समझने वाली बात है कि कला भी आलोचना है और आलोचना भी एक कला है. अंग्रेजी में इस बात का मर्म समझाने वाले लेख आपको आसानी से इंटरनेट पर मिल जाएंगे –‘आर्ट एज क्रिटिसिज्म एंड क्रिटिसिज्म एज आर्ट.’

यानी कि कला के माध्यम से जहां आप समाज की, राजनीति की, कुरीतियों की, असमानता की आलोचना कर सकते हैं, वहीं मुख्तलिफ विषयों से जुड़ी ऐसी आलोचना करना भी अपने आप में एक कला है. आज के असहिष्णु समय में यह बात समझना बेहद जरूरी है.

हर लोकतंत्र बुद्धिजीवियों और पत्रकारों से समृद्ध होता है और उनका काम ‘जी हुजूरी’ करना नहीं होता. किसी भी चीज से जुड़े गुणों व अवगुणों का विश्लेषण कर राय देना आलोचना कहलाती है. अमेरिका जैसे मजबूत लोकतंत्र में सबसे ताकतवर माने जाने वाले राष्ट्रपति की भी सार्वजनिक रूप से आलोचना करने का अधिकार सेलिब्रिटीज से लेकर आम नागरिकों तक को रहता है. वहां आम जनता भी सड़कों पर उतर कर जॉर्ज बुश से लेकर डोनाल्ड ट्रंप तक की नीतियों का विरोध करती है और मशहूर शख्सियतें भी आपको आसानी से सोशल मीडिया पर आलोचनात्मक ट्वीट करती हुई मिल जाती हैं. मीडिया भी सभी तरह की आलोचनाओं को मंच देने का काम करता है.

तो इसका अर्थ है, दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बनने से बेहतर है कि दुनिया का सबसे बेहतर लोकतंत्र बना जाए.

हमारे यहां पहले साहित्य में आलोचना, सिनेमा में आलोचना, खेल में आलोचना, राजनीति में आलोचना का समाज में अहम स्थान होता था. हिंदी साहित्य के नामी आलोचक नामवर सिंह का यह पुराना लेख पढ़िए जो गहराई में उतरकर आलोचना की संस्कृति और संस्कृति की आलोचना पर बात करता है. लेकिन आज के तकनीकी रूप से प्रबल वक्त में सोशल मीडिया ने शोर मचाने वाले ट्वीट्स के हाथों में वह ताकत दे दी है कि वे कुतर्क के माध्यम से हर स्तर की सृजनात्मक आलोचना को धराशायी कर दे रहे हैं.

फिल्म समीक्षा को लेकर भी मखौल का एक वातावरण इन दिनों तैयार किया जा रहा है. दुनियाभर में फिल्म क्रिटिसिज्म का ओहदा काफी बड़ा माना जाता है और न्यू वेव सिनेमा जिन भी देशों में फला-फूला है वहां उसके विस्तार में फिल्मकारों के अलावा फिल्म समीक्षकों का ही अहम योगदान रहा है. फिल्म क्रिटिसिज्म से जुड़े कई लेख अमेरिकी सिनेमा में प्रचलित रहे हैं जो कि फिल्म समीक्षा को दावे के साथ एक आर्ट मानते हैं और उसके क्राफ्ट पर गहराई से बात करते हैं.

कभी वक्त मिले तो यह देसी वीडियो देखिएगा और अमेरिका के दो महानतम फिल्म समीक्षकों से जुड़े ये दो विदेशी आलेख पढ़िएगा (पहला आलेख) (दूसरा आलेख). थोड़ा और वक्त मिले तो यह विदेशी वीडियो निबंध भी देखिएगा जो मौजूदा दौर के फिल्म क्रिटिसिज्म पर बात कर रहा है. अगर धुंध छाई है तो हट जाएगी.

हमारे वक्त के साथ दिक्कत यह है कि इन दिनों हम हिंदुस्तानी आलोचना-समालोचना को तमीज से स्वीकारना बंद कर चुके हैं. बिना आलोचना शब्द का मर्म समझे इसे गाली देते हैं. आलोचना को ‘छिद्रान्वेषण’ समझने की भूल करते हैं. आलोचक को छिद्रान्वेषी समझते हैं.

छिद्रान्वेषण का अर्थ केवल अवगुण निकालना होता है, जबकि आलोचना गुण-अवगुण दोनों पर बात करती है और उसका विश्लेषणात्मक मूल्यांकन हमेशा तटस्थ होकर हासिल किया जाता है. सबसे अहम बात है कि सही आलोचना हमेशा सृजनात्मक आलोचना के रूप में आती है – कंस्ट्रक्टिव क्रिटिसिज्म – और उसका मकसद केवल बेहतरी होता है.

लेकिन, इन दिनों आलोचनाओं पर जिस तरह का रुख हमारा समाज, हमारी राजनीति, सोशल मीडिया, ट्रोल्स वगैरह अख्तियार कर रहे हैं उससे यह स्पष्ट है कि बुद्धिजीवियों का अनादर करने के बाद बतौर एक देश अब हम आलोचना को - और उन्हें करने वालों को - बर्दाश्त नहीं कर पा रहे.

एक दूसरी गौर करने वाली बात यह भी है कि हाल ही में तृणमूल कांग्रेस की नेता महुआ मोइत्रा के जिस बेहद मशहूर हो चुके भाषण में फासीवाद के शुरुआती लक्षणों (साइंस ऑफ अर्ली फासिज्म) का जिक्र हुआ था, उसमें से एक संकेत बुद्धिजीवियों और कला के तिरस्कार की बात भी करता है - डिसडेन फॉर इंटलेक्चुअल्स एंड द आर्ट्स.

और चूंकि आलोचना भी एक कला है, इसलिए हमें स्वीकारना होगा कि बुद्धिजीवियों और कला के बाद समालोचनाओं के प्रति भी हमारा देश असहिष्णु होने लगा है. लोगों का आलोचनाओं के प्रति इन दिनों आक्रामक होना, उदासीन होना, उनका मखौल उड़ाना, आलोचकों को देशद्रोही के तमगे से नवाजना एक तंग मानसिकता के फैलाव का प्रतीक है. यह मानसिकता केवल राजनीतिक चेतना (अचेतना?) से सजे प्राणियों भर में मौजूद नहीं मिल रही, बल्कि सार्वजनिक रूप से राजनीति से दूर रहने वाले आम लोगों और मशहूर शख्सियतों तक के मन-मस्तिष्क पर असर डालकर उन्हें असहिष्णु बना रही है. हमारा समाज पहले ऐसा बिलकुल नहीं था.

क्या कंगना रनोट की आलोचना करना देशद्रोह है?

हमारे नेताओं की तरह सितारे भी चाहते हैं कि मीडिया और पत्रकार केवल उनकी चरण-वंदना करें. राजनीति और हिंदी फिल्म इंडस्ट्री से पत्रकारिता का गठबंधन इतना उलझा हुआ हो चुका है कि आलोचकों के लिए अपनी आलोचना की धार को कुंद होने से बचाए रखना ही सबसे कठिन काम होता जा रहा है. सितारे किस हद तक पत्रकारों से ‘जी हुजूरी’ चाहते हैं इसका सबसे ताजा उदाहरण कंगना रनोट का शर्मनाक व्यवहार है.

मौजूदा दौर का ऐसा कोई गंभीर फिल्म समीक्षक नहीं है जिसने कंगना के आलातरीन अभिनय की तारीफें न की हों. उनकी हर अच्छी फिल्म के कसीदे न पढ़ें हो और गलत के खिलाफ की उनकी लड़ाइओं में सहभागिता न की हो. आगे भी वे ऐसा करते ही रहेंगे . लेकिन जिस भाषा का उपयोग कंगना ने अपने वीडियो में किया है वह दो चीजें स्पष्ट रूप से बता रहा है.

Play

एक ये कि ग्लैमर वर्ल्ड की पावर और हिंदुस्तानी राजनीति का साथ कंगना के सर चढ़कर इस कदर बोल रहा है – वे खुद को वीडियो में सगर्व ‘टॉप एक्ट्रेस और हाइएस्ट पेड एक्ट्रेस’बताती हैं – कि वे खुद को आलोचनाओं से परे समझने लगी हैं. वरना क्या वजह होगी कि एक पुरानी ऐतिहासिक कहानी पर आज के दौर के राष्ट्रवाद का मुलम्मा चढ़ाने वाली उनकी एक फिल्म की वाजिब आलोचनाएं करने पर (‘मणिकर्णिका’) वे पत्रकारों को देशद्रोही, दसवीं फेल, दीमक, चिंदी, नालायक, मुफ्त का खाना खाने वाले और 50-60 रुपये में बिछ और बिक जाने वाला कहतीं. क्या किसी फिल्म की आलोचना करना भी अब इस देश में एंटी-नेशनल होना हो जाएगा? डर तो यही है.

कंगना की भाषा भी बेहद अचंभित करने वाली है. सभी जानते हैं कि वे मौजूदा सरकार के प्रति मोह रखती हैं और दक्षिणपंथी विचारों के प्रति खासी उत्साहित नजर आती हैं. लेकिन वीडियो में जिस तरह की भाषा का उपयोग वे कर रही हैं – ‘देशद्रोही’, ‘देश को दीमक की तरह खा जाने वाले’, ‘लिबरल’, ‘सेक्युलर’, ‘देश की एकता पर प्रहार करने वाले’– ये उन्हीं ट्रोल्स की भाषा है जो मौजूदा सरकार के खिलाफ होने वाली हर आलोचना पर इसी तरह की एक-सी बातें करते हैं. ये उन व्हाट्सएप संदेशों की भी भाषा है जो एक खास राजनीतिक पार्टी से हम सबके व्हाट्सएप पर इधर-उधर से घूमकर पहुंचते हैं और उन सभी संदेशों की भाषा एक स्त्रोत से निकली हुई मालूम होती है. कंगना रनोट उसी सस्ती भाषा को अपनी आलोचना की काट मानने की भूल कर रही हैं.

क्या मॉब लिंचिंग और हिंदू धर्म के राजनीतिकरण की आलोचना करना अस्वीकार्य है?

हाल ही में बुद्धिजीवियों से लेकर कला क्षेत्र की नामी हस्तियों ने मॉब लिंचिंग और हिंदू धर्म के लगातार होते जा रहे राजनीतिकरण पर चिंता जताते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक पत्र लिखा. पत्र में कुछ भी कपोलकल्पित नहीं था, बल्कि ठीक-ठीक वही सब लिखा था जो हमारे समाज में इन दिनों लगातार हो रहा है.

अनुराग कश्यप, श्याम बेनेगल, मणिरत्नम, कोंकणा सेन शर्मा, अपर्णा सेन, अदूर गोपालकृष्णन जैसी सिनेमा क्षेत्र की दिग्गज हस्तियों से लेकर आशीष नंदी जैसे समाजशास्त्री और रामचंद्र गुहा जैसे इतिहासकार तक ने इस चिट्ठी के मार्फत ऐसी घटनाओं की आलोचना की और प्रधानमंत्री मोदी से अपील की कि वे धर्म के नाम पर फैलती जा रही हिंसा को काबू में करने के लिए जरूरी कदम उठाएं. अहिंसा में विश्वास रखने वाले किसी भी नागरिक को आखिर ऐसे पत्र से क्या आपत्ति हो सकती है?

लेकिन, जिस तरह इस आलोचना रूपी पत्र पर नेताओं से लेकर सोशल मीडिया और फिल्मी दुनिया की ही एक दूसरी जमात ने विरोध दर्ज किया, वह हैरान कर देने वाला है. बिहार की एक अदालत में इन 49 हस्तियों के खिलाफ एक वकील साहब ने याचिका तक दायर कर दी और इस बाबत तीन अगस्त को सुनवाई भी होने की संभावना है. निर्देशक विवेक अग्निहोत्री ने इन हस्तियों को निशाने पर लेते हुए कह दिया कि अब फिल्म इंडस्ट्री में केवल दो तरह की जमातें हैं – नेशनल और एंटी-नेशनल. एक बीजेपी विधायक ने तो यहां तक कहा है कि उदारवादी और बुद्धिजीवी राष्ट्रद्रोही होते हैं और अगर वे गृहमंत्री होते तो बुद्धिजीवियों को गोली मरवा देते.

लेकिन, जिस तरह का पलटवार इस पत्र को गलत बताने के लिए 62 सेलिब्रिटीज ने किया वह हतप्रभ करने वाला भी है, और सरकार के प्रति हर आलोचनात्मक सुर को कर्कश कुतर्क के माध्यम से दबाने के एक खतरनाक चलन का ताजा उदाहरण भी. मॉब लिंचिंग के विरोध में लिखे पत्र के तुरंत बाद ही इस सच्ची-खरी बात करने वाले पत्र का विरोध करते हुए जो पत्र कंगना रनोट जैसी प्रतिभा के विस्फोट ने विवेक अग्निहोत्री, अशोक पंडित वगैरह की संगत में लिखा उसमें किसी भी जताई गई चिंता पर सीधे-सीधे बात न करते हुए चिंता जताने वालों को ही षड़यंत्र करने वाले, गलत नेरेटिव खड़ा करने और झूठ का ताना-बाना बुनने वाले, गुप्त एजेंडा रखने वाले और उन हाथों में खेलने वाला बताया जो देश के टुकड़े-टुकड़े करना चाहते हैं.

इन 62 फिल्मी हस्तियों में एक वह कवि भी शामिल हैं जिनका कवि-हृदय एक जमाने में मासूम बच्चों की हत्या और बेटियों के साथ होने वाले अत्याचारों पर अक्सर द्रवित हुआ करता था. उनसे महंगे आयोजनों में मार्मिक कविताएं सुनकर हम वाह-वाह किया करते थे और रंग दे बसंती के क्रांतिकारी गीतों को सुनकर उसके रचियता को दाद दिया करते थे. लेकिन अब मासूम इंसानों के धर्म के नाम पर मारे जाने पर वे कुछ नहीं बोलते.

समाज में हुई वीभत्स घटनाओं पर अक्सर कविताएं लिखने वाले श्रीमान प्रसून जोशी ने झारखंड के तबरेज अंसारी की भीड़ द्वारा हत्या करने पर कुछ मार्मिक लिखा है या नहीं, हम नहीं जानते. मॉब-लिंचिंग पर ही कुछ लिखा हो, हम नहीं जानते.

संजय मांजरेकर विवाद और कमेंटेटरों का चीयरलीडर्स बन जाना

जब सचिन तेंदुलकर क्रिकेट खेला करते थे तो वे एक सुंदर बात कई दफा दोहराया करते थे. जब उनकी आलोचनाओं का सुर मद्धम से तेज हो जाता और पत्रकारों से लेकर कमेंटेटर तक उनसे पूछते कि वे अपने खराब खेल से जुड़ी आलोचनाओं पर क्या कहना चाहते हैं तो वे हल्की मुस्कान के साथ सदैव कहते कि, मेरा बल्ला ही जवाब देगा. और देता भी था! रवींद्र जडेजा को उनसे सीखना चाहिए था.

वर्ल्ड कप के दौरान कमेंटेटर संजय मांजरेकर ने रवींद्र जडेजा की बल्लेबाजी की खरी आलोचना की और उन्हें आधा-अधूरा क्रिकेटर कहा. ये आलोचना बाकायदा तथ्यों पर आधारित थी क्योंकि पिछली 40 पारियों में इस क्रिकेटर का उच्चतम स्कोर केवल 33 रन का था. लेकिन इस आलोचना को रवींद्र जडेजा ने दिल पर लिया और आपत्तिजनक भाषा में ट्वीट कर संजय मांजरेकर के छोटे क्रिकेट करियर का मजाक उड़ाया.

ये उसी तरह का कुतर्क था जिस तरह का हर्षा भोगले जैसे अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट नहीं खेले हुए कमेंटेटरों की वाजिब आलोचनाओं को दबाने के लिए दिया जाता रहा है. फिल्म समीक्षकों से कहा जाता है कि वे समीक्षाएं करने से पहले फिल्म बनाकर दिखाएं! साहित्य के आलोचकों से कहा जाता है कि वे पहले किताबें लिखकर दिखाएं! मोनालिसा को पसंद नहीं करने वाले आर्ट क्रिटिक से कहा जाता है कि वे पहले मोनालिसा से बेहतर पेंटिंग बनाकर दिखाएं! समझने वाले समझते हैं कि ऐसी बातें बोगस लॉजिक की श्रेणी में आती हैं.

रवींद्र जडेजा ने न्यूजीलैंड के खिलाफ हुए सेमीफाइनल में उत्कृष्ट खेल खेलकर संजय मांजरेकर को जवाब भी दिया. लेकिन कितना अच्छा होता अगर वे आपत्तिजनक ट्वीट नहीं करते और सचिन तेंदुलकर की ही तरह साइलेंस को गोल्डन मानकर केवल अपने बल्ले और गेंद को बोलने देते. वाजिब आलोचना का वाजिब जवाब ऐसा ही होना भी चाहिए. लेकिन, जिस खेल में तीक्ष्ण से तीक्ष्ण कमेंटेटरों को केवल खिलाड़ियों पर शब्दों की पुष्प-वर्षा करने के काम पर रखा जाता हो वहां खिलाड़ी भी तो कमेंटेटरों से चीयर लीडर्स हो जाने की ही अपेक्षा करेंगे. है कि नहीं?

कबीर सिंह की आलोचना और दर्शकों से लेकर निर्देशक-हीरो तक का उनकी खिल्ली उड़ाना

‘कबीर सिंह’ की समीक्षकों द्वारा चौतरफा आलोचना करना और दर्शकों द्वारा फिल्म को बेहद पसंद करना हमारे वक्त के बारे में क्या बताता है? शायद यह कि नारीवाद और समानता की जिन आदर्शवादी बातों के सहारे हम अपने देश के बदलने की कल्पना कर रहे हैं, वे अभी तक इस देश की संकरी गलियों और कोने-कोने तक नहीं पहुंच पा रही हैं. ‘कबीर सिंह’ का 270 करोड़ के पार का बिजनेस करके ब्लॉकबस्टर फिल्म का तमगा पाना और उसको लेकर हुई वाजिब आलोचनाओं पर पहले दर्शकों और फिर निर्देशक संदीप रेड्डी वांगा तथा शाहिद कपूर का हंसना (प्रतीकात्मक ही सही) बतला रहा है कि प्रबुद्ध बातों को सुनने-स्वीकारने का समय अब इस देश के पास बिलकुल नहीं है.

‘कबीर सिंह’ की रिलीज से पहले ही हमने लिख दिया था कि आखिर क्यों यह फिल्म साल की सबसे रिग्रेसिव फिल्मों में से एक होने वाली है. फिल्म रिलीज के वक्त भी समीक्षा में उसी भाव को तफ्सील से व्यक्त किया था. हिंदी फिल्मों पर लिखने वाले तकरीबन हर जागरूक फिल्म समीक्षक ने इस फिल्म की गलतियों की आलोचना की थी और दर्शकों में भी ऐसे बहुत थे जिन्हें ये फिल्म एकदम नापसंद रही थी.

लेकिन, पितृसत्तामक समाज का प्रतिनिधित्व करने वाले युवाओं और मर्दों ने (तथा कई लड़कियों और महिलाओं ने भी) न सिर्फ इस फिल्म को पसंद किया बल्कि इसकी हो रही आलोचनाओं पर सोचने-विचारने की जगह उन्हें सोशल मीडिया पर सिरे से नकारना अपना कर्त्तव्य समझा. पहले होता था कि फिल्म से जुड़े नेगेटिव क्रिटिसिज्म को फिल्म देखकर लौटा दर्शक ध्यान से पढ़ता था और मनन करता था उन बातों पर जो उसके लिए नई होती थीं या फिर समझ के दायरे से बाहर की होती थीं. इन दिनों सिर्फ उन आलोचनात्मक बातों को कुतर्कों के सहारे झुठलाने के लिए सोशल मीडिया का उपयोग हो रहा है और इस ‘पीआर’ के लिए फिल्मकारों को पैसा खर्च करने की भी जरूरत नहीं रही है! देश का नागरिक सोशल मीडिया पर अपने आप बहक रहा है.

‘कबीर सिंह’ के निर्देशक संदीप रेड्डी वांगा ने वरिष्ठ फिल्म पत्रकार अनुपमा चोपड़ा को दिए साक्षात्कार में थोड़ी और ज्यादा रिग्रेसिव बातें करके साफ कर दिया कि ‘अर्जुन रेड्डी’ और ‘कबीर सिंह’ का रिग्रेसिव, महिलाओं को अपनी जायदाद समझने वाला नायक असल में उनके अंदर से ही अवतरित हुआ है. कई हफ्तों बाद जब शाहिद कपूर ने ‘कबीर सिंह’ को डिफेंड किया तो पहले-पहल तो सयानी बातें की लेकिन बातचीत का अंत यह खिल्ली उड़ाकर ही किया कि ‘कबीर सिंह’ का इस कदर पसंद किया जाना बतलाता है कि पहली बार दर्शकों ने समीक्षकों की ही समीक्षा की है.

यह मौजूदा भारत का एक और दुखद चलन है. राजनीति से लेकर सिनेमा तक के क्षेत्र में मिली महासफलताएं आलोचना की धार को कुंद कर दे रही हैं.

फिल्मों की गुणवत्ता नहीं सुधारेंगे, फिल्म समीक्षकों को सुधारेंगे

इस तरह के अहंकार में सना एक आदेश हाल ही में कॉलीवुड में सुनाया गया. तमिल सिनेमा से ताल्लुक रखने वाली संस्था तमिल फिल्म प्रोड्यूसर्स काउंसिल ने जुलाई के शुरुआती दिनों में यह सख्त आदेश पारित किया कि तमिल फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े निर्माता सख्त और कठोर आलोचना करने वाले फिल्म समीक्षकों को प्रेस शोज में नहीं बुलाएंगे. आगे कहा गया कि जो समीक्षक फिल्मों की, एक्टरों की, निर्माताओं की, निर्देशकों की आलोचना करेगा उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी की जाएगी!

बाद में विवाद बढ़ने पर सफाई दी गई कि यूट्यूब पर समीक्षा करने वाले कुछ स्वतंत्र समीक्षकों से तमिल सिनेमा के निर्माताओं को परेशानी है, और यह आदेश पेशेवर समीक्षकों के लिए नहीं है.

लेकिन, सवाल उठता है कि क्या पेशेवर या गैर-पेशेवर तरीके से समीक्षा करने पर कानूनी कार्रवाई का डर दिखाया जाना चाहिए? हिंदी फिल्म इंडस्ट्री भी मौजूदा समय में कई फिल्मों के प्रेस-शो समीक्षकों के लिए आयोजित नहीं करती तो क्या आगे चलकर ऐसा तकरीबन सभी बड़ी और महंगे बजट की मसाला फिल्मों के साथ किया जाने लगेगा? क्या आलोचना की आवाज दबाने के लिए इस तरह के कई दूसरे हथकंडे भविष्य में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में भी अपनाए जाने लगेंगे?

इसमें भी कोई शक नहीं कि इंटरनेट, सोशल मीडिया और यूट्यूब के आ जाने से स्वतंत्र आवाजों की आवाजाही काफी बढ़ गई है और इन्हें फिल्म निर्माता प्रभावित नहीं कर पाते हैं. इस वजह से फिल्म इंडस्ट्री के अंदर से पेशेवर, गैर-पेशेवर दोनों तरह के समीक्षकों से नाराज होने की आवाजें हर शुक्रवार सुनाई देती हैं. सबकी नाराजगी यही है कि समीक्षकों की नुक्ताचीनी के चलते उनका व्यवसाय प्रभावित हो रहा है. लेकिन जहां फिल्म निर्माताओं को अपनी फिल्मों की गुणवत्ता सुधारने में ऊर्जा खर्च करनी चाहिए, क्या वे आलोचकों को सुधारने व उनपर दबाव बनाने में बेजा अपनी ऊर्जा नहीं जाया कर रहे?

किसी सुंदर दुनिया में ऐसे सवाल पूछने की जरूरत नहीं पड़ती!