पंजाब की कैप्टन अमरिंदर सिंह सरकार से इस्तीफा देने वाले नवजोत सिंह सिद्धू के बारे में कांग्रेस में एक चर्चा ने जोर पकड़ा है. कहा जा रहा है कि जल्द ही उन्हें दिल्ली प्रदेश कांग्रेस समिति का अध्यक्ष बनाया जा सकता है. हाल तक इस पद को दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित संभाल रही थीं. लेकिन उनके निधन के बाद से यह पद खाली है. उनकी जगह पर पहले दिल्ली प्रदेश के मौजूदा कांग्रेसी नेताओं में से ही किसी को अध्यक्ष बनाए जाने की बात चल रही थी. लेकिन अगर पार्टी के सूत्रों की मानें तो पिछले कुछ दिनों से पूर्व क्रिकेटर नवजोत सिंह सिद्धू के नाम की चर्चा प्रदेश कांग्रेस में भी चल रही है और पार्टी के राष्ट्रीय नेताओं के बीच भी.

क्रिकेट खेलने के बाद क्रिकेट कमेंट्री करने वाले नवजोत सिंह सिद्धू ने अपनी राजनीति की शुरुआत भारतीय जनता पार्टी से की थी. वे 2004 से लेकर 2014 तक अमृतसर से भाजपा के सांसद रहे. 2014 में उनकी सीट से वरिष्ठ भाजपा नेता अरुण जेटली पंजाब के वर्तमान मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह के खिलाफ चुनाव लड़े और हार गये. इसके बाद सिद्धू को भाजपा ने राज्यसभा का सांसद बना दिया. उस वक्त चर्चा थी कि पंजाब में भाजपा की सहयोगी पार्टी शिरोमणि अकाली दल, नवजोत सिंह सिद्धू की सक्रियता से सहज नहीं है और इसलिए भाजपा उन्हें पंजाब की राजनीति से दूर रखना चाहती थी. सिद्धू ने जब भाजपा छोड़ी तो उस वक्त उन्होंने भी यही कहा कि पार्टी उन्हें पंजाब की राजनीति से दूर रखना चाहती है इसलिए वे भाजपा छोड़ रहे हैं.

ऐसी चर्चा है कि एक बार फिर से पहले वाली स्थिति नवजोत सिंह सिद्धू के सामने आ खड़ी हुई है. वे कांग्रेस में शामिल होकर 2017 में जब अमृतसर से विधायक बने थे तो उन्हें अमरिंदर सिंह के नेतृत्व वाली सरकार में कैबिनेट मंत्री का पद दिया गया था. सरकार बनने के बाद से ही मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह से उनके मतभेद की खबरें लगातार सुनने में आती रहीं. लेकिन हाल के कुछ महीनों में दोनों के झगड़े खुलकर सामने आने लगे. और फिर नवजोत सिंह सिद्धू ने अमरिंदर सिंह के मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया.

पंजाब से ही आने वाले काग्रेस के एक वरिष्ठ नेता बताते हैं कि पार्टी के राष्ट्रीय नेताओं की सोच अब यह बनने लगी है कि कैप्टन और सिद्धू का पंजाब में एक साथ रहना एक म्यान में दो तलवारों जैसा है. इस वजह से अब पार्टी में इस बात पर विचार हो रहा है कि सिद्धू को दिल्ली लाकर प्रदेश कांग्रेस की कमान सौंप दी जाए. ‘पार्टी के बड़े नेताओं को यह लगता है कि अगर सिद्धू दिल्ली आते हैं तो इसके दो फायदे होंगे. इससे एक तो पंजाब में पार्टी के अंदर जो ध्रुव बनते जा रहे हैं और इस वजह से जो खेमेबंदी हो रही है, उससे पार्टी को मुक्ति मिलेगी. दूसरा फायदा ये होगा कि दिल्ली में अरविंद केजरीवाल का मुकाबला करने के लिए कांग्रेस के पास एक दमदार चेहरा होगा. सिद्धू जिस तरह से लोगों को संबोधित करते हैं और अपनी सभाओं में आने वाले लोगों से संवाद स्थापित करते हैं, ये उन्हें दिल्ली में पार्टी के लिए काफी उपयोगी बनातें है. पार्टी में ये बात भी चल रही है कि नवजोत सिंह सिद्धू को दिल्ली में कांग्रेस का चेहरा बनाने से पार्टी को सिख मतदाताओं के एक बड़े हिस्से का भी साथ मिल सकता है. क्योंकि आम आदमी पार्टी और भाजपा दोनों में इस समाज का कोई बड़ा और प्रभावी नेता नहीं है.’

कांग्रेसी सूत्रों की मानें तो नवजोत सिंह सिद्धू को दिल्ली की कमान सौंपने की बात कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने चलाई है. सिद्धू को प्रियंका गांधी के विश्वस्त लोगों में शुमार किया जाता है. और माना जाता है कि राहुल गांधी भी उन्हें काफी पसंद करते हैं. भाजपा छोड़ने के बाद जब एक बार यह चर्चा चल रही थी कि सिद्धू आम आदमी पार्टी में जा रहे हैं तो उस वक्त उन्हें कांग्रेस में लाने में प्रियंका गांधी ने ही अहम भूमिका निभाई थी. कहा जा रहा है कि ​कभी पंजाब की राजनीति से दूर किए जाने की बात करके भाजपा से निकलने वाले नवजोत सिंह सिद्धू भी प्रियंका गांधी के इस प्रस्ताव को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं.

दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के कुछ नेताओं से नवजोत सिंह सिद्धू के प्रदेश अध्यक्ष बनने की संभावनाओं के बारे में बातचीत करने पर पता चलता है कि अगर इस दिशा में बात आगे बढ़ती है तो प्रदेश स्तर पर इसका कुछ विरोध भी हो सकता है. इस बारे में दिल्ली प्रदेश कांग्रेस के एक पदाधिकारी कहते हैं, ‘पंजाब से भी सिद्धू की कार्यशैली के बारे में यही जानकारी मिली है कि वे सबको एक साथ लेकर चलने वाले नेता नहीं हैं. ऐसे में जो नेता दिल्ली प्रदेश की राजनीति में काफी पहले से हैं, उनमें से कुछ सिद्धू के प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने से उतना सहज नहीं रहेंगे. लेकिन इसमें एक बात ये भी है कि अगर ये कोशिश प्रियंका गांधी या राहुल गांधी की ओर से होगी तो कोई सीधे तौर पर इसका विरोध करने की स्थिति में भी नहीं होगा. लेकिन इस वजह से कुछ पुराने नेता चुनावों में अपनी सक्रियता कम कर सकते हैं. इसका परिणाम ये हो सकता है कि सिद्धू के आने से पार्टी को जितना फायदा होगा, उतना ही नुकसान प्रदेश कांग्रेस के कुछ पुराने नेताओं के कम सक्रिय रहने से भी हो सकता है.’

यानी कि सिद्धू को दिल्ली लाने की पूरी योजना इस बात पर टिकी है कि कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व अपनी इस योजना पर कितनी मजबूती से टिका रहता है. लेकिन इस बारे में कब तक कोई स्पष्ट फैसला हो सकता है? इस सवाल के जवाब में कांग्रेस के एक पदाधिकारी कहते हैं, ‘इस समय पार्टी के सभी नेताओं की नजरें नये अध्यक्ष के चुनाव पर लगी हुई हैं. क्योंकि इसके बाद ही ये तय होगा कि नेतृत्व के स्तर पर कांग्रेस किस तरह से आगे बढ़ेगी. एक बार राहुल गांधी के इस्तीफ पर स्थिति साफ हो जाये तो पार्टी में इस तरह के निर्णय लेने की प्रक्रिया फिर से शुरू हो जाएगी.’