इसी साल जनवरी की बात है. लोकसभा चुनाव अभी चार महीने दूर थे. उस दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास एक प्रस्ताव आया. धारा 370 ( संविधान का अनुच्छेद 370) हटाने पर विचार करने की फाइल. उस वक्त तक सरकार में शामिल रहे एक प्रभावशाली अफसर की मानें तो नरेंद्र मोदी ने विचार करने के बाद इस प्रस्ताव को हरी झंडी दे दी.

उस वक्त देश के गृह मंत्री थे राजनाथ सिंह थे. फाइल गृह मंत्रालय के पास गई. अफसर ने बताया कि गृह मंत्रालय के लिए यह फैसला करना आसान नहीं था. क्योंकि कश्मीर में हालात सामान्य से बहुत दूर थे. लेकिन फरवरी आते-आते यह मन बनाया जा चुका था कि चुनाव ऐलान होने से पहले ही जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 को हटा लिया जाएगा. इसी सिलसिले में काम आगे बढ़ा, लेकिन अचानक पुलवामा हमला हो गया. जवाब में बालाकोट एयर स्ट्राइक भी हुई. इसके बाद देश में एक अलग माहौल बन गया. नरेंद्र मोदी सरकार के पिछले साढ़े चार साल के काम से ज्यादा चर्चा पाकिस्तान में घुसकर जैश के अड्डे को उड़ाने की होने लगी. भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को अंदाज़ा लग चुका था कि चुनाव जीतने के लिए यह अनुकूल माहौल है. इसलिए जब धारा 370 की फाइल दोबारा आई तो उसे चुनाव के बाद देखेंगे, कहकर टाल दिया गया. भाजपा के एक बड़े नेता की मानें तो अगर पुलवामा और बालाकोट नहीं होता तो 370 को हटाने का फैसला चार-पांच महीने पहले ही ले लिया गया होता.

नरेंद्र मोदी सरकार ने जो अपने पहले कार्यकाल में नहीं किया उसे दूसरे कार्यकाल की शुरुआत में करने का फैसला किया गया. सरकार की खबर रखने वाले एक सूत्र की मानें तो अमित शाह को गृह मंत्री बनाने के पीछे एक वजह यह भी थी. कई बार बातचीत के दौरान सरकार का शीर्ष नेतृत्व यह कहता सुनाई देता है कि जो 70-72 साल में नहीं हो पाया, उसे दस साल में करना है. अपने इस कार्यकाल में मोदी सरकार इसी नीति पर काम कर रही है. अपने दूसरे कार्यकाल में पहले से भी ज्यादा बहुमत होने की वजह से भी मोदी सरकार का आत्मविश्वास बढ़ा हुआ था. ऊपर से इमरान खान की अमेरिका यात्रा ने बचा-खुचा काम कर दिया. वहां इमरान खान के साथ डोनाल्ड ट्रंप ने कश्मीर पर जिस तरह का बयान दिया उससे निपटने के लिए भी मोदी सरकार ने धारा 370 को पूरी तरह से निष्प्रभावी करने की योजना पर फटाफट काम करना शुरु कर दिया. मोदी सरकार को एक आशंका यह भी थी कि आने वाले समय में पाकिस्तान और अमेरिका के बीच सहयोग और बढ़ सकता है और तब ऐसा करना और मुश्किल हो जाएगा. इसलिए भी उसने कश्मीर के मसले से निपटने के लिए यह वक्त चुना.

अनुच्छेद 370 हटाने से पहले लंबी चौड़ी तैयारी की गई, लेकिन गोपनीयता भी पूरी रखी गई. पंद्रह अगस्त से पहले का वक्त चुना गया ताकि घाटी में ज्यादा फोर्स भेजने की वजह स्वतंत्रता दिवस की तैयारी को माना जाए. भाजपा के कुछ नेताओं ने ही यह फैलाया कि मुमकिन है कि इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की बजाय लाल चौक पर झंडा फहराने जाएं.

इस मामले में सुरक्षा से जुड़ी चीजों का जिम्मा राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने संभाला. वे सभी खुफिया एजेंसियां, रक्षा एजेंसियों, सेना और पुलिस से बात करते रहे. 370 की कानून पेंचीदगी पर कानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद, अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने मिलकर काम किया. इसमें उन्हें अरुण जेटली का भी सहयोग मिला. राज्यसभा में यह फैसला दो-तिहाई बहुमत से पास हो, इसके लिए सरकार के पांच मजबूत मंत्री और मैनेजमेंट में माहिर पार्टी नेताओं को नया फॉर्मूला और नये दोस्त ढूंढने की सलाह दी गई.

इसी नए फॉर्मूले के तहत अचानक विरोधी दलों जैसे कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के राज्यसभा सांसद एक-एक कर इस्तीफा देने लगे. ये इस्तीफे उन्हीं राज्यों के राज्यसभा सांसदों ने दिए जहां इस वक्त भाजपा की सरकार है. मतलब इन सीटों पर दोबारा चुनाव होगा और भाजपा उन्हीं नेताओं को दोबारा अपने सिंबल पर चुनाव जिताकर राज्यसभा भेज देगी. गौर करने वाली बात यह है कि इस मिशन पर लगे किसी भी मंत्री या नेता को यह अंदाज़ा नहीं था कि वह किस काम के लिए समर्थन जुटा रहा है. गोपनीयता का आलम यह था कि पूरे सरकारी महकमे में दस से ज्यादा लोगों को इस बात की खबर नहीं थी.

इसके बाद आनन-फानन में कश्मीर में अमरनाथ यात्रा रोककर सैलानियों को वापस बुला लिया गया और फौज तैनात कर दी गई. यह जिस अंदाज़ में हुआ उससे कयासबाजी तो बहुत हुई लेकिन कश्मीरी नेताओं को ज्यादा कुछ करने का मौका नहीं मिला. मुफ्ती और अब्दुल्ला परिवार इकट्ठा हो पाता उससे पहले ही सारी तैयारी हो चुकी थी. सोमवार को संसद में अमित शाह का बयान होना था और शनिवार और रविवार को भाजपा के सभी सांसद पार्टी की पाठशाला में बैठे थे.

पहले शनिवार को अमित शाह खुद अपनी पार्टी के सांसदों से बात करने वाले थे. लेकिन शनिवार का उनका भाषण रविवार के लिए टाल दिया गया और फिर वे अगले दिन भी पार्टी के कार्यक्रम में नहीं पहुंचे. इसके बाद तय हो गया कि सस्पेंस सोमवार को ही टूटेगा. मोदी सरकार के कार्यकाल में कैबिनेट की सामान्य बैठकें बुधवार को ही होती हैं. लेकिन इस बार जब कैबिनेट की बैठक सोमवार की सुबह बुलाई गई तो सस्पेंस अपने चरम पर पहुंच गया. इस बैठक में भी नोटबंदी जैसी ही गोपनीयता बरती गई और मंत्रियों को किसी तरह की खबर न लीक करने की सलाह दी गई.

संसद में गृह मंत्री अमित शाह बोलते इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद कुछ बड़े नेताओं को फोन पर धारा 370 के बारे में बताया और इस बारे में सहयोगी दलों के कुछ प्रमुख नेताओं को भी खबर दी गई. इसके बाद संसद के अंदर की रणनीति बनाई गई. राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति को पहले ही बता दिया गया था. संसद के अंदर तय हुआ कि अमित शाह 370 का प्रस्ताव पेश करेंगे, साथ ही जम्मू-कश्मीर आरक्षण बिल और जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक भी राज्यसभा में रखा जाएगा. अमित शाह के बाद उनके सबसे भरोसेमंद महासचिव भूपेंद्र यादव को बोलने का मौका मिला. भूपेंद्र यादव भाषण की तैयारी ठीक से कर सकें इसलिए उन्हें भी पहले बता दिया गया था. अमित शाह के दफ्तर के लोग भी बताते हैं कि ‘भूपेंद्र यादव जी के पेट से बात निकालना नामुमकिन है.’

मोदी सरकार में इस एक ही फैसले से कई बाज़ियां जीत ली गई हैं. अमित शाह को गृह मंत्री बने अभी दो ही महीने हुए हैं. जिस अंदाज़ में उन्होंने आर्टिकल 370 से अपनी शुरुआत की है उससे साफ हो गया कि भाजपा में नंबर दो नेता कौन है. दो महीने बाद अक्टूबर-नवंबर में महाराष्ट्र, झारखंड और हरियाणा के विधानसभा चुनाव होने हैं. तीनों राज्य में भाजपा की सरकारें हैं. कांग्रेस लोक सभा चुनाव में मिली करारी हार से अभी भी जूझ रही है और भाजपा अगले चुनाव की तैयार लगभग खत्म कर चुकी है. और अब भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यह बात और भी मजबूती से कह सकते हैं कि उनकी सरकार वाकई मजबूत है और वे अपने प्रमुख चुनावी मुद्दे भूले नहीं हैं.