बीती 25 जुलाई को खबर आई कि शेयर बाजार में विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) के रुख ने केंद्र सरकार के माथे पर बल डाल दिए हैं. ये निवेशक बाजार में लगातार बिकवाली कर रहे हैं यानी वे शेयर बेचकर अपना पैसा वापस ले रहे हैं. इस पैसे को वे दूसरे देशों में निवेश कर रहे हैं. बताया जाता है कि केंद्र सरकार इस मसले पर गंभीर है और वह जल्द ही एफआईआई से बातचीत कर सकती है.

पांच जुलाई को वित्त मंत्री द्वारा पेश बजट को संसद की मंजूरी मिल चुकी है. सरकार बजट को समतामूलक और गरीबों का पक्षधर बता रही है तो विपक्ष इसे कारपोरेट समर्थक और निजीकरण वाला बता रहा है. बजट को लेकर इस तरह की राजनीतिक बयानबाजी हमेशा होती है. लेकिन, बजट को बाजार और निवेशक किस तरह से ले रहे हैं, यह तो कुछ आर्थिक संकेतक ही बताते हैं. इन्हीं संकेतकों में से एक अगर शेयर बाजार की बात करें तो बजट के बाद से ही वह कुछ रूठा-रूठा नजर आ रहा है. आज ही सेंसेक्स में 250 से ज्यादा अंकों की गिरावट देखने को मिली है.

बजट आने के फौरन बाद शेयर बाजार में तेज गिरावट देखने को मिली थी. बाद में भी बाजार गिरता-संभालता रहा, लेकिन उसके ‘सेंटीमेंट्स’ में सुधार नहीं दिखा. बजट के बाद अब तक भारतीय शेयर बाजारों के पूंजीकरण में 2.8 लाख करोड़ से ज्यादा की कमी आ चुकी है. बांबे स्टाक एक्सचेंज (बीएसई) का सेंसेक्स बजट आने के दो हफ्ते बाद 1500 प्वाइंट तक लुढ़क चुका है. नेशनल सिक्योरिटी एकसचेंज (एनएसई) का निफ्टी भी 580 से ज्यादा अंकों का गोता लगा चुका है.

आखिर चुनाव के बाद उम्मीदों से भरा दिख रहा शेयर बाजार का माहौल एकाएक निराशा वाले स्थायी भाव में तब्दील क्यों हो गया? आर्थिक जानकारों के मुताबिक बाजार की इस गिरावट के मूल में बजट के कई प्रावधान हैं जो निवेशकों को लगातार आशंकित किए हुए हैं. उनके मुताबिक और जैसा कि खबर की शुरुआत में भी जिक्र हुआ, बाजार में गिरावट की फिलहाल सबसे बड़ी वजह यह है कि विदेशी निवेशक लगातार शेयर बाजार से पैसा निकाल रहे हैं. बजट आने के बाद जुलाई में ही विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने शेयर बाजार से 7,712 करोड़ रुपये निकाल लिए, जिसने बाजारों में बिकवाली का माहौल बना दिया.

विदेशी निवेशक एकाएक तेजी से भारतीय स्टॉक मार्केट से पैसा क्यों निकाल रहे हैं जबकि दुनिया की अर्थव्यवस्था में ऐसी कोई खास हलचल भी नहीं है? इसकी सबसे बड़ी वजह बताई जा रही है बजट में अमीरों पर करों की दर में वृद्धि. बजट में साल में दो से पांच करोड़ रुपये कमाने वालों पर सरचार्ज बढ़ाकर 25 फीसदी कर दिया गया है और सालाना पांच करोड़ से ज्यादा कमाने वालों पर इसे 37 फीसद कर दिया गया है. सरकार के इस प्रावधान की जद में शेयर बाजार के विदेशी निवेशक भी आ रहे हैं.

विदेशी निवेशक शेयर बाजार में व्यक्तिगत रूप से या ट्रस्ट बनाकर निवेश करते हैं. इसमें ट्रस्ट बनाकर निवेश करने को ज्यादातर निवेशक तरजीह देते हैं. अमीरों पर कर यानी सुपर रिच टैक्स को लेकर बजट में जो प्रावधान किए गए हैं वे इन ट्रस्टों पर भी लागू होते हैं. इस कारण विदेशी फोर्टफोलियो निवेशकों को अब भारतीय शेयर बाजार में निवेश उतना आकर्षक नहीं लग रहा है. बताया जा रहा है कि यह बात वित्त मंत्रालय के संज्ञान में लाई गई थी, लेकिन सरकार ने विदेशी फोर्टफोलियो निवेशकों को ऐसी कोई राहत देने से इन्कार कर दिया. यही नहीं, सरकार ने इन प्रावधानों को तत्काल प्रभाव से लागू करने का फैसला किया है जिससे निवेशकों को नई रणनीति बनाने का मौका भी नहीं मिल पा रहा है. इसलिए विदेशी निवेशक लगातार स्टॉक एक्सचेंज से अपना पैसा निकाल रहे हैं जो भारतीय शेयर बाजार में गिरावट की बड़ी वजह बनता जा रहा है.

बजट में सुपर रिच टैक्स के प्रावधान के अलावा भी कुछ चीजें हैं जो शेयर बाजार को पसंद नहीं आ रही हैं. जैसे इसमें प्रावधान किया गया है कि शेयर बाजार में सूचीबद्ध यानी लिस्टेड कंपनियों को अपनी पब्लिक होल्डिंग 25 से बढ़ाकर 35 फीसदी करनी होगी. यानी कि शेयर बाजार में सूचीबद्ध हर कंपनी को हर हाल में अपने 35 फीसदी शेयर आम निवेशकों को बेचने पड़ेंगे.

एक रिपोर्ट के मुताबिक देश के शेयर बाजारों में लगभग 4700 कंपनियां लिस्टेड हैं. इनमें 25 फीसदी ऐसी हैं, जिनके मालिकों के पास अपनी कंपनियों के 65 फीसदी से ज्यादा शेयर हैं. नए प्रावधानों के चलते उन्हें अपने शेयरों की बिकवाली आम निवेशकों को करनी होगी. ऐसे में इन मालिकों को करीब चार लाख करोड़ की कीमत के शेयर बाजार में उतारने होंगे. अगर मांग और पूर्ति के सामान्य सिद्धांत की नजर से भी देखें तो बाजार में ज्यादा मात्रा में शेयर उपलब्ध होने से उनके दाम गिरेंगे और उसका सीधा असर शेयर बाजार के सूचकांक पर होगा.

इसके अलावा सरकार ने कंपनियों की पब्लिक होल्डिंग को 35 फीसदी करने का जो प्रावधान किया है, वह भी तत्काल प्रभाव से लागू होगा. इससे पहले जब कंपनियों की पब्लिक होल्डिंग 25 फीसदी की गई थी, तब कंपनियों को ऐसा करने के लिए तीन साल का समय दिया गया था. समय न मिलने के कारण भी प्रमोटर अनिश्चितता में हैं.

जानकारों के मुताबिक पब्लिक होल्डिंग 35 फीसद करने के प्रावधान का एक नुकसान और भी है. ऐसी तमाम विदेशी कंपनियां भी भारत के स्टॉक मार्केट में सूचीबद्ध हैं जिनके प्रमोटर कंपनी के शेयरों में बड़ा हिस्सा रखते हैं, लेकिन ये कंपनियां भारतीय बाजार के निवेश पर आधारित नहीं है. नए प्रावधानों के चलते इनके मालिक अपनी कंपनियों को भारतीय शेयर बाजारों से असंबद्ध ( डिलिस्ट) भी कर सकते हैं क्योंकि वे कंपनियों के शेयरों पर अपना नियंत्रण खोना नहीं चाहेंगे. यह नुकसान भी आखिरकार स्टाक मार्केट का ही नुकसान होगा.

इसके अलावा बजट में शेयरों के बाई बैक पर 20 फीसदी का भारी टैक्स लगा दिया गया है. बाई बैक यानी कंपनियों का अपने जारी किए हुए शेयरों को खुद खरीना. यह काम कई उद्देश्यों से किया जाता है. कई बार अपने नतीजों की घोषणा के समय मुनाफे में अपने निवेशकों को हिस्सा देने के साथ कंपनियां शेयर बाई बैक भी करती हैं. छोटे निवेशकों के लिए कंपनियों के बाई बैक करने का मौका इस लिहाज से अच्छा रहता है कि तब उस कंपनी के शेयरों के भाव चढ़ जाते हैं और निवेशक को अच्छा रिटर्न मिल जाता है. जाहिर है कि बाई–बैक पर ज्यादा टैक्स होने के चलते कंपनियां अब इससे बचेंगी. छोटे निवेशकों के लिए भी यह बहुत अच्छा संकेत नहीं है.

अब बजट पास हो चुका है और फिलहाल इन प्रस्तावों में राहत की उम्मीद नजर नहीं आती. शेयर बाजार ‘सेंटीमेंट्स’ पर चलते हैं. पेचीदा प्रावधानों के कारण विदेशी निवेशक और बाजार के जानकार बिकवाली शुरू करते हैं तो आम निवेशक भी अपना पैसा निकालना शुरू कर देता है जो इन सारी चीजों पर बहुत गौर नहीं करता. भारतीय शेयर बाजारों के साथ ऐसा ही हो रहा है और फिलहाल निवेशक स्थिर नहीं हो पा रहे हैं.

तो आगे क्या? जानकारों के मुताबिक शेयर बाजार मे अस्थिरता का यह सिलसिला हाल-फिलहाल चलता रहेगा. सुपर रिच टैक्स के चलते विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की बिकवाली का मुद्दा तो है ही, भारत में भी जो लोग सुपर रिच जैसी श्रेणी में आते हैं वे निवेशक भी हैं और उनके निवेश का बड़ा हिस्सा स्टॉक एक्सचेंज में भी होता है. ऐसे में उन पर ऊंचा टैक्स शेयर बाजार के घरेलू निवेश को भी प्रभावित करेगा.

‘बजट अमीरों का है या गरीबों का’, इस पर कई मत हो सकते हैं, लेकिन इस पर दो राय नहीं है कि सरकार ने अमीरों पर करों का चाबुक चला खुद को गरीब हितैषी दिखाने की जो राजनीतिक कोशिश की है वह कम से कम शेयर बाजार को तो रास नहीं आ रही.