पहला विनोद मेहता स्मृति व्याख्यान देते हुए समाजचिन्तक और राजनैतिक सिद्धान्तकार प्रताप भानु मेहता ने अपने ‘उदारवाद का अंत’ शीर्षक वाले सुविचारित व्याख्यान में शुरू में ही स्पष्ट किया कि उदारवाद के लिए वर्तमान शोकगीत नया या अप्रत्याशित नहीं है. उनका कहना था कि उदारवाद के अंत की घोषणा पिछली सदी के तीसरे दशक से लगातार की जाती रही है. हाल में रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने यह घोषणा बहुत आत्मविश्वास से की है. कुछ इस भाव से कि उदारवाद अब पुनर्जीवित कभी नहीं हो पायेगा. यह प्रश्न उठता है कि क्या हम ऐसे मुक़ाम पर पहुंच गये हैं जब उदारवाद निजी, संस्थागत और राजनैतिक विचार के स्तर पर एक नियामक तत्व के रूप में अनुपयोगी हो गया है.

डॉ. मेहता ने उदारवाद की विफलता का एक बड़ा और पहला कारण यह बताया कि उदारवाद विफल हुआ क्योंकि वह सफल हुआ. एक उदीयमान विचारधारा के रूप में वह मुक्तिदायी था पर जब वह वर्चस्व वाला विचार बन गया तो वह जो भी छूता है उसका लक्ष्य से उलटा नतीजा निकलता है. बाज़ार को उदार बनाना ठीक था पर यह उदारता अपने चरम पर पहुंचकर अब हर कुछ को चीज़ में बदलने पर उतारू हो गयी है. हर उदार सिद्धांत अपने चरम पर अपना ही विलोम हो जाता है. उदारवाद ने एक ओर तो सब कुछ को शामिल करने का लक्ष्य रखा पर व्यवहार में वह बहुतों, बहुत समुदायों को बाहर रखे रहा या वे बाहर किये जाते रहे.

डॉ. मेहता ने चीन के बढ़ते वर्चस्व और प्रभाव का ज़िक्र करते हुए बताया कि चीन में धीरे-धीरे राज्य निगरानी की व्यवस्था इस तरह नियमित कर रहा है कि हर नागरिक राज्य के सामने पूरी तरह से पारदर्शी हो जाये. उसका सब कुछ राज्य की जानकारी में हो. ऐसा निगरानी-राज्य धीरे-धीरे चीन की अन्यथा आर्थिक सफलता के कारण अनुकरणीय भी हो जा सकता है. संसार के कई देशों में, जिनमें भारत भी शामिल है, निगरानी की व्यवस्था फैलायी और सख़्त की जा रही है. उदारवाद द्वारा प्रतिपादित पारदर्शिता का यह भयानक चरम और विद्रूप है.

एक प्रश्न के उत्तर में डॉ. मेहता ने कहा कि हमें संसार में और देश में जो परिवर्तन हो रहे हैं उन्हें ठीक और वस्तुनिष्ठता से समझने की कोशिश करना चाहिये. अकसर ये परिवर्तन हमारे अपने विचार के विरुद्ध भी हो सकते हैं. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में उन्होंने कहा कि यह हमें अन-देखा नहीं करना चाहिये कि उसने इधर लचीलापन दिखाया है और गांधी-अम्बेडकर-पटेल आदि का समावेश उसी का नतीजा है. दूसरे, संघ ने जो सांस्कृतिक आधार विकसित किया है वह लंबे समय के लिए टिकाऊ रहनेवाला है और चुनाव की राजनीति के परिणामों से वह अप्रभावित रहेगा. उन्हें लगता है कि उदारवाद की कई बातों को, वाम के कुछ समाजवादी तत्वों को लोकप्रियतावादी (पापुलिस्ट) शक्तियां मज़े से समाहित कर सकती हैं. उदारवाद को यह एक और चुनौती है. एक खरे बुद्धिजीवी की तरह डॉ. मेहता ने कोई निदान बताने या संदेश देने से इनकार कर दिया.

कविता की मुक्ति

कविता की मुक्ति का ऐसा लक्ष्य है जो अकसर कवि ही साधते रहे हैं. नयी कविता का यह दावा था कि उसने हिंदी कविता को छायावादी वायवीयता और वाग्वैभव से मुक्त किया. प्रगतिशील कविता की कोशिश थी कि कविता नितांत निजीपन से मुक्त होकर सामाजिक यथार्थ के इलाके में सक्रिय-मुखर हो. छंद की जकड़ से भी कविता को मुक्त किया गया और नाम पड़ा मुक्त छंद. हर मुक्ति में कुछ अपवर्जन भी थे पर सबका दावा समावेशिता का था.

कविता को पुस्तकों में महदूद रहने या कि शिक्षा व्यवस्था का बंदी बने रहने की स्थिति से मुक्त करने की कोशिश यदा-कदा होती रहती है. पिछले कुछ दशकों में कवि सम्मेलन इतनी घटिया-हंसोड़-मनोरंजक कविता के व्यापक मंच बन गये कि अच्छी-सच्ची कविता को उनसे मुक्त ज़्यादातर इस मंच पर अनुपस्थित रहकर करना पड़ा. अनेक आलोचक यह मानते-कहते रहे हैं कि कविता को दुर्व्याख्या-विष से बचाना ज़रूरी है पर ऐसे कम हैं जिन्होंने ऐसा आलोचनात्मक प्रयत्न किया हो.

इस संदर्भ में हाल ही में दो फ्रेंच अभिनेताओं से मुलाक़ात दिलचस्प रही जो कविता को पुस्तकों, संस्थाओं, सभागारों आदि से मुक्त कर सड़कों पर लाने का एक अभियान चला रहे हैं. उनकी पद्धति यह है कि वे जिस देश में होते हैं उस देश के कवियों से मिलकर उनकी कविताएं चुनते हैं और फिर उनका सावर्जनिक जगहों जैसे सड़क, मुहल्ले के चौक, पार्क आदि में पाठ करते हैं. स्थानीय लोगों को ऐसे आयोजन में पाठ करने के लिए शामिल भी करते हैं. कविताओं के बैनर और पोस्टर भी बनाते हैं. उनका एक स्पष्ट लक्ष्य कविताओं को श्रव्य बनाना और अप्रत्याशित लोगों के बीच ले जाना है. उनका ज़ोर कविता पढ़ने पर नहीं, कविता सुनने-सुनाने पर है. कलाकार-युग्म अपने भारत दौरे पर है और हो सकता है कि बाद में प्रदर्शन और प्रस्तुति के लिए भारत का दौरा करे. रज़ा फ़ाउंडेशन उनके साथ इस अभियान में सहायता-सहयोग करेगा.

हमारे यहां कविता के पाठ के कुछ प्रयत्न हुए हैं. पहले रघुवीर सहाय और फिर उनसे प्रेरित ‘लिखावट’ ने इस संदर्भ में उल्लेखनीय पहल और काम किये. याद आता है कि दिवंगत अलखनंदन के दशकों पहले भारत भवन की सीढ़ियों पर वहां के रंगमंडस के अभिनेताओं के साथ श्रीकांत वर्मा के ‘मगध’ की कविताओं के नाट्यपाठ की बहुत प्रभावशाली प्रस्तुति की थी. रंगमंडल के एक सदस्य रहे राजकमल नायक इन दिनों रायपुर में ऐसी कविता-आधारित प्रस्तुतियां लगातार कर रहे हैं. राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय ने भी कविता के ऐसे नाट्यपाठ के आयोजन किये हैं. फ्रेंच कलाकार एक तरह से नुक्कड़ कविता का प्रयत्न कर रहे हैं. इस समय देश में जिस तरह का माहौल है उसमें नुक्कड़ कविता का आंदोलन चलाना बहुत कारगर हो सकता है, भले उसमें भक्तगण तरह-तरह की बाधाएं डालने से बाज़ नहीं आयेंगे. कई बार लगता है कि अच्छी, प्रश्नवाचक कविता साधारण नागरिकों के सुनने में आये तो उनकी सोच, संवेदना और समझ बदल सकती हैं. कम से कम विचलित या बेचैन तो हो सकती हैं. और इतना भी इस मुक़ाम पर कम नहीं होगा.

नदी किनारे कविता

नर्मदा जी के बारे में कई कथाएं, किंवदन्तियां प्रचलित हैं. नर्मदा को परंपरा में ‘सर्वत्र पुण्या नर्मदा’ कहा गया है. वे ‘उभयतटतीर्था’ भी बतायी जाती हैं. इधर की कविता में प्रकृति कम होती गयी है- उसमें नर्मदा को लेकर कुछ स्मरणीय है तो वह यहां मंडला में नर्मदा जी के किनारे बैठे भी ख़याल में नहीं आ रहा है.

इस बार ‘रज़ा स्मृति’ में कला, नृत्य और संगीत के अलावा कविता-पाठ का भी आयोजन हुआ. नर्मदा में पानी धीरे-धीरे बढ़ रहा है- ख़ासा मटमैला है. इन दिनों वह लगभग बाढ़ में थी. हमें अपने कार्यक्रम के लिए जो खुली पर ऊपर से ढंकी जगह मिली है पिछले वर्ष नर्मदा उसके बिलकुल पास से करीब डेढ़ फुट नीचे से बह रही थी. इस बार जल स्तर उतना उठना बाक़ी है.

कविता पाठ मंडला के नागरिकों के लिए अप्रत्याशित ही था. मलय, बाबुशा कोहली और महेश वर्मा की कविताएं अलग-अलग तरह की तो थीं पर उनमें दी हुई सचाई का प्रश्नांकन था, बेचैनी और तनाव का अन्वेषण था- भाषा की भंगिमाएं अलग-अलग थीं. वे हिन्दी की तीन पीढ़ियों के कवियों की रचनाएं थीं. मलय तथाकथित समाज निष्ठा के कवि हैं, बाबुशा में उच्छल विडम्बना-बोध है जो आह्लादित भी करता है. महेश अपनी कविता में शांत स्पेस रचते हैं.

श्रोताओं ने कविताएं धीरज से सुनीं- जहां उन्हें कुछ उद्वेलन हुआ उन्होंने तालियां भी बजायीं. कविता-पाठ के पहले स्थल पर कुमार गंधर्व के भजन बज रहे थे. पाठ शुरू होने से पहले के पद का मुखड़ा था, ‘सखिया वा घर सबसे न्यारा’. पाठ समाप्त होने पर कुछ श्रोताओं ने यह ज़रूर, भले अस्पष्ट सा, महसूस किया होगा कि कविता भी एक न्यारा घर है, सबसे न्यारा नहीं पर सबके बीच बसा हुआ, खुले दरवाज़ों और खिड़कियों वाला जिसमें कोई भी बेरोक टोक जा सकता है. बंदिशों, चौकसियों और निगरानियों के बढ़ते आतंक में यह बड़ी बात है.