निर्देशक : प्रशांत सिंह

लेखक : संजीव के झा, राज शांडिल्य, नीरज सिंह

कलाकार : सिद्धार्थ मल्होत्रा, परिणीति चोपड़ा, जावेद जाफरी, संजय मिश्रा, अपारशक्ति खुराना, चंदन रॉय सान्याल, नीरज सूद, शीबा चड्ढा, गोपाल दत्त

रेटिंग : 1/5

साल 2010 में एक हिंदी फिल्म चुपचाप आकर चली गई थी. नाम था ‘अंतरद्वंद’. इसने बिहार की चर्चित कुप्रथा पकड़वा विवाह पर एक गंभीर सिनेमा बनाने की कोशिश की थी.

इन दिनों एमेजॉन प्राइम वीडियो पर मौजूद ‘अंतरद्वंद’ को 2009 में सामाजिक विषयों पर बनी सर्वश्रेष्ठ फिल्म का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला था. फिल्म में शादी के लिए अगवा किए गए हीरो की भूमिका अनुराग कश्यप की ‘गुलाल’ (2009) से मशहूर हुए राज सिंह चौधरी ने निभाई थी. निर्देशन एफटीआईआई में पढ़े सुशील राजपाल का था, और चूंकि ये उनकी पहली निर्देशित फिल्म थी इसलिए 70-80 के दशक के कला सिनेमा से निकले शिल्प के प्रति उनकी प्रतिबद्धता फिल्म में साफ नजर आई थी. साथ ही निर्देशक इम्तियाज अली ने अगवा किए गए दूल्हे की पोशाक में खुद को कुर्सी से बांधकर इस छोटी मगर ईमानदार फिल्म का प्रमोशन किया था. शायद यह सोचकर कि इससे यह यथार्थवादी कला फिल्म ज्यादा से ज्यादा दर्शकों तक पहुंच सकेगी.

‘जबरिया जोड़ी’ से जुड़े तमाम डिस्कोर्स से गुजरने के बाद पता चला कि ‘अंतरद्वंद’ ज्यादा से ज्यादा दर्शकों तक नहीं पहुंच पाई. पिछले कुछ हफ्तों से पकड़वा विवाह पर ही बनी ‘जबरिया जोड़ी’ पर खबरों और सोशल मीडिया पर जिस भी तरह की बातचीत पर नजर गई उसमें ‘अंतरद्वंद’ का जिक्र कहीं नहीं मिला. शायद ही किसी को इस विषय पर पहली बार संपूर्ण सिनेमा बनाने वाली यह फिल्म याद आई हो.

इससे भी समझा जा सकता है कि क्यों एक गंभीर हार्ड-हिटिंग विषय पर एकता कपूर और शैलेष सिंह की निर्माता जोड़ी ने हास्य और बॉलीवुड ड्रामा में डूबा सिनेमा बनाना पसंद किया होगा. ऐसे में फिल्म भले ही थर्ड क्लास बने लेकिन ऐसे विषयों को मसाला सिनेमा का पैरहन ओढ़ाने से चर्चा चहुंओर हो ही जाती है! दर्शकों की स्मृति में इन दिनों कृत्रिम तरीके से पैदा किया गया बज़ (Buzz) लंबे समय तक बजबजाता जो रहता है.

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‘जबरिया जोड़ी’ ह्यूमर की टेक लेकर ही पकड़वा विवाह पर बात करने वाली थी, यह तो ट्रेलर ने बता दिया था. लेकिन यह नहीं बताया था कि प्यार-व्यार के इर्द-गिर्द रचा गया बेहद लंबा (मेलो) ड्रामा भी साथ मिलेगा और कुछ चुटकुलों की चाह में फिल्म दो घंटे से ज्यादा की आह अंतहीन यातना के रूप में हमारी नजर करेगी.

बिलाशक, फिल्म में कुछ चुटीले संवाद सच में मजेदार हैं (संवाद-लेखक राज शांडिल्य) और कई तो जहीन कल्पनाशीलता का उदाहरण भी हैं (जैसे ‘क्रांतिकारी सबको चाहिए लेकिन अपने घर में नहीं’ जैसे गंभीर विचार को जिस तरह चुटकुले का रूप दिया गया).

लेकिन, पटकथा में इधर-उधर पड़े थोड़ी-बहुत मात्रा वाले हास्य के लिए सिनेमाघरों में जाकर फिल्म देखने वाले दिन लदने लगे हैं. यह सच बॉलीवुड को स्वीकारना होगा. टीवी पर कपिल शर्मा उसी स्तर का हास्य फ्री में दे रहे हैं. ओटीटी मंचों पर कॉमिकस्तान जैसे शोज उससे ऊंचे दर्जे का हास्य कम कीमत पर मुहैया करा रहे हैं. यूट्यूब पर दर्जनों स्टैंड-अप कॉमिक अलहदा सोशल-पॉलिटिकल विषयों पर मारक व्यंग्य रच रहे हैं. ऐसे में केवल कुछ अच्छे चुटकुलों के लिए दर्शक क्यों सिनेमाघर जाए? वह तो तभी जाएगा न, जब आप उसे कॉमेडी के साथ-साथ दिलचस्प कहानी सलीके से बेचेंगे.

और यह तो सर्वविदित है कि इस मामले में बॉलीवुड का रिजल्ट बैक-बैंचर्स की तरह ही हमेशा खराब रहा है!

‘जबरिया जोड़ी’ पकड़वा विवाह और प्यार-शादी में उलझे दो प्रेमियों की कहानी कहने के साथ ही महिला सशक्तिकरण, घरेलू हिंसा और बेटा कहीं कठोर बाप का आईना न बन जाए जैसे मुद्दों को भी कहानी में शामिल करती है. भले ही नीयत सही हो, लेकिन ये मुद्दे पटकथा को बेवजह खींचते हैं और जो फिल्म कम अवधि की शुद्ध कॉमेडी फिल्म होकर मनोरंजक हो सकती थी, वह बॉलीवुड के प्रिय जॉनर ‘ड्रामा’ को खुद में शामिल करने की ख्वाहिश रखकर बॉलीवुड के प्रिय इमोशन ‘मेलोड्रामा’ में डूब जाती है.

हिंदी सिनेमा देखने की आदत रखने वाले दर्शकों के लिए दो घंटे 23 मिनट की फिल्में देखना बड़ी बात नहीं है. लेकिन ‘जबरिया जोड़ी’ तो जैसे जबरदस्ती छोटी-सी घिसी-पिटी प्रेम-कहानी में मेलोड्रामा, स्लो-मोशन, मोंटाज की शक्ल में आने वाले गानों और हंसी की कोशिश में मुंह के बल गिरती दृश्य-संरचनाओं की झड़ी लगाकर ऐसा महसूस करवाती है जैसे हम चार घंटे लंबी कोई हिंदी फिल्म देख रहे हों.

आप अपरिपक्व निर्देशन और आलसी पटकथा और एडिटिंग के बीच कई दिग्गज कलाकारों को व्यर्थ होते हुए भी देखते हैं. न...न...सिद्धार्थ और परिणीति की बात नहीं हो रही! उनकी बात बाद में. पहले उन कलाकारों की जिनको साथ लाना ‘जबरिया जोड़ी’ की कास्टिंग टीम के लिए किसी उपलब्धि से कम नहीं रहा होगा. सोचकर देखिए कि अगर किसी राजकुमार हिरानी, रोहित शेट्टी या पुराने जमाने के प्रियदर्शन, डेविड धवन जैसे निर्देशकों को संजय मिश्रा, जावेद जाफरी, नीरज सूद, गोपाल दत्त, अपारशक्ति खुराना और चंदन रॉय सान्याल जैसे कलाकारों को एक फिल्म में उपयोग करना हो तो वे क्या ही खूब हंसी का दंगा रच देंगे. लाफ-रायट, यू सी!

लेकिन, ‘जबरिया जोड़ी’ इन सभी विलक्षण अदाकारों को छोटे-छोटे किरदारों में छोटा-छोटा हास्य उत्सर्जन पैदा करने के लिए उपयोग भर करती है, लेकिन कभी-भी ऐसा कैरेक्टर ग्राफ नहीं देती कि लगे कि वे पूरी फिल्म में दर्शकों के साथ मौजूद हैं. इनमें से किसी किरदार के साथ ऐसा नहीं होता कि आप उन्हें साथ लेकर घर लौटें.

जावेद जाफरी अपने अभिनय की काबिलियत के वजह से अलग से छाप जरूर छोड़ते हैं, लेकिन क्लाइमेक्स के आसपास पहुंचकर उनका किरदार बाप की बॉलीवुडीय परिभाषा में फंस जाता है और कमजोर लिखाई के चलते दर्शकों के अवचेतन से तुरंत गुम हो जाता है.

चंदन रॉय सान्याल को देखकर भी दुख होता है. हीरो के दोस्त की स्टीरियोटाइप्ड भूमिका में वे बिहारी लहजा खूब पकड़ते हैं. लेकिन ‘कमीने’ (2009) में बेमिसाल काम करने वाला यह एक्टर जब भी ऐसे मामूली किरदारों में जान भरने की मशक्कत करता हुआ नजर आता है तो बॉलीवुड को खूब कोसने का मन करता है. आखिर ऐसी प्रतिभा नजरअंदाज करने के लिए थोड़े होती है.

सिद्धार्थ मल्होत्रा और परिणीति चोपड़ा की जो कैमिस्ट्री आपको ‘हंसी तो फंसी’ जैसी बढ़िया फिल्म में नजर आई थी उसका लेश मात्र भी ‘जबरिया जोड़ी’ में नहीं मिलता. प्रशांत सिंह की बतौर निर्देशक यह पहली फिल्म है और प्यार से जुड़े तमाम इमोशन्स वे परदे पर उभारते वक्त लगातार संघर्ष करते हुए साफ नजर आते हैं. चटख रंगों, स्लो-मोशन और संगीत का उपयोग तो बहुत करते हैं लेकिन प्यार की इंटेन्सिटी परदे पर नहीं रच पाते. एक अदृश्य दीवार हमेशा सिद्धार्थ और परिणीति के बीच नजर आती है जो उन्हें निर्देशक के इशारे पर कठपुतलियों की तरह व्यवहार करने वाला कलाकार भर बना देती है.

बबली के रोल में परिणीति चोपड़ा को ‘शुद्ध देसी रोमांस’ और ‘इश्कजादे’ वाले स्पेस में लौटते हुए देखना अच्छा लगता है. वर्ना हाल की ‘केसरी’, ‘गोलमाल अगेन’ और ‘नमस्ते इंग्लैंड’ जैसी फिल्में उनकी प्रतिभा को पूरी शिद्दत के साथ चूना लगाने का काम कर चुकी हैं. छोटे शहर की बिंदास, हंसमुख और साफ दिल वाली नायिकाओं का रोल वे बेहद उम्दा अंदाज में निभाती आई हैं और प्रतिभावान निर्देशकों की सोहबत में रहना उन्हें फिर से शुरू कर देना चाहिए.

हालांकि, ‘जबरिया जोड़ी’ उन्हें बॉलीवुड के पाषाणकालीन तौर-तरीकों वाला एक साधारण लिखा किरदार और कृत्रिम बिहारी लहजा देकर साधारण जरूर बना देती है, लेकिन फिर भी उन्हें और उनके अभिनय को आखिर तक देखना आंखों को सुहाता है.

फिल्म के नायक सिद्धार्थ मल्होत्रा को ‘अगेंस्ट टाइप’ कास्ट किया गया है. यानी उनकी शहरी नायक वाली छवि के विपरीत छोर वाला किरदार उन्हें दिया गया है. लेकिन अफसोस कि यह जोखिम भरा निर्णय फिल्म के काम नहीं आ सका. कुछ हल्के-फुल्के दृश्यों में वे जरूर फबते हैं, लेकिन एक तो दबंग व बाहुबली कहीं से नहीं दिखते, दूसरे अपने कम्फर्ट जोन से आगे बढ़ने की कोशिश करते हुए भी नजर नहीं आते.

अभी हाल ही में हमने ऋतिक रोशन को ‘अगेंस्ट टाइप’ वाला एक बिहारी किरदार ‘सुपर 30’ में बेहद प्रभावशाली तरीके से अभिनीत करते हुए देखा है. उनसे तुलना करने पर सिद्धार्थ मल्होत्रा न तो भाषा पर खास काम करते हुए दिखे हैं (किसी खास लहजे से जुड़े संवाद रटने नहीं आत्मसात करने होते हैं), न बॉडी लेंग्वेज पर और न ही स्क्रीन-प्रेजेंस पर. फिल्म के क्लाइमेक्स में एक सीन है जब जावेद जाफरी और उनका आमना-सामना होता है. उस सीन में आवाज से लेकर अभिनय तक के मामले में आपको समझ आ जाता है कि वे अभिनय के मामले में अपने इस सह-कलाकार के सामने ही कितने बौने हैं.

बाकी फिल्म में भी उनका अभिनय ऐसा है जैसे कोई उनसे जबरदस्ती ‘पकड़वा अभिनय’ करवा रहा हो!