साल 2019 चंद्र अभियानों के लिए कई मामलों में खास है. जैसे 16 जुलाई, 2019 को इंसान के चांद पर पहुंचने की पचासवीं सालगिरह थी. भारत के मामले में यह कुछ इस तरह से विशेष हो गया कि इस सालगिरह से ठीक एक दिन पहले इसरो ने अपने महत्वकांक्षी प्रोजेक्ट, चंद्रयान-2 को सफलता पूर्वक लॉन्च किया. साथ ही, इसी साल जनवरी में चीन अपना रोबोटिक स्पेसक्राफ्ट चें’ज-4 चांद के सुदूर इलाके तक पहुंचाने में सफल रहा था. इसके अलावा, अप्रैल में इजरायल द्वारा भेजे गए एक रोबोटिक लैंडर स्पेसक्राफ्ट को भी इस साल चांद तक पहुंचने के लिए की गई कोशिशों में गिना जा सकता है. हालांकि यह अभियान असफल रहा था.

आने वाले सालों की बात करें तो अमेरिकन स्पेस एजेंसी नासा ने जहां साल 2023-24 तक चांद पर दोबारा मानव को पहुंचाने और बसाने की योजना बनाई है, वहीं उससे जरा ही पीछे रहने वाला रूस करीब 2030 तक ऐसा करने का इरादा किए बैठा है. इस मामले में धीमे लेकिन ठोस कदमों से आगे बढ़ रहे चीन ने खुद को अगले 25 सालों का समय दे रखा है. ऐसे ही यूरोपीय एजेंसियां 2050 तक वहां पहुंचकर ‘मून विलेज’ बसाने का दावा करती नज़र आती हैं. चांद तक पहुंचने की इस रेस में भारत, जापान, इजरायल, उत्तर और दक्षिण कोरिया जैसे देश भी शामिल हैं. कहने का मतलब यह है कि आने वाले वक्त में जल्दी ही चांद पर पहुंचने के लिए भगदड़ मचती दिख सकती है.

दिलचस्प है कि बीते पचास सालों में किसी भी देश ने चांद पर पहुंचने के लिए कोई बड़ा सफल-असफल प्रयास नहीं किया. तो फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि धरतीवासियों को वहां पर जाने की जरूरत महसूस होने लगी है. इसके लिए अलग-अलग देशों के पास अपनी-अपनी वजहें हैं. मसलन, भारत जैसे देशों की बात करें तो उनके लिए चंद्र अभियान खुद को तकनीकी तौर पर समृद्ध दिखाने का सुनहरा मौका होगा. दूसरी तरफ चीन अपने ग्रह के बाहर खुद को ताकतवर दिखाकर विश्व शक्ति बनने की दिशा में और आगे बढ़ जाना चाहता है. इनसे अलग अमेरिका के लिए चांद पर जाना, मंगल पर पहुंचने से पहले आने वाला एक जरूरी पड़ाव भर है. इसके एक और पक्ष की तरफ गौर करें तो पता चलता है कि तमाम देशों के लिए अंतरिक्ष से जुड़े अनुसंधान करना तकनीक की बढ़ोत्तरी और अपनी क्षमताओं का विस्तार तो है ही, राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक भी है.

कुछ और आर्थिक और भू-राजनीतिक (जियोपॉलिटिकल) फायदों पर गौर करें तो पता चलता है कि वे देश जो अब तक खुद से चांद पर पहुंचने की क्षमताएं विकसित नहीं कर पाए हैं, उन्हें भी परोक्ष रूप से इन अभियानों से फायदा ही होगा. ये देश चंद्रयानों के कुछ हिस्से बनाकर या उनमें काम आने वाली छोटी-बड़ी तकनीकें साक्षा करके बड़े आर्थिक फायदे पा सकते हैं. इसका एक उदाहरण चंद्रयान-1 है, जिसके कई हिस्से स्वीडन, बुल्गारिया, ब्रिटेन और जर्मनी जैसे देशों से तैयार होकर आए थे. इनके चलते, देशों के संबंध एक-दूसरे के सहयोग पर आधारित होंगे जिससे विश्व शांति में मदद मिलने की संभावना बढ़ती है.

इसके अलावा, कई देशों के चंद्र अभियानों में रुचि लेने की सबसे बड़ी वजह इनकी लागत का बेहद कम हो जाना भी है. द इकोनॉमिस्ट की इस वीडियो रिपोर्ट की मानें तो 1980 में जहां एक स्पेसक्राफ्ट बनाने में नासा को प्रति किलो 62,000 डॉलर्स (44 लाख रुपए) खर्च करने पड़ते थे, वहीं अब यह घटकर मात्र 1400 डॉलर्स (एक लाख रुपए) रह गया है. 1960 से 1973 के दौरान चले पहले अमेरिकी चंद्र अभियान अपोलो का कुल खर्च 25.4 अरब डॉलर यानी करीब 1.8 लाख करोड़ रुपए था. वहीं इसके अगले चंद्रअभियान अर्टेमिस के कुल खर्च का अंदाजा 25 से 30 अरब डॉलर लगाया जा रहा है. लेकिन इसमें चांद पर एक स्पेस स्टेशन बनाने की तैयारी भी शामिल है. जबकि अपोलो के जरिए चांद पर पहुंचकर केवल चहलकदमी ही की जा सकी थी.

चंद्र अभियानों की दूसरी सबसे बड़ी वजह मनुष्य के लालच को ठहराया जा सकता है. चांद पर कदम रखने वाले दूसरे व्यक्ति बज़ एल्ड्रिन ने चांद पर बिखरी भूरे रंग की जिस परत को मैग्निफिसेंट डेसलेशन (शानदार वीरानापन) कहा था, उसके बारे में वैज्ञानिकों का अंदाजा है कि वह कई तरह के विरले तत्वों और बहुमूल्य धातुओं की खान हो सकती है. ऐसा खयाल किया जाता है कि चांद पर सोने, चांदी, टाइटेनियम के अलावा उससे टकराने वाले क्षुद्र ग्रहों का मलबा भी बहुतायत में है. इसमें मौजूद कई तत्वों को धरती पर कई तरह की ऊर्जा के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है. इनमें ज्ञात तत्वों की बात करें तो सबसे ज्यादा बार हीलियम-3 का नाम लिया जाता है जो पीरियोडिक टेबल के दूसरे तत्व हीलियम का आइसोटोप है. हीलियम-3, परमाणु संयंत्रों में इस्तेमाल किया जा सकने वाला एक बेहतरीन और साफ-सुथरा ईंधन है.

अमेरिका संसद ने साल 2015 में एक स्पेस-एक्ट पास किया था जिसमें यह बात भी शामिल थी कि अमेरिकन कंपनियों को चांद पर जाकर, इस तरह के किसी भी ईंधन की खुदाई करने का अधिकार है. चीन भी इसी तरह की बातें समय-समय पर कहता रहा है. कुछ साल पहले ये बातें यहां तक बढ़ीं थी कि अमेरिकी सरकार ने नासा पर चीन के साथ मिलकर किसी तरह का अनुसंधान करने पर रोक लगा दी थी.

कानून और प्रतिबंधों की बात निकली है तो इस बहाने, आपको बताते चलते हैं 1967 में संयुक्त राष्ट्र में सौ देशों के बीच एक समझौता हुआ था. इसमें कहा गया था कि चांद पर किसी भी देश का मालिकाना हक नहीं है. साथ ही, इस समझौते में चांद पर किसी भी तरह के परमाणु हथियारों का इस्तेमाल करने पर भी रोक लगाई गई थी. इसके अलावा, चांद से जुड़े किसी भी विवाद के लिए अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष कानून बनाए गए हैं. अंतरिक्ष में होने वाले किसी भी तरह के विवाद से बचने के लिए हर देश के पास स्पेस लॉयर्स होते हैं, जो सरकारों को सलाह देते हैं कि वे अंतरिक्ष से जुड़ी किस तरह की गतिविधियां कर सकते हैं और किस तरह की नहीं.

चंद्र अभियानों की बाढ़ आने पर फिर से लौटें तो मशहूर अमेरिकन उद्योगपति और टेस्ला-पेपॉल जैसी कंपनियों के संस्थापक एलन मस्क ने स्पेसएक्स और एमेजॉन के संस्थापक जेफ बेज़ोस ने ब्लू ओरिजन के नाम से अपनी रॉकेट कंपनियां शुरू की हैं. तकरीबन दो दशकों से अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में काम कर रही ये कंपनियां चांद पर पर्यटन करवाने से लेकर कॉलोनी बनाने तक की महत्वाकांक्षा दिखा चुकी हैं. और अमेरिका के नये कानून से इनकी इन महत्वाकांक्षाओं को और भी बल मिल गया है.

इसके अलावा धरती से चांद की दूरी सिर्फ तीन लाख चौरासी हजार किलोमीटर के करीब है. यह किसी भी और ग्रह की तुलना में बहुत कम है. इस दूरी को सिर्फ तीन दिन में तय किया जा सकता है. इसके अलावा, चांद से धरती पर रेडियो कम्युनिकेशन करने में महज एक से दो सेकंड का फर्क आता है. इसीलिए भी स्पेस कंपनियां अंतरिक्ष में पर्यटन की योजनाओं पर बिना हिचक काम कर रही हैं.

इन सबके अलावा चांद पर पानी मिलने की संभावनाओं का दिखना भी इसके प्रति आकर्षण की मुख्य वजह है. चंद्रमा पर हुए कुछ अनुसंधान बताते हैं कि यहां पर पानी उन ध्रुवीय क्रेटर्स में बर्फ के रूप में मिल सकता है, जहां तक सूर्य की रोशनी नहीं पहुंचती है. इसके साथ ही पानी को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में तोड़कर सांस लेने लायक हवा भी उपलब्ध करवाई जा सकती है. अगर ऐसा नहीं भी हो पाता है तो हाइड्रोजन और ऑक्सीजन का इस्तेमाल रॉकेट प्रोपेलैंट की तरह तो किया ही जा सकता है. कुल मिलाकर, पानी की मौजूदगी चांद को अंतरिक्ष में मौजूद एक ऐसा फ्यूल स्टेशन बना सकती है जहां पर स्पेसक्राफ्ट्स किसी और ग्रह का रुख करने से पहले ईंधन भरने के लिए रुक सकते हैं. यही वजह है कि मंगल तक पहुंचने को अपना लक्ष्य मानने वाला अमेरिका, चांद पर ठिकाना बनाने की रेस में सबसे तेजी से भाग रहा है.