शुक्रवार को रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर डी सुब्बाराव का एक बयान काफी चर्चा में रहा. उनका कहना था कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के अधिशेष भंडार (सरप्लस) को हड़पने की कोशिशों से मोदी सरकार की हताशा का पता चलता है. डी सुब्बाराव ने आगाह किया कि केंद्रीय बैंक के सरप्लस के मूल्यांकन के समय सजग रहने की जरूरत है.

इससे कुछ दिन पहले खबर आई थी कि आरबीआई के सरप्लस को लेकर गठित की गई बिमल जालान कमेटी ने अपना काम पूरा कर लिया है और जल्द ही वह अपनी सिफारिशें रिजर्व बैंक को सौंप देगी. इसके बाद माना जा रहा था कि आर्थिक मोर्चे पर जूझ रही सरकार को आरबीआई सरप्लस से जल्द ही कुछ मदद मिलेगी. लेकिन, अब बिमल जालान कमेटी ने फैसला किया है कि समिति के सदस्य एक बार और बैठक करेंगे.

जानकार मान रहे हैं कि हो सकता है कि इस वजह से जालान कमेटी की रिपोर्ट रिजर्व बैंक को सौंपे जाने में और देरी हो. कमेटी अपनी रिपोर्ट सौंपने में जितनी देरी करेगी, आरबीआई से सरकार को सरप्लस मिलने में भी उतना ही वक्त लगेगा. जाहिर है कि सरकार यह नहीं चाहेगी. दिलचस्प बात यह है कि इस देरी और असमंजस की वजह वही सुभाष चंद्र गर्ग बन रहे हैं जो आरबीआई सरप्लस के जल्द से जल्द स्थानांतरण के सबसे बड़े पैरोकारों में एक रहे हैं.

इस असमंजस की एक वजह तो यह है कि बतौर आर्थिक मामलों के सचिव सुभाष चंद्र गर्ग खुद बिमल जालान कमेटी के सदस्य थे और कमेटी अपनी सिफारशें रिजर्व बैंक को सौंपती उससे पहले ही उनका तबादला कर उन्हें बिजली सचिव बना दिया गया. सुभाष चंद्र गर्ग के स्थानांतरण के बाद बिमल जालान कमेटी के लिए अनिश्चितता की स्थिति इसलिये भी है क्योंकि गर्ग ने फिलहाल तैयार रिपोर्ट पर अपनी असहमति जताते हुए हस्ताक्षर भी नहीं किए हैं. तबादले के बाद बिजली सचिव के रूप में कार्यभार संभालते हुए सुभाष चंद्र गर्ग से जब पूछा गया कि उन्होंने जालान कमेटी की रिपोर्ट पर अब तक हस्ताक्षर क्यों नहीं किए हैं तो उनका जवाब था कि समिति का काम अभी पूरा नहीं हुआ है.

हालांकि समिति ने अपनी अंतिम बैठक में इससे उलट बात कही थी. उसने कहा था कि उसने अपना काम पूरा कर लिया है और जल्द ही रिपोर्ट को संपादित कर भारतीय रिजर्व बैंक को सौंप दिए जाएगा. मीडिया में सूत्रों के हवाले से ऐसी खबरें तक आ गईं कि बिमल जालान कमेटी ने आरबीआई के सरप्लस को लेकर यह सिफारिश की है कि सरकार को आरबीआई के आरक्षित कोष से एकमुश्त रकम ट्रांसफर करने के बजाय उसे तीन से पांच सालों में पैसे दिए जाएं. हालांकि, यह रकम कितनी होगी इस बारे में अभी कुछ भी स्पष्ट नहीं हैं.

जाहिर है ऐसे में सुभाष गर्ग का रिपोर्ट फाइनल न होने का बयान समिति के लिए असहज करने वाला था. हालांकि, ऐसी खबरें पहले से आ रहीं थीं कि तत्कालीन वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग जालान कमेटी के सदस्यों के रवैये से नाखुश हैं और वे एकमुश्त ट्रांसफर की वकालत कर रहे हैं. जानकारों के मुताबिक जालान कमेटी को कई बार अतिरिक्त समय की मांग इसीलिए करनी पड़ी कि इसमें वित्त विभाग के प्रतिनिधि के तौर पर शामिल सुभाष चंद्र गर्ग अन्य सदस्यों के रुख से सहमत नहीं थे, इसलिए कमेटी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच पा रही थी. एक बैठक में तो सुभाष चंद्र गर्ग ने विरोधस्वरूप हिस्सा तक नहीं लिया था. आखिर में कमेटी की समापन बैठक में भी उन्होंने रिपोर्ट पर दस्तखत नहीं किए.

ऐसे में जालान कमेटी ने अपना काम पूरा करते हुए सुभाष चंद्र गर्ग की असहमति को दर्ज कर लिया था और अपनी रिपोर्ट फाइनल होने की घोषणा कर दी थी. जानकारों के मुताबिक एक संभावना यह भी थी कि रिपोर्ट के संपादन के बाद सुभाष चंद्र गर्ग अपने असहमति नोट के साथ इस पर दस्तखत कर देंगे. लेकिन, इसी बीच बजट में विदेशी बॉन्ड के प्रावधान को लेकर हुए विवाद के चलते सुभाष चंद्र गर्ग का तबादला हो गया. इसके बाद खबर आई कि वे इससे नाराज हैं और उन्होंने वीआरएस के लिए आवेदन कर दिया है. फिर उनका बयान आया कि उन्होंने रिपोर्ट पर दस्तखत इसलिए नहीं किए हैं कि अभी यह पूरी तैयार नहीं है.

सुभाष चंद्र गर्ग के तबादले और रिपोर्ट पर उनके दस्तखत करने से इंकार ने जालान कमेटी को विचित्र स्थिति में डाल दिया है. जानकार कहते हैं कि किसी कमेटी में किसी सदस्य का असहमत होना एक अलग बात है, लेकिन वह अपनी असमति दर्ज करने के साथ रिपोर्ट पूरी होने पर भी मुहर लगा देता है. लेकिन, इस मामले में सुभाष चंद्र गर्ग सार्वजनिक रूप से कह रहे हैं कि अभी समिति ने अपना काम ही पूरा नहीं किया है. सूत्रों के मुताबिक इससे पहले भी जालान कमेटी की 18 जुलाई को जब अंतिम बैठक हुई थी तो भी सुभाष चंद्र गर्ग ने किस्तों में आरबीआई सरप्लस के ट्रांसफर पर नाराजगी जाहिर करते हुए कहा था कि वे इस मसले को अलग से आरबीआई बोर्ड की बैठक में ले जाएंगे. उस समय बतौर वित्त सचिव वे आरबीआई बोर्ड के सदस्य थे. हालांकि अपने तबादले के बाद वे अब इस मसले को आरबीआई बोर्ड की बैठक में तो नहीं ले जा सकते, लेकिन उन्होंने अपना रुख सार्वजनिक रूप से जाहिर कर दिया है.

यानी सुभाष चंद्र गर्ग ने हाल के समय में तीसरी बार सरकार के लिए मुश्किल की वजह पैदा की है. पहले उनके रुख के चलते जालान कमेटी की रिपोर्ट तैयार होने में देर हुई. फिर उनके तबादले के बाद उनके वीआरएस की खबरों से सरकार असहज हुई और अब यह कहकर कि उन्होंने रिपोर्ट पर दस्तखत नहीं किए हैं, गर्ग ने सरकार के लिए फिर मुश्किल पैदा कर दी है.

इन्हीं सब बातों के चलते भ्रम में पड़ी जालान कमेटी ने एक और बैठक का फैसला किया है जबकि पहले उसने अपना काम पूरा होने की घोषणा कर दी थी. सूत्रों के मुताबिक कमेटी एक और बैठक करने के साथ वित्त मंत्रालय और आरबीआई से भी राय मांग रही है कि इस मसले पर क्या किया जाए.

जानकार मान रहे हैं कि जालान कमेटी के सामने दो रास्ते हैं. पहला तो यही है कि वह अपनी मौजूदा रिपोर्ट के साथ ही आगे बढ़े और बिना सुभाष चंद्र गर्ग के दस्तखत के अपनी रिपोर्ट आरबीआई को सौंप दें. सूत्रों के मुताबिक गर्ग के अलावा कमेटी के अन्य सदस्य किस्तों में ट्रांसफर के सुझाव से सहमत हैं. ऐसे में बहुमत की सिफारिश ही मानी जाएगी. लेकिन, यह बहुत अच्छी स्थिति इसलिए नहीं होगी क्योंकि एक तो सुभाष चंद्र गर्ग ने इस रिपोर्ट पर दस्तखत नहीं किए हैं और दूसरे, उन्होंने सार्वजनिक रूप से यह कहा है कि समिति ने अभी पूरी तरह से अपनी सिफारिशों को अंतिम रूप नहीं दिया है. शायद इसीलिए कमेटी के सदस्यों ने एक और बैठक का फैसला लिया है.

इसके अलावा एक तरीका यह भी हो सकता है वित्त मंत्रालय की सलाह के बाद नए वित्त सचिव अतनु चक्रवर्ती को समिति का सदस्य बनाया जाए. अब यह सब कैसे किया जाए, जाहिर है कि इसे लेकर नियम संबंधी माथापच्ची करनी होगी ताकि पूरी प्रक्रिया पर कोई सवाल न उठे. जानकारों के मुताबिक यह कुछ अलग तरीके की स्थिति है और इस बारे में नियम भी बहुत स्पष्ट नहीं हैं. कमेटी के मुखिया बिमल जालान खुद कह चुके हैं कि इस संबंध मेें उनके हाथ में कुछ नहीं है.

इसके अलावा जालान समिति पर यह भी दबाव है कि वह अपनी सिफारिशें रिजर्व बैंक की 16 अगस्त को होने वाली बोर्ड बैठक से पहले सौंप दें क्योंकि इस बैठक में आरबीआई अपनी बैलेंसशीट को अंतिम रूप देगा और सरकार को देने वाले डिविडेंड पर भी चर्चा करेगा. ऐसे में आरबीआई बोर्ड जालान कमेटी की सिफारिशों पर भी चर्चा करना चाहेगा क्योंकि उसे डिविडेंड ट्रांसफर और सरप्लस ट्रांसफर के मसलों को एक साथ देखना होगा. .

16 अगस्त से पहले अगर जालान कमेटी सुभाष चंद्र गर्ग के स्थानांतरण के बाद बनी स्थिति को सुलझा लेती है तो ठीक है, वर्ना जालान कमेटी की रिपोर्ट में और देरी हो सकती है. और इस देरी के चलते सरकार को आरबीआई से सरप्लस ट्रांसफर होने में कुछ और वक्त लग सकता है. यानी सुभाष चंद्र गर्ग ने एक बार फिर सरकार को मुश्किल में डाल दिया है.