बिहार में सत्ताधारी जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) इन दिनों राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल करने की योजना पर काम कर रहा है. हाल में बिहार के बाद अरुणाचल प्रदेश दूसरा ऐसा राज्य बना जहां उसे राज्य पार्टी का दर्जा मिला. मोटे तौर पर बिहार में सिमटे रहे जेडीयू को हालिया चुनाव में अरुणाचल प्रदेश में सात विधानसभा सीटों पर जीत हासिल हुई. प्रदेश में अकेले चुनाव लड़ने के बावजूद भारतीय जनता पार्टी के बाद वह दूसरा सबसे बड़ा दल बनकर उभरा.

इसी प्रदर्शन की वजह से बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व वाले जेडीयू को अरुणाचल प्रदेश में राज्य पार्टी का दर्जा हासिल हो गया. इससे उत्साहित होकर जेडीयू अब राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल करने की योजना पर काम कर रहा है. बीते जून में जब पटना में पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी आयोजित की गई तो उसके बाद भी पार्टी की तरफ से यह बात कही गई.

राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल करने के लिए जेडीयू को अनिवार्य तौर पर चार राज्यों में राज्य पार्टी का दर्जा हासिल करना होगा. ऐसे में सवाल यह उठता है कि बिहार और अरुणाचल प्रदेश में ऐसा कर चुका जेडीयू और किन राज्यों में राज्य पार्टी का दर्जा हासिल करने की योजना पर काम कर रहा है ताकि वह राष्ट्रीय पार्टी बन सके.

इस बारे में जेडीयू के महासचिव और पूर्वोत्तर राज्यों के साथ जम्मू-कश्मीर के प्रभारी अफाक अहमद खान सत्याग्रह को बताते हैं, ‘अरुणाचल प्रदेश में चुनाव लड़ने की प्रक्रिया में हमें ये महसूस हुआ कि नीतीश कुमार की छवि और विकास को लेकर उनकी प्रतिबद्धता की वजह से बिहार से काफी दूर के राज्यों में भी उनकी एक सकारात्मक छवि बनी हुई है. हमें ये भी महसूस हुआ कि उनके नाम पर वोट मांगने पर वोट मिलता है. यही वजह थी कि अरुणाचल प्रदेश में जेडीयू दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है.’

वे आगे जोड़ते हैं, ‘अरुणाचल प्रदेश के प्रयोग और यहां की सफलता, दोनों से उत्साहित होकर पार्टी जम्मू कश्मीर, झारखंड और दिल्ली के विधानसभा चुनावों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की योजना पर काम कर रही है. इसके अलावा हम 2021 के विधानसभा चुनावों में असम में भी पूरी ताकत से उतरेंगे और पूर्वोत्तर में जेडीयू का विस्तार करेंगे.’

झारखंड और दिल्ली में अगले छह महीने के अंदर चुनाव होने हैं. झारखंड बिहार से अलग होकर बना है. दिल्ली में अच्छी-खासी संख्या में बिहार के लोग हैं. इसलिए इन दोनों राज्यों में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की जेडीयू की योजना समझ में आती है. लेकिन जम्मू-कश्मीर में आखिर वह किस आधार पर विधानसभा चुनावों में उतरने की योजना बना रहा है?

इस सवाल के जवाब में अफाक अहमद खान कहते हैं, ‘मैं ये नहीं कहूंगा कि जनता दल यूनाइटेड जम्मू-कश्मीर में बहुत मजबूत स्थिति में है. लेकिन ये जरूर कहूंगा कि जनता दल की जम्मू-कश्मीर में एक पहचान रही है. 1989 में जनता दल ने जम्मू कश्मीर के मुफ्ती मोहम्मद सईद को केंद्रीय गृह मंत्री बनाया था. 1996 में जब एचडी देवगौड़ा के नेतृत्व में सरकार बनी तो उस सरकार में भी जनता दल ने मकबूल डार को गृह राज्य मंत्री बनाया था. 1996 के जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनावों में जनता दल के पांच विधायक जीते थे. इनमें जम्मू और घाटी दोनों क्षेत्र के विधायक थे. इस आधार पर हमें लगता है कि जनता दल की वहां एक पहचान है.’

लेकिन क्या ये पहचान चुनावों में जीत के लिए काफी होगी? इसके जवाब में पार्टी के एक दूसरे नात कहते हैं, ‘हम सिर्फ इस पहचान पर ही आश्रित नहीं हैं बल्कि सांगठनिक ढांचा मजबूत करने पर भी काम कर रहे हैं. प्रभारी होने के नाते मैं बता सकता हूं कि जिला स्तर पर हमारा संगठन सक्रिय है. पिछले दिनों जब जम्मू कश्मीर में स्थानीय निकाय चुनाव हुए तो उसमें भी हमें लोगों का समर्थन मिला. इसके बाद से हम अपने संगठन को और मजबूत कर रहे हैं. हम जमीनी स्तर पर जो काम कर रहे हैं और नीतीश कुमार के प्रति जो सकारात्मक माहौल वहां लोगों में दिख रहा है, उसके आधार पर हमें पूरी उम्मीद है कि जम्मू कश्मीर में जब भी चुनाव होंगे, जेडीयू वहां बहुत अच्छा प्रदर्शन करेगी.’

जेडीयू की ओर से इसी तरह की कोशिश झारखंड और दिल्ली में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए भी हो रही है. झारखंड पहले बिहार का हिस्सा था, इस नाते बिहार की राजनीति का एक सीमित असर झारखंड पर अब भी पड़ता है. झारखंड की कई विधानसभा सीटों पर बिहार से जाकर वहां बसे लोगों की संख्या अच्छी-खासी है. ऐसे में जेडीयू को उम्मीद है अगर झारखंड में ठीक से चुनाव लड़ा गया तो वहां भी जेडीयू राज्य पार्टी बन सकती है.

संगठनात्मक स्तर पर पार्टी इसके लिए काम भी कर रही है. झारखंड में जेडीयू का संगठनात्मक ढांचा भी ठीक है. पिछले दिनों भाजपा, झारखंड मुक्ति मोर्चा और झारखंड विकास मोर्चा के कुछ नेता जेडीयू में शामिल भी हुए. इसे भी अगले विधानसभा चुनावों के संदर्भ में पार्टी की तैयारियों से जोड़कर देखा जा रहा है.

जेडीयू की दिल्ली विधानसभा चुनावों में भी उतरने की तैयारी है. दिल्ली के बारे में उसे लग रहा है कि बिहार से आकर यहां रहने वाले लोगों की संख्या अच्छी-खासी है. इनमें से बहुत लोग दिल्ली के मतदाता हो गए हैं. पार्टी को लगता है कि अगर उसने अपने उम्मीदवार ठीक से दिल्ली विधानसभा चुनावों में उतारे तो उसे यहां लाभ मिल सकता है. जेडीयू को यह भी लगता है कि नीतीश कुमार की विकास को लेकर जो छवि है, उसका फायदा पार्टी दिल्ली में ठीक से उठा सकती है. 2017 के दिल्ली नगर निगम चुनावों में भी जेडीयू ने उम्मीदवार उतारे थे. दिल्ली में नीतीश कुमार की कुछ सभाएं भी हुई थीं. लेकिन पार्टी को कोई खास सफलता नहीं मिली. अब जेडीयू के भीतर यह कहा जाता है कि उस चुनाव में पार्टी पूरी तैयारी से नहीं उतरी थी. निगम चुनाव की नाकामियों और गलतियों से सबक लेते हुए जेडीयू दिल्ली विधानसभा चुनावों में अच्छा प्रदर्शन करने की योजना पर काम कर रहा है.

जिन तीन राज्यों का जिक्र यहां किया गया है, उनमें से अगर दो राज्यों में भी जेडीयू को राज्य पार्टी का दर्जा मिल जाता है तो वह राष्ट्रीय पार्टी हो जाएगा. लेकिन यह बात जेडीयू को भी अच्छी तरह से मालूम है कि अरुणाचल प्रदेश में मिली सफलता को इन तीनों राज्यों में दोहरा पाना आसान काम नहीं है.