बीते सोमवार को अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान के साथ बातचीत के दौरान यह कहकर भारत को चौंका दिया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कश्मीर मुद्दे को सुलझाने के लिए उनकी मदद मांगी थी. डोनाल्ड ट्रंप ने कहा, ‘मैं दो सप्ताह पहले जी-20 शिखर सम्मलेन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी के साथ था और हमने इस विषय (कश्मीर) पर बात की थी. और उन्होंने वास्तव में कहा, ‘क्या आप मध्यस्थता करना या मध्यस्थ बनना चाहेंगे?’ मैंने कहा, ‘कहां?’ (मोदी ने कहा) ‘कश्मीर.’ पत्रकारों से बातचीत में उनका यह भी कहना था कि वे इस मुद्दे को हल करने में दोनों देशों की मदद करने के लिए तैयार हैं.

डोनाल्ड ट्रंप के इस बयान को भारत ने सिरे से खारिज कर दिया. भारत ने कहा कि नरेंद्र मोदी ने कभी भी कश्मीर पर मध्यस्थता के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति से ऐसी बात नहीं कही. भारत के मुताबिक उसका लगातार यही रुख है कि पाकिस्तान के साथ सभी लंबित मुद्दों पर केवल द्विपक्षीय चर्चा ही होगी.

डोनाल्ड ट्रंप के इस बयान के बाद जहां भारत में विपक्षी पार्टियां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से सफाई मांग रही हैं. वहीं, अमेरिका भी डैमेज कंट्रोल की स्थिति में आ गया है. वहां के कई सांसदों ने ट्रंप के इस बयान के लिए भारत सरकार से खेद जताया है. डोनाल्ड ट्रंप के बयान पर इतना विवाद होने की बड़ी वजह 1972 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुआ ‘शिमला समझौता’ है. भारत का हमेशा से यही कहना है कि अगर कोई तीसरा पक्ष कश्मीर मुद्दे को सुलझाने में मध्यस्थता करता है तो यह शिमला समझौते का उल्लंघन होगा.

1971 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए युद्ध के बाद दोनों देशों के बीच युद्धबंदियों की अदला-बदली, बांग्लादेश को अलग देश की मान्यता देने और राजनयिक संबंधों को सामान्य बनाने की कवायद चल रही थी. इस कवायद के तहत 2 जुलाई, 1972 को शिमला में भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पाकिस्तान के राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो के बीच एक समझौता हुआ. इस समझौते को ‘शिमला समझौता’ के नाम से जाना गया. दोनों देशों ने इस समझौते में लंबे समय तक शांति, दोस्ती और सहयोग बनाए रखने का संकल्प लिया था.

शिमला समझौते में जम्मू-कश्मीर से जुड़े दो अहम मुद्दों पर भी दोनों देशों के बीच सहमति बनी थी. इनमें पहली बात यह थी कि कश्मीर को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच जो भी विवाद है, उसे दोनों मुल्क शांतिप्रिय तरीकों से खुद सुलझाएंगे. इसके लिए किसी तीसरे देश के दखल की जरूरत नहीं है. समझौते में दूसरी प्रमुख बात यह थी कि 17 दिसंबर, 1971 के बाद दोनों देशों के बीच जम्मू-कश्मीर में जो नियंत्रण रेखा तय हुई है, उसका दोनों ही सम्मान करेंगे. दोनों पक्ष इस संबंध में न केवल अपने पूर्वाग्रहों को त्याग देंगे, बल्कि आपसी मतभेदों और कानूनी विवादों के बाद भी इस रेखा को बदलने की एकतरफा कोशिश नहीं करेंगे.

हालांकि, इस समझौते के बमुश्किल दो हफ्ते गुजरने के बाद ही पाकिस्तान के राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो इससे पलट गए. उन्होंने पाकिस्तान की संसद में कहा कि वहां की सरकार कश्मीर की अवाम के साथ है और अगर वहां की जनता आज़ादी के लिए आंदोलन करेगी तो वे कश्मीरी जनता का ही साथ देंगे. कहा जाता है कि जुल्फिकार अली भुट्टो ने ऐसा बांग्लादेश युद्ध में हार की वजह से बौखलाई पाकिस्तानी सेना के दबाव में किया था, जो शिमला समझौता से भी काफी ज्यादा नाराज थी. दरअसल, पाकिस्तानी सेना को बांग्लादेश युद्ध में मिली हार का बदला लेने के लिए सबसे बेहतर विकल्प कश्मीर ही दिख रहा था. और शायद आज भी उसे ऐसा ही लगता है. इतिहासकार रामचंद्र गुहा ‘इंडिया आफ्टर गांधी’ में लिखते भी हैं, ‘आख़िर बांग्लादेश बनाकर भारत ने पाकिस्तान की मुस्लिम मुल्क की धारणा को तोड़ा था. और इसीलिए वह कश्मीर को भारत से अलग कर अपना हिसाब बराबर करने का ख़्वाब पाले हुए है.’

बहरहाल, जुल्फिकार अली भुट्टो के बाद पाकिस्तान में जो भी सरकारें आईं, वे भी पाकिस्तानी सेना के डर की वजह से शिमला समझौते को नकारती रहीं. ये सरकारें इस समझौते से उलट कश्मीर मामले में संयुक्त राष्ट्र और अमेरिका से मध्यस्थता की बात करती रही हैं. जबकि, भारत यही कहता आ रहा है कि यह दोनों देशों के बीच का मसला है इसलिए इसे केवल वे ही सुलझाएंगे.