छह अगस्त 1945. हिरोशिमा में सोमवार की सुबह थी. धूप खिली हुई थी. लोग अपने काम-धंधे के रास्ते पर थे. सवा आठ बजे थे. अधिकतर बच्चे भी अपने स्कूलों या आंगनबाड़ियों में पहुंच चुके थे. तभी, साढ़े तीन लाख की जनसंख्या वाले इस शहर के ऊपर आकाश में एक अमेरिकी बी-29 बमवर्षक दिखाई पड़ा.

यह लड़ाकू विमान दो अन्य विमानों के साथ फिलीपींस सागर के तिनियान द्वीप से चला था और छह घंटे बाद हिरोशिमा पहुंचा था. उसके चालक पॉल डब्ल्यू टिबेट्स ने अपनी मां के सम्मान में विमान को ‘एनोला गे’ नाम दे रखा था. उसकी मां का यही नाम था. ‘एनोला गे’ जब जापान के मुख्य द्वीप से क़रीब पांच घंटे की उड़ान की दूरी पर था तो राडार के पर्दे पर उसका पता लग गया था. लेकिन उसका रास्ता रोकने या मार गिराने का कोई प्रयास नहीं हुआ. क्यों? यह आज तक कोई नहीं जानता.

‘एनोला गे’ हिरोशिमा के ऊपर क़रीब 10 किलोमीटर की ऊंचाई पर था जब पॉल टिबेट्स ने बम गिराने की अंतिम तैयारियां पूरी कीं. उसके सहयोगी मेजर टॉमस फ़ेरेबी ने एक स्विच दबाया और बम ज़मीन की ओर चल पड़ा. 43 सेकंड बाद जमीन से लगभग 580 मीटर की ऊंचाई पर यह बम प्रचंड विस्फोट के साथ फट पड़ा.

बम को सबसे व्यस्त पुल के ऊपर फटना था

64 किलो यूरेनियम के बने ‘लिटिल बॉय’ नाम के इस बम की विस्फोटक क्षमता 16 किलोटन ‘टीएनटी’ के बराबर थी. उसे वास्तव में ‘आइओई’ नाम के हिराशिमा के एक सबसे व्यस्त पुल के ठीक ऊपर फटना था. पर तेज़ हवा के झोंकों ने उसे लक्ष्य से क़रीब 240 मीटर भटका कर ‘शीमा’ नाम के एक अस्पताल के ऊपर पहुंचा दिया. विस्फोट के साथ 10 लाख डिग्री सेल्सियस की जो प्रचंड गर्मी और प्रघात तरंगें पैदा हुईं, उनसे 1.6 किलोमीटर व्यास के दायरे में सब कुछ पूरी तरह नष्ट हो गया. चार किलोमीटर के दायरे में सारे मकान ढह गये. शहर में सेना का मुख्यालय तक नहीं बचा.

विस्फोट से फैली आग से 11 वर्ग किलोमीटर के दायरे में जो कुछ भी जल सकता था, जलने लगा. खुद अमेरिकी जानकारों का अनुमान है कि मात्र पांच सेकंड के भीतर 80 हज़ार लोग मर गये! जो अन्य हज़ारों लोग तुरंत नहीं मरे, वे जल जाने, रेडियोधर्मिता या बुरी तरह घायल हो जाने के कारण वर्षों बाद तक तड़प-तड़प कर मरते रहे. विस्फोट से पैदा हुई धुंध, धुंए और रेडियोधर्मी ग़ुबार का बादल, किसी कुकुरमुत्ते जैसे आकार में, ज़मीन से लेकर 14 किलोमीटर ऊपर तक छा गया. ज़मीन पर उसका व्यास क़रीब एक किलोमीटर था.

इस ग़ुबार के बादल के कारण कुछ घंटे बाद कालिख-भरी बरसात होने लगी. इससे नदियों, तालाबों और झीलों का पानी लंबे समय के लिए रेडियोधर्मिता से प्रदूषित हो गया.

हवाई हमले का सायरन नहीं बजा

उस दिन के भुक्तभोगी रहे और जीवित बच गये हिरोशिमा-वासियों का कहना है कि आकाश में उन्होंने तीन विमान देखे. लेकिन जनता को सजग करने के लिए हवाई हमले का कोई सायरन नहीं बजा! सायरन बजना शुरू हुआ साढ़े आठ बजे. बम गिरने के 15 मिनट बाद!

‘एनोला गे’ के अलावा जो दो दूसरे विमान देखे गये, उनमें से एक में फ़ोटोग्राफ़र बैठे थे और दूसरे में अवलोकन-मापन उपकरणों के साथ कई वैज्ञानिक.

भूकंप प्रधान जापान में उस समय अधिकतर मकान हल्की लकड़ी और कागज़ के बने होते थे. शहर के 76 हज़ार घरों में से 70 हज़ार जल कर नष्ट हो गये या बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गये. हिरोशिमा की क़रीब एक-तिहाई जनता देखते ही देखते काल के गाल में समा गयी. 70 हज़ार लोग झुलस गये या घायल हो गये. 20 हज़ार सैनिक भी मारे गये. बम के रेडियोधर्मी विकरण से होने वाले दीर्घकालिक दुष्प्रभावों के कारण होने वाली मौतें आज भी जारी हैं.

तीन दिन बाद प्रलय की पुनरावृत्ति

इसी परमाणविक प्रलय की पुनरावृत्ति, तीन दिन बाद, गुरुवार नौ अगस्त को, दोपहर 11 बज कर दो मिनट पर नागासाकी में भी हुई. वहां ‘फ़ैट बॉय’ नाम का जो दूसरा बम गिराया गया, वह यूरेनियम नहीं बल्कि उससे भी अधिक घातक प्लूटोनियम का बना हुआ था. अमेरिका ने उसका तब तक कोई परीक्षण भी नहीं किया था. नागासाकी में उसका वैज्ञानिक परीक्षण और जनसंहारक उपयोग, दोनों हुआ. एक किलोमीटर के दायरे में 80 प्रतिशत मकान भस्म हो गये. 70 से 80 हज़ार लोग मारे गये.

संभावित लक्ष्यों की पहली सूची में वास्तव में चार शहरों को चुना गया था – हिरोशिमा, कोकूरा, क्योतो और निईगाती. क्योतो जापान की पुरानी राजधानी रह चुका था. अमेरिका के तत्कालीन युद्धमंत्री हेनरी स्टिम्सन ने अपनी पत्नी के साथ क्योतो में कभी हनीमून मनाया था. वे नहीं चाहते थे कि जिस शहर के साथ उनकी मधुर यादें जुड़ी हैं, वह उनके देश के हाथों मिट जाये. क्योतो को बचाने के लिए उन्होंने नागासाकी का नाम सुझाया था.

प्रलयंकारी संहारलीला का औचित्य

हिरोशिमा व नागासाकी पर गिराये गये दोनों परमाणु बमों की प्रलयंकारी संहारलीला का औचित्य यह बताया गया कि उनके बिना जापान द्वितीय विश्वयुद्ध में न तो अपनी पराजय मानता और न आत्मसमर्पण करता. यह सच है कि हिटलर के जर्मनी ने तो आठ मई 1945 को बिना शर्त आत्मसमर्पण कर दिया था, जबकि जापान ने दोनों परमाणु बमों की मार खाने के बाद, 15 अगस्त 1945 को, अपनी हार मानी. उस दिन सम्राट हिरोहितो ने रेडियो पर एक भाषण में कहा, ‘समय और भाग्य के आदेश पर हमने शांति का मार्ग प्रशस्त करना तय किया है. उन सब पीढ़ियों के लिए, जिन्हें अब कष्ट सहना पड़ेगा, यह निश्चित रूप से असहनीय है.’ दो सप्ताह बाद, दो सितंबर के दिन, जापानी सेना ने विधिवत आत्मसमर्पण भी कर दिया.

लेकिन, सच यह भी है कि जापान, 1945 का जुलाई महीना आने तक, अमेरिका और उसके साथ के ‘मित्र-राष्ट्रों’ के साथ शांतिवार्ता के रास्ते तलाशने लगा था. जर्मनी के पतन के बाद उसकी राजधानी बर्लिन से सटे हुए पोट्सडाम शहर में, 17 जुलाई से दो अगस्त तक, द्वितीय विश्वयुद्ध के विजेता ‘मित्र-राष्ट्रों’ का एक शिखर सम्मेलन हुआ था. उसमें तीन मुख्य विजेता देशों के शीर्ष नेताओं– अमेरिका के राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल और तत्कालीन सोवियत संघ के तानाशाह योसेफ़ स्टालिन ने भाग लिया था.

जापान शांतिवार्ताएं चाहता था

इस सम्मेलन से एक सप्ताह पहले, नौ जुलाई 1945 के दिन, मॉस्को में जापानी राजदूत ने सोवियत विदेशमंत्री व्याचेस्लाव मोलोतोव से मलाकात की थी. उन्होंने अनुरोध किया था कि पोट्सडाम सम्मेलन के नेताओं से कहा जाये कि जापान उनके साथ शांतिवार्ताएं चाहता है. नयी जानकारियों के अनुसार यह अनुरोध सम्राट हिरोहितो की पहल पर हुआ था. उस समय तक सोवियत संघ अकेला ऐसा देश था, जिसके विरुद्ध जापान युद्ध की स्थिति में नहीं था.

नयी जानकारियां यह भी कहती हैं कि पोट्सडाम सम्मेलन के समय राष्ट्रपति ट्रूमैन और उनके युद्धमंत्री हेनरी स्टिम्सन को यह मालूम रहा होना चाहिये कि जापान का घुटने टेक देना, बस, केवल कुछ दिनों की बात है. अमेरिकी गुप्तचर सेवा ‘सीआईए’ जापानी सरकार द्वारा उसके कुछ राजदूतों को भेजे गये तारों (टेलीग्रामों) की गुप्तचरी से इसे जान चुकी थी. इस संदर्भ में काफ़ी खोज कर चुके कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर सॉन मैलोय कहते हैं, ‘जापान ने संभावित सोवियत मध्यस्थों के द्वारा तथा स्विट्ज़रलैंड में अपने दूतावास द्वारा बहुत स्पष्ट संकेत दिये थे कि वह अब शांति चाहता है.’ जापानी विदेश मंत्री तोगो ने स्विट्ज़रलैंड में अपने राजदूत सातो के नाम 11 जुलाई 1945 को भेजे गए एक तार में लिखा, ‘हम अपनी विकट स्थिति के कारण युद्ध का अंत कर देने पर गोपनीय विचार कर रहे हैं.’

अमेरिका बिना शर्त आत्मसमर्पण मांग रहा था

यही नहीं, जापान ने एलन डलेस नाम के एक अमेरिकी अधिकारी से भी संपर्क किया, जो बाद में ‘सीआईए’ का निदेशक बना. पोट्सडाम में अमेरिका तब भी किसी शांतिवार्ता के बदले जापान को पूरी तरह नीचा दिखाने वाले बिना शर्त आत्मसमर्पण पर तुला रहा. उसी के आग्रह पर पोट्सडाम सम्मेलन की संयुक्त विज्ञप्ति में जापान से कहा गया कि वह बिना शर्त अविलंब आत्मसमर्पण करे.

कुछ नये तथ्यों और अब तक अज्ञात रहे नये दस्तावेज़ों से यह भी पता चलता है कि 1940 वाले दशक के पूर्वार्ध में हिटलर शासित जर्मनी, अमेरिका और स्टालिन शासित सोवियत संघ के बीच एक गुप्त होड़ चल रही थी कि कौन सबसे पहले परमाणु बम बना लेता है. अमेरिका को पता चला था कि स्टालिन के वैज्ञानिक 1943 से परमाणु बम बनाने में जुटे हुए हैं. जर्मनी ने 1944 तक वी-2 नाम का एक रॉकेट बना लिया था और उसके वैज्ञानिक किसी भी समय परमाणु बम का भी धमाका कर सकते हैं. इसलिए हर हाल में अमेरिका सबसे पहले अपना बम बना लेना चाहता था.

अमेरिका ने बम बनाने में बाज़ी मार ली

मई 1945 में जर्मनी के आत्मसमर्पण से जर्मन बम का डर तो नहीं रहा, पर सोवियत बम का डर बना हुआ था. जुलाई आने तक अमेरिकी बम के निर्माण पर दो अरब डॉलर ख़र्च हो चुके थे. पोट्सडाम शिखर सम्मेलन शुरू होने से ठीक एक दिन पहले, 16 जुलाई 1945 के दिन, अमेरिकी वैज्ञानिकों ने वहां के ‘लोस अलामोस’ मरुस्थल में पहले यूरेनियम परमाणु बम का परीक्षण (ट्रिनिटी टेस्ट) किया. परीक्षण सफल रहा. अमेरिका ने बाज़ी मार ली.

राष्ट्रपति ट्रूमैन ने सोवियत तानाशाह स्टालिन को यह बात पोट्सडाम सम्मेलन के समय स्वयं ही बतायी. स्टालिन ने उसी शाम अपनी गुप्तचर सेवा के प्रमुख लावरेंत बेरिया से कहा कि सोवियत परमाणु बम के काम में और तेज़ी लायी जाये. अमेरिका ने पहले ही तय कर लिया था कि पहला परमाणु बम जापान पर ही गिराया जायेगा. इससे सोवियत संघ को भी यह संदेश मिल जायेगा कि 20 वीं सदी की सबसे अजेय महाशक्ति अमेरिका ही है.

जापान पर परमाणु बम गिराना पहले से तय था

जापान पर दोनों बम गिराए जाने से तीन साल पहले, अमेरिका ने अपने यहां से हज़ारों किलोमीटर दूर, जापान के निकटवर्ती देश फिलीपींस के पास के तिनियान द्वीप पर एक गुप्त वायुसैनिक अड्डा बनाया. वहां कुछ ऐसे वैज्ञानिक भी रखे गये थे, जो चुने हुए वायुसैनिकों को भविष्य में किसी दिन जापान पर परमाणु बम गिराने का प्रशिक्षण देने में हाथ बंटा रहे थे. बम बनाने का काम अमेरिका की अपनी भूमि पर युद्धस्तर पर चल रहा था. यानी, अमेरिका ने 1942 में ही तय कर लिया था कि पहला परमाणु बम जब भी बन कर तैयार हो जायेगा, वह द्वितीय विश्वयुद्ध छेड़ने वाले हिटलर के जर्मनी पर नहीं, हिटलर का साथ दे रहे जापान पर गिराया जायेगा.

जापान पर ही इसलिए कि जापानी वायुसेना ने, सात दिसंबर 1941 को, प्रशांत महासागर के हवाई द्वीप पर स्थित अमेरिकी नौसैनिक अड्डे पर्ल हार्बर पर अचानक हमला बोल कर अमेरिका को भारी चोट पहुंचाई थी. अमेरिका द्वितीय विश्वयुद्ध में तब तक शामिल नहीं हुआ था. इस आकस्मिक आक्रमण से बौखला कर दूसरे ही दिन, यानी आठ दिसंबर 1941 को उसने विश्वयुद्ध में कूद पड़ने की घोषणा कर दी.

अमेरिकी निर्णय में नस्लवाद की गंध!

ये अटकलें भी रही हैं कि अमेरिका ने अपना पहला बम गिराने के लिए जर्मनी के बदले जापान को ही लक्ष्य इसलिए बनाया, क्योंकि अमेरिका मूलतः यूरोप से आ कर वहां बस गये लोगों का देश है. उनके बीच जर्मनों का अनुपात लगभग एक-चौथाई के बराबर था. परमाणु बम बनाने में लगे कई प्रमुख यहूदी या ग़ैर-यहूदी वैज्ञानिक भी जर्मनी से ही आये और अमेरिका में बस गये थे. उनके कुछ न कुछ परिजन फिर भी जर्मनी में ही थे. जबकि जापान अमेरिका वालों के लिए हर दृष्टि से विदेश था. पर्ल हार्बर पर आक्रमण के बाद से जापान ही परम शत्रु देश भी था. उसके प्रति दया या मानवीयता दिखाने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता था.

अमेरिका को यह भी मालूम था कि हिटलर के वैज्ञानिक भी जर्मन परमाणु बम बनाने में लगे हुए हैं. द्वितीय विश्वयुद्ध के अंतिम चरण में जर्मनी के जिस हिस्से पर अमेरिकी सैनिक पहले पहुंचे, वहां उन्होंने रूसियों के आने से पहले ही जर्मन बम के बारे में हर संभव जानकारी जुटाने की पूरी कोशिश की. एक जगह उन्हें ज़मीन में गड्ढे खोद कर छिपाये गये यूरेनियम के बहुत से पीपे मिले.

अमेरिकी बम के लिए जर्मन यूरेनियम

कैलीफ़ोर्निया विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर सॉन मैलोय का एक डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म में कहना है, ‘इन अमेरिकी सैनिकों की एक रिपोर्ट के अनुसार, पीपों वाली जगह के पास एक कारख़ाना था जहां कागज़ की बड़ी मज़बूत थैलियां बनती थीं. ज़ब्त कर ली गईं कागज़ की इन्हीं थैलियों में पीपों वाले यूरेनियम को भर कर और ट्रकों पर लाद कर वहां से हटाया गया. इसे विमान द्वारा पहले ब्रिटेन और वहां से फिर अमेरिका पहुंचाया गया.’ इस तरह क़रीब एक हज़ार टन यूरेनियम जर्मनी से अमेरिका पहुंचा.

पश्चिमी अमेरिका के वाशिंगटन राज्य में स्थित हैनफ़ोर्ड नाम के शहर में इस यूरेनियम से परमाणु बम लायक संवर्धित यूरेनियम और प्लूटोनियम हासिल किया गया. यही सामग्री अप्रैल 1945 में लोस अलामोस भेजी गयी, जहां परमाणु वैज्ञानिक अमेरिका का पहला परमाणु बम बनाने में लगे हुए थे. उस समय तक उन्हें कोई निर्णायक सफलता हाथ नहीं लगी थी, बल्कि उन्हें संदेह होने लगा था कि बम बनाने की उनकी विधि काम करेगी भी या नहीं. तब तक तीन वर्ष बीत चुके थे और दो अरब डॉलर से अधिक धन ख़र्च हो चुका था.

बम की योजना रूज़वेल्ट की विरासत थी

अमेरिकी परमाणु बम की इस गोपनीय योजना पर अनेक वैज्ञानिकों सहित दो लाख लोग काम कर रहे थे. उस समय के अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन रूज़वेल्ट 1945 की वसंत ऋतु आने तक बहुत बीमार हो गये. वे चाहते थे कि अमेरिकी परमाणु बम सोवियत बम से पहले ही बन जाना चाहिये. 12 अप्रैल 1945 को मस्तिष्काघात (इन्ट्रासेरीब्रल हेमोरेज) से अपनी मृत्यु से एक ही सप्ताह पहले, अमेरिकी कांग्रेस (संसद) के अनुमोदन के बिना ही रूज़वेलेट ने बम के प्रयोग का आदेश दे दिया. उनकी मृत्यु के बाद हैरी ट्रूमैन ऩये राष्ट्रपति बने.

द्वितीय विश्वयुद्ध एक सितंबर 1939 को शुरू हुआ था. लेकिन जापान 1937 से ही एशिया में लड़ने-भिड़ने में व्यस्त था. एक राजशाही देश होते हुए भी वहां सेना की तूती बोलती थी. सेना वयस्कों ही नहीं, 11-12 साल के बच्चों तक को पट्टी पढ़ा रही थी कि (आजकल के आत्मघाती इस्लामी आतंकवादियों की तरह) आत्मघाती हमलों द्वारा शत्रु को मारते हुए देशहित में मरना मोक्ष या देवत्व प्राप्त करने के समान है.

जापानी कुछ समय पहले तक मुंह नहीं खोलते थे

उस समय किशोरवय में ही सेना की सेवा कर चुके कई वयोवृद्ध जापानियों ने हाल ही में इस परिपाटी की पुष्टि की है. ऐसी बातों के बारे में जापानी कुछ समय पहले तक मुंह नहीं खोलते थे. 10 साल की स्कूली छात्रा रही रेइको यामादा ने ऐसे ही एक इंटरव्यू में कहा, ‘स्कूल में हमें लगभग कुछ नहीं पढ़ाया गया. केवल सैनिकों की तरह मार्च करना और लाल-सफ़ेद राष्ट्रीय झंडा लहराना सिखाया गया.’ 1945 आते-आते जापानी सेना की कमर टूट चुकी थी.तब भी हार मानने की शर्मिंदगी उसे स्वीकार नहीं थी. जापानी सेना को हो रही भारी क्षतियों के कारण ही उसकी सहायता पर आश्रित नेताजी सुभाष चंद्र बोस की आज़ाद हिंद फ़ौज भी पूर्वी भारत में आगे नहीं बढ़ पा रही थी.

1945 में अमेरिकी बमवर्षक हर रात जापानी शहरों पर कहर बरपा रहे थे. टोकियो पर एक ही रात की बमबारी में एक लाख से अधिक लोग मारे गये. चार ही महीनों की अमेरिकी बमबारी ने 66 जापानी शहर धराशायी कर दिए. अनुमान है कि इन शहरों में कुल चार लाख लोग मरे. जापानी सेना तब भी जनता से यही कहती रही कि झुकना नहीं, अंतिम सांस तक लड़ते रहना है. सेना के अभिलेखागारों में अब ऐसी फ़िल्में और दस्तावेज़ मिले हैं, जिनसे पता चलता है कि जापानी जनता युद्ध से कितनी थक और ऊब चुकी थी. सेना के ऊंचे अफ़सर भी इस सच्चाई को जानते थे. तब भी वे यही प्रचार कर रहे थे कि विजय सन्निकट है.

सम्राट ने सेना से आत्मसमर्पण करने को कहा

इस प्रचार पर विश्वास शायद ही कोई कर पा रहा था. पर देशप्रेम के नाम पर सभी चुप थे. आखिरकार जापान के सम्राट को सेना से कहना पड़ा कि उसे आत्मसमर्पण की तैयारी करनी चाहिये. सम्राट जिस समय सेना से यह कह रहे थे, उस समय अमेरिका के लोस अलामोस मरुस्थल में पहले परमाणु बम के परीक्षण की तैयारी चल रही थी. परीक्षण के निदेशक रॉबर्ट ओपनहाइमर की देखरेख में, 16 जुलाई 1945 के दिन, स्थानीय समय के अनुसार साढ़े पांच बजे बम का सफल परीक्षण हुआ. पोट्सडाम शिखर सम्मेलन में भाग ले रहे राष्ट्रपति ट्रूमैन को तुरंत इसकी ख़बर दी गई. इस ख़बर ने जापान से बदला लेने की अमेरिकी अकड़ को दम घोट जकड़ बना दिया.

ट्रूमैन ने 26 जुलाई 1945 को पोट्सडाम शिखर सम्मेलन में घोषित किया, ‘हमारी संपूर्ण सैन्य शक्ति और दृढ़निश्चय का अर्थ है जापानी सेना का अपरिहार्य विनाश और जापानी देश का अपरिहार्य विध्वंस. जापान पर पूरी तरह क़ब्ज़ा कर लिया जायेगा. उसके नेताओं को अपदस्थ और तहस-नहस कर दिया जायेगा.’ इस घोषणा के 11वें दिन हिरोशिमा पर पहला और 14वें दिन नागासाकी पर दूसरा परमाणु बम गिराया गया.

सम्राट ही जापानी जनता का हृदय-सम्राट भी

दोनों बम जापान के नेताओं पर नहीं, जनता पर गिरे. जनता मरी और तहस-नहस हुई. नयी जानकारियों के प्रकाश में अब कहा जा रहा है कि पोट्सडाम सम्मेलन की संयुक्त विज्ञप्ति से यह स्पष्ट नहीं था कि देश के आत्मसमर्पण के बाद जनता के बीच सर्वाधिक सम्मानित सम्राट का पद बना रहेगा या नहीं. यदि यह स्पष्ट होता कि सम्राट का पद बना रहेगा तो आत्मसमर्पण की राह आसान हो जाती. हर सम्राट सदियों से जापानी जनता का हृदय-सम्राट भी रहा है. एक ऐसे जापान को, जिसका कोई सम्राट नहीं है, जनता स्वीकार नहीं कर पाती. कुछ इतिहासकार मानते हैं कि राष्ट्रपति हैरी ट्रूमैन ने पोट्सडाम घोषणा में सम्राट संबंधी भ्रम जानबूझ कर बनाये रखा, ताकि वे अपने परमाणु बमों को जापान पर पटक कर उसे अपनी उंगली के इशारे पर नचा और दुनिया पर अमेरिका की धाक जमा सकते.

पहले बम के लिए हिरोशिमा को संभवतः इसलिए चुना गया कि वह जापानी संस्कृति का एक तरह से पर्याय था, बहुत ही आकर्षक था और वहां सेना की बहुत बड़ी छावनी भी थी. पश्चिमी जापान का वही सबसे बड़ा शहर था. पहला परमाणु बम गिरने तक वह अमेरिकी बमबारी से अछूता रह गया था. पर इस आशंका से, कि वहां किसी भी समय अमरिकी बमबारी हो सकती है, अगस्त 1945 के शुरू में वहां के 23 हज़ार बच्चों को देहाती इलाकों में भेज दिया गया. जापान की अमेरिकी नाकेबंदी के कारण खाने-पीने की चीज़ों का तब तक इतना अकाल पड़ गया था कि इन बच्चों को पेड़ों की पत्तियां और घास तक खानी पड़ती थी.

नरक जैसा डरावना दृश्य

जो लोग और बच्चे बम फटने के समय हिरोशिमा के केंद्र में थे, वे यदि उस क्षण पैदा हुई भीषण गर्मी, हवा के प्रचंड झोंके या रेडियोधर्मी कणों की बौछार से कुछ ही क्षणों या मिनटों में मर नहीं गये थे, तो वे अंधे, बहरे या लूले-लंगड़े हो गये. उनके कान, हाथ-पैर या दूसरे अंग शरीर से टूट कर बिखर गये थे. कपड़े जल गये थे. जो मर गये थे, उनका शरीर भुन कर गहरे काले रंग का हो गया था. जीवितों के शरीर से त्वचा और मांस के झुलसे हुए लोथड़े लटक रहे थे. खून यदि भाप बन कर सूख नहीं गया था तो सारे शरीर से टपक रहा था या ख़ून की उल्टी हो रही थी. चेहरे जल कर विद्रूप हो गये थे. सड़कों पर पड़े उनके ढेर अकड़े हुए अस्थिपंजरों या चीखती-कराहती भुतही लाशों जैसे लग रहे थे.

जब क्षण भर में हज़ारों-लाखों लोगों का ऐसा वीभत्स हाल हो जाये, तो उनकी सहायता भी भला कौन कर सकता था. न खाने को कुछ था, न पीने को. भूख-प्यास असह्य हो जाने पर जिस किसी ने नदी-तालाब का पानी पिया या घास-फूस खाया, उसके शरीर में जानलेवा रेडियोधर्मिता और बढ़ी. उस समय के कुछ उत्तरजीवी अब स्वीकार करते हैं कि भूख की मार असह्य हो जाने पर शर्म-हया और नैतिकता भी मर गयी. चोरी-डकैती,लूट-मार और यहां तक कि नरभक्षण (कनीबलिज़्म) भी होने लगा. मृतकों के मुंह से सोने वाले दांत उखाड़ लिये जाते थे.

लाशों से उठती असह्य दुर्गंध

लोग बताते हैं कि मरघट जैसी शांति के बीच चारों ओर पड़ी लाशों से उठती दुर्गंध इतनी भीषण थी कि आदमी पागल हो जाये. बम गिरने से कुछ ही दिन पहले हिरोशिमा के जो 23 हज़ार बच्चे देहातों में भेजे गये थे, वे जब अपने घरों को लौटे तो अधिकांश ने यही पाया कि न तो उनके घर बचे थे और न घरवाले. भूख-प्यास या बीमारी से जो अनाथ बच्चे मरते थे, उन्हें कूड़े-कचरे के साथ जला दिया जाता था. जो बच्चे या वयस्क जीवित रह गये थे, विकलांग या कुरूप हो गये थे, उन्हें ‘हिबाकुशा’ कहा जाने लगा. स्वस्थ लोग उनके साथ अछूतों जैसा व्यवहार करते थे. उनसे दूर रहते थे. उन्हें कोई नौकरी-धंधा या जीवनसाथी नहीं मिलता था. सब जगह अपमानित और तिरस्कृत होना पड़ता था.

धरती के इतिहास में मानवरचित ऐसा अकल्पनीय नरक इससे पहले कभी नहीं रहा होगा. यह भी अकल्पनीय ही कहलायेगा कि सारी दुनिया में हिरोशिमा की चर्चा थी – नहीं थी, तो जापान में. सरकार और सेना ने तय किया था कि देश की जनता को इस बारे में कुछ नहीं बताना है. प्रेस पर सेंसरशिप थोप दी गयी. अमेरिकी प्रेस में भी जपानियों की दारुण दशा के बारे में शायद ही कभी कुछ लिखा जातता था. काफ़ी समय बाद जब कुछ लिखने-छपने लगा, तो यह तर्क दिया जाने लगा कि बम गिराने के बदले यदि सैनिक जापान में उतारे जाते, तो 10 लाख सैनिकों की बलि देनी पड़ती. अमेरिकी जनता क्या इसे पसंद करती!

नागासाकी में भी यही हाल

हिरोशिमा के तीन दिन बाद, नौ अगस्त को नागासाकी में भी वही हुआ. जापानी वायुसेना ने एक बार फिर अमेरिकी विमानों को न तो रोका ओर न उन्हें मार-गिराने का कोई प्रयास किया. इसका एक कारण यह हो सकता है कि एक दिन पहले यानी आठ अगस्त को सोवियत संघ ने जापान अधिकृत मंचूरिया पर आक्रमण कर दिया था. जापानी सेना के उच्च अधिकारी इस नये आक्रमण का उत्तर देने में व्यस्त थे.

जून 1941 में जब जर्मनी ने सोवियत संघ पर आक्रमण कर दिया और सोवियत संघ को भी जर्मनी-जापान-इटली वाली धुरी-शक्तियों (ऐक्सि पावर्स) के विरोधी अमेरिका-ब्रिटेन-फ्रांस के मित्र-राष्ट्र (एलाइड पवर्स) गुट में शामिल होना पड़ा, तो उस समय स्टालिन ने वादा किया था कि ज़रूरत पड़ने पर सोवियत संघ जापान के विरुद्ध अलग से मोर्चा खोलेगा.

रूसियों ने पीठ में छुरा भोंका

जापान ऐसा नहीं मान रहा था कि कुछ ही दिन पहले पोट्सडाम सम्मेलन के समय जिस सोवियत संघ के माध्यम से वह शांतिवार्ताएं आरंभ करवाने का प्रयास कर रहा था, वही सोवियत संघ इतनी जल्दी उसकी पीठ में छुरा भोंक देगा. विपरीत काल में मुसीबत आती है, तो हर तरफ़ से आती है. जापानियों को ऐसा लग रहा था, मानो सारी दुनिया मिल कर उनका अस्तित्व ही मिटा देना चाहती है.

नागासाकी को भी परमाणु बम का निशाना बनाना, मरे हुए को एक बार फिर से मारने जैसा था. कुछ इतिहासकारों का मानना है कि 8 अगस्त, 1945 को जापान के विरुद्ध स्टालिन की युद्ध-घोषणा से अमेरिका को यह डर लगने लगा था कि कहीं ऐसा न हो कि वह अपने प्लूटोनियम बम ‘फैट मैन’ का वहां परीक्षण ही न कर पाए. इस डर से दूसरे बम को गिराने की तारीख 13 के बदले नौ अगस्त कर दी गई. अमेरिका यह भी सुनिश्चित करना चाहता था कि रूसी सैनिक, जर्मनी की तरह, कहीं जापानी मुख्यभूमि पर भी पहले पहुंच कर वहां अपना झंडा न फहरा दें. तब हो सकता था कि जापान उसके हाथ से पूरी तरह फिसल जाता या फिर जर्मनी की ही तरह जापान की भी बंदरबांट करनी पड़ती.

मरते को मारना कायरतापूर्ण अमानुषिकता है

नये-पुराने इन तथ्यों के परिप्रेक्ष्य में हम सोचने पर विवश हो जाते हैं. सवाल उठता है कि पोट्सडाम शिखर सम्मेलन की समाप्ति के चार ही दिन बाद अमेरिका द्वारा जापान पर दो परमाणु बम गिरा कर लाखों लोगों की जान ले लेना और तबाही का एक लंबी दुष्चक्र पैदा करना एक सरासर अनावश्यक, कुत्सित, कायरतापूर्ण घोर अमानुषिक कृत्य नहीं था तो और क्या था.

प्रश्न यह भी पैदा होता है कि जापान के साथ जो कुछ हुआ, क्या वह दुनिया को समता, सहिष्णुता और लोकतंत्र का उपदेश देने वाले और अपने आप को इन मूल्यों का सिरमौर मानने वाले अमेरिका और ब्रिटेन के अंधराष्ट्रवाद और नस्लवाद की ही एक अभिव्यक्ति नहीं था? यदि अमेरिका जैसा एक सर्वसाधनसंपन्न लोकतंत्र भी किसी दूसरी जनता के साथ वैसी ही नृशंसताएं कर सकता है, जो हिटलर, स्टालिन या माओ की तानाशाहियों ने अपनी जनता के साथ की हैं, तो लोकशाही और तानाशाही के बीच नैतिक अंतर ही क्या रहा?

कहीं ऐसा तो नहीं है कि बहुप्रशंसित लोकशाही भी उन कमियों और बुराइयों से बच सकने की कोई गारंटी नहीं है जो तानाशाहियों की मौलिक पहचान कहलाती हैं! हिरोशिमा और नागासाकी की विभीषिका वास्तव में किसी बम की अपूर्व संहारक शक्ति से अधिक पर-उपदेशी पश्चिमी लोकतंत्रों की अनैतिकता को कहीं अधिक दर्शाती है. इस विभीषिका से यही शिक्षा मिलती है कि हम पश्चिमी लोकतंत्रों को लोकतांत्रिक होने का आदर्श पैमाना नहीं मान सकते.