बाबरी मस्जिद को 1992 में उन्मादी भीड़ ने दिन-दहाड़े ढहा दिया था. अनुच्छेद 370 को 2019 में गुप-चुप तरीके से सरकार द्वारा रात में खत्म कर दिया गया. लेकिन इन दोनों घटनाओं में कुछ समानताएं भी हैं. दोनों को ऐतिहासिक गलतियों को सुधारने के नाम पर सही ठहराया गया. दोनों को संघ परिवार और उसके समर्थकों ने जीत की तरह पेश किया. और हमारे गणतंत्र के संवैधानिक मूल्यों में आस्था रखने वाले लोगों ने दोनों का ही शोक मनाया.

जब बाबरी मस्जिद ढहाई गई थी तब मैं नई दिल्ली में रह रहा था, डेल्ही स्कूल ऑफ इकॉनोमिक्स की प्रोफेसर धर्मा कुमार के घर में. धर्मा को आज भी उनके मित्र और छात्र उनके आकर्षक व्यक्तित्व और बौद्धिक साहस के लिए याद करते हैं. वे सही मायनों में उदारवादी थीं, मार्क्सवादी वामपंथियों और हिंदुत्ववादी दक्षिणपंथियों, दोनों की अतियों से बराबर दूरी रखने वालीं.

धर्मा ब्रिटिश राज के आखिरी वर्षों में मुंबई में पली-बढ़ी थीं. वहां वे कई बार जुहू बीच पर महात्मा गांधी की प्रार्थना सभाओं में भी गई थीं. जो देश उन्हें अपना राष्ट्रपिता कहता है, उसमें ही गांधी जी के आदर्शों की धज्जियां उड़ती देख उन्होंने इनका खुलकर बचाव करने की ठानी. उन्होंने एक वक्तव्य तैयार किया और उसे देश के सबसे ज्यादा बिकने वाले अखबार के पहले पन्ने पर एक विज्ञापन के तौर पर छपवा दिया. उस वक्तव्य में लिखा था:

‘अगर आप हिंदू हैं तो इसे पढ़िये. क्या आप मानते हैं कि बाबरी मस्जिद के विध्वंस ने हिंदुओं के गौरव को बहाल किया है, हमारे देश का सम्मान बढ़ाया है और भारत को मजबूत किया है? यदि ऐसा है, तो इस संभावना पर विचार करें कि इस कृत्य ने हिंदू संस्कृति का अवमूल्यन किया है, दुनिया भर में हमारे देश को शर्मसार किया है और कई समुदायों के बीच तनाव को बढ़ाकर भारत को कमजोर करने का काम भी किया है.

उस वक्तव्य को धर्मा के एक कलाकार दोस्त ने डिजाइन किया था. उसकी काली पृष्ठभूमि थी जिस पर सफेद रंग के अक्षर थे. उस पर उन 19 लोगों के नाम भी दर्ज थे जिन्होंने इस वक्तव्य पर दस्तखत किए थे. इनमें मशहूर वैज्ञानिक एमएस स्वामीनाथन, लेखक विक्रम सेठ, रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर आईजी पटेल, लेखिका पुपुल जयकर, पूर्व सॉलीसिटर जनरल अशोक देसाई और पूर्व सेनाध्यक्ष के सुंदरजी शामिल थे. अखबार में विज्ञापन की तरह वह वक्तव्य प्रकाशित करवाने का पैसा धर्मा ने ही दिया था और उस पर दस्तखत करने वाले लोगों को भी उन्होंने ही जुटाया था. इसके बावजूद उन्होंने पूरी विनम्रता और शिष्टाचार दिखाते हुए वक्तव्य के साथ अपना नाम नहीं दिया.

यह ध्यान देने वाली बात है कि अपनी जवाबदेही समझने वाले जिन साहसी भारतीयों ने इस अपील पर दस्तखत किए थे, उनके नामों की शुरुआत छह बड़े ही प्रतिष्ठित उद्योगपतियों से हो रही थी. ये थे – भरत राम, आरपी गोयनका, ललित थापर, नानूभाई बी अमीन, राज थियागराजन और देशबंधु गुप्ता. जिस अखबार में यह वक्तव्य प्रकाशित हुआ उसके पाठकों के लिए इन लोगों के दस्तखत की वजह से यह अपील कहीं ज्यादा विश्वसनीय हो गई थी. अब इसे यह कहकर खारिज नहीं किया जा सकता था कि यह ऊट-पटांग सोच रखने वाले कुछ भ्रमित ‘झोला वालों’ का काम था.

जब मैंने अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को खत्म किए जाने की बात सुनी तो मेरा दिमाग दिसंबर, 1992 के उसी दौर में पहुंच गया. रात को मैं जागा हुआ था और वह सब याद कर रहा था जो तब धर्मा कुमार ने किया था. मैं आज अपनी उम्र के जिस पड़ाव पर हूं. 1992 में उनकी उम्र भी तकरीबन यही रही होगी. हमारे बौद्धिक तबके में मेरी स्थिति भी वही है जो उनकी थी. मेरे भी दूसरे कई क्षेत्रों में रसूखदार दोस्त हैं.

उस रात को मेरे मन में पहला विचार यही आया कि मैं अपनी शिक्षक का अनुसरण करूं. अपने देश के नागरिकों से इस बर्बर विजयोन्माद को खारिज करने की अपील करते हुए एक वक्तव्य का मसौदा तैयार करूं और उन्हें इस काम के नैतिक और राजनीतिक नतीजों के बारे में चेताऊं. यह वक्तव्य शायद कुछ यूं होता – ‘अगर आप देशभक्त भारतीय हैं तो इसे पढ़िए. क्या आप मानते हैं कि अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को रातों-रात और बिना विचार-विमर्श के खत्म करना राष्ट्रीय गौरव को बढ़ाने वाला है और क्या इससे भारत मजबूत होगा? यदि ऐसा है तो इस संभावना पर विचार करें कि इस कृत्य ने संविधान की उपेक्षा की है, लोकतांत्रिक मूल्यों का अवमूल्यन किया है और कश्मीर और शेष भारत के बीच तनाव घटाने के बजाय बढ़ाया है.’

लेकिन क्या मैं उस कद के लोगों से इस वक्तव्य पर हस्ताक्षर करवा पाता? लेखकों और कलाकारों के मामले में यह काम आसान होता. लेकिन ललित थापर और आरपी गोएनका जैसी शख्सियतों जैसा कद्दावर कौन समकालीन उद्योगपति इस मुहिम में शामिल हो पाता?

मैं खुद ऐसे दर्जन भर उद्योगपतियों को निजी तौर पर जानता हूं जो उनसे भी ज्यादा कामयाब हैं जिनसे धर्मा कुमार ने संपर्क किया था. मुझे पता है कि वे ईमानदार हैं, उदार सोच रखते हैं और अपने मूल में लोकतांत्रिक हैं. यह जरूर है कि उनमें से कुछ को अनुच्छेद 370 सही व्यवस्था नहीं लगती थी लेकिन उनमें से भी किसी को वह तरीका सही नहीं लगा होगा जिस तरह से इसे हटाया गया. निश्चित तौर पर मैं एक ऐसा वक्तव्य लिख सकता था जो उनकी भावनाओं को सटीकता और ईमानदारी से जाहिर करता. लेकिन अपवाद यही होता कि उनमें से किसी ने इसके साथ अपना नाम नहीं जोड़ा होता.

इसकी वजह यह है कि एक अहम पहलू के मामले में साल 2019 साल 1992 जैसा नहीं है. और वह अहम पहलू यह है कि आज दिल्ली में जो सरकार है वह उससे अलग है जो बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के वक्त सत्ता में थी. जब धर्मा कुमार ने भरत राम और ललित थापर से संपर्क किया था तो इन उद्योगपतियों ने यह नहीं सोचा होगा कि उस वक्तव्य पर हस्ताक्षर करने से उन्हें कोई नुकसान पहुंचा सकता है. लेकिन आज अगर मैं उनके समकालीनों से यही करने को कहूं तो वे ऐसे वक्तव्य पर हस्ताक्षर नहीं करेंगे, भले ही वे मेरी कोशिश से पूरी तरह सहमत क्यों न हों.

अतीत के साथ तुलना एक सीख हो सकती है और दूसरे लोकतंत्रों के साथ यह तुलना शायद और भी बड़ा सबक हो. जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने मनमाने तरीके से छह इस्लामिक देशों के नागरिकों के अपने यहां आने पर रोक लगा दी तो अमेरिका की छह शीर्ष कंपनियों के सीईओ ने इसका मिलकर विरोध किया. वे अपने विचार खुलकर रख सके क्योंकि वे जानते थे कि सिर्फ अपनी राय जाहिर करने से न तो सरकार उनके पीछे पड़ने वाली है, न सत्ताधारी पार्टी के नेता उन्हें भला-बुरा कहने वाले हैं और न ही उन्हें सोशल मीडिया पर देश का दुश्मन करार दिया जाने वाला है.

लेकिन आज के भारत में सबसे ज्यादा ईमानदार और देशभक्त उद्योगपति भी उससे ज्यादा भयभीत हैं जितना वे 1992 में हुआ करते थे. उन्होंने कई वजहों से चुप्पी साधी हुई है. सबसे धनी और सफल भारतीय भी आज सबके सामने वह नहीं कह सकते जो उनके मन में है. और एक यही बात हमें यह बताने के लिए काफी है कि 2019 में हमारे लोकतंत्र की हालत कैसी है.