महाराष्ट्र की राजनीति में काफी प्रभाव रखने वाले ठाकरे परिवार में यह परंपरा रही है कि उसका कोई भी सदस्य न तो सीधे चुनावी राजनीति में उतरता है और न ही सरकार में कोई पद लेता है. ठाकरे परिवार के नेतृत्व वाली शिव सेना की जब महाराष्ट्र में सरकार भी बनी तो भी मुख्यमंत्री का पद परिवार के किसी व्यक्ति ने नहीं लिया. लेकिन अब पहली बार ऐसा लग रहा है कि ठाकरे परिवार का कोई व्यक्ति न सिर्फ चुनाव लड़ सकता है बल्कि सरकार में पद भी ले सकता है.

बाल ठाकरे ने शिव सेना की स्थापना की थी. उनके जीवनकाल में ही पार्टी महाराष्ट्र में सरकार बनाने की स्थिति में भी आई. लेकिन न तो बाल ठाकरे ने कभी चुनाव लड़ा और न ही वे प्रदेश के मुख्यमंत्री बने. पार्टी के अपने वफादारों को उन्होंने न सिर्फ चुनाव लड़ाया बल्कि सरकार चलाने का दायित्व भी दिया.

बाल ठाकरे के जीवन में ही उनके बेटे उद्धव ठाकरे और भतीजे राज ठाकरे भी राजनीति में सक्रिय हुए. लेकिन ये दोनों भी चुनावी राजनीति में नहीं गए बल्कि संगठन में ही रहे. बाद में राज ठाकरे ने अलग पार्टी महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना बनाई लेकिन फिर भी वे खुद चुनाव नहीं लड़े. दोनों में से कोई न तो प्रदेश की सरकार में शामिल हुआ और न ही केंद्र सरकार में. जबकि कई मौके ऐसे आए जब केंद्र में भी शिव सेना के सहयोग से सरकार चली. अभी भी केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार में शिव सेना साझीदार है, लेकिन उसमें ठाकरे परिवार का कोई भी सदस्य मंत्री नहीं है.

उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे भी शिव सेना की राजनीति में सक्रिय हो गए हैं. अभी वे शिव सेना की यूथ विंग के प्रमुख हैं. इन दिनों वे पूरे महाराष्ट्र में जन आशीर्वाद यात्रा पर निकले हैं. उनके साथ पार्टी के दूसरे नेता भी इस यात्रा में शामिल हैं. महाराष्ट्र के अलग-अलग हिस्सों में उनकी इस यात्रा में शामिल होने के लिए अच्छी संख्या में लोग आ रहे हैं.

अब पहली बार महाराष्ट्र की राजनीति में यह चर्चा है कि ठाकरे परिवार से आदित्य ठाकरे इस साल होने वाले विधानसभा चुनावों में खुद मुकाबले में उतर सकते हैं. उनके बारे में तो यह भी कहा जा रहा है कि अगर चुनाव के बाद प्रदेश में एक बार फिर से भाजपा-शिव सेना सरकार बनती है तो आदित्य ठाकरे सरकार में भी शामिल हो सकते हैं. चर्चा तो यह तक है कि शिव सेना उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठाना चाहती है.

हालांकि इसमें संकट यह है कि महाराष्ट्र में कभी शिव सेना की जूनियर पार्टनर रही भाजपा आज सीनियर पार्टनर है. मुख्यमंत्री की कुर्सी भाजपा के देवेंद्र फड़णवीस के पास है. ऐसे में यह सवाल बना हुआ है कि क्या भाजपा मुख्यमंत्री की कुर्सी से अपना दावा छोड़ेगी.

पिछले दिनों आदित्य ठाकरे ने यह बयान देकर सभी को हैरान कर दिया कि पार्टी में उनके चुनाव लड़ने को लेकर चर्चा चल रही है और अगर लोगों ने चाहा तो वे मैदान में उतरने से पीछे नहीं हटेंगे. उन्होंने यह भी कहा है कि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और शिव सेना प्रमुख उद्धव ठाकरे में यह सहमति बन गई है कि प्रदेश में अगला मुख्यमंत्री शिव सेना का होगा. हालांकि, भाजपा की ओर से इसकी पुष्टि नहीं की गई है, लेकिन आदित्य ठाकरे ने सार्वजनिक तौर पर कहा कि अमित शाह और उद्धव ठाकरे के बीच जब इस विषय पर बातचीत हो रही थी तो उस वक्त उस कमरे में देवेंद्र फड़णवीस और वे भी थे. दूसरी तरफ देवेंद्र फड़णवीस दावा कर रहे हैं कि अगली बार भी वे ही महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बनेंगे.

शिव सेना के प्रमुख नेताओं में शुमार किए जाने वाले संजय राउत ने सार्वजनिक तौर पर यह बयान दिया है कि जिस जन आशीर्वाद यात्रा पर आदित्य ठाकरे निकले हैं, उसमें पार्टी कार्यकर्ताओं और लोगों का उत्साह देखकर तो यही लग रहा है कि वे आदित्य ठाकरे को बतौर मुख्यमंत्री देखना चाहते हैं. पार्टी के कुछ अन्य नेताओं ने भी 29 साल के आदित्य ठाकरे को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर देखने की इच्छा जताई है.

लेकिन महाराष्ट्र की राजनीति को करीब से देखने वाले राजनीतिक जानकारों की मानें तो चाहे शिव सेना जितनी भी योजनाएं बना रही हो, लेकिन मुख्यमंत्री का फैसला चुनावों के बाद ही हो पाएगा. शिव सेना और भाजपा में यह सहमति बन गई है कि विधानसभा चुनावों में दोनों पार्टियां बराबर-बराबर सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेंगी. चुनावों के बाद जिसके विधायकों की संख्या अधिक होगी, मुख्यमंत्री की कुर्सी पर उस पार्टी की दावेदारी होगी.

हालांकि, कुछ लोग एक दूसरे फॉर्मूले की बात भी कर रहे हैं. इन लोगों का कहना है कि अगर शिव सेना की कम सीटें भी आती हैं तो संभव है कि पार्टी आधे-आधे कार्यकाल के लिए मुख्यमंत्री बनाने पर भाजपा के साथ सहमति बनाने की कोशिश करे. कहा जा रहा है कि इसमें शिव सेना यह कह सकती है कि पहले कार्यकाल के पूरे पांच साल में भाजपा का मुख्यमंत्री रहा है, इसलिए दूसरे कार्यकाल में पहले मुख्यमंत्री बनाने का अवसर शिव सेना को मिलना चाहिए. अगर भाजपा इस पर सहमत होती है तब जाकर कहीं शिव सेना के मुख्यमंत्री के लिए कोई संभावना बन पाएगी.

अगर शिव सेना को मुख्यमंत्री बनाने का अवसर मिलता है तो संभव है कि ठाकरे परिवार के सरकार में शामिल नहीं होने की परंपरा टूट जाए और आदित्य ठाकरे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बन जाएं. शिव सेना द्वारा उन्हें आगे किए जाने की कुछ और वजहें भी बताई जा रही हैं. महाराष्ट्र की राजनीति पर नजर रखने वाले एक वरिष्ठ पत्रकार बताते हैं, ‘शिव सेना को भी मालूम है कि बाल ठाकरे वाला करिश्माई व्यक्तित्व उद्धव ठाकरे का नहीं है.’

वे आगे जोड़ते हैं, ‘बाल ठाकरे के रहते यह संभव था कि ठाकरे परिवार सरकार में शामिल नहीं हो, लेकिन पूरी सरकार उसके हाथ में रहे. इससे पार्टी के विस्तार पर भी कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ता था. उद्धव ठाकरे भी अपनी सरकार और मंत्रियों पर नियंत्रण तो रख सकते हैं लेकिन इससे संगठन विस्तार का काम आगे नहीं बढ़ पाएगा. ऐसे में अगर आदित्य ठाकरे सरकार का नेतृत्व करते हैं तो इससे परिवार के प्रति लोगों के विश्वास का फायदा शिव सेना को सांगठनिक स्तर पर भी मिलेगा और उसके लिए खुद को महाराष्ट्र की राजनीति में एक प्रमुख ताकत बनाए रखने में सुविधा होगी.’