मुझे याद है कि मैंने 1983 में सदमा देखी थी. सिनेमा हॉल से मैं बेहद दुखी होकर निकला था. मेरा गला सूख रहा था और घर पहुंचने के बाद दो दिनों तक खाना खाने या किसे से बात करने का मन ही नहीं किया. मैंने कभी नहीं सोचा था कि एक फिल्म किसी इंसान पर इस तरह का असर भी छोड़ सकती है. मैं तब सिर्फ बीस साल का था. उस वक्त तो मैं सोच भी नहीं सकता था कि एक दिन मैं श्रीदेवी के साथ काम करूंगा.

मुझे श्रीदेवी की आंखों ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया. यूं लगता था कि जैसे उनकी आंखें उनकी रूह में झांकने की खिड़कियां हैं. उनकी आंखें एकदम पारदर्शी-सी थीं, और फिर भी उनमें दर्शकों की खातिर बेबाक भावनाओं को बेहद उम्दा और ‘इंसानी’ भावनाओं में तब्दील कर देने का हुनर था. मैं उन्हें देखकर हैरत में था.

जब मैं उनसे पहली बार मिला तो बस इतना ही कह पाया, ‘सदमा देखने के बाद मुझसे दो दिनों तक खाया नहीं गया.’ श्रीदेवी ने मेरी ओर देखा और अचानक उनकी आंखें भर आईं. मुझे पूरा यकीन है कि मेरी इस स्वीकारोक्ति में उन्हें मेरी ईमानदारी दिखाई दे गई थी. श्रीदेवी हल्के से मुस्कुराईं और कहा, ‘थैंक यू.’ और हमने इंग्लिश विंग्लिश की रिहर्सल शुरू कर दी.

अगले घंटे, दिन, हफ्ते, महीने... जो मैंने उनके आस-पास रहते हुए गुजारे, उस दौरान मुझे समझ में आ गया कि मैं अभी तक जितने एक्टरों से मिल चुका हूं, श्रीदेवी उनमें सबसे संवेदनशील और सबसे खामोश एक्टर हैं जिन्होंने एक उम्दा कलाकार के स्तर तक खुद को लाने के लिए बहुत कड़ी मेहनत की है. मुझे लगता है कि वे यह बात समझती थीं कि भारतीय दर्शकों से भारतीय तरीके में ही संवाद करना होगा.

हमारी प्राचीन और पारंपरिक नाट्यशैलियों, खासकर कुड़ियट्टम और कथकली में कलाकार आपस में भी बात कर रहे हों तब भी हमेशा दर्शकों से ही रूबरू रहते हैं. वे दर्शकों का पूरा सम्मान करते हैं और उनका उद्देश्य दर्शकों को एक उदात्त सत्य तक ले जाना होता है. किसी भी पारंपरिक भारतीय शैली का यही मूल उद्देश्य है – दर्शकों को सूक्ष्म से उदात्त की ओर ले जाना.

हालांकि बहुत सारे आधुनिक भारतीय कलाकार, चाहे वे ड्रामा स्कूलों में प्रशिक्षित हुए हों या नहीं, अभिनय की पाश्चात्य शैली से ज्यादा प्रभावित रहे हैं, जहां माना जाता है कि कलाकार और दर्शक के बीच में हमेशा एक चौथी दीवार बनी रहती है. इसके जरिए दर्शक अभिनेता के जीवन में चुपके से झांक सकते हैं. इसलिए कुछ हद तक ये मान बैठना कि सामने दर्शक हैं ही नहीं, कतई सच नहीं हो सकता. अगर पूरी तरह झूठ न भी हो तो ये आधा सच तो जरूर है कि सिनेमा के दर्शक हमारे सामने कहीं नहीं हैं.

कारण तो मुझे ठीक-ठीक नहीं मालूम, लेकिन हो सकता है हिंदुस्तानी शास्त्रीय नृत्य में उनके प्रशिक्षण की वजह से हमेशा ऐसा लगता था कि श्रीदेवी का अपने दर्शकों के साथ एक किस्म का पवित्र रिश्ता है. इसलिए श्रीदेवी हमेशा दर्शकों के लिए अभिनय किया करती थीं. इसलिए नहीं कि उन्हें कोई दिखावा करना था, बल्कि इसलिए क्योंकि स्क्रिप्ट की गहरी सच्चाई को बरकरार रखते हुए वे अपने अलग-अलग किरदारों में अपनी जान डाल दिया करती थीं. श्रीदेवी अपने तरह की खास अभिनेत्री थीं. कैमरे के लिए अभिनय करते हुए भी उनकी एक्टिंग कभी-भी नकली नहीं लगी.

दूसरी ओर ऐसे कई भारतीय एक्टर हैं जो कैमरे के लिए अभिनय करते हैं, लेकिन उस लम्हे या उस स्थिति की सच्चाई के बगैर; और इसलिए उनकी एक्टिंग हम पर गहरा असर नहीं डाल पाती. श्रीदेवी की ‘कॉमिंग टाइमिंग’ के बारे में बहुत कुछ कहा जा चुका है. संदर्भ हल्का-फुल्का या संजीदा हो सकता है. लेकिन एक सीन या अपने सह-अभिनेता की एक्टिंग से तारतम्य बिठाते हुए एक्टिंग में अपनी प्रतिक्रिया देना एक एक्टर के तौर पर हर सीन में उनके अतिसंवेदनशील और जागरूक बने रहने का नतीजा है.

मुझे लगता है कि श्रीदेवी की चुप्पी का अभ्यास (इस बारे में कई लोगों ने बात की है कि कैसे श्रीदेवी फिल्म सेट पर खामोश रहती थीं) दरअसल उनकी ‘परफेक्ट टाइमिंग’ का कारण था. मुझे लगता है कि सेट पर खामोश रहकर वे अपनी ऊर्जा जाया होने से बचाती रहती थीं.

यह शांत चुप्पी उनकी गहरी संवेदनशीलता और मर्यादा का कारण भी थी. मैं देख रहा हूं कि आजकल के एक्टरों में इस शिष्टता, मर्यादा या संवेदनशीलता की उस गहराई की सख्त कमी है जो श्रीदेवी में हुआ करती थी. विशुद्ध भारतीय स्टाइल में एक्टिंग करने वालीं श्रीदेवी एक खास एक्टर थीं. काश वे आज जिंदा होतीं. काश उनका हुनर और लोगों में भी होता. काश इंग्लिश विंग्लिश 2 बनाई जा सकती.

(आदिल हुसैन का श्रीदेवी से जुड़ा यह संस्मरण हिंदी युग्म और वेस्टलैंड प्रकाशन से प्रकाशित किताब ‘श्रीदेवी रूप की रानी’ से लिया गया है. श्रीदेवी के फिल्मी करियर की कहानी कहने वाली इस किताब को ललिता अय्यर ने लिखा है)