बीते हफ्ते अमेरिका ने रूस के साथ हुई ‘मध्यम दूरी परमाणु शक्ति संधि’ यानी आईएनएफ से खुद को आधिकारिक तौर पर अलग कर लिया. शुक्रवार को अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोंपियो ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा, ‘अपने नाटो सहयोगियों के पूर्ण समर्थन के साथ अमेरिका इस नतीजे पर पहुंचा है कि रूस ने आईएनएफ संधि का उल्लंघन किया है और इसलिए अब अमेरिका भी संधि से जुड़े अपने दायित्यों का पालन नहीं करेगा.’

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का कहना है कि रूस कई सालों से इस संधि का उल्लंघन करते हुए मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलों का निर्माण कर रहा है. उनके मुताबिक इस स्थिति में अमेरिका भी इस संधि का पालन नहीं करेगा और बड़े स्तर पर ऐसी मिसाइलों का निर्माण करेगा.

मध्यम दूरी परमाणु शक्ति (आईएनएफ) संधि क्या है?

1980 में शीत युद्ध के दौरान रूस ने यूरोपीय देशों को निशाना बनाने के मकसद से अपने सीमाई इलाकों में सैकड़ों मिसाइलें तैनात कर दी थीं. मध्यम दूरी की ये मिसाइलें परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम थीं. इसके बाद 1987 में शीत युद्ध की स्थिति को खत्म करने के लिए अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन और अंतिम सोवियत नेता मिखाइल गोर्बाचोव ने एक संधि की थी. इसे ही मध्यम दूरी परमाणु शक्ति (आईएनएफ) संधि नाम दिया गया. यह संधि इन दोनों देशों को जमीन से मार करने वाली ऐसी मिसाइलें बनाने से रोकती है जो परमाणु हथियारों को ले जाने में सक्षम हों और जिनकी मारक क्षमता 500 से लेकर 5,500 किलोमीटर तक हो. आईएनएफ संधि से पश्चिमी देशों पर सोवियत संघ के परमाणु हमले का खतरा खत्म हो गया था. इस संधि के बाद अमेरिका और रूस दोनों ने करीब तीन हजार मिसाइलें नष्ट कर दी थीं.

1987 में अंतिम सोवियत नेता मिखाइल गोर्बाचोव और अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन (दाएं) ने इस संधि पर हस्ताक्षर किए थे

अमेरिका के आईएनएफ संधि खत्म करने की वजह

बीते एक दशक में अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने रूस द्वारा मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलें बनाने की कई बार सूचना दी. रूस द्वारा आईएनएफ संधि के उल्लंघन का सबसे ताजा मामला 2017 में सामने आया. अमेरिकी एजेंसियों ने खबर दी कि रूस ने जमीन से मार करने वाली ‘9M729’ क्रूज मिसाइल को विकसित किया है जो 5500 किमी तक मार करने और परमाणु हथियार ले जाने में सक्षम है.

अमेरिका की चेतावनी के बाद रूस ने पहले तो ऐसी किसी मिसाइल के अस्तित्व में होने से ही इनकार कर दिया. कुछ समय बाद उसने इस मिसाइल के निर्माण की बात तो मानी, लेकिन दावा किया यह मिसाइल पांच हजार नहीं बल्कि केवल 480 किमी तक ही मार कर सकती है. अमेरिका ने रूस के इस दावे को गलत बताते हुए उसे इस तरह की सभी मिसाइलें नष्ट करने के लिए कहा, जिससे रूस ने साफ़ इनकार कर दिया.

अमेरिका के आईएनएफ संधि से हटने की एक और बड़ी वजह चीन को बताया जा रहा है. बीते साल अमेरिकी रक्षा विभाग ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि चीन जिस तरह की मिसाइलें बना रहा है, अगर उसे भी रूस के साथ हुई संधि में शामिल किया जाए तो उसकी 95 फीसदी मिसाइलें इस संधि का उल्लंघन करेंगी. इस रिपोर्ट के बाद अधिकारियों का कहना था कि अब इस संधि में चीन को भी शामिल किया जाना चाहिए या फिर अमेरिका को संधि से हट जाना चाहिए. अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक चीन ने तिब्बत सहित अपने लगभग सभी समुद्री सैन्य अड्डों पर ये मिसाइलें तैनात की हैं और इनकी जद में भारत, जापान, ताइवान और गुआम में स्थित अमेरिकी सैन्य अड्डा भी आता है.

रिपब्लिकन सीनेटर टॉम कॉटन सीएनएन से बातचीत में कहते हैं, ‘मैं काफी पहले से अमेरिकी राष्ट्रपति प्रशासन से कहता आ रहा हूं कि आईएनएफ संधि को खत्म कर देना चाहिए. आप केवल रूस द्वारा किए जा रहे संधि के उल्लंघन को देख रहे हैं, लेकिन मैं चीन को सबसे बड़ा खतरा मानता हूं जिसने मध्यम दूरी की बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलों का जखीरा इकट्ठा कर लिया है. आपको कुछ करना चाहिए क्योंकि अब यह संधि आपके राष्ट्रीय हितों के पक्ष में नहीं दिखती.’

हालांकि, अमेरिका के कहने पर चीन ने साफ़ कर दिया है कि वह आईएनएफ जैसी किसी संधि में शामिल नहीं हो सकता.

संधि टूटने का भारत और अन्य देशों पर क्या असर दिख सकता है?

अगर संधि टूटने के बाद इसके खतरों की बात करें तो सबसे बड़ा खतरा यूरोप पर मंडरा रहा है. विदेश मामलों के जानकारों की मानें तो यूरोप को फिर उसी स्थिति का सामना करना पड़ सकता है, जैसी आईएनएफ संधि होने से पहले थी. जानकारों के मुताबिक अब रूस मध्यम दूरी की बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलें तैनात करेगा जिसके परिणाम स्वरूप अमेरिका भी रूस के खिलाफ यूरोपीय देशों में यही काम करेगा.

इन जानकारों की मानें तो यूरोप के बाद एशिया ऐसा क्षेत्र होगा जहां मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलें तैनात करने की होड़ शुरू होगी. एशिया में कई देश ऐसे हैं जिन्हें सुरक्षा देने के नाम पर अमेरिका इस तरह की मिसाइलें तैनात करेगा. बीते हफ्ते अमेरिकी रक्षा मंत्री मार्क एस्पर ने साफ़ तौर पर कहा भी, ‘आईएनएएफ संधि के टूटने के बाद अमेरिका एशिया में भी मध्यम दूरी की मिसाइलें तैनात करने की योजना बना रहा है.’

जानकारों की मानें तो एशिया में चीन के साथ शक्ति का संतुलन बनाने के लिए अमेरिका ऐसी मिसाइलें तैनात करेगा और सबसे ज्यादा मिसाइलें भारत, जापान, दक्षिण कोरिया और ताइवान में तैनात किए जाने की उम्मीद है. दक्षिण कोरिया और जापान में मिसाइलें तैनात करने को लेकर पिछले दिनों अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन ने कहा, ‘हम केवल अपने सुरक्षा बलों, दक्षिण कोरिया, जापान और अन्य जगहों पर हमारे सहयोगियों की सुरक्षा के बारे में बात कर रहे हैं....अमेरिकी मिसाइलों की तैनाती एक रक्षात्मक कदम होगा क्योंकि चीन ने हथियारों (मिसाइलों) का जखीरा इकट्ठा कर रखा है, अमेरिकी और जापानी सैन्य ठिकाने इसकी जद में हैं.’ माना जा रहा है कि एशिया प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते दबदबे का जवाब देने के लिए अमेरिका को मिसाइलों की तैनाती के लिए ताइवान और भारत से अच्छी दूसरी भौगोलिक स्थिति नहीं मिल सकती.

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एशिया में मिसाइलों की होड़ पर विराम लगने की एक उम्मीद भी

कुछ जानकार एक और बात भी बताते हैं. इनके मुताबिक आईएनएफ संधि के टूटने का सबसे ज्यादा फायदा निश्चित तौर पर अमेरिका और रूस को ही होने जा रहा है क्योंकि अब ये दोनों मध्यम दूसरी की बैलिस्टिक मिसाइलें बड़े स्तर बनाएंगे और बेचेंगे भी. हालांकि, कूटनीति के कुछ विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि अमेरिका के एशिया में मिसाइलें तैनात करने से भारत जैसे देशों की एक बड़ी मुश्किल भी हल हो सकती है. इनके मुताबिक अमेरिकी मिसाइलों की तैनाती से निश्चित ही चीन पर दबाव बढ़ेगा और वह यह चाहेगा कि अमेरिका ऐसा न करे. ऐसी स्थिति में यह भी हो सकता है कि चीन आईएनएफ जैसी अमेरिका की उस नयी संधि में शामिल हो जाए जिसके लिए अमेरिका उस पर कई सालों से दबाव बना रहा है.

हालांकि, कुछ लोगों का यह भी मानना है कि इस स्थिति में चीन अकेले आईएनएफ जैसी किसी संधि में शामिल होकर अपनी मध्यम दूरी की मिसाइलें खत्म करने को राजी नहीं होगा. तब वह चाहेगा कि भारत को भी उस संधि में शामिल किया जाए और वह भी अपनी मध्यम दूरी की अग्नि और ब्रह्मोस जैसी मिसाइलें खत्म करे. जाहिर है इस स्थिति में भारत पाकिस्तान से खतरे को देखते हुए उसे भी इस संधि में शामिल करने को कहेगा. यानी एक स्थिति ऐसी भी बन सकती है जिसमें भारत, पाकिस्तान और चीन तीनों इस नयी संधि में शामिल होकर अपनी मध्यम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलें छोड़ने को तैयार हो जाएं.