इधर कुछ बरसों से समाज और राजनीति में सब कुछ इस क़दर बेसुरा और बीहड़ हो गया है कि हम आसानी से यह नहीं सोच सकते कि हमारे राज और समाज के नेताओं का संगीत से कोई संबंध रह गया है. लेकिन स्वतंत्रता के पहले ऐसा समय था. महात्मा गांधी से जब यह पूछा गया कि आप स्कूल के स्तर पर किसी विषय को अनिवार्य रूप से सब छात्रों को पढ़ाना निर्धारित कराना चाहेंगे तो उनका उत्तर था- ‘संगीत’. उन्होंने राष्ट्रप्रेम या देशभक्ति जैसे प्रत्याशित विषय नहीं बताये थे. यों तो कहा जा सकता है कि गांधी जी स्वयं पूरे भारत का समवेत संगीत, समवेत स्वर थे. पर संगीत से उनके संबंध और संपर्क के कुछ प्रसंग याद किये जा सकते हैं.

गांधी जी ने जब उस्ताद अब्दुल करीम खां का गाना सुना तो उन्होंने कहा कि अगर मेरे बस में होता तो उस्ताद को हर गांव में ले जाकर लोगों को सुनवाता ताकि वे महसूस कर सकें कि हमारे यहां याने भारत में किस तरह का श्रेष्ठ परिष्कार संबंध है. उनके नेतृत्व में हुए कांग्रेस के अमृतसर अधिवेशन में तीन शास्त्रीय गवैये आमंत्रित थे. भास्कर बुवा वखले, जगन्नाथ बुवा पुरोहित और कृष्णराव शंकर पंडित. पहले उन्हें अलग-अलग गाना था पर फिर समय की कमी के कारण तीनों ने मिलकर गाया. गांधी जी के प्रिय भजन ‘रघुपति राघव राजाराम’ और ‘वैष्णव जन तो तेणे कहिये’ की धुनें विष्णु दिगम्बर पलुसकर जैसे श्रेष्य शास्त्रीय संगीतकार ने बनायी थीं. कर्नाटक शैली की मूर्धन्य एमएस शुभलक्ष्मी गांधी जी की प्रिय गायिका थीं और शायद उन्होंने मीरा के भजन गाने की शुरूआत गांधी जी की प्रेरणा से की. गांधी जी की दैनिक प्रार्थना-सभा में भक्तिपद गाये ही जाते थे, एक तरह से समूहगान के रूप में.

उनकी जन्मशती पर पंडित कुमार गंधर्व ने अपनी निराली आविष्कारक प्रतिभा से एक नया राग काफ़ी सोच-विचारकर ‘गांधी मल्हार’ बनाया. कुमार जी ने महात्मा को ‘भारतछोड़ो’ आन्दोलन के समय बंबई के गवालिया टैंक मैदान की जनसभा में पहली बार देखा था जिसमें वे कुछ छात्रों के साथ भजन गाने उनके गुरु प्रोफ़ेसर देवधर द्वारा भेजे गये थे. ‘गांधी मल्हार’ में कुमार जी ने गांधी जी के अभय, करुणा और एकाकीपन पर ध्यान केन्द्रित किया है. विलंबित और दुत लय में जो दो बंदिशें कुमार जी स्वयं रचीं वे असाधारण रूप से खड़ी बोली में हैं और उनमें उनको ‘संजीवन’, ‘आलोक’, ‘आहत और आरत के सखा’ आदि विहित किया गया है. उन्हें ‘दर्शन का अनुगामी’ भी कहा गया है. शास्त्रीय संगीत के क्षेत्र में यह एक असाधारण घटना है.

रज़ा फ़ाउण्डेशन की सीरीज़ ‘गांधी मैटर्स’ में कुमार जी की बेटी कलापिनी कोमकली ने इस अनूठे राग की पृष्ठभूमि बतायी और उसे सशक्त ढंग से प्रस्तुत किया. यह भी याद किया कि उसकी पहली प्रस्तुति कुमार जी ने विज्ञान भवन में गांधी जी की पुण्यतिथि 30 जनवरी 1970 को की थी. साथ में उन्होंने एक कबीर-पद भी गाया था- ‘हिरना समझ-बूझ बन चरना’.

गांधी आस्था

यह तो अब सभी जानते हैं कि गांधी जी ईश्वर में अटल आस्था रखते थे. उन्होंने आरम्भ में इस पर इसरार किया था कि ‘ईश्वर ही सत्य है.’ बाद में, अपने जीवन के उत्तरकाल में उन्होंने कहा कि ‘सत्य ही ईश्वर है.’ इस सिलसिले में एक रोचक प्रसंग डॉ. राममनोहर लोहिया के ‘अनूठे अहिंसक का हिंसक अंत’ शीर्षक एक संस्मरणपरक लेख में आता है जिसे एक पुस्तिका के रूप में इन्स्टीट्यूट फ़ार सोशल डिमोक्रेसी नामक एक संस्था ने हाल ही में एक पुस्तिका के रूप में प्रकाशित किया है.

लोहिया जी ने लिखा है, ‘एक बार गांधी जी ने मुझसे प्रश्न किया कि क्या में ईश्वर में विश्वास करता हूं? निश्चय ही ऐसे प्रश्न के लिए बहुत देर हो चुकी थी, क्योंकि मैं गांधी जी को कई बरसों से जानता था और यह प्रश्न उन्होंने पहले कभी नहीं किया था. कई प्रश्न जो मुझे उनसे पूछने चाहिये थे, नहीं पूछे, क्योंकि मूर्खों की तरह मैं समझता था कि वे सदा जीवित रहेंगे..... मैंने कहा कि नहीं. तब गांधी जी ने कहा कि यह शंका की बात है कि कभी मैं अच्छा सत्याग्रही बन सकूंगा, यदि मैं ईश्वर में विश्वास नहीं करता. फिर तत्काल ही उन्होंने कहा कि लेकिन कौन जाने. हर एक का अपना ढंग होता है और शायद मैं बिना ईश्वर के ही सत्याग्रह कर सकूं. और उन्होंने प्रश्न टाल दिया और फिर कभी उसे न उठाया. यह छोटी पर निर्णायक स्वीकृति थी. कोई नहीं जानता. हर का अपना ढंग होता है.’

लोहिया आगे लिखते हैं, ‘मैं चाहे भगवान को न मानूं लेकिन ऐसी कई कलात्मक कल्पनाएं हैं जिन्होंने लुभाया है, क्रॉस पर ईसा की कल्पना ने मुझे सदा ही लुभाया है, उसी तरह जैसे उसने लाखों करोड़ों क्रिस्तानों को लुभाया है या किसी को भी लुभा सकता है. यदि हेमलेट और जूलियट लुभा सकते हैं तो मुझे ऐसा कोई कारण नहीं दिखता कि हुसैन और ईसा न लुभावें. इसी तरह राम, कृष्ण और शिव की कल्पना ने भी मुझे लुभाया है. शिव तो सबसे अधिक. कल ही किसी ने उनकी तमाम लीलाओं के बारे में पूछा, जिनका हर काम अपने आप औचित्यपूर्ण है. उनके किसी काम को दूसरे का समर्थन नहीं चाहिये. ऐसी तमाम कलापूर्ण कल्पनाएं हैं जो आखि़रकार असर करती ही हैं चाहे कोई ईश्वर को माने या न माने?’

गांधी जी की अपनी आस्था गहरी और अटल थी. पर उनकी दूसरों की जो उनसे भिन्न आस्था रखते या कोई भी आस्था न रखते हों, समझ और अपने से मिलाकर रखने की सूझ भी उतनी ही अनूठी थी. यह पूरा प्रसंग यह भी स्पष्ट करता है कि गांधी जी भले महात्मा हों उनके सहयोगी या और कोई भी उनसे प्रश्न पूछ सकता था, उनसे असहमत भी हो सकता था. इसी लेख में लोहिया जी बताते हैं कि गांधी जी ने उनसे कहा.... ‘तुम तो ज़िम्मेदारी से भागते हो.’ मैंने कहा कि आप जब इस नतीजे पर पहुंच जायें कि देश के सबसे अच्छे लोग कांग्रेस नेता ही नहीं हैं तभी आप मुझे कुछ ज़िम्मेदारी दें.’.... इस बात के करीब छत्तीस घंटे बाद गांधीजी ने मुझे रात को अपने सोने के कमरे में बुलाकर पूछा- ‘क्या मैंने ऐसा कभी कहा है कि वे लोग सबसे अच्छे हैं.’ मैंने कहा हां आपने ऐसा एक नहीं हज़ार दफे कहा है. तब गांधी जी ने कहा कि मैंने कहा था कि ‘इनसे ज़्यादा अच्छे नहीं’ दोनों में फ़र्क है. पूरा प्रसंग गांधी जी की हत्या के कुछ दिनों पहले का है.

अतिव्याख्या दुर्व्याख्या

इन दिनों व्यापक सामाजिक जीवन में दुर्व्याख्या का विष बहुत फैल गया है. भारत, परंपरा, धर्म, संस्कृति, इतिहास, लोकरंग, संविधान, न्याय की दुर्व्याख्या इतने व्यापक स्तर पर की जा रही है कि उनसे त्रस्त लोग अतिव्याख्या पर उतर आते हैं. दोनों तरफ की व्याख्याओं में असल व्याख्या की जगह और पूछ लगातार घट रही है. पर, दुर्भाग्य से, दोनों तरह की व्याख्याओं का चलन बहुत पहले से है. किसी कृति के किसी बिम्ब या छवि को प्रतीकात्मक मानकर उसकी अति या दुर्व्याख्या करने की अकादेमिक हरकत काफ़ी दशकों से चले आ रही है. सामान्य मानवीय प्रेम को वैसा न रहने रहने देकर आत्मा-परमात्मा के आध्यात्मिक व्यापार में बदलना, पेड़ को पेड़ न रहने देकर उसे किसी चीज़ का प्रतीक मानना-मनवाना भी अकसर होता रहता है. कुछ ऐसी मानसिकता विकसित कर दी गयी है कि साहित्य के अध्यापक हर बिम्ब या वस्तु को प्रतीक में ढाल देते हैं और सच्चाई से साहित्य की दूरी और बढ़ा देते हैं.

नोबेल विजेता लातीनी अमरीकी उपन्यासकार गैब्रियल गार्सिया मार्क्वेज के उनकी लंबी पत्रकारिता की दौरान लिखे गये लेखों का एक संचयन अंग्रेज़ी अनुवाद में ‘दि स्कैण्डल ऑफ दि सेंचुरी’ के नाम से अलफ्रेड नाफ़ ने प्रकाशित किया है. उन्होंने अपने उपन्यासों के चरित्रों और प्रसंगों की दुर्व्याख्या के कई नमूने दिये हैं. ख़राब अध्यापकों की एक तरह की लड़ी लगी हुई है: एक मानता है कि एक हृदयहीन मोटी दादी कभी न अघानेवाले पूंजीवाद का प्रतीक है. दो ऐसे ही अध्यापकों ने उन्हें यह बताकर चकित किया कि उनका एक उपन्यास बेला बारटोक के तीसरे पियानो कन्सर्तो की संरचना के अनुरूप है. हवाना के एक अध्यापक ने यह नतीजा निकाला कि उनके क्लैसिक ‘एकान्त के एक सौ वर्ष’ में कोई समाधान नहीं दिया गया है. मार्क्वेज की टिप्पणी है - ऐसे अध्यापक किसी कृति के बहाने अपना ही गल्प गढ़ लेते हैं.

उनका आगे यह कहना है कि काफ़का की कहानी ‘कायाकल्प’ में ग्रेगोरी साम्सा एक सुबह अपने को एक विशाल कीड़े में बदल गया पाता है तो उन्हें नहीं लगता कि यह किसी चीज़ का प्रतीक है. एक तरह का अंधा तर्कवाद ख़राब अध्यापक व्यापक रूप से फैला रहे हैं. वे अपने बचपन और स्कूल के अध्यापकों को याद करते हुए कहते हैं कि ऐसे अध्यापक थे जो छात्रों को कविता में मुक्त और निजी शिरकत करने, उसके आश्चर्य से दो-चार कराते थे. साहित्य में कोई भी पाठ्यक्रम अच्छा पढ़ सकने के निर्देश के अलावा कुछ और नहीं होना चाहिये. उनका पक्का मत है कि उपन्यासकार जितना कहते हैं उससे अधिक कहने की उनकी इच्छा या कोशिश नहीं होती है. वे जो कहते हैं कि वह वही है जो वे कहना चाहते हैं- न ज़्यादा, न कम.