भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार सुस्त हो रही है यह बात ढंके-छुपे तरीके से आज से करीब छह महीने पहले ही कही जाने लगी थी. भारतीय बाजार के लगभग हर प्रमुख क्षेत्र में मांग तेजी से गिर रही थी. आंकड़े कह रहे थे कि देश में बेरोजगारी 45 साल के सबसे ऊंचे स्तर पर है. लेकिन, उस समय आम चुनाव का माहौल था इसलिए इस तरह की खबरें राजनीतिक सुर्खियों के नक्कारखाने में तूती जैसी साबित हो रही थीं.

आम चुनाव के बाद जब मोदी सरकार एक निर्णायक जनादेश के साथ दोबारी लौटी तो बाजार से लेकर अर्थशास्त्रियों तक को उम्मीद थी कि दूसरे कार्यकाल के अपने पहले बजट में वह कुछ ऐसे प्रावधान करेगी कि आर्थिक ग्रोथ को रफ्तार मिले. उम्मीद की जा रही थी कि बजट आने के बाद आर्थिक माहौल कुछ खुशनुमा होगा, लेकिन हुआ इसका उल्टा.

बजट आने के हफ्ते-दो हफ्ते बाद ही आर्थिक समाचार पत्रों में ऐसी खबरें आने लगीं कि सुस्त अर्थव्यवस्था रफ्तार पकड़ने के बजाय मंदी की तरफ जाती दिख रही है. फिर शेयर बाजार टूटने शुरु हुए और बाजार के जानकारों ने भी कहा कि मंदी की आहट साफ सुनाई दे रही है. सरकार अभी साफ तौर पर भले ही कठिन हालात की बात न कह रही हो, लेकिन उसे भी इस बात का अंदाजा हो चुका है. पीएमओ इस मसले पर लगातार सक्रिय है और माना जा रहा है कि जल्द ही बजट के कई प्रावधानों में बदलाव पर विचार किया जा सकता है. जानकार मानते हैं कि अब बहुत बारीकी में जाने की जरुरत नहीं रही और कारोबारी माहौल पर एक मोटी नजर ही मंदी का इशारा कर देती है:

वाहन, मकानों की बिक्री में भारी गिरावट

ऑटोमोबाइल सेक्टर मंदी की चपेट में है, यह बात मई-जून के आंकड़ों से ही जाहिर होने लगी थी. जून के आंकड़ों के मुताबिक ही देश में वाहनों की बिक्री पिछले 19 साल के न्यूनतम स्तर पर थी. लेकिन, जुलाई में आए आंकड़े और डराने वाले हैं. सभी ऑटोमोबाइल कंपनियों की ब्रिकी में गिरावट दर्ज की गई है. इनमें सबसे ज्यादा चौंकाने वाला आंकड़ा मारुति सुजुकी का है. जुलाई में उसकी बिक्री में करीब 36 फीसदी की कमी दर्ज की गई है. मारुति के आंकड़े सबसे अहम इसलिए हैं क्योंकि उसके वाहनों की बिक्री न केवल ऑटोमोबाइल सेक्टर का बैरोमीटर है, बल्कि इससे आप अर्थव्यवस्था की हालत का भी अंदाजा लगा सकते हैं.

मारुति की बिक्री गिर तो पिछले अप्रैल से ही रही थी, लेकिन जुलाई में आई भारी गिरावट के बाद उसेने अपने अस्थायी कर्मचारियों की सेवाएं समाप्त करनी शुरु कर दी हैं. खबरों के मुताबिक, ऐसे कर्मचारियों में से छह फीसद तक की कटौती की जा सकती है. ऑटोमोबाइल सेक्टर इस हालात में पहुंच चुका है कि पूरे देश में 250 से ज्यादा वाहन डीलरशिप की इकाइयां बंद हो चुकी हैं. वाहनों की घटती बिक्री सबसे ज्यादा चिंताजनक इसलिए भी हैं क्योंकि यह संगठित उद्योग सेक्टर का लगभग 40 फीसदी हिस्सा रखता है. और बिक्री में गिरावट सिर्फ कारों में ही नहीं बल्कि ट्रैक्टर और ट्रक जैसे भारी वाहनों में देखी जा रही है.

वाहनों की लगातार गिरावट से वह फाइनेंस कंपनियां भी प्रभावित होती हैं जिनका पूरा कारोबार ही ऑटो लोन पर चलता है. यानी ऑटोमोबाइल क्षेत्र में मंदी का यह सिलसिला चलता रहा तो बड़े पैमाने पर लोगों की रोजी-रोटी पर बन आएगी.

रियल एस्टेट सेक्टर में भी कमोबेश ऐसे ही हालात हैं. एक आंकड़े के मुताबिक, देश के तीस बड़े शहरों में करीब 12.75 लाख मकान बनकर तैयार हैं, लेकिन उनका कोई खरीददार नहीं है. नोटबंदी, जीएसटी की मार के बाद जैसे-तैसे सुधरे इस सेक्टर ने राहत की सांस ही ली थी कि मकानों की बिक्री न होने और कर्ज संकट बढ़ने से बिल्डर और भी मुश्किल में आ गए हैं. सरकार ने बजट में इस सेक्टर को कुछ प्रोत्साहन के इशारे जरुर किए, लेकिन वे फिलहाल अप्रभावी दिख रहे हैं. रियल एस्टेट सेक्टर छोटे कामगारों को रोजगार मिलने का बड़ा जरिया है, लेकिन यहां भी भीषण मंदी के चलते लोगों की नौकरियां जा रही हैं क्योंकि मकानों की बिक्री ठप होने के बाद बिल्डर नए प्रोजेक्ट में हाथ डालने से कत़रा रहे हैं.

स्टाक मार्केट से बिदकते विदेशी निवेशक

पांच जुलाई में बजट आने के बाद से शेयर बाजार की गिरावट का आलम यह है कि उसने एक महीने में गिरने का पिछले 17 साल का रिकार्ड तोड़ दिया है. बजट में अमीरों पर लगाए गये सुपर रिच टैक्स के दायरे में आने के कारण विदेशी निवेशक लगातार भारतीय शेयर बाजारों से अपना पैसा निकाल रहे हैं. जुलाई में ही भारतीय इक्विटी मार्केट से 11000 करोड़ रुपये निकाले जा चुके हैं जो पिछले नौ महीने में सबसे ज्यादा है. इसके अलावा सरकार ने कंपनियों के लिए पब्लिक होल्डिंग 25 से 35 फीसद करने का जो प्रस्ताव किया है (इससे प्रमोटर्स अपने पास कंपनियों के 65 फीसदी से ज्यादा शेयर नहीं रख पाएंगे) उससे भी शेयर बाजार में गिरावट का दौर थम नहीं रहा है.

माना जा रहा है कि जुलाई में शेयर बाजार की खस्ता हालत के कारण निवेशक दस हजार करोड़ से ज्यादा की रकम गंवा चुके हैं. कुछ समय से निवेशकों के लिए शेयर बाजार ही थोड़ा बहुत रिटर्न देता दिख रहा था, लेकिन अभी उसकी भी स्थिति डांवाडोल है. बाजार में गिरावट के चलते पहले से ही खस्ताहाल में चल रहे म्यूचुअल फंड बाजार को भी झटका लगा है. निवेशकों में निराशा के माहौल को देखते हुए वित्त मंत्रालय और पीएमओ सक्रिय हो गए हैं. जानकारों के मुताबिक इस बात के संकेत मिल रहे हैं कि कंपनियों की पब्लिक होल्डिंग को 25 से 35 फीसदी करने के फैसले में कुछ बदलाव किया जा सकता है. और, मीडिया में सुपर रिच टैक्स को हटाने की बात भी चल रही है जिसके बाद शेयर बाजार में कुछ सुधार देखने को मिला है.

राजकोषीय घाटे के आंकड़े पर भ्रम

आर्थिक आंकड़ों की विश्वसनीयता पर मोदी सरकार के पिछले कार्यकाल के दौरान काफी बहसें हो चुकी हैं. ग्रोथ की रफ्तार, रोजगार के आंकड़े वगैरह के बारे में स्वतंत्र अर्थशास्त्री कुछ और कह रह थे और सरकार का पक्ष इन पर कुछ और था. इस तरह की ताजा बहस राजकोषीय घाटे को लेकर है. लेकिन इस बार इसका इशारा कैग ने किया है. उसका कहना है कि सरकार ने ऑफ बजटिंग (ऐसे मद से पैसे की व्यवस्था जो बजट प्रस्ताव में नहीं होती, लेकिन सरकार की देनदारी का हिस्सा होती है) के सहारे अपना राजकोषीय घाटा 3.4 फीसद दिखाया है. लेकिन, अगर ऑफ बजटिंग के कर्ज को भी जोड़ दिया जाये तो यह घाटा 5.9 फीसद तक पहुंच सकता है. आर्थिक सुधारों के बाद राजकोषीय अनुशासन का जो दौर चला है उसमें यह आंकड़ा काफी चौंकाने वाला है. ऑफ बजटिंग का सहारा सभी सरकारें लेती हैं, लेकिन इसे जोड़कर राजकोषीय घाटे का इस स्तर तक पहुंच जाना डरावना है. इसकी वजह यह है कि विदेशी निवेशक निवेश करने से पहले बाकी चीजों के साथ यह भी देखते हैं कि सरकार की राजकोषीय नियंत्रण की स्थिति कैसी है. आईएमएफ और विश्व बैंक की रिपोर्ट भी काफी हद तक इसी पर आधारित होती हैं जो पूरी दुनिया में देश के आर्थिक हालात के बारे में सकारात्मक या नकारात्मक धारणा बनाती हैं. जानकारों के मुताबिक सरकार ने इसीलिए आंकड़ों की यह बाजीगरी की है. मंदी की ओर बढ़ते आर्थिक हालात में राजकोषीय घाटे का इतना बड़ा आंकड़ा विदेशी निवेश को घटाकर उसे और भी गंभीर बना सकता है.

राजकोषीय घाटे के साथ अगर राजस्व के आंकड़ों पर गौर किया जाए तो हमारी चिंता और बढ़ सकती है. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस बजट में राजस्व वसूली के बहुत महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखे हैं. अगर सरकार इस लक्ष्य को पाना चाहती है तो उसे अगले नौ महीने में इसे तीस फीसदी बढ़ाना होगा. लेकिन, इस वित्त वर्ष की पहली तिमाही में राजस्व में सिर्फ छह फीसदी की ही वृद्धि हुई है. यह अर्थव्यवस्था की खराब हालत का एक और संकेतक है. अब सरकार अगर राजस्व के अपने लक्ष्य से चूकती है तो वह घाटे को नियंत्रित करने का लक्ष्य नहीं पा पाएगी. और अगर उसने कर वसूलने में अधिक सख्ती की तो वह भी निवेश और उसकी वजह से उद्योगों पर प्रतिकूल असर डालेगी. इसके चलते उस पर ‘टैक्स टैररिज्म’ का आरोप भी लग सकता है जो निवेश के माहौल को और खराब करने का ही काम करेगा.

कॉरपोरेट जगत में निराशा का माहौल

मोदी सरकार के अगर दोनों कार्यकाल को मिला दिया जाये तो यह पहली बार है कि कॉरपोरेट जगत के दिग्गज सरकार की आर्थिक नीतियों के खिलाफ मुखर हैं. बजाज ऑटो के चेयरमैन राजीव बजाज ने ऑटो इंडस्ट्री पर सरकार की नीति पर तंज कसते हुए यह कहा कि जब ऑटो इंडस्ट्री संकट में है तब सरकार इलेक्ट्रिक वाहनों की बात कर रही है. उन्होंने नीति की अस्पष्टता को लेकर सवाल उठाए तो उनके पिता राहुल बजाज ने अर्थव्यवस्था के पूरे परिदृश्य पर कहा, ‘न मांग है और न कोई निजी निवेश हो रहा है. ऐसे में ग्रोथ कहां से आएगी. वह स्वर्ग से तो टपकेगी नहीं.’ राहुल बजाज को मोदी समर्थक उद्योगपतियों में गिना जाता है, ऐसे में उनका यह कथन बताता है कि कॉरपोरेट जगत में निराशा का माहौल गहरा है. बजाज के बाद एचडीएफसी बैंक के चेयरमैन दीपक पारेख ने भी कहा कि अर्थव्यवस्था सुस्त है और कर्ज संकट बना हुआ है, इससे मंदी के आसार साफ नजर आ रहे हैं. इससे पहले लार्सन एंड टूब्रो के चेयरमैन एएम नाइक भी अर्थव्यस्था को लेकर चिंता जता चुके हैं. जब देश का कॉरपोरेट जगत भी आर्थिक नीतियों को लेकर मोदी सरकार की आलोचना कर रहा है, तो यह स्थिति की गंभीरता को बताता है.

छोटे शहरों और लघु-मध्यम उद्योगों से आती खराब खबरें

शेयर बाजार, कोर सेक्टर में ग्रोथ के गिरते आंकड़े और कारोपोरेट जगत में निराशा के माहौल के साथ छोटे शहरों से भी लघु उद्योगों को लेकर अच्छी खबरें नहीं है. सूरत के हीरा उद्योग में काम करने वाले कामगारों की एसोसिएशन ने उन 13 हजार लोगों की सूची जारी की है जो पिछले कुछ महीनों में बेरोजगार हो गए हैं. ऑटो इंडस्ट्री में मंदी के कारण जमशेदपुर के अपने प्लांट में टाटा मोटर्स ने काम बंद कर दिया है. इससे आसपास की वे तमाम इकाइयां, जो टाटा मोटर्स को अपने उत्पाद सप्लाई करती थीं, बंद होने के कगार पर आ गई हैं. सोने पर बढ़ी इंपोर्ट ड्यूटी के कारण मेरठ जैसे शहरों में आभूषण कारीगरी का काम भी मंदा है और स्थानीय पहचान वाले लगभग सभी उद्योगों में काम कम होने की खबरें हैं.

उपरोक्त सारी वजहें बता रही हैं कि अर्थव्यवस्था को किसी भी कोने से देखा जाए उसमें एक ऐसी सुस्ती नजर आती है जो मंदी की तरफ बढ़ती नजर आ रही है. बचाव में ऐसा कहा जा सकता है कि अर्थव्यवस्था के चक्र में ऐसा समय आता है, जब आर्थिक गतिविधियों में सुस्ती आ जाती है. लेकिन, यह सुस्ती आए हुए ठीक-ठाक वक्त हुआ और इसमें फिलवक्त सुधार के लक्षण नजर नहीं आ रहे हैं. इसलिए साफ है कि यह आर्थिक चक्र के चलते आने वाली मंदी नहीं है. बल्कि, अर्थव्यवस्था में कोई संरचनात्मक दिक्कत आ चुकी है. अगर हालात इतने गंभीर नहीं होते तो न तो सरकार बजट के कई प्रावधानों पर फिर से विचार कर रही होती और न ही आरबीआई लगातार चार बार अपनी ब्याज दरें घटाता.