‘खानदानी शफाखाना’ का विचार बेहद उत्तम है. सोचकर देखिए कि अगर एक लड़की को पारंपरिक और रुढ़िवादी माहौल में एक सेक्स क्लीनिक चलाना होगा तो उस केंद्रीय विचार में कितनी सारी संभावनाएं मौजूद होंगी. फिल्म का टोन आप कॉमेडी रखें या सीरियस, आनंद आना तय है. लेकिन, सोनाक्षी सिन्हा की फिल्म ऐसे उत्तम विचार के इर्द-गिर्द जैसे सोकर पटकथा लिखती है. वह सोशल टैबू विषयों पर बनी अपने से पहले आई कई फिल्मों से प्रेरित होती है और अंतत: मेलोड्रामा की टेक लेकर एक खास आइडिया का निहायत आलसी क्रियान्वयन हमारी नजर करती है.

‘खानदानी शफाखाना’ देखते हुए आपको ‘विकी डोनर’ से लेकर ‘शुभ मंगल सावधान’ और ‘बधाई हो’ तक की याद आएगी. शिल्पी दासगुप्ता की यह फिल्म इन तीनों फिल्मों की तरह ही ऐसे रिस्की और अलहदा विषय पर सिनेमा बनाती है जिस पर सार्वजनिक रूप से बात करना आज भी हमारे समाज में असंभव है. लेकिन तीनों फिल्मों को जेहन में रखकर सोचने पर आपको आसानी से समझ आएगा कि यह फिल्म कहां चूकती है और कहां कुछ दिलचस्प रच पाती है.

‘विकी डोनर’ और ‘बधाई हो’ की खासियत थी कि उन्होंने अंत तक अपने अलहदा विषय पर बेहद दिलचस्प पटकथा लिखने में सफलता हासिल की थी. उनके पास अच्छे कलाकारों के अलावा उत्कृष्ट लेखक भी थे जिन्होंने अलहदा विचार पर इतराने से ज्यादा कहानी की पूर्णता पर ध्यान दिया था.

वहीं ‘शुभ मंगल सावधान’ बेहद रोचक विषय और शानदार शुरुआत के बावजूद इंटरवल के बाद वाले हिस्से में साधारण हिंदी सिनेमा के तौर-तरीकों में उलझने की वजह से एक ठीक-ठाक दर्शनीय फिल्म ही बन पाई थी. उसका विचार सेक्स से जुड़े विषयों पर बनी तमाम फिल्मों में सबसे ज्यादा जोखिम भरा था और इसी वजह से आज भी उसे याद किया जाता है. लेकिन संपूर्णता में वह फिल्म बाकी दो की तुलना में उन्नीस ही ठहरती है.

ऐसी ही कमियां ‘खानदानी शफाखाना’ के साथ भी हैं. ‘शुभ मंगल सावधान’ से कई गुना ज्यादा. उसके ऊपर अपने अलहदा विचार का हैंगओवर इतना अधिक है कि वह साफ तौर पर उससे आगे नहीं बढ़ पाती. जब बढ़ती है तो पुराने रास्ते ही नापते हुए मिलती है. हिंदी सिनेमा के निर्देशकों को यह नई तरह की बीमारी लगी भी हुई है कि वे नए रिस्की विचारों को फिल्मों में लाकर ही खुद को सत्यजीते रे समझने लगते हैं और उसके क्रियान्वयन पर ध्यान कम देते हैं. सोशल मैसेज देने के फेर में पड़कर मनोरंजक, दिलचस्प सिनेमा गढ़ना भूल जाते हैं.

गौतम मेहरा की लिखी ‘खानदानी शफाखाना’ शुरू से आखिर तक किसी ज्ञानवर्धक सरकारी विज्ञापन की तरह प्रवचननुमा रहती है. इस बीच कॉमेडी तथा हल्के-फुल्के दृश्यों की टेक लेने के बावजूद आखिर तक सेक्स ऐजुकेशन देने वाले किसी टीचर की तरह रट्टामार व्यवहार करती है.

हिंदी फिल्मों को नायाब और रिस्की विषयों को एक्सप्लोर करने का तरीका अब बदलना होगा. 2012 में ‘विकी डोनर’ ने स्पर्म डोनर बने नायक के माध्यम से समाज को होने वाली हैरत और तकलीफों को जिस तरह एक्सप्लोर किया, आप 2019 में सेक्स क्लीनिक चलाने वाली लड़की के माध्यम से वैसी ही कुछ परिस्थितियों को भला क्यों एक्सप्लोर करना चाहते हैं? शॉक वैल्यू आखिर कब तक काम आएगी? कुछ आगे बढ़िए और सेक्स क्लीनिक चलाने वाली नायिका के होने से रुढ़िवादी समाज को होने वाली परेशानियों और उनके दकियानूसी विरोधों से आगे की पटकथा तैयार कीजिए. सोशल टैबूज पर बनी हमारी ज्यादातर फिल्में ‘समाज क्या कहेगा’, ‘परिवार क्या कहेगा’ जैसी थीम्स के आसपास वही सब पुराना रचने में व्यस्त हो जाती हैं, जो कि नेटफ्लिक्स और एमेजॉन प्राइम के इस दौर में देखने वाले को ऊब से भर देता है.

इस आलोचना को बेहतर समझना हो तो ‘खानदानी शफाखाना’ की तरह ही सेक्स एजुकेशन पर कॉमेडी-ड्रामा जॉनर की होकर बात करने वाली नेटफ्लिक्स की ब्रिटिश सीरीज ‘सेक्स एजुकेशन’ से इस फिल्म की तुलना करके देखिए. वह सीरीज भी सेक्स एजुकेशन के सोशल टैबू होने की ही बात करती है लेकिन कई सारे दिलचस्प किरदार, परिस्थितियां और कंटेम्पररी थीम्स लगातार हमारी नजर करते चलती है. और इस दौरान किरदारों के अंतर्मन में लगातार झांकने का मौका देते हुए ऐसा कथा-संसार रचती है कि आप उस विदेशी व अजनबी कहानी से आसानी से कनेक्ट कर पाते हैं. ‘खानदानी शफाखाना’ में देसी होने के बावजूद कहानी तो खैर चरी जा चुकी घास बराबर है, तिस पर सिचुएशन्स भी खालिस क्लीशे-युक्त और पुरानी हिंदी फिल्मों के मेलोड्रामा के कीचड़ में पनपने वाली मिलती हैं!

हालांकि, कुछ जगहों पर आपको हंसी आती है और कुछ जगहों पर कुछ दिलचस्प दृश्य भी मिलते हैं. लेकिन दो घंटे बीस मिनट की फिल्म में क्या ये काफी हैं? बिलकुल नहीं!

फिल्म में जहां हंसी आती है, वहां वरुण शर्मा मिलते हैं. वे हमेशा से फिल्मों में हास्य का पुट शामिल करने के लिए रखे जाते रहे हैं और यहां भी छोटे-मोटे चुटकुले जहीन अंदाज में डिलिवर करते हैं. लेकिन समझने वाली बात है कि वरुण शर्मा का पात्र कहानी में कुछ खास नहीं जोड़ता, बल्कि केवल फिल्म को बतौर कॉमेडी बेचने के काम आता है.

इन दिनों जिस फिल्म में वरुण शर्मा होते हैं उसके प्रमोशन के लिए वे हर मुमकिन मंच पर टॉप स्टार्स के साथ नजर आते हैं. आखिर क्यों? क्योंकि उनकी कही पंच-लाइन्स फिल्म को बतौर एक कॉमेडी बेचने में मदद करती हैं और दर्शक भी ट्रेलर में ‘चूचा’ का एक्सटेंशन देखकर उम्मीद करता है कि फिल्म बढ़िया कॉमेडी फिल्म होगी.

लेकिन, ‘खानदानी शफाखाना’ कॉमेडी फिल्म कतई नहीं है. सिचुएशनल कॉमेडी फिल्म तो एकदम ही नहीं. वह केवल इधर-उधर कुछ चुटकुलों का उपयोग भर करती है और सेक्स से जुड़ी बातों के माध्यम से चंद ही दृश्यों में सिचुएशन कॉमेडी हमारी नजर करती है. लेकिन ये चुटकुले खत्म होते ही तुरंत मेलोड्रामा की गिरफ्त में आ जाती है और धीमी रफ्तार में छोटी-छोटी बातें मार्मिक संगीत की टेक लेकर देर-देर तक कहती चलती है. जैसे हिंदुस्तानियों के पास फिल्म देखने के अलावा कोई और काम-धंधा है ही नहीं!

फिल्म में जो दृश्य-संरचनाएं अच्छी हैं, प्रभाव डालती हैं, सिचुएशन कॉमेडी की चमक रखती हैं, उन सब में सोनाक्षी सिन्हा का अभिनय प्रभावित करता है. ‘नूर’ व ‘इत्तेफाक’ में सोनाक्षी सिन्हा के अभिनय में निखार आया था और ‘खानदानी शफाखाना’ में भी वे कई दृश्यों में अपनी रेंज से प्रभावित करने में सफल रहती हैं.

जब कुछ मरीज मर्दानगी से जुड़ी परेशानियों का जिक्र करते हैं तब सोनाक्षी अचंभित होने के कई एक्सप्रेशन्स बेहद सलीकेदार देती हैं. चिड़ी रहने वाली, गुस्से में फटने को तैयार रहने वाली नायिका का रोल निभाना आसान नहीं होता, क्योंकि सुंदर चेहरे को क्यूटनेस से दूर ले जाकर आड़े-टेढ़े अंदाज में पेश करना होता है. सोनाक्षी इस चुनौती को स्वीकारती हैं और कई जगह पर किरदार की इस विशेषता का जरूरत से ज्यादा ‘शो-ऑफ’ करती हुई मालूम होने के बावजूद किरदार के दायरे में रहने की वजह से पसंद आती हैं. कॉमेडी पर भी उनकी पकड़ बेहतर हुई है और इमोशनल दृश्यों में वे पहले जितनी हाइपर कम होती हैं.

कुल मिलाकर, उनके होने की वजह से ‘खानदानी शफाखाना’ पूरी तरह सिफर होने से बची रहती है.

अन्नू कपूर का वकील किरदार ‘विकी डोनर’ के ही रोल का एक्सटेंशन है और उन जैसे बेहतरीन कलाकार के लिए ऐसे कमजोर लिखे किरदार करना भी चुटकियों का काम है. टीवी एक्टर प्रियांशु जोरा प्रेमी की भूमिका में हैं और उनकी स्क्रीन प्रेजेंस में ताजगी तो है, लेकिन कैरेक्टर-ग्राफ इतना कमजोर है कि वे शुरुआती कुछ दृश्यों के बाद असरदार नहीं रह पाते.

बादशाह का किरदार भी फिल्म में कुछ खास नहीं जोड़ता. हालांकि वे आभामंडल वैसा ही दमदार क्रिएट करते हैं जैसा कि उनके म्यूजिक वीडियोज में नजर आता है. लेकिन किरदार की लिखाई इतनी कमजोर है कि शुरुआत में असर करने के बाद वे भी बस एक शो-पीस बनकर रह जाते हैं. क्लाइमेक्स का कोर्टरूम सीन तो हद हास्यास्पद है और न सिर्फ बादशाह के किरदार को ठीक से उपयोग नहीं कर पाता बल्कि राजेश शर्मा जैसे जहीन एक्टर को भी एकदम बेढब किरदार करने को देता है.

सबसे हास्यास्पद क्षण तब आते हैं जब इस सीक्वेंस में दर्शक-दीर्घा में खड़े-खड़े ही लोग जज से बहस करने लगते हैं और जज साहब भी आराम से उनकी बातों को तवज्जो देते हैं. बेचारा कटघरा, खुद के उपयोग न होने पर खासा मायूस हुआ होगा!

फिल्म में एक और दिलचस्प चीज नोट करने वाली है. इसका नाम वैसे तो ‘खानदानी शफ़ाखाना’ है लेकिन खालिस उर्दू का शब्द ‘शिफ़ाखाना’ होता है. शिफ़ाखाना यानी कि अस्पताल. आम बोलचाल की भाषा में इसे शफ़ा कहकर काफी उपयोग किया जाता है इसलिए फिल्म के टाइटल की अशुद्धि शायद कई लोगों के लिए स्वीकार्य हो सकती है.

लेकिन दिलचस्प बात ये है कि जहां सोनाक्षी सिन्हा से लेकर बादशाह जैसे नयी पीढ़ी के युवा कलाकार फिल्म में इसे शफ़ाखाना ही बोलते हैं, वहीं अन्नू कपूर और कुलभूषण खरबंदा जैसे वरिष्ठ व भाषा को समझने वाले अनुभवी कलाकार हमेशा खालिस उर्दू का उपयोग कर ‘शिफ़ाखाना’ बोलते हुए नजर आते हैं. उनको सलाम!