भले असहमति बरदाश्त करने की हमारी क्षमता तेज़ी से घटती जा रही है, हमें यह याद रखना चाहिये कि जिन इबारतों ने मुनष्य के इतिहास को निर्णायक रूप से बदल दिया उनमें से अधिकांश असहमति की स्याही से लिखी गयी थीं. यह स्याही धर्म, विज्ञान, ज्ञान, राजनीति, आर्थिकी, चिन्तन, विचार आदि सभी पर फैलती रही है. ऐसा कोई मानवीय समय नहीं हो सकता जिसमें असहमति न हो. नहीं होना चाहिये.

मैं कोंकणी के साहित्यकार दामोदर मोज़ो को उनकी 75वीं वर्षगंठ पर असहमति, सृजन, साहस और अन्तःकरण के लिए सलाम करने गोवा गया, पिछले सप्ताह. उन पर दो दिनों का सुविचारित-सुनियोजित आयोजन था जिसमें कोंकणी के अनेक लेखक और प्रेमी बड़ी संख्या में शामिल हुए. एक बार फिर लगा कि भारत में जो तथाकथित छोटी भाषाएं हैं (जिनके बोलने-बरतनेवाले कम हैं) उनमें लेखकों की जगह, पूछपरख अधिक है, उनमें लेखक होने का सामाजिक अर्थ है. मोज़ो के लिए यह महोत्सव तीन सरकारी संस्थाओं ने मिलकर किया जिनमें राज्य उच्च शिक्षा संचालनालय, रवीन्द्र भवन और शासकीय कला महाविद्यालय शामिल थे. यह तब जब गोवा में जोड़-तोड़ से बनी भाजपा सरकार है और मोज़ो असहमति के नायक लेखक रहे हैं जिन्हें हत्या की धमकी भी, धार्मिक अतिवादियों ने, पिछले वर्ष दी थी और सरकार को उन्हें सुरक्षा देना पड़ी थी. काश कि अन्य भाजपा सरकारें ऐसी ही समझदार होतीं!

दामोदर भाई, जैसा कि सभी उन्हें कोंकणी में सम्बोधित करते हैं, सारस्वत ब्राह्मण हैं पर उन्होंने कैथोलिक समाज, खाड़ी देशों में केरल से गयी आयाओं की दुर्दशा, तमिलनाडु की सुनामी आदि पर लिखा है. यह साहित्य में अपने से दूसरों को अपनाना है जो कि एक तरह से साहित्य का बुनियादी सबक और धर्म दोनों हैं. हमें यह अहसास कराना कि कोई दूसरे नहीं होते. इन दिनों तो हर दिन नये दूसरे बनाये जा रहे और तंग किये, हमलों का शिकार बनाये जा रहे हैं. यह अपनापन साहित्य की मानवीयता और लोकतंत्र दोनों का विस्तार करता है.

लेखक क्या होते हैं इसकी अनेक उक्तियां ज़हन में आती हैं- ‘अदृश्य के मधुसंचयी’ (रिल्के), ‘आत्मा के गुप्तचर’ (मुक्तिबोध), ‘अनन्त के राजदूत, समय द्वारा बन्धक बनाकर रखे गये’ (पास्तरनाक), ‘दूसरे इतिहास के कातिब’ (पाज़), ‘अनपहचानी सचाई के विधायक’ आदि. मोज़ो पर हरेक कुछ न कुछ लागू होती हैं.

एक सच्चे लेखक की तरह, उम्मीद है, कि वे भी आस्था और सन्देह, सचाई और कल्पना, आशा और निराशा, अनुभव और अबोधता, विचार और भावनाओं,ज्ञान और रहस्य, व्यवस्था और अराजकता आदि के द्वन्द्वों में फंसे हैं. हमारा समय इन द्वन्द्वों को ज़्यादा तीख़ा कर रहा है और लिखने को अधिक कठिन. वे इस सबके बावजूद मोर्चे पर हैं, यह कुछ उजाला फैलाता है.

साही की वापसी

हिंदी में विस्मरण और कृतज्ञताहीनता का जो माहौल दशकों से रहा है, उसमें ऐसे बहुत से लेखक होंगे जिन्होंने अधिक से अधिक विजयदेव नारायण साही का नाम तो सुना होगा पर उनका लिखा शायद ही कुछ पढ़ा हो. एक अतिरिक्त कारण यह भी है कि उनकी पुस्तकें आसानी से नहीं मिलतीं: अधिकांश दुष्प्राप्य हैं. इधर हम कुछ लोग साही को वापस ध्यान और विश्लेषण में, बहस में लाने की चेष्टा कर रहे हैं. गोपोश्वर सिंह ने उनकी एक संचयिता तैयार की है जो जल्दी ही प्रकाशित होगी और उसके बाद जल्दी ही उनकी ग्रन्थावली भी.

साही समाजवादी थे तब, जब वैसा होना बौद्धिक और राजनैतिक जोखिम उठाने जैसा था. वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी के अध्यापक थे पर लिखते हिन्दी में रहे. कवि, आलोचक, चिन्तक और संपादक थे. वे नये साहित्य के परिसर में एकमात्र थे जिन्होंने एक मध्यकालीन कवि ‘जायसी’ पर एक पूरी पुस्तक लिखी जिसने जायसी को फिर परिदृश्य पर ला दिया. उनके दूसरे कवितासंग्रह ‘साखी’ ने एक हड़कंप सा मचाया था. उसमें एक कविता ‘प्रार्थना: गुरु कबीरदास के लिए’ का समापन इन पंक्तियों से होता था-

दो तो ऐसी निरीहता दो

कि इस दहाड़ते आतंक के बीच

फटकार कर सच बोल सकूंं

और इसकी चिन्ता न हो कि

इस बहुमुखी युद्ध में

मेरे सच का इस्तेमाल

कौन अपने पक्ष में करेगा।

यह भी न दो

तो इतना ही दो

कि बिना मरे चुप रह सकूं।

ये पंक्तियां आज, लिखे जाने के लगभग 40 वर्ष बाद, कितनी प्रासंगिक लगती हैं. यह हमारे समय का प्रतिनिधि कवि-वक्तव्य हो सकता है. अलबत्ता यह भी कहना होगा कि अब युद्ध दुर्भाग्य से बहुमुखी नहीं रह गया है, वह दुमुखी है. ऐसे में ‘फटकार कर सच’ बोल सकना और भी ख़तरनाक हो गया है. ऐसे हैं जो अकसर चुप रहते हैं पर ‘बिना मरे’. पर परिस्थिति के इस परिवर्तन से साही की प्रार्थना की प्रासंगिकता आहत नहीं होती. यह प्रार्थना ‘अन्तहीन सहानुभूति की वाणी’ बोल सकने की विनम्रता आरंभ में ही मांगती है और यह इसरार भी करती है कि ‘यह अन्तहीन सहानुभूति/पाखण्ड न लगे.’ आज राजनीति और राज्य दोनों में सहानुभूति कितना विराट् पाखंड बन गयी है!

हर जगह धरती की भाषा एक जैसी

इन दिनों नफ़रत, भेदभाव, हिंसा की भाषा हर जगह इतनी एक जैसी लगती है कि हम भूल ही जाते हैं कि इसके बरक़स ‘हर जगह धरती की भाषा एक जैसी’ है. इसकी याद दिलायी है असमिया में लिखी जा रही है ‘मियां कविता’ ने. यह काव्यपंक्ति सिराज खां की कविता से है जिसमें यह भी आता है-

वे पूछते हैं, ‘ओय, तुम्हारी जाति क्या है?’

मैं उन्हें कैसे बताऊं कि मेरी जाति आदमी है

और हम तभी तक हिन्दू या मुसलमान हैं

जब तक धरती हमें एक नहीं कर देती।

एक और कविता में रेहाना सुलताना लगभग चीतकार करती हैं-

तुम्हारी गोद में आकर मैंने क्या पाया?

मेरी कोई पहचान नहीं, न कोई भाषा

मैं अपने को गंवा चुकी, सब कुछ गंवा चुकी

जो मुझे परिभाषित कर सकता

और फिर भी मैं तुम्हें भींचकर पकड़े हूंं

मैं तुमने पिघलने की कोशिश कर रही हूंं

मुझे कुछ नहीं चाहिये, मेरी मांं,

सिर्फ़ थोड़ी सी जगह तुम्हारे चरणों में।

इन माटी के सपूतों को बताओ

कि हम सब भाई-भाई हैं....

काज़ी नील अपनी एक कविता में ‘हर मकान को सौ बरसों के अँधेरों से भरा’ और इस जम़ीन को ‘एक दरका हुआ हृदय’ बताते हैं. हफ़ीज़ अहमद अपनी कविता में कहते हैं-

लिखो

मैं एक मियां हूंं

मेरा सीरियल नम्बर एनआरसी में 200543 है।

मेरे दो बच्चे हैं

अगली गर्मियों में

एक और होने जा रहा है

क्या तुम उससे भी नफ़रत करोगे

जैसे नफ़रत तुम मुझसे करते हो?