भारत द्वारा जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद-370 के अधिकतर प्रावधानों को हटाए जाने पर पाकिस्तान ने बेहद कड़ी प्रतिक्रिया दी है. उसने एक के बाद एक भारत के इस निर्णय के विरोध में कई बड़े फैसले लिए हैं. पाकिस्तान ने भारतीय उच्चायुक्त को निष्कासित कर दिया, द्विपक्षीय व्यापार को निलंबित कर दिया और दोनों देशों के बीच चलने वाली समझौता एक्सप्रेस को भी हमेशा के लिए बंद करने का ऐलान किया. पाकिस्तान की ओर से यह भी कहा गया है कि वह जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म करने के मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में उठाएगा और यह कोशिश करेगा कि विश्व समुदाय भारत पर इस निर्णय को वापस लेने का दबाव बनाए. इसके अलावा पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने भारत के साथ हुए शिमला समझौता सहित तमाम समझौतों-संधियों की समीक्षा करने की चेतावनी भी दी है.

पाकिस्तान की सरकार द्वारा लिए गए इन फैसलों को लेकर कई जानकार हैरान हैं. इन लोगों का कहना है कि अनुच्छेद-370 हटने पर पाकिस्तान का कड़ी प्रतिक्रिया देना तो स्वाभाविक था, लेकिन इतनी कड़ी प्रतिक्रिया देना समझ से परे नजर आता है. इन लोगों के मुताबिक वर्तमान में पाकिस्तान की जैसी खस्ता आर्थिक हालत है, उसे देखते हुए तो इसकी उम्मीद बिलकुल नहीं की जा सकती थी. हालांकि विदेश मामलों के कुछ जानकार कश्मीर को लेकर उसके हद से ज्यादा बौखलाने के पीछे कई वजहें बताते हैं.

डोनाल्ड ट्रंप के बयान से खुश पाकिस्तान के मंसूबों पर भारत ने पानी फेर दिया है

बीते महीने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान जब अमेरिका से स्वदेश लौटे तो उनकी पहली प्रतिक्रिया थी, ‘ऐसा लग रहा है जैसे दोबारा विश्व कप जीतकर लौटा हूं.’ इमरान खान की इस ख़ुशी की सबसे बड़ी वजह डोनाल्ड ट्रंप का वह बयान था जिसमें उन्होंने कश्मीर मुद्दे पर मध्यस्थता की पेशकश की थी. इस बयान के बाद भारत में काफी हंगामा हुआ था. जानकार कहते हैं कि डोनाल्ड ट्रंप के इस बयान को इमरान खान अपनी बड़ी कूटनीतिक सफलता मान रहे थे. जब ट्रंप ने एक हफ्ते के भीतर दूसरी बार फिर मध्यस्थता की बात कही तो इमरान खान को विश्वास हो गया कि वे अफगानिस्तान में अमेरिका की मदद करने के बदले उससे कश्मीर मुद्दे पर कुछ हासिल कर सकते हैं. लेकिन, भारत की नरेंद्र मोदी सरकार ने महज दो हफ्ते बाद ही ऐसा दांव चला कि इमरान खान के अरमानों पर पानी फिर गया.

पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार नजम सेठी एक न्यूज चैनल से बातचीत में कहते हैं कि इमरान खान और डोनाल्ड ट्रंप की मुलाकात के ‘चंद दिनों बाद ही भारत के इस दांव ने न केवल पाकिस्तान को चित कर दिया बल्कि अमेरिका को भी यह साफ़ सन्देश दे दिया कि कश्मीर उसका निजी मामला है और उसे इसमें किसी का दखल मंजूर नहीं है.’ सेठी आगे कहते हैं, ‘भारत की अभी तक की सरकारें तो केवल बयानों में कश्मीर में तीसरे पक्ष का दखल न देने की बातें करती थीं, लेकिन नरेंद्र मोदी की सरकार ने बयानों से कहीं आगे जाकर कश्मीर पर एक बड़ा फैसला ले लिया, जो काफी मायने रखता है.’

पाकिस्तान के पूर्व राजनयिक हुसैन हक्कानी भी अपनी एक टिप्पणी में कुछ ऐसा ही लिखते हैं. उनके मुताबिक ‘नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा इस समय लिए गए इस फैसले ने पाकिस्तान की सरकार को हिलाकर रख दिया है...पाकिस्तान की रणनीति हमेशा कश्मीर मुद्दे को ‘वैश्विक मुद्दा’ बनाने की रही है और भारत ने इसे हमेशा द्विपक्षीय बनाने के लिए संघर्ष किया. लेकिन मोदी सरकार के इस फैसले ने अब कश्मीर मुद्दे को पूरी तरह से भारत और पाकिस्तान का आंतरिक मसला बना दिया है.’

भारत सरकार से जुड़े कुछ सूत्र भी बताते हैं कि अनुच्छेद-370 को हटाने की तैयारी तो लंबे समय से चल रही थी और यह भाजपा का चुनावी वादा भी था, लेकिन इस समय आनन-फानन में यह फैसला लिए जाने की एक वजह अमेरिका और पाकिस्तान दोनों को संदेश देना था. इस मामले की जानकारी रखने वाले एक अधिकारी नाम न छापने की शर्त पर समाचार वेबसाइट मिंट को बताते हैं, ‘पुलवामा हमले के बाद से ही इसकी तैयारी हो रही थी लेकिन जब अमित शाह ने गृहमंत्री का कार्यभार संभाला तो इस पर गंभीरता से काम शुरू हुआ.’ ये अधिकारी आगे कहते हैं, ‘अमरनाथ यात्रा को रोका गया क्योंकि वास्तव में आतंकी खतरा था...लेकिन इसी दौरान इमरान खान और डोनाल्ड ट्रंप की मुलाकात के बाद जब ट्रंप का (कश्मीर पर) बयान आया तो (सरकार को) लगा कि अब कोई समाधान होना चाहिए और वो भी जल्द से जल्द.’

भारत पर दबाव बनाने के लिए बौखलाहट का दिखावा

इमरान खान बीते साल जुलाई में पाकिस्तान की सत्ता में आए थे. प्रधानमंत्री बनने के बाद से ही उन्होंने भारत से बातचीत करने के लिए एड़ी-चोटी तक का जोर लगा दिया, लेकिन नरेंद्र मोदी ने उन्हें कोई तवज्जो नहीं दी. भारत के तरजीह न देने की वजह पाकिस्तान का वह वर्षों पुराना रवैया था जिसके लिए कहा जाता है कि वह आगे से दोस्ती करता है और पीछे से छुरा घोंपता है.

पठानकोट और उरी जैसे आतंकी हमलों के बाद से मोदी सरकार ने पाकिस्तान से साफ़ शब्दों में कह दिया था कि बातचीत तभी होगी जब आतंकवाद पर वह कड़ी कार्रवाई करेगा. फिर पुलवामा हमले के बाद दोनों देशों के बीच बातचीत की रही सही उम्मीद भी खत्म हो गई. इस हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान को दिया गया ‘मोस्ट फेवर्ड नेशन’ का दर्जा भी वापस ले लिया और वैश्विक स्तर पर उसके खिलाफ लामबंदी शुरू कर दी. भारत के इन फैसलों की वजह से पाकिस्तान को व्यापार और आर्थिक मोर्चे पर लगातार नुकसान हो रहा था और इसके चलते भी वह लगातार इस कोशिश में था कि भारत से बातचीत हो जाए जिससे उसे कुछ राहत मिल सके. लेकिन, दोबारा सत्ता में आने के बाद भी नरेंद्र मोदी ने पाकिस्तान को कोई तरजीह नहीं दी.

विदेश मामलों के जानकारों की मानें तो बातचीत के सभी प्रयासों में विफल होने के बाद अब पाकिस्तान को लगता है कि वह कश्मीर में हुए इस नए घटनाक्रम को लेकर भारत पर दबाव बना सकता है और थोड़ी बहुत राहत देने या फिर बातचीत के लिए उसे मजबूर कर सकता है. यही वजह है कि पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद-370 हटाए जाने के मुद्दे को दुनियाभर में जोर-शोर से उठाने की कोशिश कर रहा है. वह यह भी जानता है कि अगर उसने इतनी ज्यादा बौखलाहट नहीं दिखाई तो फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस मुद्दे को कोई अहमियत नहीं दी जाएगी.

हालांकि, कूटनीति के जानकार कहते हैं कि पाकिस्तान की इन कोशिशों के बाद भी कश्मीर के हालिया वाकये को वैश्विक स्तर पर कोई तरजीह नहीं मिलेगी. वरिष्ठ पत्रकार नजम सेठी कहते हैं, ‘संयुक्त राष्ट्र के जितने भी सदस्य हैं, उनके भारत से बेहतरीन रिश्ते हैं, कोई भी पाकिस्तान जैसे देश के लिए भारत से अपने संबंध खराब करने का जोखिम नहीं उठाएगा.’ वे आगे कहते हैं कि अमेरिका को अफगानिस्तान से निकलने के लिए पाकिस्तान की दरकार है और इसलिए वह भी तभी तक इस मुद्दे पर थोड़े बहुत बयान जारी कर सकता है जब तक कि वह अफगानिस्तान से निकल नहीं जाता.

इस मामले पर अभी तक अन्य देशों की जो प्रतिक्रिया आई है उससे पता लगता है कि कोई भी देश भारत के खिलाफ नहीं बोलना चाहता. अमेरिका ने जहां दोनों देशों से शान्ति बनाए रखने की अपील की है. वहीं चीन ने अपनी सीमा से जुड़े लद्दाख को लेकर तो चिंता जाहिर की, लेकिन कश्मीर मुद्दे पर ज्यादा कुछ नहीं बोला. यहां तक कि मुस्लिम देशों मलेशिया, तुर्की, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब ने पाकिस्तान की अपील के बाद भी कोई ऐसा बयान जारी नहीं किया जिससे नई दिल्ली से उनके रिश्तों में कोई दरार आए.

पाकिस्तान की अंदरूनी परेशानियों से जनता का ध्यान हटाने की कोशिश

कुछ जानकार पाकिस्तान के बिगड़े अंदरूनी हालात को भी इमरान खान सरकार की इतनी ज्यादा बौखलाहट की एक वजह बताते हैं. ये लोग कहते हैं कि इमरान खान जब से वहां की सत्ता में आए हैं देश की आर्थिक स्थिति बद से बदतर होती जा रही है. एक साल पहले जिस एक अमेरिकी डॉलर की कीमत सौ पाकिस्तान रुपए के बराबर थी, वह अब 157 पाकिस्तानी रुपए हो गई है. जाहिर है कि इस दौरान वहां बेतहाशा महंगाई भी बढ़ी है. जानकारों की मानें तो अनुच्छेद-370 के मुद्दे को जोर-शोर से उठाने के पीछे इमरान खान का मकसद वहां की जनता का ध्यान अर्थव्यवस्था और महंगाई जैसे मुद्दों से हटाना भी है. वहीं सात अगस्त को कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान की संसद का एक विशेष सत्र आयोजित हुआ था. इसमें पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने जिस तरह नाटकीय अंदाज में ‘कश्मीर बनेगा पाकिस्तान’ के नारे लगवाए उससे भी यह इशारा तो मिलता ही है कि वहां की सरकार जनता के दिलो-दिमाग में बाकी मसलों से ऊपर कश्मीर मसले को उभारना चाहती है.

पाकिस्तान के कुछ पत्रकार यह भी बताते हैं कि बीते महीने इमरान खान जब अमेरिका दौरे से लौटे थे तो उन्होंने अपनी सरकार की विदेश नीति की जमकर तारीफ़ की थी. उनकी सरकार ने यह दौरा ऐसे प्रचारित किया था कि जैसे डोनाल्ड ट्रंप से कश्मीर मुद्दे पर बयान दिलवाकर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने भारत को चारों खाने चित कर दिया हो. लेकिन गौर करने वाली बात है कि वही अमेरिका तब चुप रहा, जब भारत ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद-370 हटाया. ऐसे में यह साफ़ हो गया कि इमरान खान की विदेश नीति से भारत की विदेश नीति कहीं ज्यादा मजबूत है. पाकिस्तान की विपक्षी पार्टियों ने भी इस मुद्दे को खूब भुनाया और इसे इमरान की फ्लॉप विदेश नीति कहकर जनता के बीच प्रचारित किया. बताते हैं कि ऐसे में इमरान खान की सरकार पाकिस्तानी आवाम के बीच अपनी बेहतर छवि को बनाए रखने के लिए भारत के खिलाफ ज्यादा बौखलाहट दिखाने जैसे हथकंडे अपनाने को मजबूर है.