निर्देशक : प्रकाश कोवलामुडी

लेखक : कनिका ढिल्लन

कलाकार : कंगना रनोट, राजकुमार राव, हुसैन दलाल, अमायरा दस्तूर, ब्रिजेंद्र काला, सतीश कौशिक, ललित बहल, जिमी शेरगिल

रेटिंग : 3.5/5

क्या आपने ‘बॉर्टन फिंक’ देखी है? 1991 में आई अमेरिकी सिनेमा की यह मास्टरपीस एक ऐसे सिनेमा लेखक की कहानी कहती है जो लेखन में गहरे उतरते-उतरते यथार्थ और कल्पना के बीच फर्क करने लायक नहीं रहता. ‘ब्लैक स्वान’ (2010) तो देखी ही होगी? सबसे अच्छा नाचने का पागलपन नताली पोर्टमैन के किरदार पर इस कदर हावी हो जाता है कि वह रिएलिटी और फैंटसी में फर्क नहीं कर पाती. ‘शटर आइलैंड’ (2010)? ‘गॉन गर्ल’ (2014)? ‘द शाइनिंग’ (1980)? ‘टैक्सी ड्राइवर’ (1976)?

साइकोलॉजिकल थ्रिलर जॉनर की ये केवल कुछ चुनिंदा उम्दा फिल्में हैं, जो अपने मुख्य किरदार के पागलपन के भंवर में फंसते जा रहे व्यक्तित्व को बाकमाल अंदाज में परदे पर रच चुकी हैं. इन फिल्मों के महान सिनेमा का रूप लेने में निराली कहानी और अद्भुत अभिनय के साथ-साथ उस दुर्लभ लेखन और निर्देशन का भी उतना ही हाथ रहा है जो कि पागलपन के भवसागर की ‘विजुअल’ व्याख्या अद्भुत और अविश्वसनीय तरीके से परदे पर रचते हैं. इस जॉनर की कई विदेशी फिल्में ऐसी भी हैं जो बेहद कुशलता के साथ अंत तक दर्शकों को इस सवाल के साथ उलझाए रहती हैं कि जो परदे पर चल रहा है उसमें से ‘यथार्थ क्या है और कल्पना क्या?’

‘जजमेंटल है क्या’ इसी स्तर की बेहिसाब अनोखी और हिंदी सिनेमा के लिहाज से बेहद साहसिक साइकोलॉजिकल थ्रिलर फिल्म है. इसकी विजुअल स्टोरीटेलिंग का स्वाद लेने के लिए इसे एक से ज्यादा बार थियेटरों में देखा जाना चाहिए.

लेकिन, इस फिल्म की गहराई और अलहदा होने के पीछे की वजहों को समझने के लिए आपको साइकोलॉजिकल जॉनर की विदेशी फिल्मों से पहले से वाबस्ता होना जरूरी है. नहीं तो आप इस फिल्म को बस एक थ्रिलर कहानी के रूप में एन्जॉय भर कर पाएंगे जिसकी अच्छी शुरुआत होती है, दिलचस्प जगह पर मध्यांतर होता है और अपना रहस्य सलीके से आखिर तक बचाकर वह दर्शकों के लिए दर्शनीय बनती है. कंगना रनोट की ‘जजमेंटल है क्या’ इस तरह की आसान फिल्मों से आगे की फिल्म है.

कहानी उसी के आसपास की है जो कि ट्रेलर दिखा चुका है. कंगना रनोट का किरदार बॉबी अपने नए किराएदार केशव (राजकुमार राव) पर शक करता है कि वह साइको है, खूनी है और फिल्म अंत तक इसी रहस्य को जानने की घुमावदार और जैसे कभी खत्म न होने वाली बदहवास यात्रा का चित्रण करती है. कंगना का किरदार बॉबी एक्यूट साइकोसिस से पीड़ित है और फिल्म आखिर तक उसके पागलपन की टेक लेकर दर्शकों को उलझाए चलती है कि वह जो ‘कह’ रही है वो सच है या जो पागलपन का चरम ‘दिखा’ रही है वो सच है.

कंगना का किरदार राव के किरदार को खूनी साबित करना चाहता है और राव का किरदार कंगना के किरदार को पागल और साइको. दोनों जो माइंडगेम्स खेलते हैं (या खेलते हुए नजर आते हैं) वह इस फिल्म की जान है.

फिल्म शुरुआत में आसान जान पड़ती है जब कंगना रनोट को वैसे ही न्यूरोटिक पात्र अभिनीत करने को देती है जैसे किरदार वे अपनी पहली फिल्म ‘गैंगस्टर’ के समय से कर रही हैं. लेकिन राजकुमार राव की एंट्री होते ही पहले तो फिल्म प्रिडिक्टिबल लगने वाली जलन से भरपूर प्रेम-कहानी में तब्दील होती है और फिर अनोखी होना शुरू होते हुए कंगना के राव पर शक करने के चरम पर बार-बार और कई बार पहुंचती है. स्टोरीटेलिंग का चरम वह इंटरवल के बाद वाले हिस्से में छूती है और जब कंगना के दिमाग में रहने वाली आवाजें सशरीर उसके इर्द-गिर्द घूमने लगती हैं तो कसम से, फिल्म विजुअल स्टोरीटेलिंग का शीर्ष छूती मालूम होती है.

‘जजमेंटल है क्या’ के लिए कंगना रनोट को ढेर सारी तारीफें शर्तिया मिलने वाली है, लेकिन हमें लगता है कि इस फिल्म का मुख्य टेलेंट तेलुगू सिनेमा से आए निर्देशक प्रकाश कोवलामुडी, उनकी पत्नी और लेखिका कनिका ढिल्लन तथा सिनेमेटोग्राफर पंकज कुमार हैं. इन तीनों ने मिलकर मानसिक बीमारी, घरेलू हिंसा और ट्रॉमा से जूझते किरदार बॉबी के पागलपन को जो ‘विजुअल लैंग्वेज’ दी है वह अद्भुत है.

इस तरह के किरदारों के ‘माइंडस्पेस’ में विजुअली जाना बेहद कठिन काम है (किताबों में व्याख्या करना बनिस्बत आसान है) और इसीलिए भी ऊपर वर्णित फिल्में महान की श्रेणी में आती हैं क्योंकि वे ‘बताकर नहीं’ बल्कि ‘दिखाकर’ किरदारों के पागलपन को चित्रित करती हैं. सिनेमा बताने का नहीं, दिखाने का माध्यम है लेकिन कभी-कभी ही अपनी असली परिभाषा के अनुरूप हम दर्शकों को मिलता है.

‘हैदर’, ‘तुम्बाड’, ‘शिप ऑफ थीसियस’ तथा ‘तलवार’ जैसी उम्दा फिल्मों का फिल्मांकन करने वाले पंकज कुमार ने अलहदा ही टैक्स्चर फिल्म को दिया है. अंधेरी गलियां और सुर्ख रंगों से सजे फ्रेम्स जहां कहानी को रहस्यमयी आवरण देते हैं वहीं कैमरे का मूवमेंट कोलाहल को बखूबी व्यक्त करता है. ‘मनमर्जियां’ जैसी मैच्योर फिल्म लिखने वाली कनिका ढिल्लन ने एक और मजबूत और अतरंगी महिला किरदार रचने के अलावा जिस तरह उस किरदार बॉबी के जेहन का विस्तृत नक्शा सीन दर सीन परदे पर उकेरा है, वह उसके माइंडस्पेस को बेहद कुशलता से व्यक्त करता है. इस तरह से किरदार के अंतर्मन को तफ्सील से उकेर पाना सिनेमा के किसी भी लेखक के लिए सबसे मुश्किल लिखाई कहलाएगी.

फिल्म में कई सीन आपको बेवजह भी लगेंगे – जैसे सीता और रामायाण वाला सब-प्लॉट– लेकिन किरदार के माइंडस्पेस को जानने के लिए ये बेहद दिलचस्प दृश्य हैं. अगर आप एक्यूट साइकोसिस नामक बीमारी के लक्षणों से वाकिफ हैं या गूगल करने में वक्त नहीं लगाते हैं (कल्पना और यथार्थ में फर्क न कर पाना, भ्रम की स्थिति में रहना, आवाजें सुनना, अदृश्य लोगों से बात करना आदि), तो आपको फिल्म में कई जगह उसका सही चित्रण करने वाले ऐसे कई सारे सीन मिलेंगे. इसलिए हमने पहले कहा कि इस फिल्म को एक से ज्यादा बार देखा जाना चाहिए, क्योंकि इसकी विजुअल भाषा वाकई परतदार है और एक बार में नहीं उधेड़ी जा सकती.

कंगना रनोट के अभिनय के बारे में शुरुआती समझ यह जरूर बनती है कि यह उनके लिए एक आसान किरदार है क्योंकि वे ऐसे अति में डूबे किरदार करने में सिद्धहस्त रही हैं. लेकिन चूंकि फिल्म परतदार है, बहु-आयामी है, और सीधी-सरल कहानी नहीं कहती बल्कि एक तरह से बॉबी के किरदार की कैरेक्टर-स्टडी भी है, इसलिए यह किरदार अभिनीत करने में कतई आसान नहीं रहा होगा. कंगना की काबिलियत है कि उनका अभिनय किरदार की ग्रोथ के हिसाब से कंसिस्टेंट रहता है और आपको कभी नहीं लगता कि वे अपनी बनी-बनाई एक छवि को भुना रही हैं. हमेशा लगता है कि वे बॉबी के पात्र को ही सजीव कर रही हैं. उनके अभिनय को सलाम!

इसमें भी कोई शक नहीं कि इस कदर पागलपन में रचा-बसा किरदार अभिनीत करने की चुनौती को स्वीकारना किसी भी टॉप एक्ट्रेस के लिए आसान नहीं है. ऐसे रिस्की किरदार जिनसे दर्शकों को अंत तक लगाव न रहे आज की तारीख में कम ही एक्ट्रेस अटेम्प्ट करने की हिम्मत रखेंगी. ये कंगना रनोट का साहस है कि वे दिलचस्प और अनोखी कहानियों का हिस्सा बनने के लिए नायिकाओं से जुड़े नियम-कायदों को ताक पर रखने के लिए सदैव तैयार रहती हैं.

हालांकि, उनकी एक शरारत यह भी पकड़ में आती है कि वे इस फिल्म को थोड़ा-सा आत्मकथात्मक स्वर देती हैं! यही इस अनोखी फिल्म की सबसे बड़ी कमी भी है. जो भी दर्शक कंगना की सार्वजनिक लड़ाइयों के बारे में जानता होगा, उन्हें पागल कहकर खारिज करने वाले बॉलीवुड सितारों की खबरों से वाकिफ होगा, वह समझ जाएगा कि फिल्म का अंत क्या होगा. भले ही फिल्म आपको आखिर तक उलझाए रखने में एकदम सफल सिद्ध होगी लेकिन फिर भी आपने अंत का जो अंदाजा लगाया होगा वह वैसा ही निकलेगा.

कंगना इन दिनों अपनी हर फिल्म में ऑटोबायोग्राफिकल तथ्य डालने लगी हैं, और अब जिस स्तर पर यह आदत पहुंच चुकी है वह सिनेमा की पावन सुंदरता के हिसाब से थोड़ा आत्ममुग्ध कदम ही कहा जाएगा. फिल्म के अंत में कंगना का एक वॉयस-ओवर भी है जो किसी सदगुरु की तरह प्रवचननुमा होकर वही कहता है जो कंगना अपने बारे में हर उपलब्ध सार्वजनिक मंच से कहना पसंद करती हैं.

राजकुमार राव भी क्या ही कमाल एक्टर हैं! कंगना के होने से उन्हें इस फिल्म में थोड़ा कम तारीफों से संतोष करना पड़ेगा, लेकिन कटु सत्य यही है कि अगर वे केशव के किरदार को रहस्य का मजबूत गुरुत्वाकर्षण और विरोधाभास नहीं देते तो कंगना का किरदार इतना निखर कर नहीं आता. केशव के पात्र में अंत तक उनका काम देखने लायक है और आम इंसान के रूप में रहते हुए भी वे अपने किरदार को कई दिलचस्प शेड्स से नवाजते हैं. उनके लिए, कंगना के लिए और सबसे जरूरी एक अनोखी विजुअल स्टोरीटेलिंग के लिए ‘जजमेंटल है क्या’ जरूर देखिए.

शुद्ध सिनेमा पर मेंटल होने वालों के लिए यह एकदम उपयुक्त फिल्म है!

Play