राम बहादुर छेत्री आजकल काफी परेशान हैं और इस दौरान वक्त-बेवक्त अपने तमाम परिचितों को फोन मिलाते रहते हैं. इस बारे में वे कहते हैं, ‘अभी मैं जिस तरह के मानसिक दबाव से गुजर रहा हूं, वैसा किसी के साथ न हो.’ असम में बक्सा जिले के एक प्राथमिक स्कूल में शिक्षक 55 साल के राम बहादुर की इस परेशानी की वजह है – राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर यानी एनआरसी. भारत सरकार एनआरसी के जरिए असम में रहने वाले वैध नागरिकों की पहचान कर रही है और इसमें उनके नाम दर्ज किए जा रहे हैं. एनआरसी में अपना नाम दर्ज करवाने के लिए आवेदक को यह साबित करना पड़ता है कि वह या उसके पूर्वज 24 मार्च 1971, की मध्यरात्रि यानी बांग्लादेश युद्ध शुरू होने से पहले भारत में आ चुके थे.

राम बहादुर का नाम पिछले साल एनआरसी में आ चुका था, लेकिन उन्हें बीते महीने सरकारी सूचना मिली कि ऐसा गलती से हो गया था. जुलाई 2018 में एनआरसी की अंतिम मसौदा सूची प्रकाशित हुई थी जिसमें 3.29 करोड़ आवेदकों में से करीब 40 लाख लोगों के नाम शामिल नहीं थे. वहीं इस साल 26 जून को इनमें से भी 1.02 लाख लोगों के नामों को एनआरसी से हटा दिया गया. राम बहादुर इन्हीं लोगों में से एक हैं.

फोटो : अरुणाभ
राम बहादुर छेत्री

एनआरसी मसौदे से जिन लोगों के नाम हटाए गए उनकी एक अतिरिक्त सूची प्रकाशित की गई थी जिसमें राम बहादुर छेत्री का नाम था. एनआरसी अधिकारियों के मुताबिक इसमें उन लोगों के नाम शामिल हैं जिन्हें या तो ट्रिब्यूनल ने विदेशी घोषित किया है या फिर जिनका मामला अभी लंबित है. साथ ही इसमें वे लोग भी शामिल हैं जिनके मतदाता पहचान पत्र पर चुनाव आयोग ने ‘डी’ (डाउटफुल या संदिग्ध) दर्ज कर उन्हें मतदान के लिए अयोग्य ठहरा दिया है. इन पर संदेह है कि ये बांग्लादेश से आए वे लोग हैं जिनके पास भारत में प्रवेश से जुड़ा कोई दस्तावेज नहीं है. लेकिन राम बहादुर इनमें से किसी भी वर्ग में शामिल नहीं हैं.

राम बहादुर छेत्री की जिंदगी में यह आफत कैसे आई

जिन लोगों का नाम जुलाई 2018 में एनआरसी की मसौदा सूची में शामिल नहीं हो पाया था, उन्हें नागरिकता के लिए दोबारा आवेदन देना था. राम बहादुर की बड़ी बहन का नाम भी इस सूची में नहीं था और उन्होंने नियमों के मुताबिक एक बार फिर से आवेदन दिया. इस मामले पर हुई सुनवाई में उनके दावे की सच्चाई जांचने के लिए बतौर गवाह राम बहादुर को भी बुलाया गया. उन्होंने वहां इस बात की पुष्टि की कि वे उनके पिता गोपी राम छेत्री की ही बेटी और उनकी बहन हैं. इन दोनों ने आवेदन में गोपी राम छेत्री को अपना ‘लीगेसी पर्सन’ घोषित किया है. लीगेसी पर्सन संबंधित व्यक्ति का वह पूर्वज है जो 1971 से पहले भारत में आकर बस गया था. दिलचस्प बात यह है कि 1951 में जो एनआरसी तैयार हुआ था उसमें गोपी राम छेत्री का नाम शामिल है.

राम बहादुर छेत्री और उनकी बहन के अलावा वहां सुनवाई के दौरान इनके तीन और भाई भी मौजूद थे और सभी ने वहां लगभग एक जैसी ही बातें कहीं. लेकिन वहां उपस्थित अधिकारी का कहना था कि इन सभी की बहन ने अपने आवेदन में जो उम्र लिखी है, वह उनके दावे के हिसाब से तर्कसंगत नहीं लगती. इस हवाले से राम बहादुर बताते हैं, ‘दस्तावेजों के मुताबिक गोपी राम मेरी बहन के पिता होने के लिहाज से काफी छोटे थे. लेकिन यह छोटी सी चूक थी. सभी जानते हैं कि उस जमाने में उम्र वगैरह हमेशा सही नहीं लिखी होती थीं.’

आखिरकार सुनवाई के दौरान वह अधिकारी उनकी बहन के मामले को लेकर सहमत नहीं हुआ. राम बहादुर बताते हैं कि तब उन्हें इस बात का अंदाजा नहीं था कि अब खुद उनकी नागरिकता सवालों के घेरे में आ जाएगी. इस सबके बाद उन्होंने अपनी पहचान तय करवाने के लिए अधिकारी को कई सारे दस्तावेजों की असल प्रतियां दिखाईं. इन दस्तावेजों में दसवीं कक्षा का प्रमाण पत्र और मतदाता पहचान पत्र भी था. फिर भी उनका दावा निरस्त कर दिया गया. उनसे कहा गया कि ‘लीगेसी पर्सन उनका माता-पिता/दादा-नाना/पड़दादा/पड़नाना’ नहीं है और उन्होंने गोपी राम छेत्री को लेकर झूठ बोला था.

इस पूरे मामले में एक गजब का विरोधाभास भी है

राम बहादुर छेत्री के साथ उनकी बेटी का नागरिकता दावा भी खारिज किया गया है. लेकिन दिलचस्प बात यह है कि उनका बेटा, जिसके दस्तावेजों में लीगेसी पर्सन के रूप में गोपी राम छेत्री का ही नाम दर्ज है, एनआरसी की सूची में शामिल है. दूसरे शब्दों में कहें तो एनआरसी अधिकारी यह तो मानते हैं कि राम बहादुर का बेटा गोपी राम का पोता है, लेकिन उन्हें वे गोपी राम का बेटा नहीं मानते.

राम बहादुर छेत्री नेपाली बोलने वाले गोरखा समुदाय से आते हैं और इस समुदाय की भारत में बड़ी गहरी जड़ें हैं. लेकिन अब अपनी भारतीयता पर अचानक सवाल खड़े हो जाने से वे काफी परेशान हैं. ‘मेरे पिता स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे’ राम बहादुर बताते हैं, ‘मेरा जन्म यहीं हुआ और मैंने अब तक की अपनी पूरी जिंदगी यहीं बिताई है. 33 साल से मैं बच्चों को असमिया पढ़ा रहा हूं और इसका बदला मुझे इस तरह मिला है.’ इस मामले पर असम गोरखा छात्र संगठन के अध्यक्ष प्रेम तमांग कहते हैं, ‘यह एनआरसी के उस अधिकारी के दुराग्रहों का नतीजा है. उसके पास इस बात को लेकर शायद अपनी ही एक अलग सोच-समझ है कि किसे एनआरसी का हिस्सा होना चाहिए और किसे नहीं.’

राम बहादुर छेत्री की तरह ही एनआरसी से जुड़ा हुआ एक मामला 33 वर्षीय अब्दुल जुब्बा का भी है. वे दर्रांग जिले के गांव बिलपर के एक किसान परिवार से ताल्लुक रखते हैं. अब्दुल ने जब पहली बार एनआरसी के बारे में सुना तो वे खुश हुए थे कि अब उन लोगों के मुंह बंद हो जाएंगे जो उन जैसे बंगाली बोलने वालों की नागरिकता पर सवाल उठाते हैं. लेकिन उनकी यह खुशी उस वक्त काफूर हो गई जब बीते महीने उन्हें भी पता चला कि उनका नाम एनआरसी की मसौदा सूची से हटा दिया गया है. जबकि जुलाई 2018 में राम बहादुर की तरह उनका नाम भी इसमें शामिल था. अब्दुल भी 26 जून को एनआरसी अधिकारियों द्वारा जारी 1.02 लाख उन लोगों की सूची में हैं जिनका नाम ‘गलती’ से मसौदा सूची में आ गया था.

एनआरसी अधिकारियों के मुताबिक अब्दुल ने अपने दादा को लीगेसी पर्सन घोषित किया था लेकिन उनका यह दावा स्वीकार नहीं किया गया. अब्दुल के दादा का नाम 1966 की मतदाता सूचियों में है. उनसे अपना संबंध साबित करने के लिए अब्दुल ने अधिकारियों के सामने अपनी हाई स्कूल की परीक्षा का प्रवेश पत्र जिसमें उनके पिता का नाम था, और अपने दादा का मतदाता पहचान पत्र भी जमा किया था.

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अब्दुल जुब्बा

दावा पहले स्वीकार कर लिया गया था

अब्दुल का नाम जुलाई 2018 की मसौदा सूची में आने का मतलब था कि एनआरसी अधिकारियों ने उनके दस्तावेजों की जांच करने के बाद उन्हें विश्वसनीय माना था. तो अब सवाल है कि अचानक यही दस्तावेज ‘अस्वीकार्य’ कैसे हो गए?

दरअसल अब्दुल के परिवार के कुछ सदस्यों का नाम भी जुलाई 2018 की सूची में नहीं आ पाया था. इनके लीगेसी पर्सन भी अब्दुल के दादा ही हैं. एनआरसी अधिकारियों के सामने जब इनके मामले की सुनवाई हुई तो राम बहादुर की तरह अब्दुल भी बतौर गवाह वहां पेश हुए थे. लेकिन शायद इस दौरान जिस अधिकारी को इन दावों की जांच करनी थी उसने अब्दुल के दस्तावेजों में कोई गड़बड़ी पाई और इसके बाद यह फैसला दिया गया कि वे वह व्यक्ति नहीं हैं जो होने का दावा कर रहे हैं. अब्दुल कहते हैं कि तब उस अधिकारी ने यह नहीं बताया कि उनके दस्तावेजों में कोई दिक्कत थी और न ही उसने पहचान साबित करने के लिए उनसे कोई अतिरिक्त सबूत मांगे.

अब्दुल और राम बहादुर छेत्री ने एनआरसी में अपना नाम दर्ज करवाने के लिए नए सिरे से आवेदन किया है. अब वे कोई जोखिम नहीं लेना चाहते. अब्दुल बताते हैं, ‘इस बार मैं अपना पैन कार्ड, पासपोर्ट और मतदाता पहचान पत्र भी जमा करूंगा.’

दोनों को अब 31 अगस्त को एनआरसी की अंतिम सूची प्रकाशित होने के बाद ही पता चलेगा कि इसमें उनका नाम है या नहीं. लेकिन तब तक या फिर शायद उसके बाद भी उन्हें ‘बाहरी’ व्यक्ति का तमगा अपने साथ लेकर ही चलना होगा.