तकरीबन छह महीने बाद होने वाले दिल्ली विधानसभा चुनावों के मद्देनजर कांग्रेस और आम आदमी पार्टी (आप) के बीच गठबंधन को लेकर एक बार फिर से राजनीतिक गलियारों में चर्चा चलने लगी है. दोनों दलों के कुछ नेताओं को ऐसा लगता है कि इस गठबंधन से दोनों दलों का फायदा होगा और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को दिल्ली प्रदेश की सत्ता में आने से आसानी से रोका जा सकेगा.

दोनों दलों के बीच लोकसभा चुनावों के पहले भी गठबंधन की कोशिशें हुई थीं. प्रमुख नेताओं के बीच कई दौर की बातचीत भी चली. लेकिन अंतिम समय में बात नहीं बनी. उस वक्त यह बात सामने आई कि आप के सर्वेसर्वा अरविंद केजरीवाल दिल्ली से बाहर गठबंधन की शर्त पर दिल्ली में गठबंधन को तैयार थे, लेकिन कांग्रेस दिल्ली से बाहर आप के साथ गठबंधन नहीं करना चाह रही थी.

दिल्ली प्रदेश कांग्रेस की अध्यक्ष रहीं शीला दीक्षित आप के गठबंधन के पक्ष में नहीं थीं. उन्होंने सार्वजनिक तौर पर भी गठबंधन का विरोध किया था और कहा था कि उनके विरोध के बावजूद अगर पार्टी का शीर्ष नेतृत्व गठबंधन का फैसला करता है तो वे इस फैसले का समर्थन करेंगी. पिछले दिनों शीला दीक्षित का निधन हो गया. इसके बाद से कुछ नेता फिर से आप-कांग्रेस गठबंधन की बातों को आगे बढ़ा रहे हैं. ऐसे लोगों को लग रहा है कि कांग्रेस के अंदर से इसका अब उतना तीखा विरोध नहीं होगा जितना पहले हो रहा था.

लोकसभा चुनावों में एक बार फिर दिल्ली की सभी सातों सीटों पर भाजपा के उम्मीदवार जीत गए थे. उसके तुरंत बाद आप की ओर से पार्टी के प्रमुख नेता संजय सिंह का बयान आया कि विधानसभा चुनावों को लेकर कांग्रेस के साथ आप का कोई गठबंधन नहीं होगा. लेकिन राजनीतिक जानकारों ने उस वक्त भी कहा कि अगर कांग्रेस-आप का गठबंधन हुआ होता तो संभव है कि दिल्ली के लोकसभा चुनावों के परिणाम थोड़े अलग होते.

लोकसभा चुनाव परिणामों में आप के लिए चिंता की बात यह थी कि 2014 के मुकाबले उसका वोट प्रतिशत तकरीबन आधा हो गया. 2014 में दिल्ली में आप को 33 प्रतिशत वोट मिले थे. 2019 में यह आंकड़ा घटकर तकरीबन 18 फीसदी रह गया जबकि 2019 में कांग्रेस को आप से अधिक (तकरीबन 22 फीसदी) वोट मिले. दिल्ली की कुल सात सीटों में से पांच पर पार्टी के उम्मीदवार दूसरे नंबर पर रहे. आप सिर्फ दो ही सीटों पर दूसरे स्थान पर रही.

इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखते हुए आप के कुछ नेता विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के साथ गठबंधन की बात कर रहे हैं. एक पार्टी नेता इस बारे में कहते हैं, ‘पार्टी में अधिकांश नेता यह कह रहे हैं कि 2015 के विधानसभा चुनावों में हम अकेले ही बड़ी जीत हासिल करने में कामयाब रहे थे इसलिए इस बार ​भी अकेले ही उतरना चाहिए. लेकिन जो लोग ये बात कह रहे हैं कि वे भूल जा रहे हैं कि 2014 के लोकसभा चुनावों में हमें 33 प्रतिशत वोट मिले थे. आप इस पूंजी के साथ 2015 के विधानसभा चुनावों में उतरी थी और इसी पूंजी की वजह से हमें बड़ी कामयाबी मिली थी.’

वे आगे कहते हैं, ‘लोकसभा चुनावों में 18 फीसदी पर आ जाने के बाद अकेले चुनाव में कूदने की बात करना अतिआत्मविश्वास दिखाने जैसा है. हमारे जैसे और भी कुछ पार्टी नेता शीर्ष नेताओं को गठबंधन के फायदे समझाने की कोशिश कर रहे हैं. केजरीवाल सरकार ने दिल्ली में काफी काम किया है. लेकिन जब चुनाव होते हैं तो काम के अलावा भी कई और समीकरण चलते हैं. ऐसे में अगर हमारा कांग्रेस के साथ गठबंधन होता है तो इसका फायदा दोनों दलों को मिलेगा और दिल्ली में भाजपा को आसानी से हराया जा सकेगा.’

यह पूछे जाने पर कि विधानसभा चुनावों में आप और कांग्रेस के बीच गठबंधन की बातचीत अभी किस स्तर पर है, वे कहते हैं, ‘अभी दोनों दलों के कुछ नेता अनौपचारिक तौर पर यह बात कर रहे हैं कि ये भी एक संभावना हो सकती है. दोनों दलों के बड़े नेताओं में अभी यह बातचीत नहीं हुई है. लेकिन जैसे-जैसे चुनाव के दिन नजदीक आएंगे, वैसे-वैसे इस संभावना को हकीकत में बदलने की कोशिश दोनों पक्षों से दिख सकती है.’

उधर, दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के एक नेता का कहना है कि अनौपचारिक बातचीत में संभावित गठबंधन को लेकर चर्चा तो चल रही है लेकिन इस बारे में कोई निर्णय हाल-फिलहाल होता नहीं दिख रहा है. वे कहते हैं, ‘शीला दीक्षित के निधन के बाद दिल्ली प्रदेश कांग्रेस में नए अध्यक्ष की नियुक्ति होनी है. ऐसे में जो नए प्रदेश अध्यक्ष आएंगे, वे गठबंधन के बारे में क्या सोचते हैं, इस पर काफी कुछ निर्भर करेगा. फिर राहुल गांधी के बाद कांग्रेस में नए राष्ट्रीय अध्यक्ष की भी नियुक्ति होनी है. दिल्ली विधानसभा चुनावों को लेकर गठबंधन होगा या नहीं यह नए राष्ट्रीय अध्यक्ष पर भी निर्भर करेगा. लेकिन मैं इतना कह सकता हूं कि ऐसी किसी संभावना को दोनों में कोई ​भी दल सिरे से खारिज करने की स्थिति में नहीं है.’

शीला दीक्षित के पहले प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहे अजय माकन लोकसभा चुनावों में भी कांग्रेस और आप के बीच गठबंधन की वकालत कर रहे थे. शीला दीक्षित के निधन के बाद प्रदेश कांग्रेस में अब उन्हें सबसे मजबूत नेता माना जा रहा है. ऐसे में अगर प्रदेश कांग्रेस की कमान उनके हाथों में एक बार फिर से आती है तो इस बात की काफी संभावना बढ़ जाएगी कि कांग्रेस और आप के बीच विधानसभा चुनावों को लेकर कोई गठबंधन हो.

इसी तरह हरियाणा की जननायक जनता पार्टी से आप का गठबंधन टूटने को भी दिल्ली में गठबंधन की संभावनाओं के लिए एक अच्छा संकेत माना जा रहा है. आप ने कह दिया है कि हरियाणा विधानसभा चुनावों के लिए वह जजपा के साथ गठबंधन नहीं करेगी. लोकसभा चुनावों में भी हरियाणा में आप और जजपा के बीच गठबंधन होने का असर दिल्ली की बातचीत पर भी पड़ा था क्योंकि आप यह चाहती थी कि हरियाणा में कांग्रेस, आप और जजपा के बीच गठबंधन हो. कांग्रेस इसके लिए तैयार नहीं थी. अब आप जजपा से अलग हो गई है तो माना जा रहा है कि इससे दिल्ली में गठबंधन की बातचीत पहले के मुकाबले ज्यादा आसान होगी.