़की (क्लाइंट) से बात नहीं हो तो आपको वहां पर नहीं जाना है. एक बार, बुकिंग आने पर मैंने कन्फर्म करने के लिए फोन किया तो फोन उठाने वाले ने कहा मेरी वाइफ के लिए है, आप आ जाओ. कई बार लोग अपनी पत्नी या बहन के लिए बुकिंग कर देते हैं. यहां पर भी यही होगा यह सोचकर मैं चली गई.’ ज्योति कहती हैं कि ‘किसी लड़की से मेरी बात नहीं हुई थी इसलिए मैंने सोसायटी पहुंचकर नीचे बैठे सिक्योरिटी गॉर्ड को भी साथ ले लिया. वे बताती हैं कि ‘जब मैं वहां पहुंची तो उस फ्लैट में भारी-भरकम डीलडौल वाले दो-तीन लड़के थे और घर की हालत देखकर लगता था कि लड़कियां तो शायद ही कभी इस घर में आई होंगी. यह देखकर मैंने वहां सर्विस देने से मना कर दिया और बुकिंग कैंसिल करके चली आई.’

ज्योति के उलट पुणे की स्नेहलता का अनुभव बताता है कि लड़कियों का होना भी सुरक्षा की गारंटी नहीं माना जा सकता है. वे बताती है कि एक बार एक पॉश इलाके से बुकिंग आई और जब वे क्लाइंट के पास पहुंचीं तो वह नाम मात्र के कपड़े पहनकर घर में घूम रही थी. स्नेहलता कहती हैं कि ‘वह फ्लैट काफी बड़ा था और वहां ढेर सारी बियर और शराब की बोतलें पड़ीं थीं. चार लड़के भी थे. हालांकि लड़कों ने मुझसे अच्छे से बात की और उसके (क्लाइंट के) आने तक बैठने को कहा लेकिन लड़की को केवल ब्रा-पैंटी में देखकर मेरे होश उड़ गए. उसने चेंज करके आने को कहा और चली गई. पांच-सात मिनट बीते कि मुझे वहां के माहौल से ऐसा लगने लगा कि वह अब नहीं आएगी. मुझे खतरा सा महसूस हुआ तो मैं किसी बहाने से बाहर निकली और भाग आई.’

नोएडा की कविता भी एक और भयावह किस्सा बताती हैं. वे कहती हैं कि ‘नोएडा के सेक्टर-137 की एक सोसायटी में मैं एक बार सर्विस देने पहुंची तो वहां पर दो लड़कियां थीं. दो लड़कियों को देखकर मुझे सेफ होने का भरोसा हो गया. उन्होंने कहा अंदर बेडरूम में चलकर करो तो मैं वहां चली गई.’ कविता बताती हैं कि ‘शक्ल और बातचीत से मॉडर्न लग रहीं उन लड़कियों ने कमरे में ढेर सारा तंत्र-मंत्र का सामान रख रखा था. मैंने कहा मैं एक फोन करके आती हूं तो उन्होंने मुझे कमरे से बाहर नहीं निकलने दिया. मैं समझ गई यहां पर जरूर कुछ गड़बड़ होने वाली है. इसी बीच किसी ने कॉलबेल बजा दी और मुझे वहां से भागने का मौका मिल गया.’

ये तो वे अनुभव हैं जिनमें महिलाएं बच निकलने में सफल रहीं. लेकिन हर बार तो ऐसा नहीं होता होगा. इसके अलावा ऐसा भी नहीं है कि सिर्फ महिलाओं को ही ऐसे अनुभवों से दो-चार होना पड़ता है. कभी-कभार ही सही लेकिन कई बार मर्द भी ऐसी मुश्किलों मे पड़ते-पड़ते बचे हैं. गॉर्डनिंग और क्लीनिंग का काम करने वाले शाहनवाज़ खान कहते हैं कि ‘लड़कियों के मामले में तो ऐसा है कि अगर वे किसी तरह की शिकायत करती हैं तो उन पर यकीन किया जाता है. हम कुछ बताएं तो हमारा मजाक उड़ जाता है. एक बार मैं नोएडा सेक्टर-50 में एक बड़ी कोठी में काम करने गया तो उनके नौकर ने काम के बाद पेमेंट के लिए बहुत देर तक बिठाकर रखा. इसके बाद एक लड़का आ गया, उसने मुझे कहा - तुम बहुत पतले, गोरे और सुंदर हो. फिर वह अजीब-अजीब सी हरकतें करने लगा. लेकिन तभी दो लोग आ गए. वो शायद उसके मां-बाप थे. फिर वो अंदर चला गया. उस दिन तेरह सौ का बिल बना था लेकिन उन ऑन्टी ने मुझे दो हजार रुपए दिए और माफी मांगते हुए कहा कि मैं ये बात किसी को ना बताऊं.’

एप के जरिए पुरुषों को मसाज सर्विस देने वाले मिकी बताते हैं कि ‘हमारे यहां लड़के हों या लड़कियां, हम कोठियों में जाना अवॉयड करते हैं. सोसायटीज थोड़ा सेफ होती हैं. गेट पर आपकी एंट्री होती है और टॉवर के नीचे खड़ा वॉचमैन आपको आते-जाते देखता है. फिर भी कोठी हो या अपार्टमेंट कभी कोई लड़का मुझे अकेला मिल जाए तो मैं घबरा जाता हूं. मैं भी पढ़ा-लिखा प्रोफेशनल हूं. गे लोगों की इज्जत भी करता हूं लेकिन वे मुझे डराते भी हैं. मसाज के दौरान कई बार लोगों ने इस तरह के इशारे या हरकतें करने की कोशिश की हैं, हर बार मैं लगभग बचकर ही भागा हूं.’

घरों के अलावा कई बार दूसरी जगहों पर भी इन लोगों को मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है. उदाहरण के लिए राइडर्स, कैब्स को अक्सर इधर-उधर घुमाते हुए ले जाते हैं, फिर उन्ही की शिकायत डालकर कम पैसे पे करते हैं या कई बार उन्हें डरा-धमका देते हैं और भुगतान ही नहीं करते हैं.

एक अंतर्राष्ट्रीय कैब सर्विस के साथ काम करने वाले उमेश तिवारी बताते हैं कि ‘मेरी फर्म लोगों को दूसरे शहर जाने के लिए भी टैक्सी की सुविधा मुहैया करवाती है. ऐसे ही एक बार एक आदमी मुझे दिल्ली से सहारनपुर ले गया. वहां वो एक होटल में जाकर रुका. हम रात में पहुंचे. अगले दिन की भी बुकिंग थी, उस दिन भी मैं उसे घुमाता रहा. इसके बाद वो अचानक गायब हो गया. उसने मेरे पैसे तो दिए ही नहीं, होटल का बिल भी उसने नहीं भरा था. इसके बाद होटल वालों ने मुझे उसका ड्राइवर समझकर पीट दिया. मैं कहता रहा, मैं तो कैब वाला हूं. उन्होंने मुझे पुलिस को दे दिया. मुझे एक रात हवालात में काटनी पड़ी.’ तिवारी कहते हैं कि ‘मैं इस बात से सबसे ज्यादा दुखी था कि इस पूरे मामले में कंपनी ने मेरी कोई मदद नहीं की.’

उमेश की ही कंपनी में काम करने वाले सतपाल बताते हैं कि एक बार उनकी कैब में एक कस्टमर ने उनसे दो हजार रुपये यह कहकर मांगे कि उसके पास कैश नहीं है और वह उन्हें पैसे ऑनलाइन ट्रांसफर कर देगा. उसने पैसे ट्रांसफर होने का मैसेज भी सतपाल को दिखाया. लेकिन असलियत में पैसे ट्रांसफर हुए नहीं थे. जब उन्होंने इस बारे में कंपनी के पास शिकायत की तो उन्हें यह कहा गया कि यह उनकी ही गलती थी इसलिए कंपनी इसमें कुछ नहीं कर सकती.

शारीरिक शोषण, मारपीट और आर्थिक नुकसान, होम सर्विस देने वालों के लिए सबसे बड़ी चुनौतियां होती हैं और ये नये-नये रूपों में अक्सर उनके सामने आती रहती हैं. उदाहरण के लिए, पूर्वी दिल्ली के इलाकों में प्लंबिंग का काम करने वाले रवि कुमार बताते हैं कि ‘कई बार क्लाइंट कहता है कि कैश नहीं है, ऑनलाइन ले लो. मगर फिर वो पे नहीं करते. ऐसे में जब तक पैसे आ नहीं जाते डर लगा रहता है. पिछले दिनों मैंने एक गीजर लगाया था उसका पेमेंट अब तक अटका हुआ है, अब तो मैंने उम्मीद भी छोड़ दी है. अब मैं पेमेंट डन का मैसेज आने तक क्लाइंट के पास रुका रहता हूं.’

इसी इलाके में रहने वाली नयनतारा बताती हैं, ‘मैं रहती तो मयूर विहार में हूं लेकिन बुकिंग ग्रेटर नोएडा-वेस्ट और नोएडा एक्सटेंशन वाले इलाकों की लेती हूं. मेरे इलाके के लोग बड़े खराब हैं, वे बुकिंग तो एप से करते हैं फिर कहते हैं - डिस्काउंट करो. एप के साथ ऐसा करना पॉसिबल नहीं होता, मना करने पर रेटिंग खराब कर देते हैं. सोसायटी वाले प्रोफेशनल लोग होते हैं, काम कराते हैं और पैसा देते हैं. बात खतम!’ रवि कुमार और नयनतारा सहित ऊपर जिक्र गए ज्यादातर लोग यह बताते हैं कि किसी भी तरह की झिकझिक होने पर वे ज्यादा कुछ नहीं बोल पाते क्योंकि एक तो उनकी कंपनी या ब्रांड की इज्जत उस समय उनके हाथ में होती है और दूसरा उनकी रेटिंग बिगड़ने का भी उन्हें डर बना रहता है. क्योंकि एक बार रेटिंग बिगड़ने पर कंपनी छूट जाने का भी खतरा रहता है और क्लाइंट न मिलने का भी. लेकिन इस चक्कर में उनके पैसे मारे जाते हैं.

ये कुछ उदाहरण बताते हैं कि ऑनलाइन या एप के जरिए सर्विस देने वालों को कितनी तरह की मुश्किलों और खतरों का सामना रोज करना पड़ता है. इन कंपनियों में सुरक्षा के क्या इंतजाम किए जाते हैं, इससे जुड़े सवाल सत्याग्रह ने होम सर्विस प्रोवाइडर्स के मेल और ऑफिशियल फेसबुक पेजों पर भेजे थे जिनका अब तक कोई जवाब नहीं मिला है. केवल, अर्बन क्लैप की तरफ से कहा गया कि वे इसके लिए एक प्रतिनिधि तय कर रहे हैं लेकिन किसी प्रतिनिधि ने सत्याग्रह से अब तक संपर्क नहीं किया है.

एक अन्य ऑनलाइन फर्म के प्रतिनिधि से अनौपचारिक तौर पर संपर्क करने पर, अपना नाम न छापने की शर्त पर वे बताते हैं, ‘कुछ मौके ऐसे आए हैं, जब हमारे साथ काम करने वाले लोग मार-पीट और अब्यूज का शिकार हुए हैं. इसके लिए हमारे ऐप पर एक इमरजेंसी बटन होता है जिसे दबाने पर तुरंत उनकी लोकेशन हमारे पास पहुंच जाती है. इसके बाद हम उन्हें कॉल कर उनकी समस्या पूछते हैं और जरूरत पड़ने पर रेस्क्यू के लिए जाते है. हालांकि लड़कियों से जुड़ी कभी कोई बड़ी दुर्घटना तो सामने नहीं आयी लेकिन छिटपुट केस आते रहते हैं, जो आमतौर पर कंपनी दबा देती है या सेटलमेंट करवा देती है. इसमें सबसे बुरा यह है कि ऐसा कुछ होने के बाद लड़कियां अक्सर काम छोड़ देती हैं.’

यानी कि होम सर्विस एप्स ने ज़िंदगियां आसान तो की हैं मगर इनके जरिए सेवा देने वालों के लिए यह आधा ही सच है.

(इस रिपोर्ट में सभी नाम बदल दिए गए हैं और इनमें से किसी को व्यावसायिक परेशानी का सामना न करना पड़े इसलिए कंपनियों के नाम भी नहीं लिखे गए हैं.)