नौ जनवरी, 1915 को महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से हमेशा के लिए भारत वापस लौटे. अखबारों में उनके साक्षात्कार प्रकाशित होने लगे थे. उनके स्वागत में कार्यक्रमों का आयोजन होना भी शुरू हो गया था. चार दिन बाद यानी 13 जनवरी को बम्बई नेशनल यूनियन ने शहर के हीराबाग में महात्मा गांधी और कस्तूरबा गांधी के स्वागत में एक कार्यक्रम का आयोजन रखा था. कार्यक्रम का एक खास आकर्षण यह भी था कि इसमें उस दौर के धुरंधर राष्ट्रवादी नेता बाल गंगाधर तिलक भी उपस्थित थे. हालांकि उन्हें इसका औपचारिक निमंत्रण नहीं भेजा गया था.

तिलक ने गांधी-दंपति का स्वागत करते हुए कहा कि वे श्री गांधी और श्रीमती गांधी का सम्मान करके अपने कर्तव्य का ही पालन कर रहे हैं, क्योंकि वे एक दूरस्थ देश (दक्षिण अफ्रीका) में भारत के सम्मान की रक्षा के लिए लड़े हैं. उन्होंने कहा कि भारत के लोगों को श्री गांधी के जीवन-कार्य से यही शिक्षा ग्रहण करनी है कि यहां आत्म-त्याग की भावना से युक्त और अधिक स्त्री-पुरुष उत्पन्न होने चाहिए.

इस कार्यक्रम के बारे में एक रिपोर्ट में लिखा गया कि महात्मा गांधी का भाषण फीका और औपचारिक था. लेकिन पूरी रिपोर्ट को पढ़कर लगता है कि यह भाषण इतना भी फीका भी नहीं रहा होगा, क्योंकि अन्य बातों के अलावा गांधी ने इस कार्यक्रम में दोहराया था कि भारत में उन्होंने गोपाल कृष्ण गोखले को ही अपना राजनीतिक गुरु चुना है. हालांकि उन्होंने यह जरूर कहा कि वे तो पूना जाकर तिलक की सेवा में उपस्थित होकर उनका सम्मान करना चाहते थे, और बम्बई में तिलक से मिलकर उन्हें बहुत खुशी हुई है.

कार्यक्रम में उस समय के बहुत बड़े ट्रेड यूनियन नेता जोसेफ बैप्टिस्टा भी मौजूद थे जिन्हें सब प्यार से ‘काका बैप्टिस्टा’ कहते थे. बैप्टिस्टा तिलक के बहुत ही करीबी थे और यह माना जाता है कि तिलक का मराठी में दिया गया प्रसिद्ध नारा- ‘स्वराज्य हा माझा जन्मसिद्ध हक्क आहे आणि तो मी मिळवणारच’ का पहला हिस्सा यानी ‘स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है’ वास्तव में तिलक से पहले काका बैप्टिस्टा अंग्रेजी में दे चुके थे जब उन्होंने कहा था कि ‘फ्रीडम इज़ माइ बर्थराइट’. उल्लेखनीय है कि तिलक ने जब एनी बेसेंट के साथ मिलकर 1916 में इंडियन होम रूल लीग बनाई थी तो काका बैप्टिस्टा ही इसके पहले अध्यक्ष बने थे.

बहरहाल बैप्टिस्टा जब इस स्वागत कार्यक्रम में बोलने के लिए आए तो उन्होंने एक दिलचस्प बात कही. महात्मा गांधी द्वारा तिलक की मौज़ूदगी में गोखले को अपना गुरु मानने की बात दोहराने की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा - ‘जब तक श्री गांधी सत्यपरता और आत्मसम्मान के आदर्श पर दृढ़ हैं - जैसा कि अब तक वे अपने जीवन में रहे हैं - तब तक इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि वे अपना गुरु किसे चुनते हैं.’ पाठकों को ध्यान होगा कि गोखले कांग्रेस की नरम या उदारवादी धारा का प्रतिनिधित्व करते थे, जबकि तिलक लाल-बाल-पाल के नाम से प्रसिद्ध हुई तिकड़ी गरम दल का प्रतिनिधित्व करते थे.

लेकिन यह तिलक और गांधी की कोई पहली मुलाकात नहीं थी. तबसे करीब 20 साल पहले 1896 में जब गांधी छह महीने के लिए दक्षिण अफ्रीका से भारत आए थे, तब भी पुणे में दोनों की मुलाकात हो चुकी थी. उस समय गांधी की उम्र थी केवल 27 साल. तिलक तब 40 साल के थे. उस मुलाकात का वर्णन अपनी आत्मकथा ने महात्मा गांधी ने कुछ यूं किया है, ‘बम्बई से मैं पूना गया. मुझे मालूम था कि पूना में दो दल थे. मुझे तो सबकी मदद की जरूरत थी. मैं लोकमान्य तिलक से मिला. उन्होंने कहा, ‘सब पक्षों की मदद लेने का आपका विचार ठीक है. आपके मामले में कोई मतभेद नहीं हो सकता . लेकिन आपके लिए तटस्थ सभापति चाहिए. आप प्रो. भंडारकर से मिलिए. वे आजकल किसी आन्दोलन में सम्मिलित नहीं होते. पर संभव है कि इस काम के लिए आगे आ जायें. उनसे मिलने के बाद मुझे परिणाम से अवगत कराइये. मैं आपकी पूरी मदद करना चाहता हूं. आप प्रो. गोखले से तो मिलेंगे ही. मेरे पास आप जब आना चाहें, निःसंकोच आइए.’ गांधी ने आगे लिखा कि ‘लोकमान्य का यह मेरा प्रथम दर्शन था. मैं उनकी लोकप्रियता का कारण तुरंत समझ गया.’

जहां तक 1915 की बात है तो काका कालेलकर ने लिखा है कि इसी साल बहुत से दोस्तों की ज़िद पर तिलक और गांधी की एक और मुलाकात की व्यवस्था की गई. दोनों को एकांत में बातचीत करने का अवसर दिया गया. इस मुलाकात के बाद तिलक ने अपने एक करीबी दोस्त गंगाधर राव से कहा - ‘यह आदमी हममें से नहीं है. वह पूरी तरह से अलग रास्ते पर चलता है, लेकिन वह हर मायने में सही है. इससे भारत को कभी कोई नुकसान नहीं पहुंच सकता. हमें ध्यान रखना चाहिए कि हम कभी उसके प्रतिकूल कोई काम न करें, बल्कि हम उसकी जो भी मदद कर सकते हैं वह करनी चाहिए.’

लेकिन 11 जुलाई, 1915 को पूना में गांधी और तिलक की हुई यह मुलाकात अखबारों में खूब चर्चा का विषय बन गई. इसे संभवतः कांग्रेस के नरम और गरम धड़े के बीच मेल कराने के प्रयास के रूप में देखा जाने लगा. तरह-तरह के कयास लगाए जाने लगे. तिलक दबाव में आ गए और उन्होंने ठान लिया कि वे इस मुलाकात का पूरा विवरण प्रकाशित कर देंगे. उन्होंने पत्र लिखकर गांधी से इसकी अनुमति मांगी. लेकिन गांधी इसके पक्ष में नहीं थे. उन्होंने 27 जुलाई, 1915 को अहमदाबाद से तिलक को एक पत्र में लिखा:

‘प्रिय श्री तिलक, आपसे मेरी मुलाकात के संबंध में अपने नाम का इस्तेमाल करने का अधिकार मैंने किसी को नहीं दिया है. आपने जिन बातों का उल्लेख किया है उनको मैंने पढ़ा तक नहीं है. हमारी बातचीत व्यक्तिगत थी और व्यक्तिगत ही रहनी चाहिए. आपके द्वारा भेजा गया भेंट का मसौदा कदाचित उसके साथ न्याय नहीं करता. मैंने यह कभी नहीं कहा मैं कांग्रेस की तरफ से या उसके द्वारा दिए गए अधिकार के आधार पर काम करता हूं. मैं तो केवल मित्रों की ओर से एक मित्र और प्रशंसक के रूप में आपके पास गया था. ...मैं अखाबारी विवाद में पड़ना नहीं चाहता. आशा है आप मेरी इस इच्छा का खयाल रखेंगे और हमारी भेंट का विवरण कदापि प्रकाशित नहीं करेंगे.’

इस प्रकरण से कोई दस साल पहले जब गांधी ने सत्याग्रह कर जेल जाने की ठानी थी तो उसके पीछे तिलक की प्रेरणा से इनकार नहीं किया जा सकता. अगस्त 1906 में जब दक्षिण अफ्रीका के ट्रांसवाल में ब्रिटिश प्रशासन ने एशियाटिक लॉ संशोधन अध्यादेश लाकर भारतीयों के लिए दूसरे एशियाई लोगों की तरह पंजीकृत होना अनिवार्य कर दिया जिसमें उन्हें अपने उंगलियों के निशान भी देने थे. इस कानून में और भी कई ऐसे प्रावधान थे जिससे वहां भारतीयों के जीवन पर विपरीत प्रभाव पड़नेवाला था. महात्मा गांधी ने न केवल अपने अखबार ‘इंडियन ओपिनियन’ में इस कानून की आलोचना शुरू की, बल्कि जैसा कि हम जानते हैं कि उन्होंने इसके खिलाफ एक संगठित आंदोलन की शुरुआत भी की.

लेकिन इस आंदोलन में आगे कैसे बढ़ा जाय इस पर दक्षिण अफ्रीका के भारतीयों के बीच बहुत बहस चल रही थी. इसी दौरान तिलक ने भारत में अपने एक भाषण में कहा कि यदि ऐसा कोई भी कानून लागू होता है तो वे इसका उल्लंघन कर जेल भी जाने के लिए तैयार हैं. तिलक के इस भाषण पर आधारित एक प्रस्ताव को गांधी ने अपनी रणनीति का हिस्सा बनाया और भारतीयों को प्रोत्साहित किया कि वे भी इस कानून का उल्लंघन कर जेल जाने के लिए तैयार हों. उन्होंने बार-बार अपने भाषणों में तिलक के जेल जानेवाली बात का जिक्र करना शुरू किया.

इसके बाद जैसा कि हम जानते हैं कि तिलक खुद भी जेल गए तो जरूर, लेकिन एक अलग ही मुकदमे में. 30 अप्रैल, 1908 को प्रफुल्ल चाकी और खुदीराम बोस नाम के दो युवकों ने मुजफ्फरपुर में जज किंग्सफोर्ड की हत्या के इरादे से एक घोड़ागाड़ी पर बम फेंका, लेकिन उसमें किंग्सफोर्ड की जगह दो ब्रिटिश महिलाएं बैठी थीं जो इस विस्फोट में मारी गईं. गांधी ने इस हिंसक तरीके की आलोचना की थी, लेकिन उन्होंने ब्रिटिश हुकूमत के रवैये से उपजे असंतोष को भी इसके लिए जिम्मेदार ठहराया था. इधर तिलक ने अपनी पत्रिका ‘केसरी’ में इसपर दो लेख लिखे जिसमें उन्होंने भी हिंसात्मक तरीकों से असहमति तो जताई थी, लेकिन बंगाल के क्रांतिकारी दल के उत्साह की प्रशंसा की थी. उन्होंने स्वराज्य को ही समस्या का एकमात्र समाधान बताया था. उन्होंने पत्रकारिता कानून के द्वारा जनमत को दबाने की सरकार की कोशिश के खिलाफ भी चेताया था. 24 जून को तिलक को इन दोनों लेखों के लिए दो अलग-अलग वारंट के अनुसार गिरफ्तार कर लिया गया और उनपर राजद्रोह का मुकदमा चला. जूरी ने उन्हें दो के मुकाबले सात मतों से दोषी ठहराया और छह साल के लिए देश-निकाले की सजा दी. जूरी में बहुमत एंग्लो-इंडियनों का था और जिन दो सदस्यों ने विरुद्ध मत दिया वे भारतीय थे.

तिलक को देशनिकाले की सजा दिए जाने के बाद एक अगस्त, 1908 को महात्मा गांधी ने ‘इंडियन ओपिनियन’ में अपने लेख में तिलक की विद्वता और बहादुरी प्रशंसा तो बहुत की थी, लेकिन फिर भी हिंसक क्रांतिकारियों के तरीकों की सफलता बारे में आशंका जताई थी. उनके शब्द थे - ‘यह सजा जितनी दुःख पहुंचानेवाली है, उतनी आश्चर्यजनक नहीं. उससे दुःखी भी नहीं होना चाहिए. हम जिस राज्य का मुकाबला करना चाहते हैं, वह हमारे ऊपर अत्याचार करे तो इसमें विचित्र कुछ भी नहीं है. श्री तिलक ऐसे महान पुरुष हैं, इतने विद्वान हैं कि उनके कार्य के बारे में इस देश में कुछ लिखना धृष्टता ही मानी जाएगी. उन्होंने देश के लिए जो कष्ट उठाया है उसके लिए वे पूजने योग्य हैं. उनकी सादगी बड़ी जबरदस्त है. उनकी विद्वता का प्रकाश यूरोप में भी खिल रहा है. फिर भी हम जिन्हें बड़ा मानते हैं उनका पक्ष हमें आंख बंद करके नहीं लेना है. श्री तिलक के लेखों में कटुता नहीं थी, ऐसा कहना अथवा ऐसा बचाव पेश करना तिलक के ऊपर कलंक लगाने जैसा है. तीखे, कड़वे और मर्मभेदी लेख लिखना उनका उद्देश्य था. अंग्रेजी राज्य के खिलाफ भारतीयों को उकसाना उनकी सीख थी. उसे ढांकना श्री तिलक की महानता में त्रुटि दिखाने जैसी बात है. ...श्री तिलक मुबारकबाद के योग्य हैं. उन्होंने जबरदस्त कष्ट उठाकर अमरत्व पाया है. और भारत की स्वतंत्रता की नींव डाली है.’

तिलक और गांधी के बीच कई प्रश्नों पर स्पष्ट मतभेद रहे. जैसे प्रथम विश्वयुद्ध में भारत के शामिल होने पर दोनों में ऊपरी सहमति तो थी लेकिन तिलक इसके लिए ब्रिटिश हुकूमत के सामने स्वराज्य की शर्त रखना चाहते थे. सत्याग्रह के महत्व को स्वीकारते हुए भी इसपर दोनों का दृष्टिकोण बिल्कुल अलग था. 25 अगस्त, 1918 में गांधी एक पत्र में तिलक को लिखते हैं, ‘कांग्रेस में आने का मेरा इरादा है नहीं. नरम दल के सम्मेलन में भी जाने का इरादा है नहीं. मुझे लगता है कि मेरा विचार दोनों ही दलों से अलग है. ...यदि आप और श्रीमती बेसंट (मेरे विचार को) स्वीकार भी कर लेंगे तो भी जिस तरह से मैं लड़ना चाहता हूं वैसा तो आप लड़ेंगे नहीं. श्रीमती बेसंट ने कह दिया है कि वे सत्याग्रही नहीं हैं. आप सत्याग्रह को स्वीकारते तो हैं, लेकिन केवल दुर्बलों का ही एक हथियार मानकर.’

ब्रिटेन में उस दौर के एक मशहूर पत्रकार और लेखक हुए वेलेन्टाइन शिरोल. उन्होंने अपनी किताब ‘इंडियन अनरेस्ट’ में तिलक को ‘द फादर ऑफ इंडियन अनरेस्ट’ कह डाला. तिलक इससे इतने नाराज हुए कि उन्होंने शिरोल पर मानहानि का मुकदमा कर दिया. तिलक यह मुकदमा हार गए, लेकिन प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान दो साल तक शिरोल को इंग्लैंड से बाहर रहकर भारत में अदालत का चक्कर काटना पड़ा. गांधी के मुताबिक तिलक इस मुकदमे में हारकर भी जीत गए थे. 31 मई, 1919 को तिलक का सार्वजनिक अभिनन्दन करने के लिए बम्बई के गिरगांव के शांताराम की चाल में महात्मा गांधी की अध्यक्षता में एक कार्यक्रम हुआ. इसका उद्देश्य शिरोल के खिलाफ तिलक द्वारा लड़े गए मुकदमे में हुए खर्च के लिए चंदा जुटाना भी था.

इस दौरान गुजराती में अपना अध्यक्षीय भाषण देते हुए गांधी ने कहा, ‘प्रत्येक विचारवान भारतीय का लक्ष्य तो एक ही (स्वराज) होना चाहिए, अलबत्ता उसे पाने के लिए अलग-अलग तरीकों का सहारा लिया जा सकता है. यह सभी जानते हैं कि मेरे तरीकों का श्री तिलक के तरीकों से मेल नहीं है. फिर भी देश के प्रति उनकी महान सेवाओं, उनके आत्मत्याग और विद्वता की प्रशंसा के अवसर प्राप्त होने पर मैं खुशी-खुशी भाग लेना चाहूंगा. ...सच कहा जाए तो मैं अदालतों में मुकदमे ले जाने के पक्ष में नहीं हूं. वहां की जीत आपके मामले की सचाई पर निर्भर नहीं करती. कोई भी अनुभवी वकील मेरी इस बात का समर्थन करेगा कि मुकदमे में जीतना ज्यादातर न्यायाधीश, वकील और अदालत तथा (घटनास्थल) स्थान पर निर्भर करता है. अंग्रेजी में एक कहावत है कि अदालत में वही जीतता है जिसके पास सबसे लंबी थैली होती है. ...इसलिए लोकमान्य के मुकदमा हार जाने पर मेरे मन में यही आया कि वे मेरी तरह सत्याग्रही होते तो कितना अच्छा होता, ताकि वे मुकदमे में हार-जीत के झंझट से बच जाते.’

1922 में एम पॉल रिचर्ड नाम के एक सज्जन महात्मा गांधी से मिले और दोनों के बीच कई घंटे तक विभिन्न मुद्दों पर एक लंबी और अंतरंग बातचीत हुई. लेकिन बाद में ये रिचर्ड महोदय अलग-अलग अखबारों में गांधीजी से हुई अपनी बातचीत के बारे में विचित्र-विचित्र विवरण प्रकाशित करने लगे. पहले तो उन्होंने शान्ति-निकेतन के बारे में गांधी का एक विवादास्पद विचार ‘बॉम्बे क्रॉनिकल’ अखबार में छपाया, जिसका खंडन महात्मा गांधी को यंग इंडिया में छापना पड़ा. दूसरी बार, फिर से रिचर्ड महाशय ने तिलक से जुड़े अखबार ‘लोकमान्य’ में तिलक के बारे में गांधी के विवादास्पद विचार छपावाने की कोशिश की. बकौल रिचर्ड महात्मा गांधी ने तिलक के बारे में कहा था, ‘मैं भारत की स्वाधीनता के लिए नहीं, बल्कि संसार में अहिंसा की स्थापना के लिए काम कर रहा हूं, तथा मुझमें और श्री तिलक में यही अंतर है. श्री तिलक ने मुझसे एक बार कहा था, ‘मैं अपने देश की स्वाधीनता के लिए सत्य का भी बलिदान कर सकता हूं’, परंतु मैं (गांधी) सत्य के लिए स्वाधीनता के बलिदान को भी तैयार हूं.’

‘लोकमान्य’ के संपादक ने इसे छापने से पहले इसे महात्मा गांधी के पास इसपर उनकी स्वीकृति के लिए भेजा. गांधी ने 23 फरवरी, 1922 को यंग इंडिया में रिचर्ड की सभी बातों का खंडन करते हुए एक लेख लिखा जिसका शीर्षक था - ‘मेरे दुःख का अंत नहीं’. इसके जवाब में पॉल रिचर्ड ने भी एक लेख लिखा जिसका शीर्षक था - ‘उनका (गांधी का) दुःख और मेरा अपना दुःख’. महात्मा गांधी ने इस लेख को भी 16 मार्च, 1922 को यंग इंडिया में छापा.

जो भी कहें, तमाम मतभेदों के बावजूद तिलक और गांधी का संबंध इतना प्रगाढ़ था कि दोनों ही हर महत्वपूर्ण मुद्दे पर एक-दूसरे से मिलकर साफगोई से राय लेते-देते थे और एक-दूसरे की बात गंभीरता से सुनते थे. एक अगस्त, 1920 को तिलक के निधन के बाद चार दिन बाद ‘यंग इंडिया’ में ‘लोकमान्य’ शीर्षक से अपने श्रद्धांजलि लेख में महात्मा गांधी ने लिखा - ‘वे (तिलक) जनता के अभिन्न अंग थे. जनता पर जितना प्रभाव उनका था, उतना हमारे युग के किसी और व्यक्ति का नहीं था. ...निस्संदेह वे जनता के आराध्य थे. हजारों लोगों के लिए उनके शब्द ही कानून थे. वास्तव में हमारे बीच से एक महामानव उठ गया है. सिंह की आवाज मौन हो गई है.’

अपने निधन से ठीक तीन महीने पहले एक मई, 1920 को तिलक खुद ही गांधी से मिलने सिंहगढ़ पहुंचे थे. अपनी चिर-परिचित साफगोई में उन्होंने गांधी से कहा, ‘देखिए, मैं आपकी तरह सहिष्णु नहीं हूं. मैं ईंट का जवाब पत्थर से देने में विश्वास करता हूं.’ उससे थोड़े ही दिन पहले तिलक महाराज ने अपने निकट के सहयोगी दादासाहेब खापर्डे द्वारा एनी बेसेंट को ‘पूतना की मौसी’ कहे जाने को भी उचित ठहराया था.