लगता है कि सोनभद्र में 10 लोगों के बलिदान से उत्तर प्रदेश में वन भूमि पर कब्जों के काले कारनामों पर अब अंकुश लग सकेगा. बीते महीने सोनभद्र में 18 हेक्टेयर भूमि पर कब्जा करने के प्रयास के दौरान हुई गोलीबारी में 10 ग्रामीणों की मौत हो गई थी और दो दर्जन से ज्यादा लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे. इस हत्याकांड ने योगी सरकार को विपक्ष के तीखे हमलों का निशाना बनाया. प्रियंका गांधी वाड्रा से लेकर मायावती तक ने विपक्ष के तमाम नेताओं ने योगी सरकार पर दोष मढ़ा. विधानसभा में भी इस मामले की गूंज सुनाई दी और विपक्ष ने एकजुट होकर सरकार से इस्तीफे की मांग की. लेकिन घटना के तीन हफ्ते बाद इस मामले की उच्च स्तरीय जांच और उस पर योगी सरकार के तेवरों को देखकर उम्मीद जगी है कि राज्य में वन भूमि पर धूर्तता से कब्जे करने वाले सारे गुनाहगारों का खेल खत्म हो सकेगा.

जांच रिपोर्ट आते ही योगी सरकार ने सोनभद्र हत्याकांड और उससे जुड़े जमीन घोटाले के लिए पुलिस, राजस्व और सहकारिता विभाग के 15 अफसरों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दी है. इनके साथ ही 14 अन्य लोगों के खिलाफ भी रिपोर्ट दर्ज कराई गई है. इनमें बिहार कैडर के दो आईएएस अधिकारियों की पत्नियों के नाम भी शामिल हैं. आरोपित बनाई गई आशा मिश्र आईएएस अधिकारी प्रभात कुमार मिश्र की पत्नी हैं जबकि विनीता शर्मा उर्फ किरन भानु प्रताप शर्मा की पत्नी हैं. जांच रिपोर्ट के 1000 पन्नों में यह खुलासा किया गया है कि सोनभद्र में अरबों रुपयों की सरकारी और वन भूमि को हड़पने के लिए किस तरह के हथकंडे अपनाए गए. यह भी कि किस तरह सरकारी तंत्र, अफसरों और रसूखदार नेताओं की मिलीभगत से पूरा खेल किया गया.

कब्जे के खेल का इतिहास

जांच रिपोर्ट के मुताबिक जमीनों पर धूर्ततापूर्ण तरीकों से कब्जे का यह मामला 1952 से शुरू हुआ था. 10 अक्टूबर 1952 को बिहार के कांग्रेस एमएलसी महेश्वर प्रसाद नारायण और दुर्गा प्रसाद राय ने अपने 12 रिश्तेदारों के साथ मिल कर सोनभद्र के उंभा और सपही गांवों में आदर्श कृषि सहकारी समिति की स्थापना की, जबकि नियमानुसार राज्य के बाहर का कोई व्यक्ति राज्य में कृषि सहकारी समिति बना ही नहीं सकता था. इस समिति के मुख्य प्रवर्तक महेश्वर प्रसाद उत्तर प्रदेश के राज्यपाल रहे चंद्रेश्वर प्रसाद नारायण के चाचा थे.

1955 में राबर्ट्सगंज के तहसीलदार की मिली भगत से बहुत बड़ी सरकारी भूमि सोसाइटी के नाम कर दी गई. 1989 में यही 1400 बीघा जमीन सोसाइटी से व्यक्तिगत नामों पर हस्तांतरित यानी ट्रांसफर कर दी गई. जमीन के निजीकरण के बाद आशा मिश्र और विनीता शर्मा गैरकानूनी ढंग से जमीन की मालिक बन गई थीं. 17 अक्टूबर 2017 को इन दोनों ने अपने हिस्से की 18-18 हेक्टेयर जमीन सोनभद्र हत्याकांड के मुख्य आरोपित, पूर्व ग्राम प्रधान यज्ञदत्त व उसके पक्ष के अन्य लोगों को बेच दी.

यहां तक का सारा खेल अफसरों की मिलीभगत से चलता रहा. लेकिन जब 2018 में प्रधान पक्ष के लोगों ने राजस्व अधिकारियों व पुलिस प्रशासन की मदद से भूमि पर कब्जे का प्रयास किया तो उन्हें जबर्दस्त प्रतिरोध के कारण पीछे हटना पड़ा. दरसल इस जमीन पर उंभा व सपही गांवों के 140 परिवार तीन पीढ़ियों से खेती करते चले आ रहे थे. ये लोग जमीन पर अवैध मालिकाना हक जताने वाली समिति को इसका भुगतान भी करते थे, लेकिन जमीनी हकीकत को जानने की कोशिश करने के बजाय सोनभद्र के सहायक अभिलेख अधिकारी ने 27 फरवरी 2019 को प्रधान पक्ष के लोगों के पक्ष में नामांतरण आदेश जारी कर दिया.

नामांतरण आदेश अपील पर सोनभद्र के डीएम का रुख भी ऐसा ही रहा. उन्होंने भी ग्रामीणों की सभी 11 अपीलें तकनीकी आधार पर रद्द कर दीं और एक तरह से सोनभद्र में हिंसा होने की परिस्थितियां भी पैदा कर दीं. अब छह जुलाई 2019 के इसी आदेश के कारण योगी सरकार ने डीएम अंकित कुमार अग्रवाल और एसएसपी सलमान जफर को हटा कर उनके खिलाफ विभागीय जांच के आदेश भी दे दिए हैं.

यही नहीं, सरकार ने इस घटना से सबक लेते हुए सोनभद्र और मिर्जापुर जिलों में ग्राम समाज और वन विभाग की हजारों एकड़ जमीन पर फर्जी कागजों के आधार पर किए गए कब्जों की उच्चस्तरीय जांच भी शुरू कर दी है. इसके लिए अपर मुख्य सचिव राजस्व रेणुका कुमार की अध्यक्षता में छह सदस्यीय समिति बनाई गई है. अनुमान लगाया जा रहा है कि सोनभद्र और मिर्जापुर जिलों में एक लाख एकड़ से अधिक भूमि पर पिछले वर्षों में इसी तरह चारसौबीसी करके कब्जे किए जा चुके हैं. राज्य सरकार द्वारा गठित नई समिति दोनों जिलों में गलत तरीकों से किए गए नामांतरण और कब्जों की पूरी पड़ताल करेगी. समिति में वन विभाग और सहकारिता के अधिकारियों को भी शामिल किया गया है. इस समिति को कुल 2.48 लाख हेक्टेयर जमीन के रिकार्ड खंगालने हैं.

इस मामले में राज्य सरकार ने एक और बड़ा कदम उठाया है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने घोषणा की है कि ग्रामसभा उंभा और सपही की विवादित 1300 बीघा जमीन, जिसको आदर्श कृषक सहकारी समित के नाम पर हथियाया गया था, अब वापस ग्राम पंचायत के नाम पर दर्ज कराई जाएगी और उसके बाद यह जमीन स्थानीय मूल निवासियों, भूमि पर पहले से खेती करते आ रहे ग्रामीणों और अन्य भूमिहीनों में बांट दी जाएगी.

खेल पूरे राज्य में

गैर सरकारी और वन भूमि पर कब्जे का मामला उत्तर प्रदेश के सिर्फ दो जिलों तक ही सीमित नहीं है. वन क्षेत्र से जुड़े बहराइच, पीलीभीत, मुरादाबाद, लखीमपुर-खीरी, गोंडा और बलरामपुर जैसे कई जिलों में यह खेल बीसियों साल से चल रहा है. कृषि समितियों के जरिए सरकारी जमीनें हड़पने के मामलों के बहुत बढ़ जाने पर कभी तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा ने प्रदेश भर के ऐसे मामलों की जांच के लिए मंगल देव विशारद की अध्यक्षता में एक जांच कमेटी भी गठित की थी. इस समिति ने अपनी रिपोर्ट में कृषि सहकारी समिति बना कर डेढ़ लाख एकड़ से अधिक भूमि अवैध तरीके से हथियाए जाने की बात कही थी. लेकिन कांग्रेस के ही कुछ बड़े नेताओं के नाम सामने आने पर इस रिपोर्ट को ही दबा दिया गया.

वन जमीनों पर कब्जे का धंधा भी राजनीतिक संरक्षण और अफसरों की मिलीभगत से ही फलता-फूलता रहा है. कब्जा करने वाले तराई क्षेत्र की उपजाऊ वन भूमि पर जंगलों को काट कर उन पर खेती शुरू कर देते हैं. इसमें वनकर्मियों की मौन सहमति होती है. अगर कब्जा करते वक्त ही वन विभाग सक्रिय हो जाए तो जंगल कटने से भी बच जाए और कब्जा करने वालों के खिलाफ आपराधिक मामले भी चलने लगें, गिरफ्तारियां आदि भी हो सकें.

लेकिन यहां तक वन विभाग अपनी आंखें बन्द रखता है. इसके कुछ समय बाद वन विभाग की ओर से धारा 26 के तहत कब्जेदार को खाली कराने का नोटिस दिया जाता है. इसके बाद मामला अदालत पहुंच जाता है जहां उचित पैरवी के अभाव में कब्जेदार को ही संरक्षण मिलता रहता है. आलम यह है कि अविभाजित उत्तर प्रदेश के समय से ही करीब 39 हजार एकड़ वन भूमि पर कब्जों के खिलाफ वन विभाग द्वारा दायर मुकदमे विभिन्न अदालतों में चल रहे हैं. अवैध कब्जेदार आराम से जमीनों पर खेती करते चले आ रहे हैं.

राजनीतिक संरक्षण

इस प्रक्रिया को राजनीति का संरक्षण भी खूब मिलता है. उत्तराखंड में नैनीताल जिले के बिंदुखत्ता इलाके में 25-30 वर्ष पहले जब इस तरह के कब्जे हो रहे थे तो कांग्रेस के वरिष्ठ नेता नारायण दत्त तिवारी पर इन कब्जेदारों को संरक्षण देने के आरोप लगे थे. ऐसा ही कुछ पीलीभीत, लखीमपुर आदि जिलों में भी होता रहा.

सोनभद्र और मिर्जापुर जैसे जिलों में वन भूमि और सरकारी भूमि की बड़े पैमाने पर हुई चोरी के खिलाफ वन विभाग के एक अधिकारी एके जैन ने गंभीर रुख अपनाया था. तत्कालीन मुख्य वन संरक्षक एके जैन ने 29 दिसंबर 2014 को अपनी जांच रिपोर्ट में कहा था, ‘सोनभद्र जनपद की धारा-4 की विज्ञप्ति में लगभग 25 हजार हेक्टेयर भूमि को वन अधिनियम के प्रावधानों के विरूद्ध वन क्षेत्र से अलग कर गैर आदिवासियों तथा अन्य संस्थाओं के कब्जे में होने का अनुमान लगाया गया था. लेकिन यह आंकड़ा लगभग एक लाख हेक्टेयर है और लगातार बढ़ता जा रहा है जो गंभीर चिंता का विषय है. इसलिए इस मामले की सीबीआई जांच कराई जानी जरूरी है.’

जैन की इस रिपोर्ट में तत्कालीन वन सचिव की भूमिका को भी संदिग्ध माना गया था. इस रिपोर्ट पर तत्कालीन प्रमुख वन संरक्षक उमेंद्र शर्मा ने भी अपनी मोहर लगाते हुए इस मामले की ’किसी उच्च स्तरीय, सक्षम और निष्पक्ष संस्था’ से जांच कराने की सिफारिश की थी. लेकिन न सिर्फ यह रिपोर्ट दबा दी गई बल्कि जैन का तबादला कर दिया गया और कुछ ही दिनों में एक संदिग्ध सड़क दुर्घटना में उनकी मौत भी हो गई.

यह मामला सुप्रीम कोर्ट भी पहुंचा था. 1994 में जब वनवासी सेवा ट्रस्ट की याचिका पर सुनवाई हुई तो सुप्रीम कोर्ट भी इस खेल को जान कर हैरान हो गया. सामान्य प्रक्रिया यह है कि किसी भूमि को वन भूमि में शामिल करने के लिए सरकार धारा-4 के तहत प्रस्ताव करती है. वन अधिनियम की धारा-20 के तहत आपत्तियों की सुनवाई के बाद भूमि वन घोषित कर दी जाती है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि इस संबंध में प्रक्रिया पूरी होने के बाद भी वन बंदोबस्त अधिकारी सुनवाई करते रहे और ज्यादातर मामलों में वन भूमि को वन क्षेत्र से बाहर करने का काम करते रहे जिसका फायदा अवैध कब्जेदारों को होता रहा. सुप्रीम कोर्ट ने कानून के अनुसार कार्रवाई करने का आदेश दिया. लेकिन इसके बाद भी जमीनी हकीकत में कोई बदलाव नहीं हुआ.

जमीनों पर कब्जे को लेकर सरकारी संरक्षण का एक उदाहरण मायावती सरकार में जेपी ग्रुप को 1083 हेक्टेयर जमीन देने का मामला है. पहले बंदोबस्त अधिकारी ने आपत्ति की तो उसे हटाकर नए अधिकारी को लाया गया. नए अधिकारी ने सोनभद्र के पांच गांवों में धारा-20 की कार्रवाई करते हुए जमीन जेपी ग्रुप के नाम कर दी. जबकि सुप्रीम कोर्ट की अनुमति के बिना ऐसा किया ही नहीं जा सकता था. हालांकि बाद में एनजीटी की आपत्ति के बाद जेपी ग्रुप को यह जमीन छोड़नी पड़ी और जुर्माना भी भरना पड़ा.

सिर्फ सोनभद्र जिले में ही धारा चार के तहत 2,48,312 हेक्टेयर जमीन पर सुनवाई होनी थी. लेकिन आज तक 45,517 हेक्टेयर भूमि पर ही धारा-20 की कार्रवाई हुई. यानी दो लाख हेक्टेयर से ज्यादा वन भूमि अभी भी अवैध कब्जेदारों के हाथ में है. राज्य सरकार ने अब इस मामले में जिस तरह की सक्रियता दिखाई है और रेणुका कुमार समिति को जांच के जो-जो मुद्दे सौंपे हैं उसके बाद यह संभावना दिखाई दे रही है कि उत्तर प्रदेश में वन भूमि पर कब्जों का बरसों पुराना खेल खत्म हो सकेगा और इसमें शामिल रहे अधिकारियों, नेताओं, दबंगो और वन भूमि पर कब्जा करके अरबपति बने कब्जेदारों को सजाएं मिलेंगी. इस मामले में भूमिहीन ग्रामीणों और वनवासियों को भी यह उम्मीद बंध रही है कि योगी सरकार अपने वादे के मुताबिक खाली कराई गई जमीन उन्हें बांट देगी.