सुस्त पड़ती अर्थव्यवस्था को गति देने के लिये भारतीय रिजर्व बैंक की छह सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने रेपो रेट में 0.35 प्रतिशत की कटौती कर दी है. इस कटौती के बाद रेपो दर 5.40 प्रतिशत रह गयी है. यह लगातार चौथा मौका है जब रेपो दर में कटौती की गयी है. रेपो दर में इस कटौती के साथ रिजर्व बैंक की रिवर्स रेपो दर भी कम होकर 5.15 प्रतिशत रह गई है. इस कटौती के बाद बैंकों पर कर्ज और सस्ता करने का दबाव बढ़ गया है. माना जा रहा है कि इसके चलते आने वाले दिनों में होम, कार और पर्सनल लोन पर ब्याज दर कम हो सकती है.

क्या है रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट?

रेपो रेट वह दर होती है जिस पर आरबीआई अन्य बैंकों को कर्ज देता है. इसी कर्ज से बैंक ग्राहकों को ऋण की सुविधा मुहैया कराते हैं. अगर रेपो रेट कम होता है तो इसका मतलब है कि बैंक से मिलने वाले सभी प्रकार के कर्ज सस्ते हो जाएंगे. वहीं, बैंकों को आरबीआई में धन जमा कराने पर जिस दर से ब्याज मिलता है उसे रिवर्स रेपो रेट कहते हैं.

मंदी की बात मानी

आरबीआई द्वारा रेपो दर में कमी किए जाने की संभावना पहले से जताई जा रही थी. जानकारों के मुताबिक आर्थिक विकास की गति धीमी पड़ने के चलते केंद्रीय बैंक पर ब्याज दर में कटौती करने का दबाव बढ़ गया था. एमपीसी ने कहा भी कि जून में द्विमासिक मौद्रिक नीति समीक्षा के बाद भी घरेलू आर्थिक गतिविधियों में तेजी नहीं आई है. उसका यह भी कहना था कि वैश्विक स्तर पर मंदी तथा दुनिया की दो अर्थव्यवस्थाओं (अमेरिका और चीन) के बीच बढ़ते व्यापार युद्ध से स्थितियां और भी खराब हो सकती हैं. हालांकि रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास का यह भी कहना था कि आर्थिक मंदी का भी एक चक्र होता है और यह आती-जाती रहती है.

केंद्रीय बैंक ने 2019-20 के लिये सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वृद्धि दर के अनुमान को भी सात से घटाकर 6.9 प्रतिशत कर दिया है. उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित महंगाई दर चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में 3.1 प्रतिशत रहने का अनुमान है जबकि दूसरी छमाही में इसके 3.5 से 3.7 प्रतिशत के दायरे में रहने की संभावना जताई जा रही है.