पिछले हफ्ते देश के पूर्व वित्तमंत्री अरुण जेटली का निधन हुआ है. इससे पहले अगस्त की शुरुआत में ही पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का निधन हुआ था. इनके निधन के बाद सोशल मीडिया पर बड़ी संख्या में लोगों ने श्रद्धांजलियां अर्पित कीं. लोग मृतकों की पुरानी तस्वीरें और यादें साझा करने लगे. उनकी उपलब्धियों को रेखांकित करने लगे. उनके साथ के अपने व्यक्तिगत अनुभव भी साझा करने लगे. लेकिन इसी दौरान विभिन्न लेखकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच एक तीखी बहस भी छिड़ती देखी गई. जहां एक पक्ष दिवंगतों की अच्छाइयों और उपलब्धियों को याद कर उन्हें श्रद्धांजलि देने में लगा था और विपक्ष के कई लोग भी मृतकों की अच्छाइयों को याद कर रहे थे, वहीं बड़ी संख्या में ऐसे भी लोग देखे गए जो इन अवसरों पर मृतकों की कटु आलोचना करने में लगे थे.

मौत बड़ी कमाल की चीज है. किसी को नहीं छोड़ती. अत्याचारियों और तानाशाहों से लेकर संत-महात्माओं तक को मरना पड़ता है. मरने के बाद मनुष्य का शरीर नहीं बचता. उसके गुणावगुणों की कहानियां बच जाती हैं. खासकर जो व्यक्ति राजनीति जैसे सावर्जनिक जीवन में होता है उसके पक्ष और विपक्ष में एक-से-बढ़कर-एक सच्ची-झूठी, लेकिन सत्याभासी कहानियां मौजूद होती हैं.

एक राजनेता के जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी क्या होती है? फ्रांसीसी दार्शनिक ज्यां-पाल सार्त्र के 1948 में लिखे एक नाटक ‘लेस मैन्स सेल्स’ अर्थात् ‘गंदे हाथ’ का एक कम्यूनिस्ट चरित्र हिर्देरर एक स्थान पर पूछता है– ‘यहां ठीक कोहनियों तक मेरे हाथ गंदे हो चुके हैं. मैंने उन्हें गंदगी और खून में डुबो दिया है. क्या आप समझते हैं कि आप निर्दोषतापूर्वक शासन कर सकते है?’

सार्त्र से पहले भी शासकों या राजनीतिज्ञों के मूल्यांकन को उनके निजी चरित्र, भावनाओं और नैतिक दुविधाओं में निरूपित करने की प्रवृत्ति इतिहासकारों से लेकर समाज विज्ञानियों तक में एक लंबी परंपरा रही थी. लेकिन कई समकालीन चिंतकों और विश्लेषकों ने सार्त्र के ‘गंदे हाथों’ वाले रूपक को बड़े मार्के का माना है. माइकल वॉल्ज़र नाम के एक प्रभावशाली अमरीकी राजनीतिक दार्शनिक तो ज़ोरदार तरीके से उस उल्टी धारा का प्रतिनिधित्व करते नज़र आते हैं जो हिर्देरर के उपरोक्त सवाल का ज़वाब ‘नहीं’ में देने से जरा भी नहीं हिचकते. यानी कि वे सहानुभूतिपूर्वक मानते हैं कि कोई राजनेता निर्दोषतापूर्वक शासन कर ही नहीं सकता.

राजनीति में ‘निर्दोषता’ को ‘भोलेपन’ और ‘अयोग्यता’ से जोड़कर देखा जाता है. इसे राजनीतिक और प्रशासनिक उत्तरदायित्व के लिहाज से एक विवादास्पद और अवांछनीय चारित्रिक गुण भी करार दिया जाता है. राजनीतिक और प्रशासनिक पदों पर बैठे लोगों के शासन में आने का प्रतियोगितात्मक संघर्ष निजी और सार्वजनिक रूप से कितना पाक-साफ रहता है, यह विचार का विषय है.

आधुनिक गणतांत्रिक राज्यों में भी शासन करने की जिम्मेदारी निभाने की प्रक्रिया कितनी सरल और कितनी जटिल है, इस पर विचार करने की आवश्यकता होगी. सार्वजनिक पदों पर आसीन लोगों द्वारा भ्रष्टाचार का संबंध किस हद तक संबंधित व्यक्ति के निजी और स्वायत्त निर्णय, आचरण, जीवन उद्देश्य या पसंदगी-नापसंदगी पर निर्भर करता है? क्या सार्वजनिक जीवन को अपनाने का निर्णय एक कठोर निर्णय है, जिसमें व्यक्ति को संस्थात्मक और प्रक्रियात्मक बाध्यताओं के अनुरूप ऐसे फैसले भी लेने पड़ते हैं जिनमें अनिवार्य रूप से किसी-न-किसी के साथ ज्यादती या अन्याय अवश्यंभावी और स्वभाविक है? क्या निजी जीवन की नैतिकता और सार्वजनिक जीवन की नैतिकता के लिए अलग-अलग मापदंड होते हैं या होने चाहिए?

क्या बहुमत (सीमित अर्थों में ही) आधारित लोकतांत्रिक राजनीति में सत्ता हासिल करने की प्रतिस्पर्धा के लिए प्रयुक्त ‘युद्ध’ और ‘हार-जीत’ जैसी आक्रामक उपमाएं लोकतांत्रिक उद्देश्यों के बजाय सामंतवादी और प्रतिक्रियावादी उन्मादों और लोभों से ज्यादा उत्प्रेरित नहीं लगतीं? एक जटिल बहुलतावादी समाज में प्रतिनिधिमूलक संसदीय प्रणाली के अंतर्गत सत्ता हासिल करने में शुचिता और सदाचार पहले भी कितने महत्वपूर्ण थे या आज ही कितने ज़रूरी रह गए हैं? क्या कथित तौर पर लोकतांत्रिक समाजों में राज्य-सत्ता की प्रकृति पूरी तरह से लोकतांत्रिक आदर्शों के अनुरूप ढ़ल पाई है? या फिर यह सत्ता को वैधानिकता हासिल कराने हेतु कुछ चुनावी प्रक्रियाओं के समय-समय पर बेमन से किए जाने वाले अनुपालन के चक्र में फंस गया है?

क्या एक पक्ष द्वारा दूसरे पक्ष को पछाड़ने के लिए अपनाए जाने वाले उचित-अनुचित हथकंडों को लेकर आम सहमति नहीं बनती जा रही है? एक ऐसी स्थिति जिसमें तमाम पक्ष स्वयं को इसी व्यवस्था, प्रक्रियात्मक बाध्यताओं और अन्य पक्ष के अनुचित रवैयों के दबावों से पीड़ित होने के रूप में स्वयं को पेश करते हैं और इसी आधार पर अपने भ्रष्ट साधनों का भी औचित्य सिद्ध करने के तर्क तलाशते रहते हैं.

ये कुछ मौलिक प्रश्न हैं जिन पर संबंधित व्यक्तियों से परे जाकर सोचने की ज़रूरत होगी. व्यवस्था व्यक्ति का निर्माण कर रही है या कि व्यक्ति व्यवस्था का निर्माण कर रहा है, इस मुर्गी पहले और या अंडा वाली पहेली को समझना होगा. जिम्मेदारी के पद पर बैठे हुए व्यक्ति की तटस्थ, निर्भीक और द्वेषरहित आलोचना उसके जीवित रहते होनी चाहिए. उसके निधन के ठीक बाद यदि कुछ बोलना ज़रूरी ही हो, तो नम्र भाषा में उसके परिजनों के प्रति संवेदना व्यक्त करनी चाहिए और मृतक में यदि थोड़ी भी अच्छाई रही हो, तो उसे रेखांकित करना चाहिए. एक अवधि के बाद फिर से उसके कार्यों का तटस्थ, निर्भीक और द्वेषरहित मूल्यांकन होना चाहिए. यही तरीका है. तमाम विसंगतियों के बावजूद लोक-परंपरा में आज भी इसका निर्वाह किया जाता है. किसी व्यक्ति की कटु आलोचना का सबसे उपयुक्त समय उसकी मौत का अवसर नहीं होता. उसके पहले और एक अवधि के बाद का समय होता है.

लेनिन से लेकर माओ और सुहार्तो से लेकर सद्दाम हुसैन तक हम राजनेताओं और शासकों को कई रूप में देखते-समझते हैं. एकदम परस्पर-विरोधी नैरेटिव और दृष्टिकोण से उनका मूल्यांकन करते हैं. लाखों लोग एक ही समय में एक ही व्यक्ति के पक्ष और विरोध में अलग-अलग खड़े पाए जाते हैं. रूस के महान साम्यवादी विचारक और नेता माने-जाने वाले लेनिन के समय में भी वहां हिंसा हुई. उनके शासनकाल में भी लोगों को राजनीतिक विद्वेष की वजह से मारा गया. लेकिन उनके जीवन के अन्य साहसिक कार्यों की महात्मा गांधी तक ने भूरि-भूरि प्रशंसा की थी. इसलिए जिन लोगों ने गांधी की हत्या पर मिठाइयां बाटीं वे भारत के लोकचित्त में कभी उस रूप में स्वीकार नहीं किए जा सकेंगे. नेहरू के निधन पर अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा दी गई श्रद्धांजलि हम गिनाते नहीं थकते. नेहरू तो नेहरू थे. लेकिन आपातकाल के दौरान पर्याप्त अपयश अर्जित कर चुके संजय गांधी की विमान दुर्घटना में मृत्यु के बाद राम मनोहर लोहिया अस्पताल पहुंचकर इंदिरा गांधी को सांत्वना देने वालों में अटल बिहारी वाजपेयी भी प्रमुख थे.

याद रखना चाहिए कि मौत किसी की भी हो, वह उस मृतक के परिजनों के लिए तत्काल दुःख लेकर आती है. उस समय हमें मौत की अनिवार्यता और उसके आध्यात्मिक निहितार्थों का खयाल नहीं रहता. ज्ञानी और परिपक्व लोग भी ऐसे अवसरों पर उदास होते और रोते हुए तक देखे जाते हैं. इसलिए उस समय कम-से-कम स्वस्थ और तटस्थ आलोचकों को भी धैर्य रखना चाहिए. अगर उस समय संबंधित मृतक का अतिशयोक्तिपूर्ण महिमामंडन भी किया जा रहा हो, तो भी उसका कटु जवाब तत्काल देने के बजाय आगे उचित अवसर के लिए छोड़ देना चाहिए.

भारतीय राजनीति में दलबंदी भले ही दिलबंदी तक पहुंच गई हो, लेकिन आज भी विवाह और मृत्यु जैसे अवसरों पर राजनेताओं में आपसी सहृदयता देखी जाती है. कुछ लोग इसे भी चोर-चोर मौसेरे भाई और शासक-वर्ग की आपसी सांठ-गांठ कहकर खारिज कर सकते हैं. लेकिन मनुष्य को कभी-कभी केवल मनुष्य के रूप में देखना, उससे जुड़ना, उसे उसकी कमियों के साथ स्वीकारना भी जरूरी होता है. शुद्धतावादी मूल्यांकन की कठोर कसौटियों पर संसार का कोई मनुष्य पूर्णरूपेण खरा नहीं उतर सकेगा. ऐसे में कोई किसी को स्वीकार नहीं कर सकेगा. परिवार और समाज व्यवस्था चल ही नहीं पाएगी.

इसके अलावा हमारी परवरिश, पृष्ठभूमि, हमारी राजनीतिक विचारधारा भी व्यक्तियों के बारे में हमारी धारणाएं बनाती हैं. जाति, धर्म, लिंग, भाषा और क्षेत्र इत्यादि से जुड़ी धारणाएं तो हमारे मन में गहरी जड़ें जमाई हुई होती ही हैं. इसलिए भी किसी के भी बारे में एकदम निश्चित फैसला देने से पहले अपने इन पूर्वाग्रहों के प्रति थोड़ी सतर्कता बरतनी चाहिए. सहानुभूति और समानुभूति से काम लेना चाहिए. कटुता और द्वेष को किनारे रखकर भी, और शायद रखकर ही तटस्थ और प्रभावी आलोचना संभव है.

इसलिए विनोबा ने समाज और राजनीति के लिए कटुकवर्जनम्, गुणनिवेदम् और स्नेहसाधनम् का सूत्र दिया था. उन्होंने लिखा है कि वेद में एक स्थान पर आता है— नमो नमः स्तेनानां पतये नमो नमः नमः पुंजिष्ठेभ्यो नमो निषादेभ्यः ब्रह्म दाशा ब्रह्म दासा ब्रह्मैवेमे कितवाः यानी ‘उन डाकुओं के सरदारों को नमस्कार! उन क्रूरों को, उन हिंसकों को नमस्कार! ये ठग, ये दुष्ट, ये चोर, सब ब्रह्म ही हैं. इन सबको नमस्कार.’ गांधी, विनोबा, जेपी और लोहिया जैसों ने अपने जीवन में इसे जीकर भी दिखाया. सार्वजनिक जीवन में व्यक्तिगत राग-द्वेष को यथासंभव किनारे रखने की कोशिश की और सफल भी रहे.

इस मामले में गहन आध्यात्मिक निहितार्थों वाली बात संत कबीर ने अपने अनोखे अंदाज में कुछ यूं कही थी -

‘भक्त मरे क्या रोइये, जो अपने घर जाय।
रोइये साकट बापुरे, हाटों हाट बिकाय।।’