आजकल नरेंद्र मोदी सरकार के एक वरिष्ठ अधिकारी सुभाष चंद्र गर्ग चर्चाओं में हैं. चर्चा की वजह यह है कि उन्हें आर्थिक मामलों के सचिव के पद से हटाकर ऊर्जा विभाग का सचिव बना दिया गया है. सुभाष चंद्र गर्ग की चर्चा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बहुत विश्वस्त अधिकारियों में होती रही हो, ऐसा नहीं है. लेकिन पिछली और इस मोदी सरकार में भी बजट आने तक वे बहुत सशक्त अधिकारी रहे, इस बात से शायद ही किसी को इनकार हो. आरबीआई के साथ सरकार के विवाद के दौरान सरकारी मोर्चेबंदी के प्रमुख सिपहसालार सुभाष चंद्र गर्ग ही थे. फिर, इस सशक्त नौकरशाह के तबादले की वजह क्या रही? क्या वजह है कि इसके बाद उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए आवेदन किया है - वित्त मंत्री की नाराजगी, पीएमओ की नाखुशी या आरएसएस की नाराजगी?

सुभाष चंद्र गर्ग आर्थिक मामलों के सचिव के तौर पर राजकोषीय नीति और आरबीआई से संबंधित मामलों के प्रभारी थे. ऐसे समय में जब सरकार आर्थिक मोर्चे पर तमाम मुश्किलों से जूझ रही है तब एकाएक गर्ग को हटाने का फैसला चौंकाने वाला था. यह मसला तब और पेंचीदा हो गया जब अपने तबादले के अगले ही दिन उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (वीआरएस ) के लिए आवेदन कर दिया. तबादले का फैसला और वीआरएस का आवेदन एकदम क्रिया-प्रतिक्रिया की तरह आया. इसका मतलब यह निकाला गया कि सुभाष चंद्र गर्ग सरकार के फैसले से नाराज हैं. हालांकि, उन्होंने इन बातों से इनकार किया है.

मोदी सरकार के पिछले कार्यकाल में आरबीआई के आरक्षित कोष से सरप्लस की मांग को लेकर सुभाष चंद्र गर्ग जिस तरह खुलकर सामने आए, वैसा करने से नौकरशाह आम तौर पर बचते हैं. जब यह विवाद गहराया तब आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य का कहना था कि कई देशों ने केंद्रीय बैंक के रिजर्व के साथ इस तरह के प्रयोग किए हैं और वे बुरी तरह असफल रहे हैं. अगर भारत ऐसा करता है तो उसे भी बाजार का कोप झेलने के लिए तैयार रहना चाहिए. विरल आचार्य का यह भाषण खासा चर्चित रहा. लेकिन, सुभाष चंद्र गर्ग ने विरल के भाषण का मजाक उड़ाते हुए कुछ आंकड़ों के साथ ट्वीट किया कि कहां है बाजार का कोप?

उर्जित पटेल के कार्यकाल में ही आरबीआई ने एनपीए के बोझ से दबे कई सार्वजनिक बैंकों के कर्ज बंटाने पर रोक लगा दी थी. चुनावी साल होने के कारण उस वक्त वित्त मंत्रालय और केंद्रीय बैंक के बीच तनाव चरम पर पहुंच गया था. तब तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने आरबीआई गवर्नर को धारा 7 (इसके तहत आरबीआई गवर्नर को वित्त मंत्रालय के निर्देश मानने ही पड़ते हैं) लागू करने की चेतावनी दी. सूत्रों के मुताबिक, इसके सूत्रधार भी सुभाष चंद्र गर्ग ही थे.

उनकी यह आक्रामक कार्यशैली आरबीआई सरप्लस के लिए बनी बिमल जालान कमेटी तक में नजर आई. कमेटी के ज्यादातर सदस्य सरकार को किश्तों में सरप्लस देने पर राजी हैं. लेकिन इस कमेटी के सदस्यों में से एक गर्ग एकमुश्त रकम की बात पर अड़े हैं. इसके चलते उन्होंने अभी तक कमेटी की रिपोर्ट पर दस्तखत नहीं किए हैं.

इन सभी बातों के आधार पर साफ तौर पर कहा जा सकता है कि मोदी सरकार में उन्हें कितना फ्री हैंड मिला हुआ था और इसके चलते वे कितने आत्मविश्वास से भरे रहा करते थे. फिर, वित्त मंत्रालय की ऐसी ताकतवर शख्सियत का एकाएक तबादला क्यों हो जाता है? वह भी तब जब पांच जुलाई को बजट पेश होने तक सबकुछ अच्छा-भला दिख रहा था!

जानकार, इसकी तात्कालिक वजह बजट के उस प्रावधान को मान रहे हैं जिसमें कहा गया है कि धन की कमी को दूर करने के लिए सरकार अंतरराष्ट्रीय बाजार से विदेशी कर्ज जुटाएगी. दरअसल, बजट की इस घोषणा के बाद से ही सरकार के इस प्रस्ताव की जोरदार आलोचना शुरु हो गई. रघुराम राजन, सी रंगराजन जैसे कई पूर्व आरबीआई गवर्नरों ने सॉवरिन बॉन्ड की इस योजना को खतरनाक बताया. दिलचस्प बात यह थी कि आलोचना करने वालों में सिर्फ वे नहीं थे जो आम तौर पर मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों की आलोचना करते हैं. बल्कि सरकार समर्थक अर्थशास्त्रियों को भी यह प्रस्ताव नहीं जमा. सरकारी थिंक टैंक नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस के डायरेक्टर रॉथिन राय ने भी कहा कि सॉवरिन बांड जारी कर विदेशी मुद्रा में कर्ज लेने के बारे में मेरी चिंताएं भी आरबीआई के पूर्व गवर्नरों जैसी ही हैं. प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार समिति के सदस्य विवेक देबरॉय ने भी इस प्रस्ताव से असहमति जताई. पर, इन सब बातों से सुभाष चंद्र गर्ग के तबादले का क्या संबंध? इस पर चर्चा से पहले विदेश से कर्ज लेने की इस योजना पर चर्चा कर लेते हैं.

आखिर सॉवरिन बांड हैं क्या? सरकार इन बॉन्ड्स के जरिये विदेश से लिए गए कर्ज के बदले हर साल इसे देने वाले कोे एक तय रकम देने का वादा करती है. अर्थशास्त्रियों का मानना है कि उन देशों को विदेशों में सॉवरिन बांड नहीं जारी करने चाहिए जिनकी मुद्रा अंतरराष्ट्रीय बाजार में कमजोर या बहुत उतार-चढ़ाव वाली हो. ये कर्ज विदेशी मुद्रा में लिए जाएंगे और विदेशी मुद्रा में ही चुकाए जाएंगे. ऐसे में अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में रुपये की कीमत गिरी तो हमें ब्याज और मूलधन के रूप में बड़ी रकम चुकानी पड़ेगी. जानकार मानते हैं कि बड़ी मात्रा में ऐसा विदेशी कर्ज लेने से भारत कर्ज के दुष्चक्र में फंस सकता है. इसीलिए 2013 में इस तरह के बांड लाने का विचार त्याग दिया गया था.

अर्थशास्त्रियों के साथ-साथ आरएसएस की आर्थिक इकाई स्वदेशी जागरण मंच की भी इस प्रस्ताव पर त्योरियां चढ़ गईं. स्वदेशी जागरण मंच के संयोजक अश्विनी महाजन ने अपने एक लेख में कहा कि इंडोनेशिया, ब्राजील, अर्जेंटीना, तुर्की और मेक्सिको जैसे देश विदेशी बाजार से कर्ज लेने के दुष्चक्र में ऐसा फंसे हैं कि कई देशों का विदेशी कर्ज इनकी जीडीपी के 50 फीसद से ज्यादा तक हो गया है. ऐसे में विदेशी मुद्रा में कर्ज जुटाने की यह योजना समझ से परे है.

बताया जाता है कि बजट में घोषित इस विचार के पीछे सुभाष चंद्र गर्ग का ही दिमाग था. आरएसएस समर्थित स्वदेशी लॉबी भी इसका पूरा दोष उनके ही सर पर मढ़ रही है. उसके ऐसा करने की कुछ वजहें भी नजर आती हैं. बजट आने के बाद सुभाष चंद्र गर्ग ने मीडिया से बातचीत में इस योजना की खासी पैरवी की थी. सुभाष चंद्र गर्ग का तर्क था कि सरकार अगर कर्ज के लिए घरेलू बाजार में जाएगी तो वह और महंगा हो जाएगा और उससे उद्योगों को खासी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा. वैसे भी भारत का कर्ज बाजार नगदी के संकट से जूझ रहा है. इसलिए चालू वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में सॉवरिन बांड जारी कर सरकार विदेशी बाजारों से कर्ज जुटाएगी.

ये सभी बातें अपनी जगह हैं, लेकिन क्या सॉवरिन बांड से जुड़ी आशंकाओं का अंदाजा तत्कालीन आर्थिक मामलों के सचिव को नहीं था? जानकारों के मुताबिक बतौर सुभाष चंद्र गर्ग उस समय सरकार की फौरी बजटीय चिंताओं को देख रहे थे. पांच ट्रिलियन अर्थव्यवस्था के लिए भारी-भरकम निवेश की जरूरत है. इसलिए उन्होंने विदेशी बांड से होने वाले नफे का तो ध्यान रखा, लेकिन उसके नुकसान से जुड़ों पक्षों पर वित्त मंत्री से चर्चा करना शायद उचित नहीं समझा. इसके बाद आर्थिक जानकारों के साथ-साथ जब स्वदेशी जागरण मंच और आरएसएस ने सॉवरिन बांड से जुड़ी आशंकाओं को लेकर सरकार को घेरा तो वित्त मंत्री या पीएमओ के पास इनका कोई ठोस जवाब नहीं था.

बजट के इस प्रस्ताव की वजह से यह धारणा बन रही थी कि सरकार में गहन विचार-विमर्श के बजाय एकाएक फैसले ले लिया जाते हैं और बजट जैसे महत्वपूर्ण दस्तावेज में भी उनका उल्लेख कर दिया जाता है. इस वजह से 25 जुलाई को पीएमओ ने भी इस प्रस्ताव पर अपनी आपत्ति जाहिर करते हुए इसका पूरा ब्यौरा मांगा. सूत्रों के मुताबिक, सॉवरिन बॉन्ड योजना को लेकर मोदी सरकार की असहजता का जिम्मेदार सुभाष चंद्र गर्ग को माना गया और नतीजा उनके तबादले के तौर पर आया.

नौकरशाही में तबादले सामान्य हैं. लेकिन उसके बाद नौकरी छोड़ने की अनुमति मांगना उतनी सामान्य बात नहीं है. सुभाष चंद्र गर्ग के तबादले की वजह सॉवरेन बांड स्कीम है या कुछ और, यह अलग बात है. लेकिन, यह प्रकरण यह जरूर बताता है कि सत्ता के गलियारे में कब कौन आप्रासंगिक हो जाए कुछ नहीं कहा जा सकता है.

स्वदेशी जागरण मंच के संयोजक अश्विन महाजन के एक ट्वीट से यह बात समझी जा सकती है. इसमें महाजन ने सुभाष चंद्र गर्ग पर कुछ उसी अंदाज में तंज कसा है, जैसा कभी गर्ग ने आरबीआई के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य पर कसा था. गर्ग के तबादले के बाद महाजन ने अपने ट्वीट में कहा कि ‘मुझे ऐसा लगता है कि विदेश कर्ज के उनके (सुभाष चंद्र गर्ग) ‘अद्भुत विचार’ के लिए उन्हें पुरस्कृत किया गया है.’

महाजन का तंज तबादले तक नहीं रुका, उन्होंने आगे यह भी कहा कि मोदी सरकार को कुछ ‘ओवर परफार्मिंग’ अधिकारियों को अनिवार्य सेवानिवृत्ति देने के बारे में भी सोचना चाहिए.